Tuesday, October 26, 2021

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प्रशांत भूषण मामला: सोली सोराबजी ने कहा- सुप्रीम कोर्ट ने ज़रूरत से ज्यादा सक्रियता दिखायी

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नई दिल्ली। भारत के पूर्व एटार्नी जनरल और न्यायविद सोली सोराबजी ने कहा है कि सिविल राइट वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ उनके ट्वीट का स्वत: संज्ञान लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आवश्यकता से अधिक सक्रियता दिखा दी।

सोराबजी ने यह बात ‘द हिंदू’ को 22 अगस्त को दिए एक साक्षात्कार में कही। उन्होंने कहा कि “अब कोर्ट ज्यादा से ज्यादा प्रशांत को महज एक लेक्चर दे सकता है। उन्हें चेतावनी दे सकता है लेकिन दंडित नहीं कर सकता….हालांकि इस नाजुक संतुलन को बनाए रख पाना बहुत मुश्किल है।”

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने स्वत: संज्ञान के इस मामले में अपने फैसले को सुरक्षित रख लिया है। इसने प्रशांत भूषण को अपने बयान पर फिर से विचार करने के लिए 24 अगस्त तक का समय दिया है। जिसमें उन्होंने चीफ जस्टिस एसए बोबडे की बाइक और पिछले छह सालों में कोर्ट की भूमिका को लेकर किए गए अपने ट्वीट पर कोर्ट से माफी मांगने से इंकार कर दिया था।

सोराबजी ने कहा कि कोर्ट पहले ट्वीट को नजरंदाज कर सकती थी। और दूसरा ट्टीट केवल विचार था।

सोराबजी ने पूछा कि “लोग अलग-अलग आस्था रखते हैं क्या आप लोगों को ऐसी कोई आस्था रखने के लिए दंडित कर सकते हैं जो सुप्रीम कोर्ट की पसंद के हिसाब से न हो।“ 

सोराबजी ने कहा कि सत्य अवमानना के खिलाफ एक पूर्ण रक्षा है। एक शख्स को अपने आरोपों को सही साबित करने का मौका दिया जाना चाहिए। सोराबजी ने कहा कि “अगर भूषण अपने आरोपों के तथ्यों को स्थापित करने के लिए तैयार हैं तब आप उन्हें ऐसा करने से कैसे रोक सकते हैं…..उन्हें जबरन चुप नहीं कराया जाना चाहिए। निश्चित तौर पर अगर उनके आरोप आधारहीन, मनगढ़ंत हैं तब ज़रूर उन्हें दंडित करिए। लेकिन केवल यह कहने के लिए उन्हें दंडित मत कीजिए।”

एक संस्था के तौर पर सुप्रीम कोर्ट का प्राधिकार और सम्मान और बढ़ जाएगा अगर वह आरोपों पर बातचीत करता है बजाय इसके कि उस शख्स के ऊपर अवमानना थोपकर जिसने उसे तथ्यों के आधार पर लगाया है।

उन्होंने कहा कि महज एक आरोप लगाने के चलते किसी शख्स को अवमानना के लिए दंडित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट को किसी पूर्वाग्रह के तहत नहीं काम करना चाहिए। आरोपों के गलत साबित पाए जाने के बाद ही दंडित करने का काम किया जाना चाहिए।

सोराबजी ने कहा कि “हर नागरिक को अपना स्वतंत्र विचार रखने का अधिकार है। अगर कोई शख्स कहता है कि जज भ्रष्ट हैं तो अपने आरोपों को सही साबित करने के लिए उसे मौका दीजिए…..मैं फिर से दोहरता हूं, अगर प्रशांत भूषण के आरोप पूरी तरह से बेतुके लगते हैं तब उनको दंडित कीजिए उसके पहले कत्तई नहीं। बगैर उन्हें साबित करने का मौका दिए और सिर्फ कल्पना के आधार पर और यह कहकर कि वो गलत हैं। ऐसा नहीं कर सकते।…..नहीं, मैं नहीं समझता कि इस मामले के अंत में सुप्रीम कोर्ट की कोई अच्छी छवि बनी है।”  

जिस तरह से कोर्ट ने अवमानना मामले में जल्द बाजी दिखायी उसको लेकर भी उन्होंने सवाल उठाया और खासकर वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये पूरे मामले की सुनवाई को लेकर। सोराबजी ने कहा कि “अगर वो थोड़ा सब्र दिखाते तो क्या बिगड़ जाता…..अगर वो कुछ समय तक के लिए इंतजार कर लेते तो क्या सब कुछ ध्वस्त हो जाता या फिर खत्म हो जाता।”

वह कोर्ट के इस विचार को लेकर भी असहमत थे कि स्वत: संज्ञान की कार्यवाही शुरू करने से पहले भारत के एटॉर्नी जनरल से उनकी सहमति लेना आवश्यक नहीं था। सोराबाजी ने कहा कि “एटार्नी जनरल सर्वप्रथम लॉ अफसर हैं। उनसे संपर्क किया जाना चाहिए था। वे उन्हें नजरंदाज नहीं कर सकते। अवमानना (संविधान के अनुच्छेद 129 के तहत) को शुरू करने में कोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां कुछ निश्चित सीमाओं के भीतर ही हैं। क्या करने की निहित शक्ति? यह निहित शक्ति का बेजा इस्तेमाल है।”

उन्होंने आगे कहा कि एटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल जिन्हें नोटिस जारी किया गया था और वह पूरी कोर्ट की कार्यवाही के दौरान मौजूद रहे, उन्हें पूरा विस्तार से सुना जाना चाहिए था। सोराबजी ने कहा कि “मामले को लेकर कोर्ट को जल्दबाजी थी।”

इस मुद्दे पर कि क्या कोर्ट की लगातार निंदा करते हुए एक लोकतंत्र के भीतर अवमानना के आधार को बनाए रखना चाहिए। सोराबजी ने कहा कि न्यायपालिका एक महत्वपूर्ण संस्था है और उसकी प्रतिष्ठा को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है।

सोराबजी ने कहा कि “लेकिन यहां सवाल सिद्धांतों का है। आप न्यायपालिका की आलोचना कर सकते हैं या नहीं कर सकते हैं या कुछ तथ्यों पर आधारित है। वह कुछ निश्चित तथ्य हैं? और अगर आप ऐसा करते हैं तो क्या आप कोर्ट की अवमानना करते हैं? इसके विपरीत, मेरा मानना है कि आप कोर्ट के सम्मान को और बढ़ाते हैं।”

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