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पीएम मोदी ने तय कर लिया अपना पक्ष! किसान नहीं, अंबानी-अडानी का देंगे साथ

कहते हैं डॉक्टर तब तक मर्ज का ईलाज नहीं कर पाता जब तक कि उसकी डायगोनसिस न कर ले। और बगैर डायगोनसिस के दी गयी दवाएं महज प्रयोग साबित होती हैं। आज पीएम का राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान दिया गया जवाब एक डॉक्टर द्वारा दी गयी किसी एक मर्ज की दवा का रूप था जिसकी उसे पहचान तक नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि तकरीबन 1 घंटे के भाषण में मोदी ने कभी सीधे किसानों को संबोधित ही नहीं किया। उनके पूरे भाषण का मर्म यह था कि किसान खुद से आंदोलन नहीं कर रहे हैं बल्कि उन्हें गुमराह कर दिया गया है और दूसरे बाहरी लोग उनके आंदोलन की अगुआई कर रहे हैं। और उन्होंने आंदोलनजीवी बताकर उनका नया नामकरण तक कर डाला। अब अगर किसी समस्या को हल करने का प्रस्थान बिंदु ही गलत होगा तो फिर वह समस्या कैसे हल हो पाएगी?

मसलन पीएम मोदी मानते ही नहीं कि किसानों की कोई समस्या है या फिर उसकी वजह से वो लोग घर, खेती और सूबा छोड़कर दिल्ली में बैठे हुए हैं। लिहाजा जब समस्या दिखेगी नहीं तो समाधान की कोई बात ही नहीं उठती। और जिस हिस्से की समस्या के तौर पर उन्होंने उसे चिन्हित किया है उसका आंदोलनजीवी कहने के जरिये मजाक उड़ाकर यह भी बता दिया कि उस तरफ ध्यान देने की जरूरत ही नहीं है। हां, ऊपर से किसानों के लिए पीएम ने जरूर एक बार फिर एमएसपी जारी रखने की बात कह दी। अब कोई पूछ ही सकता है कि इस जबानी वादे का भला चुनावी में दिए गए किसी भाषण से ज्यादा क्या हैसियत है। जब तक कि उसे कानून का हिस्सा न बनाया जाए। कहने को खुद प्रधानमंत्री ने ही रेलवे का निजीकरण न होने देने का वादा किया था लेकिन आज चौराहे पर उसे नीलामी के लिए खड़ा कर दिए हैं।

पूरे भाषण में न तो पीएम मोदी ने नये कृषि कानून को लेकर कुछ बोला। और न ही उसमें किसी तरह के संशोधन का कोई संकेत दिया। ऊपर से उन्होंने विपक्ष पर जरूर यह आरोप जड़ डाला कि उसने कानून पर बात न करके अपने भाषणों में राजनीतिक निशाने साधे। हां पीएम को जरूर एक बार फिर अपनी उन तमाम योजनाओं को गिनाने का मौका मिल गया जिसकी उन्होंने किसानों के लिए घोषणाएं कर रखी हैं। यह बात अलग है कि उसमें कितना किसानों का फायदा हो रहा है और कितना कारपोरेट का वह एक विश्लेषण का विषय है। मसलन उन्होंने बताया कि 90 हजार करोड़ रुपये फसल बीमा योजना में दिया गया है। लेकिन उसकी हकीकत यही है कि इसमें बीमा या क्षतिपूर्ति के नाम पर किसानों को 150 और 400 रुपये के चेक ही मिलते रहे हैं। और सारा पैसा प्रीमियमम भुगतान के नाम पर कारपोरेट की झोली में चला जाता है।

दरअसल पीएम मोदी ने आज के भाषण में एक रणनीति अपनायी जिसमें वह अपने कानून और किसानों के आंदोलन पर फोकस करने की जगह विपक्ष की भूमिका और सत्ता में रहने के दौरान उसकी नीतियों और घोषणाओं पर केंद्रित कर दिया। उन्होंने बार-बार कभी कांग्रेस तो कभी मनमोहन सिंह और कभी लाल बहादुर शास्त्री के हवाले से इन नीतियों को आगे बढ़ाने की बात कही। उन्होंने साफ-साफ कहा कि मनमोहन सिंह इसी नीति को आगे बढ़ाना चाहते थे। लेकिन वह नहीं कर सके और उनके काम को अब वह पूरा कर रहे हैं। इसी तरह से उन्होंने जोतों का हवाला देकर चौधरी चरण सिंह तक को अपने पक्ष में लेपेटने की कोशिश की। यहां तक कि गुलाम नबी आजाद की तारीफ कर उनको गांधी परिवार तक से अलग दिखाने का प्रयास किया जब उन्होंने कहा कि आजाद से ‘थ्री जी’ सहमत नहीं होंगे।

बहरहाल अपने बचाव के लिए पीएम मोदी की भले ही यह एक रणनीति हो सकती है। और एक बारगी शायद वह विपक्ष का मुंह बंद भी कर दें लेकिन इससे समस्या का समाधान नहीं होने जा रहा है क्योंकि आंदोलन विपक्ष नहीं बल्कि किसान चला रहे हैं। और उन किसानों को मनाने और उन्हें संतुष्ट करके घर भेजने की जिम्मेदारी सरकार की है। और सरकार इस जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकती है। क्योंकि कानून उसने बनाया है और यह कानून अगर किसानों के लिए है तो लोकतंत्र का तकाजा है कि उसे उनसे पूछ कर ही बनाया जाना चाहिए था। और अगर वे उससे सहमत नहीं हैं तो फिर उसे रद्द कर दिया जाना चाहिए।

आज के भाषण में पीएम मोदी ने तीन हिस्से जो सबसे ज्यादा प्रभावित हैं या फिर इस आंदोलन के केद्र में हैं और उसके सबसे बड़े खैरख्वाह हैं उन सभी को दरकिनार करने की कोशिश की। इसमें सबसे पहले वो किसान हैं जिन्होंने मोर्चा संभाल रखा है। दूसरे वे हैं जिन्होंने संसद के भीतर सबसे ज्यादा इसको लेकर सरकार की घेरेबंदी की है। और तीसरा लेफ्ट है। जिसके बारे में मोदी ने कहा कि वह 1969 में भी वही बात करता था जब लाल बहादुर शास्त्री हुआ करते थे और आज भी वही बात कह रहा है। लेकिन सवाल यही है कि अगर आंदोलन करने वाले और उनका समर्थन करने वाले कोई सवाल उठा रहे हैं तो उन्हें इस तरह की बातों से खारिज नहीं किया जा सकता है। लिहाजा पीएम मोदी को या तो ठोस जवाब देना होगा या फिर इस कानून को वापस लेना होगा। क्योंकि जहां तक यह आंदोलन पहुंच गया है और जिस जज्बे से लोग उसमें लगे हुए हैं कम से कम यह बात दावे के साथ कही जा सकती है कि वह कत्तई अपना कदम पीछे नहीं खींचने जा रहे हैं।

(जनचौक के संपादक महेंद्र मिश्र की त्वरित टिप्पणी।)

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This post was last modified on February 8, 2021 2:12 pm

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