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चोट अर्णब को लगी, घायल हुए मोदी!

हम अपनी नागरिकता बोध खोते जा रहे हैं और एक कबीलों के देश में परिवर्तित होते जा रहे हैं। अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी के मसले पर सामने आयी प्रतिक्रियाएं कुछ इसी तरफ इशारा करती हैं। ऐसा नहीं है कि हर किसी ने उसी तरह की प्रतिक्रिया दी है। तार्किक और तथ्यात्मक तथा ईमानदारी से चीजों को देखने और समझने वाले तथा न्याय में यकीन रखने वाले एक हिस्से ने बेहद संयमित और वाजिब प्रतिक्रिया जाहिर की है। लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान कहिए या फिर कथित राष्ट्रवादी धारा से जुड़े हिस्से ने एक बार फिर अंधभक्तों जैसा ही व्यवहार किया है। शुरुआत गिरफ्तारी के मुद्दे से ही करते हैं। अवलन तो यह गिरफ्तारी अर्णब के किसी पत्रकारिता से जुड़े मसले पर नहीं हुई है। इसलिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता या फिर किसी पत्रकार को बेवजह परेशान करने का मामला ही नहीं बनता।

इस केस में एक चैनल के मालिक ने किसी शख्स या फिर उसकी कंपनी से काम करवाया और उसके काम के एवज में उसके 5 करोड़ बकाए का भुगतान नहीं किया। बार-बार तगादे से थक हार कर संबंधित शख्स ने अपनी मां के साथ आत्महत्या कर ली। और वह अपने पीछे एक सुसाइड नोट छोड़ गया जिसमें अर्णब गोस्वामी समेत उनकी कंपनी के दो और लोगों के नाम हैं। इसमें उसने साफ-साफ लिखा है कि वह यह आत्महत्या अपना बकाया न मिल पाने और उससे खड़ी हुई परेशानी के चलते कर रहा है। अन्वय नाइक नाम के इस शख्स और उसकी मां कुमुद ने यह खुदकुशी 2018 में की थी। एक नागरिक के तौर पर क्या इस देश में अन्वय को न्याय पाने का अधिकार नहीं है? क्या उसकी पत्नी और बहन को यह हक नहीं है कि वह सूबे और देश की सरकारों के सामने अपने भाई-पति और मां के लिए न्याय की गुहार लगा सकें? इस मसले को तवज्जो न देने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वही अर्णब गोस्वामी जो अपने साथ राजनीतिक बदले की कार्रवाई का गाना गा रहे हैं।

अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता है जब ठीक इसी तरह के एक मसले पर तीन महीने तक पूरे देश को परेशान कर रखे थे। दिन-रात रिपब्लिक टीवी पर एक ही खबर चलती थी वह थी सुशांत आत्महत्या प्रकरण। अर्णब ने शायद ही किसी दूसरे मसले पर इतने प्राइम टाइम शो किए होंगे। जबकि इस प्रकरण में न तो कोई सुसाइड नोट था और न ही किसी तरह का कोई पुख्ता सुबूत। बावजूद इसके  महज शक की बिना पर और देश की सत्ता की जरूरतों के मुताबिक रिया चक्रवर्ती को सारे चैनलों ने हत्यारी और दोषी करार दे दिया था। और जब उसी तरह का एक दूसरा मसला सामने आया है जिसमें कि ठोस सबूत हैं तब उनके समर्थक और जमात के लोग चाहते हैं कि उस पर कोई बात ही न की जाए। या फिर उसे बिल्कुल भुला दिया जाना चाहिए। और रही पुलिस जांच और उसके द्वारा फाइनल रिपोर्ट लगाने की बात तो हमें नहीं भूलना चाहिए कि यह सब कुछ बीजेपी नेता फड़वनीस के शासन काल में हुआ है। और फड़नवीस समेत सारे बीजेपी के कद्दावर नेताओं का अर्णब प्रेम कल ट्विटर की टाइमलाइन और मीडिया में उनके बयानों के तौर पर तैर रहा था।

