Wednesday, May 18, 2022

ग्राउंड रिपोर्ट: सजल नेत्रों से अपने गांव को डूबते देख रहे हैं लोहारी के लोग

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लोहारी (देहरादून)। बिजली के लिए देहरादून जिले के सुदूरवर्ती लोहारी गांव को बांध के पानी में जलसमाधि दे दी गई है। वह भी गांव वालों को बिना पूरा मुआवजा दिये और बिना उनके रहने की व्यवस्था किये। इस तरह विकास के नाम पर एक और जनजातीय गांव और वहां की अनूठी संस्कृति को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया है। बेघर हुए गांव के 72 परिवारों के करीब 300 सदस्यों की चिन्ता अब आशियाने को लेकर तो है ही, इसके साथ ही उनका दुख यह भी है कि अलग-अलग जगहों पर जाकर अपनी जनजातीय संस्कृति, अपने अनूठे पर्व-त्योहार और शेष समाज से अलग तरह की अपनी परंपराओं को कैसे जीवित रख पाएंगे? 

लोहारी गांव के लोग लगातार मांग कर रहे थे कि पूरे गांव को एक ही जगह पर जमीन दे दी जाए, ताकि गांव डूब जाने के बाद भी वे एक ही जगह रहकर अपनी परंपराओं को जीवित रख सकें और आगे भी एक-दूसरे के सुख-दुख में काम आ सकें। लेकिन, सरकार ने उनकी मांग नहीं मानी। मुआवजे के मामले में भी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ, इससे पहले ही पिछले हफ्ते 48 घंटे का नोटिस देकर गांव खाली करवा दिया गया। दूर बैठे ग्रामीण अब पल-पल अपने गांव को अपनी नजरों के सामने डूबता हुआ देख रहे हैं।

48 घंटे के नोटिस पर खाली करवाया गांव। अब 8 कमरों में रह रहे 20 परिवार।

लोहारी गांव 120 मेगावाट क्षमता वाली व्यासी जल विद्युत परियोजना के डूब क्षेत्र में है। हालांकि इस योजना पर 1972 में काम शुरू हुआ था। 1989 तक भूमि अधिग्रहण के साथ ही कई दूसरे काम भी हुए। लेकिन, बाद में काम बंद हो गया। 2013-14 में फिर से इस योजना पर काम शुरू हुआ। अपनी जनजातीय संस्कृति का हवाला देकर लोहारी गांव के लोगों ने खुद को एक ही जगह पर बसाने की मांग रखी। यह मांग कैबिनेट से भी पास हुई। जमीन भी चिन्हित की गई, लेकिन बाद में कैबिनेट ने इस फैसले को पहले स्थगित और फिर निरस्त कर दिया। गांव वालों को न जमीन मिली और न मुआवजे को लेकर कोई सहमति प्रशासन के साथ बन पाई। इन प्रमुख मांगों पर अंतिम फैसला होने से पहले ही गांव को जबरन खाली करवा दिया गया।

मंगलवार, सुबह करीब 10 बजे हैं, जब मैं देहरादून से करीब 90 किमी दूर लोहारी गांव में पहुंचा। दूर से ही पूरा गांव पानी में डूबा नजर आने लगा था। गांव पहुंचा तो करीब 20 परिवार जूनियर हाई स्कूल में मिले। 6 अन्य परिवार स्कूल के पास ही एक अन्य खंडहर बन चुके पुराने मकान में। घरों का सामान बाहर खुले आसमान के नीचे रखा गया है। राशन के लिए एक कमरा तय किया गया है। किसका राशन कहां है, उसे ढूंढना संभव नहीं, लिहाजा सभी परिवार एक साथ खाना बना रहे हैं। खाना सिर्फ पेट भरने के लिए ही है। क्योंकि, जहां स्कूल में लोग रह रहे हैं, वहां पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है। शुरू के दो दिन प्रशासन की ओर पानी के टैंकर भिजवाए गये थे, लेकिन अब टैंकर भेजना बंद कर दिया गया है। टैंकर बंद क्यों किये, यह किसी को पता नहीं। गांव वालों ने संबंधित कर्मचारी से टैंकर के बाबत बात की तो कर्मचारी ने ऊपर के आदेशों का हवाला देकर टैंकर भेजने से इंकार कर दिया है।

