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Categories: बीच बहस

नागरिक आजादी का अंतरिक्षः अवमानना का उपग्रह

1. प्रशांत भूषण के अवमानना प्रकरण के कारण जिरह में संविधान के इतिहास और उसकी भविष्यमूलकता को लेकर कई तरह के पेंच और द्वैध पैदा हो गए हैं। उनकी भ्रूण हत्या नहीं की जानी चाहिए।

ये सवाल फिलहाल तो जस्टिसगण अरुण मिश्रा, बीआर गवई और कृष्ण मुरारी की बेंच में आश्वस्ति मांग रहे हैं कि उन पर ‘पब्लिक डोमेन’ में बहस सुनी जाए।

संविधान न्यायालय भी दरबार-ए-खास नहीं दरबार-ए-आम होते हैं।

सभी संस्थाओं की लोकतांत्रिक बादशाहत में संवैधानिक तेवर होना भी ज़रूरी है।

प्रशांत भूषण पर चल रहे अवमानना मामले ने देश क्या, दुनिया के समझदार नागरिक वर्ग में चिंताजनक और चिन्तनीय बौद्धिक खलबली मचा रखी है।

लोग सीधे संविधान से ही सवाल पूछ रहे हैं कि तुम्हारी उद्देशिका में ही लिखा है न कि ‘हम भारत के लोग’ ही संविधान निर्माता हैं?

‘हम भारत के लोग’ ही सार्वभौम हैं। न राष्ट्रपति, न प्रधानमंत्री, न संसद और न खुद संविधान ही सार्वभौम है।

इसलिए संविधान के रचयिता खुद अपने लिखे के पाठ संविधान, अर्थात अपने खुद के विवेक से ‘पब्लिक डोमेन’ में खुली जिरह करने के लिए सक्रिय होकर आश्वस्त हैं।

2. तथ्यात्मक मुद्दा इतना ही है कि प्रशांत भूषण सुप्रीम कोर्ट के बहुत सक्रिय वकील हैं। अपनी अलग पहचान बनाते जनहित के मामले उठाते वकीलों में लगभग अव्वल हैं।

उन्होंने कई बार ऐसा भी कुछ कहा और किया भी है जिसे लेकर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना अधिनियम, 1971 के प्रावधानों के तहत उन पर अवमानना प्रकरण कायम हुए हैं।

मेधा पाटकर, अरुंधति राय और प्रशांत भूषण ने ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ के सिलसिले में विस्थापितों के पक्ष में भाषण और वक्तव्य दे सुप्रीम कोर्ट के सामने धरना भी दिया था; तब सुप्रीम कोर्ट के कुछ वकीलों की शिकायत पर, तीनों के खिलाफ अवमानना का मुकदमा दर्ज हुआ।

प्रशांत भूषण और मेधा पाटकर के खिलाफ कार्रवाई नहीं की, लेकिन ख्यातिप्राप्त लेखिका अरुंधति राय ने नोटिस के जवाब में सुप्रीम कोर्ट की समझ के अनुसार ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया जो अवमाननाकारक लगी।

जिन भाषणों के आधार पर मुकदमा था वे तो अलग-थलग हो गए, नतीजतन अरुंधति को सजा दी गई।

केरल के प्रसिद्ध मुख्यमंत्री ईएमएस नम्बूदिरीपाद को न्यायपालिका की अकादमिक आलोचना करने के कारण सजा दी गई। अजीबोगरीब कारण बताया गया कि उनकी और उनके विख्यात वकील वीके कृष्णमेनन की न्यायपालिका को लेकर मार्क्स और एंगेल्स के विचारों के अनुरूप भाषण देने का दावा सही नहीं है।

देश के कानून मंत्री पी शिवशंकर सुप्रीम कोर्ट की कड़ी आलोचना में कह गए कि दहेजलोभी लोग बहुओं को जला रहे हैं, काले बाजारिए, भ्रष्ट लोग और विदेशी विनिमय वगैरह के अभियुक्त भी सुप्रीम कोर्ट में स्वर्ग पा लेते हैं। CJI सव्यसाची मुखर्जी ने उसे एक विधिशास्त्री का ‘एप्रोच’ और ‘एट्टीचूड’ कहा,  लेकिन सजा नहीं दी।

1919 में अंगरेज जज ने ‘यंग इंडिया’ के संपादक गांधी जी को बार-बार माफी मांगने का कहने पर भी गांधी के माफी नहीं मांगने पर भी सजा नहीं दी, केवल चेतावनी देकर छोड़ दिया।