ऐसे में किसी के लिए भी यह समझना मुश्किल नहीं है कि फडनवीस और उनकी पुलिस ने उस मामले में ऐसा क्यों किया होगा? अब अगर उस समय अन्वय के परिवार को न्याय नहीं मिला तो क्या आगे भी उसे न्याय पाने का हक नहीं है? अगर गांधी की हत्या के 72 सालों बाद भी संघ-बीजेपी और उससे जुड़े परिवारी संगठन उसकी फिर से जांच की मांग उठा सकते हैं तो फिर दो साल पहले हुई एक आत्महत्या के मामले की भला जांच क्यों नहीं हो सकती है? और ऐसी स्थिति में जबकि सार्वजनिक तौर पर सामने आयी चीजें इस बात को दिखाती हैं कि पीड़ित और उसके परिजनों के साथ न्याय नहीं हुआ है।

इसके साथ ही कुछ लोग कल अर्णब की गिरफ्तारी के समय कथित पुलिस ज्यादती पर रणरोवन कर रहे थे। इस बात में कोई शक नहीं कि किसी भी शख्स के साथ एक सिविल नागरिक जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। लेकिन क्या यह सच है कि अर्णब के साथ पुलिस ने ऐसा कुछ किया है। सामने आए वीडियो इस बात को सिरे से खारिज करते हैं। जबकि उल्टे अर्णब तकरीबन 20 मिनट तक अपने सोफे पर बैठे रहे और वह सामने मौजूद पुलिस प्रशासन और उसकी पूरी टीम को भाषण पिलाते रहे और लगातार पुलिस के साथ न जाने पर अड़े रहे। कभी सास-ससुर से मिलने का बहाना तो कभी पत्नी से बात करने की बात कहकर समय जाया करते रहे। और किसी भी कीमत पर कमरे से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं थे।

इस बीच, लोगों की सहानुभूति हासिल करने के लिए वह लगातार खुद के ऊपर हमले और अपने बीवी और बेटे के साथ हाथापाई का पुलिस पर आरोप लगाते रहे। जबकि किसी भी वीडियो में यह बात नहीं दिखी और न ही उसका कोई दूसरा साक्ष्य सामने आया है। अब अर्णब को डिफेंड करने वालों को ज़रूर यह बात बतानी चाहिए कि आखिर पुलिस को वहां कितना इंतजार करना चाहिए था? और अर्णब को ले जाने के लिए उसे क्या करना चाहिए था? आखिर में पुलिस ने उनकी बांह पकड़ कर और पूरे सलीके से उन्हें पुलिस वैन तक ले गयी। और अब बाद में कोर्ट ने उन्हें 14 दिन के ज्यूडिशियल कस्टडी में भेज दिया है।

अर्णब की गिरफ्तारी के बाद सत्ता के खेमे से जो प्रतिक्रिया आयी है वह अभूतपूर्व है। कैबिनेट मंत्री से लेकर सूबे के मुख्यमंत्री और संघ के आला नेताओं ने इस तरह से प्रतिक्रिया दी हैं मानो उन्हें ऐसा करने के लिए ऊपर से निर्देश दिए गए हों। सब ने एक सुर में प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है। और मुंबई पुलिस के कदम को फासिस्ट बताया है। यूपी के सीएम योगी तक ने इसका प्रतिकार किया है। और इसे प्रेस पर हमला बताया है। जिन्होंने अभी कुछ दिनों पहले ही हाथरस में चार दिनों तक पत्रकारों को गांव में घुसने नहीं दिया। घटना को कवर करने जा रहे केरल के एक पत्रकार को रास्ते से उठाकर यूएपीए जैसे काले कानून के तहत जेल मे डलवा दिया।