मैंने स्कूल में मौजूद ब्रह्मीदेवी से स्थिति के बारे में जानना चाहा। वे सरकार से नाराज हैं। कहती हैं, बिना रहने की व्यवस्था किये हमें भगा दिया गया। यहां न पानी है, न शौच और नहाने की व्यवस्था। खुले में खाने, खुले में रहने और खुले में शौच जाने के साथ ही दूषित पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं। हर रोज उल्टी-दस्त के कारण तीन-चार लोगों को अस्पताल ले जाना पड़ रहा है। महिलाओं का नहाना पिछले 5 दिन से बंद है, उनके नहाने के लिए कोई जगह ही नहीं है। 

थम नहीं रहे 100 वर्षीय बुजुर्ग महिला के आंसू।

स्कूल के ठीक नीचे तक पानी भर गया है। स्कूल के सामने दो बड़े रोड़ी के ढेर हैं। बांध बनाने वाली कंपनी ने यहां स्टोन क्रशर लगाया था। रोड़ी के दोनों ढेर करीब 300 वर्ग मीटर में हैं और ऊंचाई 25 मीटर से ज्यादा है।  बताया गया कि गांव से करीब 400 मीटर आगे लखवाड़ बांध बनाया जाना है, इस बांध के लिए ये रोड़ियां तैयार की गई हैं। हालांकि फिलहाल रोड़ियों के ढेर भी पानी में डूब रहे हैं। दोनों ढेरों के बीच जो निचली जगह बच गई है, वहां पानी भर गया है। गांव के कुछ युवक मुझे गांव दिखाने ले जाते हैं। रोड़ी का पहला टीला पार करने के बाद दूसरे टीले के बीच करीब 10 फीट पानी है। इसे पार करने के लिए गांव वालों ने दो बल्लियां लगाई हैं। यह खतरनाक है, लेकिन युवाओं के साथ किसी तरह बल्लियों के सहारे मैं दूसरे टीले पर पहुंच गया। इस टीले के साथ ही गांव के घर हैं। एक मंजिला मकानों की अब केवल छत ही पानी से बाहर नजर आ रही है, जबकि दो मंजिला मकानों का ऊपरी हिस्सा अब भी पानी के बाहर हैं।

रोड़ी के ढेर पर करीब दो दर्जन ग्रामीण बैठे हैं। इनमें ज्यादातर महिलाएं हैं। बताया गया कि लोग रोज सुबह इस टीले पर आकर बैठ रहे हैं और दिनभर डूबते घरों को देखते रहते हैं। टीले पर बैठकर डूबते घरों को देखती महिलाओं के साथ कुछ पुरुष भी हैं। यहां मुझे हृदय सिंह तोमर मिलते हैं। पूछते हैं, आप ही बताओ, हम कहां जाएं? हम जनजाति के लोगों की बाकी समाज से अलग संस्कृति है। हमारे देवी-देवता भी बाकी समाज से अलग हैं। इसीलिए हमने एक ही जगह पर सभी परिवारों को बसाने की मांग की थी। इसी मांग को लेकर हमने 2014-15 में मुआवजा लेने से इंकार कर दिया था। 

जल विद्युत परियोजना का व्यासी बांध कल तक उत्पादन स्तर तक भर जाएगा।

हमें लगातार ठगा गया। सरकार ने जमीन के बदले जमीन देने की हामी भरी। लेकिन, बाद में सरकार पीछे हट गई। हमारे विधायक ने हमें हरसंभव मदद की बात कही थी। विकासनगर में तत्कालीन मुख्यमंत्री की जनसभा में हम लोगों को जमीन देने की गुजारिश भी की थी, मुख्यमंत्री ने हामी भरी थी। लेकिन, जब गांव डूबने लगा और हम लोग विधायक के पास गये तो उनके तेवर बदले हुए थे, वे अभद्रता पर उतर आए। हृदय सिंह ने विधायक वाली वह वीडियो भी दिखाई, जिसमें विधायक मुन्ना सिंह चैहान गांव वालों पर गरम हो रहे हैं। 

