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विपक्ष की गैर मौजूदगी में लेबर कोड बिल लोकसभा से पास, किसानों के बाद अब मजदूरों के गले में फंदा

मोदी सरकार ने किसानों के बाद अब मजदूरों का गला घोंटने की तैयारी कर ली है। इस सिलसिले में उसके द्वारा तैयार लेबर कोड बिल आज विपक्ष की गैर मौजूदगी में लोकसभा से पास हो गया। इसके तीन हिस्से हैं। इंडस्ट्रियल रिलेशन कोड बिल, 2020; कोड ऑन सोशल सेक्योरिटी बिल, 2020 और आक्युपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एण्ड वर्किंग कंडिशन कोड बिल, 2020। ये तीनों बिल पिछले शनिवार को लोकसभा में पेश हुए थे। इनके तहत डिजिटल-वेब दुनिया और ठेका और अनौपचारिक शर्तों के साथ काम करने वाले मजदूर, जिन्हें अंग्रेजी में गिग वर्कर्स के नाम से जाना जाता है, को भी ‘सुरक्षा’ के घेरे में लाया गया है, जिसके तहत सरकार की अनुमति के बिना भी वे मजदूरों को काम पर रख और निकाल सकते हैं।

इंडस्ट्रियल कोड बिल, 2020 में सरकार का प्रस्ताव मजदूरों की हड़ताल के अधिकार को और भी नियंत्रित करने का है, जबकि उनकी छंटनी और काम से बाहर करने का अधिक अधिकार कंपनियों को दिया जाएगा। पहले 100 मजदूरों तक वाली फैक्टरी शॉप में छंटनी और काम से बाहर करने के लिए सरकार से अनुमति की जरूरत नहीं थी। अब इसे 300 मजदूरों की क्षमता तक में इस कार्रवाई की खुली छूट का प्रस्ताव पेश कर दिया गया है।

पूंजी-मालिकानों को मजदूरों के काम के हालात को और भी बदतर बनाने की पूरी छूट देने की तैयारी चल रही है। मजदूरों के लिए काम करने वाली स्टैंडिंग कमेटी ने अप्रैल महीने में ही इस सुझाव को भेज दिया था। ऐसा किस आधार पर किया गया? क्या मजदूरों की हड़तालों की इतनी संख्या या पूंजी पर श्रम का इतना अधिक भार बढ़ गया था, जिसके आधार पर निर्णय लिया गया? इस मसले की जरूर ही जांच होनी चाहिए और सवाल उठाना चाहिए। पहली बात, मार्च और अप्रैल के महीने में कोविड-19 के चलते लॉकडाउन का निर्णय सरकार का था, मजदूरों का नहीं। दूसरा, भारत में पहले से चली आ रही मंदी का कारण श्रम की उत्पादकता नहीं है। यह मुख्यतः पूंजी का सापेक्षिक पिछड़ापन और घरेलू बाजार में आती गिरावट है। ऐसे में मजदूर कम कर मजदूरों से अधिक काम कराना या सापेक्षिक घाटा होने पर फैक्टरी बंद कर देने से न तो मंदी दूर होगी और न ही औद्योगिक विकास की कोई संभावना बनेगी।

इस कोड बिल को मजदूर-पूंजी संबंध को ‘फ्लैक्सिबल’ बनाने के नाम पर पेश किया गया। दरअसल यह फैक्टरी शॉप, मालिकों को मजदूरों के खिलाफ ‘मशैल फ्लैक्श’ करने का बिल है। यदि हम नोएडा, फरीदाबाद, गुरुग्राम, दिल्ली और नरेला-सोनीपत औद्योगिक इलाकों में मजदूरों के आंदोलन और उनके खिलाफ जघन्य कारनामों का रिकार्ड देखें, तब आपको सबसे अधिक मसले प्रबंधकों द्वारा मजदूरों के साथ दुर्व्यवहार, काम के घंटे, मजदूरी की अदायगी, संगठन बनाने का अधिकार, फैक्टरी शॉप पर दुर्घटनाएं और फैक्टरी शॉप में आग और विस्फोट सबसे अधिक दिखाई देंगे। ऐसे में मालिकों को मनमानेपन की और भी छूट देने का इससे अधिक अर्थ क्या रह जाता है कि वे मजदूरों को फैक्टरी में गुलाम बनाकर काम कराएं! यह बिल औद्योगिक स्लेवरी का दौर शुरू करने वाला प्रस्ताव है, जिसे भारत के 1890-1930 के औद्योगिक विकास के इतिहास में देखा जा सकता है।