कुछ दिनों पहले दिल्ली के एक पत्रकार प्रशांत कन्नौजिया को दो-दो बार उठवा लिया था। मिर्जापुर के एक पत्रकार के खिलाफ सिर्फ इसलिए मुकदमा दर्ज करवा दिया क्योंकि उसने मिडडे मील में मिलावट और भ्रष्टाचार के मामले को उठाया था। उनको भी अर्णब की गिरफ्तारी का दर्द हुआ है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किस चिड़िया का नाम है इस घटना के बाद ही पता चला है। राजनाथ सिंह से लेकर प्रकाश जावड़ेकर और शिवराज चौहान से लेकर स्मृति ईरानी तक ने प्रतिक्रिया देने में कोई देरी नहीं लगायी। इनसे ज़रूर यह बात पूछी जानी चाहिए कि गौरी लंकेश क्या पत्रकार नहीं थीं? या फिर उनको बोलने की आज़ादी का अधिकार हासिल नहीं था? उनकी दिनदहाड़े हत्या कर दी गयी।

क्या किसी कैबिनेट मंत्री ने उनकी हत्या की निंदा की? उनके हत्यारों की गिरफ्तारी के लिए किसी ने बयान जारी किया? देश के इतने सारे बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता और मानवाधिकार कर्मी निरपराध, निर्दोष जेल की सींखचों के भीतर महीनों और सालों से कैद हैं लेकिन उनको लेकर संघी प्रवक्ता राकेश कुमार सिन्हा को फासीवाद की याद नहीं आयी और अब जबकि अर्णब की गिरफ्तारी हुई है तो उन्हें फासीवाद का खतरा सता रहा है। और आज वह अर्णब के दरवाजे के बाद आपके दरवाजे पर होने की भविष्यवाणी कर रहे हैं।

इस पूरे प्रकरण में दिलचस्प बात यह है कि इस पूरी जमात के निशाने पर कांग्रेस है जो महाराष्ट्र में न तो तीन में है और न ही तेरह में। महाराष्ट्र में सरकार उद्धव ठाकरे की है जो शिवसेना से जुड़े हैं। और गृहमंत्री अनिल देशमुख हैं जो एनसीपी से वास्ता रखते हैं। सरकार में भी कांग्रेस तीसरे पायदान पर ही रहती है। बावजूद इसके पूरा हमला कांग्रेस पर केंद्रित है। यह बात बताती है कि इस मसले पर भी बीजेपी और संघ जमात खुली राजनीति कर रहे हैं।

इस तिलमिलाहट की वजह को समझा जा सकता है। यह संघ-बीजेपी के दिमाग पर हमला हुआ है। अर्णब की यह गिरफ्तारी उसे भविष्य के एक बड़े खतरे का संकेत दे रही है। दरअसल मीडिया में वह जमात जिसके सत्ता के साथ नाभिनाल के रिश्ते हैं और पिछले छह सालों से वह भक्त पत्रकारिता में जुटी हुई थी। इस घटना से उसके डर कर अलग हो जाने का खतरा है। क्योंकि सरकार का चारण और भाट बनकर उसने पहले ही अपनी पत्रकारिता की साख गवां दी है और अब अगर उसका व्यक्तिगत जीवन भी सुरक्षित नहीं रहेगा तो भला वह सत्ता के साथ क्यों रहेगा?

और ऊपर से इस तरह की तमाम कार्रवाइयों की न केवल आशंका बनी रहेगी बल्कि जब भी इस तरह का कोई मौका आएगा तो केंद्र सरकार उसकी रक्षा करने में अक्षम हो जाएगी। इस चीज की महज आशंका ही सरकार के साथ खड़ी मीडिया समर्थकों की व्यवस्था तास के पत्ते की तरह भरभरा कर गिर जाएगी। और सरकार ने इस खतरे को सूंघ लिया है इसीलिए उसने अर्णब के पीछे अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। जिससे वह भले ही अर्णब को न बचा पाए लेकिन इस बात का एहसास ज़रूर करा दे कि इस तरह के किसी भी मौके पर पूरी जमात संबंधित शख्स के साथ खुलकर खड़ी होगी।

(महेंद्र मिश्र जनचौक के संपादक हैं।)

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This post was last modified on November 5, 2020 7:22 pm

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