क्या सफूरा ज़रगर को मिल रही है मुसलमान होने की सज़ा?

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कुछ दिन पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने नागरिक संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन के एक प्रमुख कार्यकर्ता और जामिया मिलिया इस्लामिया की शोध छात्र सफूरा ज़रगर को जमानत दी। उनकी ज़मानत के बाद यह आशा की जा रही है कि जेल में बंद बाकी सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जल्द ही जमानत हासिल हो जाएगी। गर्भवती सफूरा पिछले ढाई महीने से जेल में बंद थीं। उन पर अवैध गतिविधियां (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) जैसा काला कानून लगाया गया है, जिसमें जमानत मिलना बहुत मुश्किल होता है।

यही नहीं, पुलिस को दिए गए इकबालिया बयान को भी सबूत के तौर पर स्वीकार किया जा सकता है। न्याय की भावना के खिलाफ, अभियुक्त को यह साबित करने के लिए कहा जाता है कि कैसे वह आतंकवादी नहीं है। यही वजह है कि जब सफूरा को जमानत मली तो बहुत सारे लोगों के लिए यह किसी ‘चमत्कार’ से कम नहीं था।

27 साल की सफूरा ज़रगर, जम्मू और कश्मीर के किश्तवाड़ जिले की रहने वाली हैं। वह जामिया मिलिया इस्लामिया में समाजशास्त्र विभाग में एक रिसर्च स्कालर हैं। उन्हें 10 अप्रैल को दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था। उन पर सड़क को अवरुद्ध करने और यातायात में बाधा डालने का आरोप लगाया गया था। मगर उनकी गिरफ्तारी के तीन दिन बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया था, लेकिन पुलिस की मंशा कुछ और ही थी।

मुस्लिम विरोधी मानसिकता के साथ काम करते हुए, दिल्ली पुलिस ने सफूरा पर एक यूएपीए लगाया और उन्हें फिर से गिरफ्तार कर लिया। पुलिस नहीं चाहती थी कि सफूरा को इतनी जल्दी रिहा किया जाए। 

दरअसल सफूरा के खिलाफ कोई मामला बनता भी नहीं। सीएए विरोधी प्रदर्शन पूरी तरह से शांतिपूर्ण था। विरोध करने वालों ने कोई ऐसी हरकत नहीं की जिस से कोई हिंसा भड़की हो। प्रदर्शनकारी अम्बेडकर और भगत सिंह के नारे लगा रहे थे। उनके हाथों में राष्ट्रीय ध्वज था। वे संविधान की प्रस्तावना का पाठ कर रहे थे। अगर वे यह सब नहीं भी करते तब भी लोकतंत्र में विरोध प्रकट करने का अधिकार होता है। अगर विरोध के लिए किसी लोकतंत्र में ‘स्पेस’ न हो, तो समझ लीजिये कि वह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है।

पुलिस भी अन्दर से यह जानती है कि सफूरा ज़रगर के खिलाफ कोई मामला बनता भी नहीं है। मगर जब आदेश ऊपर से हों तो पुलिस भी वही करती है जो उसे करने के लिए कहा जाता है। पुलिस से कहा गया कि सीएए का विरोध करने वालों को पकड़ा जाये और फरवरी के दिल्ली दंगों के लिए उन्हें कुसूरवार ठहराया जाए। 

विडम्बना देखिये कि जिन्होंने देश के संविधान को बचाने के लिए संघर्ष किया उनको जेल मिली। संविधान की रक्षा के लिए सफूरा जरगर भी एक बहादुर सैनिक की तरह लड़ रही थीं। वह अन्याय के खिलाफ आवाज उठा रही थीं। सफूरा की संविधानिक लड़ाई मनु स्मृति में यकीन रखने वालों के दिलों में कांटे की तरह चुभ रही थी। फिरका परस्तों को तो सिर्फ यही दिखता है कि मुस्लिम महिला सिर्फ ‘मज़लूम’ हैं। मुस्लिम ख़वातीन की यही छवि मीडिया ने बनाई थी, जिसे तीन तलाक विवाद के दौरान भुनाया गया। लेकिन जब ‘मज़लूम’ मुस्लिम महिलाएं सीएए आंदोलन में आगे आईं और देश और संविधान को बचाने के लिए कसमें खाईं, तो हिंदुत्व शक्तियों के होश उड़ गए!

मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर काम करने वाली हिंदुत्व की सरकार यह कैसे बर्दाश्त कर सकती थी कि मुस्लिम खवातीन और नौजवान आन्दोलन में हिस्सा लें और कई जगहों पर वे कयादत की कमान संभालें? तभी तो एक बड़ी साजिश रची गयी और सीएए के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने वाले प्रदर्शनकारियों पर हिंसक हमला करवाया गया। जब यह सब भी विफल हो गया, तो दंगे भड़काने के लिए कट्टरपंथियों को खुली छूट दी गई। दंगाइयों पर नकेल कसने के बजाय, उलटे सीएए विरोधी कार्यकर्ताओं को पकड़ा गया। सफूरा ज़रगर और अन्य के खिलाफ इसी साजिश के तहत यूएपीए के तहत मुक़दमे दर्ज किए गए हैं और उन्हें जेल में डाल दिया गया है।

जो लोग वास्तव में दिल्ली के दंगों के ‘मास्टर माइंड’ हैं और जिन्होंने भीड़ इकट्ठा कर पुलिस को धमकी दी कि अगर सीएए विरोधी धरनों को जल्द ही हटाया नहीं गया, तो वे खुद उन्हें हटाने (पढ़िए उन पर हमला करने) के लिए आगे आ जायेंगे। क्या पुलिस और मीडिया को यह बात नहीं पता है कि दंगे होते नहीं, बल्कि कराये जाते हैं? जब तक प्रशासन और सरकार दंगे नहीं कराना चाहती, तब तक किसी एक व्यक्ति या समूह के लिए दंगे भड़काना और उसे बनाए रखना आसान नहीं है।

लेकिन पुलिस और प्रशासन सत्ता में बैठे राजनेताओं के दबाव में काम कर रही है। सफूरा और उनके जैसे प्रदर्शनकारियों को मुस्लिम-विरोधी पूर्वाग्रह की वजह से ‘टारगेट’ किया जा रहा है। हालाँकि सीएए के विरोध में बहुत सारे गैर मुस्लिमों को भी निशाना बनाया गया है, मगर मुसलमान राज्य के दमन का सब से ज्यादा शिकार हुए हैं। 

मीडिया भी इस मुस्लिम विरोधी राजनीति का हिस्सा बना हुआ है। वह आँख बंद कर सरकार के एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है। इसी एजेंडे के तहत काम करते हुए, मीडिया, खास कर हिंदी समाचारपत्र और हिंदी न्यूज़ चैनल, लगातार सफूरा के खिलाफ खबर फैला रहा है। मीडिया की बेईमानी देखिये कि जब सफूरा जमानत पर जेल से बाहर आई, तो हिंदी समाचार पत्रों ने इस खबर को प्राथमिकता नहीं दी। यह उनकी मुस्लिम विरोधी मानसिकता नहीं है तो और क्या है? 

सफूरा के जमानत पर रिहा होने के अगले दिन (जून 24), हिंदी अखबारों ने जमानत की खबर को नज़रंदाज करते हुए इसे अन्दर के पेज पर धकेल दिया। दिलचस्प बात यह है कि उसी दिन, इन अखबारों ने ईडी की ‘रेड’ वाली खबर को प्रथम पेज पर जगह दी। फ्रंट पेज पर यह खबर छापा गया कि ईडी ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता ताहिर हुसैन के घरों पर छापा मारा है। उस दिन के अख़बारों को पढ़कर ऐसा लग रहा था कि मीडिया के लिए एक मुस्लिम नेता के घर पर छापा मारे जाने की ख़बर एक गर्भवती मुस्लिम छात्र की ज़मानत से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है।

मगर यही मीडिया निर्दोष मुसलमानों के रोने की आवाज़ अनसुना कर देता है और न ही अल्पसंख्यकों के सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन पर ज्यादा खबर ही छपती है। उसकी अक्सर यही कोशिश होती है कि ऐसी खबरें लगाई जायें जिस से यह साबित किया जा सके कि मुसलमान ‘सच्चे देशभक्त’ नहीं होते। वे ‘राष्ट्र-विरोधी’ गतिविधियों में शामिल हैं, ऐसी भी खबर को खूब हवा दी जाती है।

यह सब देखकर, ऐसा लगता था कि मुख्या धारा का मीडिया, खासकर हिंदी समाचार पत्र और न्यूज़ चैनल, मुसलमानों के बारे में नकारात्मक खबरें प्रकाशित करने में अधिक रुचि रखते हैं। यदि किसी मुस्लिम को गिरफ्तार किया जाता है और उसके खिलाफ आरोप लगाया जाता है कि वह “अवैध” गतिविधियों में शामिल है, तो यह लीड खबर बनती है। दूसरी तरफ, मुसलमानों के रोज़ी और रोटी के सवाल दरकिनार कर दिए जाते हैं। इसी पूर्वाग्रह का शिकार सफूरा और अन्य मुस्लिम कार्यकर्ता भी बने हैं।

(अभय कुमार एक स्वतंत्र पत्रकार हैं। इससे पहले वह ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ काम कर चुके हैं। हाल के दिनों में उन्होंने जेएनयू से पीएचडी (आधुनिक इतिहास) पूरी की है। अपनी राय इन्हें आप [email protected] पर मेल कर सकते हैं।)

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