गांधी ने साफ कह दिया था, वे अपनी अभिव्यक्ति की आजादी पर कोई अदालती अंकुश स्वीकार नहीं करते, जज जो चाहे सो सजा दे दे।

एक जज हेवार्ड ने उन्हें और प्रकाशक महादेव देसाई को सत्याग्रही मान लिया था। कई मामलों में निहित न्याय सिद्धांतों को अपने लंबे-चौड़े जवाब और सैकड़ों पृष्ठों के दस्तावेजों के साथ प्रशांत भूषण ने विचारण के लिए तीन जजों की बेंच के सामने दाखिल किया।

मजा यह कि आठ दस दिनों में ही उन जवाबी बिंदुओं और दस्तावेजों को मुनासिब प्रक्रिया के चलते, बहुत कम समय में सुप्रीम कोर्ट ने अपनी समझ में 108 पृष्ठों का आदेश पारित करते प्रशांत भूषण को जिम्मेदार ठहरा दिया। उनको कितनी सजा दी जाए केवल इस पर विचार होना है। प्रशांत भूषण के वकील डॉ. राजीव धवन ने यह भी कह दिया कि उसमें से कई पृष्ठ तो किसी अन्य मामले से शब्दशः उठा लिए गए लगते हैं।

3. संविधान सभा में नागरिकों के मूल अधिकार अमेरिकी संविधान से हूबहू उधार लिए गए हैं। अभिव्यक्ति के नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाते संविधान सभा में कई आधारों सहित मानहानि और अदालत की अवमानना के संबंध में संसद को अधिनियम बनाने के अधिकार दिए गए। हालांकि दमदार सदस्य आरके सिधवा और विश्वनाथ दास ने ऐसी कड़ी बातें कहीं थीं कि आज कोई कह नहीं सकता, वरना सीधा सीधा अवमानना का मामला बन जाएगा।

प्रशांत भूषण ने तो वैसा कुछ नहीं कहा। उन सदस्यों ने तो यहां तक कह दिया था कि “जज भी आखिर मनुष्य ही होते हैं। उनके सिर पर दो सींग नहीं होते। उनसे भी गलतियां होती हैं। कई कंगाल वकील तक जज बना दिए जाते हैं। आज़ादी के बाद भी जजों की ब्रिटिश हुकूमतशाही के वक्त की मानसिकता कायम चली आई है।”

बहरहाल प्रतिबंध तो अनुच्छेद 19 (2) में लगा ही वह कहता है: ‘‘19. वाक्-स्वातंत्र्य आदि विषयक कुछ अधिकारों का संरक्षण-(2) खण्ड (1) के उपखण्ड (क) की कोई बात उक्त उपखण्ड द्वारा दिए गए अधिकार के प्रयोग पर भारत की प्रभुता और अखण्डता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्धों, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार के हितों में अथवा न्यायालय-अपमान, मानहानि या अपराध-उद्दीपन के सम्बन्ध में युक्तियुक्त निर्बंन्धन जहां तक कोई विद्यमान विधि अधिरोपित करती है वहां तक उसके प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी या वैसे निर्बंन्धन अधिरोपित करने वाली कोई विधि बनाने से राज्य को निवारित नहीं करेगी।’’ 

21 साल की उम्र में ही प्रशांत भूषण ने आपातकाल के वक्त ‘द केस दैट शूक इंडिया’ नामक किताब लिख दी थी।

4. प्रशांत भूषण में युवकोचित बौद्धिक गुस्सा भी रहता है। मनुष्य में विचार उसके संस्कार, पैतृक गुण, सामाजिक हैसियत आदि के कारण सार्वजनिक अभिव्यक्तियों में वाचाल रहते हैं। मानो अनुसूचित जातियों के प्रतिनिधि पी शिवशंकर ने कहा था कि न्यायपालिका में उच्च वर्णों और वर्गों की दबंगई होने से, वहां वंचितों की वेदना का फलसफा सूखा-सूखा सा है।

यही तो जस्टिस कर्णन को अदालत की अवमानना पर सजा होने से कई बुद्धिजीवी कह रहे हैं!