यह औद्योगिक कोड बिल मजदूरों के हड़ताल के अधिकार को लगभग खत्म करने का प्रस्ताव पेश करता है। मजदूर तभी हड़ताल पर जा सकते हैं जब तक कि विवाद खत्म करने का प्रयास उपयुक्त माध्यम से पूरा न कर लिया गया हो। इसके तहत कोई भी मजदूर नौकरी हासिल करने के 60 दिन के भीतर हड़ताल पर नहीं जा सकता। दूसरे जब तक मसला ट्रिब्यूनल या नेशनल इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल में चल रहा है, हड़ताल की अनुमति नहीं है। वार्ता से हासिल निर्णय या निष्कर्ष को लागू करने की प्रक्रिया के 60 दिनों के भीतर भी हड़ताल नहीं हो सकती है।

यह शर्तें कुल मिलाकर मजदूरों के हड़ताल के अधिकार को ही छीन लेती हैं। हड़ताल की सारी शर्तों को मालिक और सरकार ने हड़प लिया है। सिर्फ हड़ताल शब्द को एक पारिभाषिक शब्दावली की तरह प्रयोग किया गया है, जिससे इतना तो लगे कि औद्योगिक मसलों में मजदूर भी एक हिस्सा है। श्रम की स्टैंडिंग कमेटी ने यह भी प्रस्ताव दिया है कि सार्वजनिक सेवा क्षेत्र, जैसे पानी, बिजली, प्राकृतिक गैस, टेलिफोन और अन्य आवश्यक सेवा क्षेत्रों में हड़ताल की शर्तों को उद्यम के सभी क्षेत्रों तक विस्तारित कर दिया है। यानी उत्पादन के सारे क्षेत्र अब इसैंशियल क्षेत्र बन चुके हैं, जिसमें हड़ताल पर जाने के पहले छह हफ्ते का समय लेना होता है या हड़ताल की नोटिस देने के 14 दिन में हड़ताल पर जाया जा सकता है। जाहिर बात है कि फैक्टरी मालिक हड़ताल की नोटिस जारी किए मजदूरों के साथ सरकारी संस्थानों के साथ मिलकर या खुद की सेक्टयोरिटी व्यवस्था के माध्यम से क्या सलूक करेंगे? वैसे भी, मजदूरों को काम से निकाल देने की जो खुली छूट है, उसका प्रयोग वे बेहद ‘अहिंसक’ तरीके से करेंगे।

यह बिल मजदूरों को काम से निकाल देने के बाद ‘कुशलता बनाए रखने का फंड’ जारी करने की बात करता है। यह कितना होगा? संभवतः मजदूर के निकाले जाने के पहले वाले 15 दिन की मजदूरी के बराबर होगी। इसे कौन देगा? मालिक या सरकार या दोनों मिलकर; किस तरह से यह भुगतान किया जाएगा, यह सब अभी साफ होना है। सोशल सेक्योरिटी कोड बिल में राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड बनाने का प्रस्ताव है जिसके तहत असंगठित मजदूर, गिग यानी ठेका पर काम करने वाले आधुनिक किस्म का काम करने वाले हुनरमंद मजदूर और अस्थिर काम करने वाले मजदूर आएंगे।

