Tuesday, November 29, 2022

जस्टिस रमना ने राजद्रोह कानून पर लिया था ऐतिहासिक निर्णय पर संवैधानिक मामलों पर रही चुप्पी

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देश के 48वें मुख्‍य न्‍यायाधीश जस्टिस एन वी रमना आज रिटायर हो गये। उन्‍होंने 24 अप्रैल, 2021 को सीजेआई (चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया) के रूप में अपने पद की शपथ ली थी। रमना ने जस्टिस बोबडे की जगह ली थी, जो 23 अप्रैल, 2021 को सेवानिवृत्‍त हुए। मुख्‍य न्‍यायाधीश के रूप में जस्टिस रमना ने अपने कार्यकाल में कई अहम मामलों की सुनवाई की और उनके फैसले लिए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट में बड़ी संख्या में संविधान पीठ के समक्ष लंबित महत्वपूर्ण मामलों पर चीफ जस्टिस रमना ने चुप्पी साध रखी थी, जो कि दूरगामी नतीजों वाले साबित हो सकते थे। आज अपने कार्यकाल के अंतिम दिन यानि सेवानिवृत्‍त होने के मौके पर उन्होंने तीन आदेश/फैसले दिए।

सीएम योगी पर नहीं चलेगा केस: यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ को आज बड़ी राहत मिल गई। सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने ने भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन पर मुकदमा चलाने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। यह मामला 2007 का है। यूपी सरकार ने मई 2017 में इस आधार पर मुकदमे की अनुमति देने से मना कर दिया था कि सबूत नाकाफी हैं।

इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड सीमा शुल्क अधिनियम पर हावी होगा 

मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना, जस्टिस हिमा कोहली और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने माना कि सीमा शुल्क अधिनियम पर दिवाला और दिवालियापन लागू होगी। पीठ ने कहा कि सीमा शुल्क प्राधिकरण केवल शुल्क और उगाही निर्धारित कर सकता है लेकिन वसूली की कार्यवाही शुरू नहीं कर सकता।

मुफ्त में चीजें बांटने का मुद्दा: सुप्रीम कोर्ट ने मामले को 3 जजों की बेंच के हवाले किया

सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों द्वारा किए गए वादों और मुफ्त में चीजें बांटने से संबंधित मुद्दों को तीन-जजों की पीठ के पास भेज दिया है। सीजेआई एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि पक्षकारों द्वारा उठाए गए मुद्दों पर व्यापक सुनवाई की आवश्यकता है। कुछ प्रारंभिक सुनवाई को निर्धारित करने की आवश्यकता है, जैसे कि न्यायिक हस्तक्षेप का दायरा क्या है, क्या अदालत द्वारा विशेषज्ञ निकाय की नियुक्ति किसी उद्देश्य की पूर्ति करती है, आदि। कई पक्षों ने सुब्रमण्यम बालाजी में यह निर्णय भी प्रस्तुत किया। पुनर्विचार की आवश्यकता है।

पेगासस मामला 

भारत के राजनेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की जासूसी किए जाने वाले पेगासस जासूसी मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमना, जस्टिस सूर्यकांत और हिमा कोहली की बेंच ने की। अदालत ने मामले की जांच कर रही टेक्निकल कमेटी को मई में 4 हफ्तों का समय दिया था। जिसमें कहा गया था कि वह इस दौरान अपनी अंतिम रिपोर्ट इस दौरान सौंप दें। उनके रिटायर होने से एक दिन पहले यानि कि 25 अगस्‍त को ही सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट पर सुनवाई की।

बिलकिस बानो गैंगरेप मामला 

बिलकिस बानो गैंगरेप मामला एक बार फिर से चर्चा में है क्‍योंकि गुजरात सरकार ने छूट नीति के तहत इसमें शामिल सभी ग्‍यारह आरोपियों को रिहा कर दिया। इसे लेकर हलचल शुरू होते ही सुप्रीम कोर्ट की तरफ से गुजरात सरकार को नोटिस भेजा गया जिसके तहत मामले की सुनवाई फिर से होगी। इस मामले की भी सुनवाई गुरुवार को जस्टिस एन वी रमना, जस्टिस अजय रस्‍तोगी और विक्रम नाथ की बेंच ने की।