टीले पर करीब डेढ़ घंटे ग्रामीणों के साथ बिताने के बाद जब मैं वापस लौटा तब तक इस टीले पर पहुंचने के लगाई गई बल्लियों तक पानी पहुंच चुका है। इस तरफ के टीले पर एक बुजुर्ग महिला बैठी नजर आईं। वे बैसाखियों के सहारे यहां तक पहुंची हैं, लेकिन अब बल्लियों से होकर गांव के पास वाले टीले तक पहुंच पाना उनके लिए संभव नहीं है। बुजुर्ग महिला ने अपनी उम्र 100 वर्ष से ज्यादा बताई। मैंने उनसे बातचीत करने का प्रयास किया तो जौनसारी बोली में वे सरकार को बुरा-भला कहने लगीं। उनका कहना था कि गांव ही नहीं हमारे देवता भी डूब गये और पर्व-त्योहार भी। दूसरे टीले पर पहुंचकर डूबते गांव के अंतिम दर्शन न कर पाने से निराश बुजुर्ग महिला की आंखों से बातचीत के दौरान लगातार आंसू टपकते रहे। 

स्कूल में अब ग्रामीणों ने दिन के खाने की तैयारी शुरू कर दी है। कुछ युवक प्लास्टिक की पाइप लगाकर पानी भरने का प्रयास कर रहे हैं, ताकि खाना बनाने लायक पानी की व्यवस्था की जा सके। महिलाएं पत्थरों, ईंट से बनाये चूल्हे सुलगाने का प्रयास कर रही हैं। स्कूल के बरामदे में गांव में बड़े-बुजुर्ग बैठे हैं। दूसरे गांवों से कुछ रिश्तेदार भी उन्हें सांत्वना देने आये हैं। इस बीच गांव की दो बेटियां ससुराल से लौटी हैं। यहां की हालत देख वे जोर-जोर से रो पड़ती हैं। एक बुजुर्ग समझाने की कोशिश करते हैं, रोओ मत बेटी, दूसरा घर बन जाएगा। लेकिन, यह कहते हुए खुद बुजुर्ग का गला भर आया और आंखें नम हो गई। 

जलसमाधि लेता लोहारी गांव

मैंने गांव वालों से बातचीत करने का प्रयास किया। मुआवजे के बारे में पूछे जाने पर उदय सिंह तोमर कहते हैं कि 1972 से 1989 तक नौ बार गांव वालों की 8 हजार से ज्यादा जमीन का अधिग्रहण किया। उसका मुआवजा भी मिला। बाद में काम बंद हो गया। 2013 में फिर से काम शुरू हुआ तो और जमीन अधिकग्रहीत करने की बात चली। मकानों का मुआवजा भी तय हुआ, लेकिन हमने मुआवजा लेने से इंकार कर दिया। हम सभी परिवारों के लिए एक ही जगह पर जमीन मांग रहे थे। 

सरकार कभी ना, कभी हां कहती रही और हुआ कुछ भी नहीं। राजपाल सिंह तोमर कहते हैं, जून 2021 में बांध में पानी भरने का काम शुरू हुआ तो गांव के लोगों ने बांधस्थल पर जाकर धरना दिया। जल सत्याग्रह भी किया, लेकिन किसी ने सुध नहीं ली। धरना 120 दिन तक चला। 2 अक्टूबर, 2021 की देर रात भारी संख्या में पुलिस पहुंची और गांव वालों को खदेड़ दिया। 17 लोगों को गिरफ्तार किया। 5 दिन लोग जेल में रहे। हाई कोर्ट से जमानत करवाई।

राकेश चैहान कहते हैं, हमें कई तरह के लालच दिये गये। कह सकते हैं कि कई तरह से ठगा गया। जमीन, मकान, मुआवजा और परियोजना में नौकरी देने का लालच भी दिया गया। कुछ लोगों को काम मिला भी। कुछ की गाड़ियां बांध के काम में लगी तो कुछ ने मजदूरी की। बाद में पता चला कि काम के बदले जो पैसा गांव वालों को दिया था, वह मुआवजे में से काटा जाएगा। अब शाम के तीन बज चुके हैं। मैं गांव के डूबते घरों, खेतों और जंगल को देखने के बाद वापस लौट रहा हूं। इसी बीच रोड़ी के टीले से सभी लोगों को वापस बुला लिया गया है। टीले पर जाने के लिए लगाई गई बल्लियों के ऊपर पानी आ गया है। गांव वाले निराश हैं। अब डूबते गांव को इतने पास से नहीं देख पाएंगे। उदास मैं भी हूं, इसी उदासी को ओढ़े लौट आया हूं।

(देहरादून से वरिष्ठ पत्रकार त्रिलोचन भट्ट की रिपोर्ट।)

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