इसमें गिग वर्कर्स से काम कराने वाले मालिक इसके लिए जरूरी फंड में एक से दो प्रतिशत का अनुदान करेंगे, लेकिन यह हिस्सा गिग वर्कर्स को दिए जाने वाले वेतन का पांच प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। साथ ही, अंतरराज्यीय प्रवासी मजदूरों को इस सामाजिक सुरक्षा के तहत लाया जाएगा। इनकी परिभाषा में प्रवासी मजदूर वे होंगे जो एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं और जिनकी कमाई 18 हजार रुपये प्रति माह तक है। यह बिल मजदूरों को काम की जगह पर आवास देने की अपनी जिम्मेदारी को खत्म करता है। यानी, मजदूर यदि काम की जगह के आस-पास बस गया है, उसे उजाड़ने के समय उसे बसाने की अस्थाई जिम्मेदारी भी अब सरकार नहीं लेगी। मजदूरों को एक राज्य से दूसरे राज्य आने और जाने का यात्रा भत्ता दिया जाएगा। यह जिम्मेदारी मालिक की होगी। यह रोज का भाड़ा नहीं होगा बल्कि साल में आने और जाने का भाड़ा होगा।

मजदूरों को लेकर लाए गए कोड बिल, 2020 पर अभी बात नहीं हो रही है। इस कोड बिल का कुछ हिस्सा कांग्रेस और भाजपा की सरकारें अपने-अपने राज्यों में लागू कर चुकी हैं। इसके लिए उन्होंने स्टैंडिंग कमेटी से भी आज्ञा लेने की जहमत नहीं उठाई है। केंद्र सरकार मुख्यतः इसे कानून बनाकर मसले को वैध बनाने जा रही है।

किसानों के मसले पर खूब बात हो रही है, और यह जरूर होना चाहिए। अभी भी भारत की विशाल आबादी खेत पर निर्भर है। लॉकडाउन ने खेत पर और भी दबाव बढ़ा दिया है। मोदी सरकार किसानों को आधा पेट खाकर बाजार में अनाज बेचने की व्यवस्था कर रही है, जिसमें किसानों की लागत मूल्य किसानों की जान लेने के लिए तैयार बैठी हुई है। यह भारत की एक विशाल आबादी को भूख का शिकार बनाने वाला कानून है, जिसमें करोड़ों भारतवासी अन्न की कमी से धीमी मौत मरने के लिए विवश होगा। लेकिन, दूसरी ओर मजदूरों को पूंजीपतियों, ठेका पट्टी पर काम कराने वाले मालिकों से लेकर रीयल स्टेट और भट्ठा फैक्टरियों में मजदूरों को बेहद दयनीय हालात में काम कराने वाले कानून आ रहे हैं। मजदूरों के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक अधिकारों को खत्म करने का प्रस्ताव संसद में आ चुका है। भारत की दूसरी सबसे बड़ी आबादी औद्योगिक क्षेत्र में है, जो मुख्यतः शहरों में रहती है।

लॉकडाउन में हमने मजदूरों को सड़क पर उनकी कुल जमा पूंजी के साथ देखा है। सरकार अपने नये बिल से उसे और भी बदतर हालात में ले जाने की स्थितियां बना रही है। आप कह सकते हैं कि यह सब भयावह है। यह सच है, लेकिन यदि यह सब ऐसे ही चलता रहा, जिसमें देश की 85 प्रतिशत आबादी को जिंदगी की उम्मीद के हाशिये पर फेंका जा रहा है तब यदि हम यह सब होते हुए देखना ही चाहते हैं तो हमें अभी और भी भयावह नतीजे का इंतजार करना है। जो बोल रहे हैं उनकी आवाज का गला घोंटा जा रहा है, यह भी सच है। यदि हम इस सब को वर्ग के कैटेगरी में देखें तो यह भीषण तरीके का वर्ग संघर्ष चल रहा है, सवाल यही है कि यह दुनिया कैसे बदली जाए!

(अंजनी कुमार सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)

This post was last modified on September 22, 2020 9:26 pm

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