महाराष्ट्र संकट मामला

मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने महाराष्‍ट्र में शिवसेना पर अधिकार को लेकर सीएम एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे के गुट के बीच चल रही लड़ाई और 16 बागी विधायकों को अयोग्‍य ठहराए जाने के मामले की भी सुनवाई की। इस पर बीते मंगलवार को फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को पांच जजों की संविधान पीठ को सौंप दिया जिसके तहत अब पीठ इससे संबंधित फैसले तय करेगी।

पीएमएलए मामला 

जस्टिस रमना, जस्टिस माहेश्‍वरी और जस्टिस सीटी रविकुमार की पीठ ने कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को दो विशिष्ट मुद्दों पर नोटिस जारी किया, जिन पर उनकी राय में, फिर से विचार करने की आवश्यकता थी। पीठ ने सुनवाई की अवधि को बढ़ाते हुए कहा कि अब इसकी सुनवाई 4 हफ्ते बाद होगी।

पीएम सिक्योरिटी ब्रीच मामला 

पंजाब में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  की सुरक्षा में हुई गंभीर चूक के मामले की जांच के लिए 12 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एक कमेटी बनाई। कमेटी की अध्‍यक्षता सेवानिवृत्त जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने की।गुरुवार को कमेटी की रिपोर्ट को प्रस्‍तुत करते हुए सीजेआई रमना  की पीठ ने कहा कि अब इसे आगे की कार्रवाई के लिए केंद्र के पास भेजा जाएगा और अब केंद्र ही इस पर एक्‍शन लेगा। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में फिरोजपुर के एसएसपी को जरूरी कार्रवाई करने में विफल रहने का दोषी पाया।

राजद्रोह मामला 

जस्टिस रमना, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस हिमा कोहली की एक पीठ ने राजद्रोह कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर दस मई को सुनवाई की थी और इस पर एक ऐतिहासिक फैसला लिया था। पीठ ने यह आदेश दिया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 124A के तहत 162 साल पुराने राजद्रोह कानून को तब तक स्थगित रखा जाना चाहिए जब तक कि केंद्र सरकार इस प्रावधान पर पुनर्विचार नहीं करती। कोर्ट ने यह भी कहा कि राजद्रोह के मामले में जो भी लोग जेल में बंद हैं वे अब अपनी जमानत याचिका दाखिल कर सकते हैं।

चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता में पांच जजों की पीठ ने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को रद्द करने के केंद्र सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को सात जजों की पीठ को भेजने से इनकार कर दिया था। वो पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने नवंबर 2019 में कहा था कि सीजेआई का पद सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत सार्वजनिक अथॉरिटी है। सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2019 के फैसले में यह भी कहा कि ‘जनहित’ में सूचनाओं को उजागर करते हुए ‘न्यायिक स्वतंत्रता को भी दिमाग में रखना होगा।

जस्टिस रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने एक अन्य महत्वपूर्ण फैसले में जनवरी, 2020 में फैसला सुनाते हुए कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और इंटरनेट पर बिजनेस करना संविधान के तहत संरक्षित है और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को प्रतिबंध के आदेशों की तत्काल समीक्षा करने का निर्देश दिया था।

एनवी रमना सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों वाली उस बेंच का भी हिस्सा रहे हैं, जिसने 2016 में अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस की सरकार को बहाल करने का आदेश दिया था। नवंबर 2019 में जस्टिस एनवी रमना की अगुवाई वाली बेंच ने महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस को सदन में बहुमत साबित करने के लिए शक्ति परीक्षण का आदेश दिया था। चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने उस याचिका पर भी सुनवाई की थी, जिसमें पूर्व एवं मौजूदा विधायकों के खिलाफ आपराधिक मामलों के निस्तारण में बहुत देरी का मुद्दा उठाया गया था।

जस्टिस रमना के कार्यकाल के दौरान कुछ महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप भी सामने आए। बतौर सीजेआई पदभार संभालने के कुछ ही महीनों के भीतर जस्टिस रमना ने पेगासस स्पाइवेयर मामले से जुड़ी याचिकाओं के एक बैच को सुना। अक्टूबर, 2021 में उनके नेतृत्व वाली एक पीठ ने आरोपों की जांच के लिए एक पैनल बनाया और मामले में जांच कराई। पीठ ने केंद्र सरकार के इनकार पर प्रतिकूल टिप्पणी करते हुए कहा कि वह स्पष्ट तौर पर बताए कि उसने स्पाइवेयर का इस्तेमाल किया है या नहीं।

रमना की पीठ ने लखीमपुर खीरी मामले में भी कड़ा रुख अपनाया, जिसमें केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा पर वाहन से कुचलकर आठ लोगों की जान ले लेने का आरोप था। उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश—जिसमें आशीष मिश्रा को जमानत दी गई थी—को चुनौती देने से इनकार किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह जमानत रद्द कर दी।

फिर, इस साल मई में रमना की पीठ ने ब्रिटिशकालीन राजद्रोह कानून (भारतीय दंड संहिता की धारा 124 ए) के तहत आपराधिक परीक्षण और अदालती कार्यवाही को निलंबित कर दिया, जबकि भारत संघ को दंडात्मक प्रावधान पर पुनर्विचार करने की अनुमति दी। यह आदेश इस धारा की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं पर सुनवाई के बाद दिया गया और केंद्र सरकार की तरफ से इसे स्वीकार करते हुए इस पर ‘पुनर्विचार’ की जरूरत बताई गई।

रमना ने ट्रिब्यूनल में रिक्तियों से जुड़े मसले पर भी कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने ट्रिब्यूनल में फास्ट-ट्रैक नियुक्तियों के प्रति गंभीर न होने को लेकर कई मौकों पर केंद्र सरकार की खिंचाई की।

संवैधानिक मामले अनसुने रहे

हालांकि, उनके आलोचक संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किए जाने, नागरिकता (संशोधन) अधिनियम और चुनावी बांड की वैधता को चुनौती दिए जाने जैसे कई महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों को सूचीबद्ध न किए जाने पर सवाल उठा रहे हैं। ये केस उनके पूर्ववर्तियों के समय भी लंबित रहे हैं।

हिजाब मामले में याचिकाकर्ताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने कहा कि कई बार उल्लेख करने के बावजूद इस मामले को कभी सूचीबद्ध नहीं किया गया।

जस्टिस रमना के कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट के साथ-साथ उच्च न्यायालयों में भी बड़े पैमाने पर न्यायिक नियुक्तियां हुईं, जिससे रिक्तियां 2016 के बाद से अपने निम्नतम स्तर पर आ गईं। उनके नेतृत्व में कोलेजियम ने हाई कोर्टों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए 250 से अधिक सिफारिशें कीं। इसने उन नामों को भी दोहराया जो पहले सरकार की तरफ से लौटाए जा चुके थे और इनमें से कुछ की नियुक्तियों को अंततः मंजूरी भी मिल गई।

जस्टिस रमना के पदभार संभालने के चार महीने बाद अगस्त 2021 में उच्चतम न्यायालय में नौ न्यायाधीशों की नियुक्ति हुई, जबकि अन्य दो ने इस साल मई में शपथ ली। पहले नियुक्त नौ न्यायाधीशों में तीन महिलाएं शामिल हैं, जिनमें एक अनुसूचित जाति और दूसरी अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित हैं। तीन महिला न्यायाधीशों में से एक जस्टिस बी.वी. नागरत्ना 2024 में पहली महिला सीजेआई बनने जा रही हैं।

जस्टिस रमना के कार्यकाल के दौरान सरकार ने भी सबसे अधिक नियुक्तियों पर मुहर लगाई, जब 266 न्यायाधीशों को हाई कोर्टों में नियुक्त किया गया, जबकि जस्टिस बोबडे के समय यह आंकड़ा 104 और जस्टिस रंजन गोगोई के 13 महीनों के कार्यकाल के दौरान 107 रहा था।

कानून और न्याय मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 1 जुलाई तक हाई कोर्टों में न्यायाधीशों के 1,108 स्वीकृत पद संख्या के मुकाबले केवल 381 रिक्तियां हैं। इस साल जनवरी और फरवरी में ये रिक्तियां 411 थीं, जबकि मार्च में यह आंकड़ा 387 और अप्रैल में 391 रहा।

बार को जस्टिस रमना के कार्यकाल के दौरान एक समस्या अनसुलझी रहने को लेकर शिकायत है, और वह मामलों को सूचीबद्ध करने के तरीके से जुड़ी है। वकीलों को अक्सर शिकायत रहती है कि अदालत की तरफ से उनकी लिस्टिंग का आदेश होने के बावजूद मामलों को हटा दिया जाता है। इसे लेकर खासी नाराजगी रही, जिसकी वजह से अधिवक्ताओं को हर सुबह जस्टिस रमना की अदालत के सामने लाइन लगाने को बाध्य होना पड़ता था।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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