न्यायिक इतिहास के भीष्म पितामह शताब्दी पुरुष जज  वीआर कृष्ण अय्यर ने रिटायरमेंट के बाद कह दिया था कि न्यायपालिका तो अस्तित्वहीन संस्था हो गई है। वहां ईसा मसीह को तो सूली पर चढ़ाया जाता है, लेकिन खलनायकों को नहीं। कई बार उसका सभ्यता से भी संस्पर्श बिछुड़ जाता है।

उन पर भी मुकदमा दायर किया गया, लेकिन केरल के चीफ जस्टिस रहे सुब्रमणियम पोट्टी की बेंच ने नोटिस तक देने की जरूरत नहीं समझी… कहा कि न्यायपालिका की छाती इतनी चौड़ी होनी चाहिए कि वह सवालों को अपने विवेक से सुलझाती रहे।

अमेरिका और इंग्लैंड में भी जजों को मीडिया में मूर्ख और बूढ़ा तक कहकर उनका सिर नीचे और पैर ऊपर दिखाती तस्वीरें छाप दी गई हैं। वहां भी शिकायत कुनिंदा पहुंचे, लेकिन उन्हीं जजों ने साफ किया कि यह तो सच है कि हम बूढ़े हैं। कोई हमें बेवकूफ समझ रहा है, तो यह तो उसकी निजी राय है, हमारी अपने बारे में ऐसी राय नहीं है।

5. 2009 में प्रशांत भूषण के कहने के वक्त कि… पिछले छह वर्ष के दौर में न्यायपालिका में लोकतंत्र का क्षरण हुआ या पिछले चार मुख्य न्यायाधीशों के वक्त भ्रष्टाचार रहा है, सोशल मीडिया सक्रिय होकर आया नहीं था।

अरुंधति के पक्ष में भी देश के सैकड़ों बुद्धिजीवी और विदेशों के प्रख्यात विद्वान और सांसद वगैरह सुप्रीम कोर्ट को लिख चुके थे कि अदालती अवमानना को लेकर संवैधानिक अधिकारों की समझ को ही तो अरुंधति ने अपने जवाब में विन्यस्त किया है। वह अवमानना का नहीं बौद्धिक वाद-विवाद का मामला है और पूरी तौर पर अभिव्यक्ति की आजादी के तहत है।

नाम चॉम्की जैसे विख्यात बुद्धिजीवी, पत्रकार, राजनेता, प्राध्यापक जिनमें ‘The Hindu‘ के संपादक एन राम, ‘जनसत्ता’ के संपादक प्रभाष जोशी और न जाने कितने लोग शामिल थे, सामने आए। जिस जज ने मामला पंजीबद्ध कर नोटिस जारी किया था, अरुंधति ने सवाल उठाया था कि उन्हें नोटिस के जवाब की सुनवाई अन्य जज से करानी चाहिए, तभी वस्तुपरक आकलन होगा, लेकिन जस्टिस जीबी पटनायक ने दलील नहीं मानी।

6. हालिया कोविड-19 के भयानक प्रकोप के दौर में CJI शरद अरविंद बोबडे की अपने गृह नगर नागपुर पहुंचकर 50 लाख रुपये की भाजपा कार्यकर्ता की विदेशी हारले डेविडसन की मोटरसाईकल पर बैठकर तस्वीर खींची गई। वह सोशल मीडिया में वायरल हो गई। हजारों नागरिकों ने तरह-तरह की असहज क्या भद्दी और अपमानजनक टिप्पणियां कर दीं।

प्रशांत भूषण ने भी शायद इस आशय का ट्वीट कर दिया होगा कि… न्याय मिलने की मुश्किलों के इस महामारी के दौर में सुप्रीम कोर्ट में त्वरित और जरूरी सुनवाई के वक्त ऐसी फोटो खिंचाने और संपूर्ण व्यापक न्यायिक व्यवस्था के आचरण का आकलन करने से आने वाली पीढ़ियां भारतीय न्यायपालिका के बारे में क्या धारणाएं कायम करेंगी!

कुछ शिकायतखोर नस्ल के वकीलों का कानूनी ज्ञानशास्त्र के विकास में महत्वपूर्ण योगदान रेखांकित होता रहता है। एक शिकायत के आधार पर प्रशांत भूषण को अवमानना का नोटिस आननफानन में मिला। तुर्रा यह कि 2009 में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों के खिलाफ जो कथित कटाक्ष किया था, उसे भी सुनवाई के लिए साथ-साथ सूचीबद्ध कर दिया गया। बहुत कम दिनों में फैसला देने का इरादा तेज प्रक्रिया के चलते इशारों-इशारों में ‘कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है’ की तर्ज पर जाहिर कर दिया गया।

अपनी रीढ़ की हड्डी पर आज भी सुप्रीम कोर्ट में कुछ तेजतर्रार वकील संविधान के ज्ञान, फलक और जन-अभिमुखता के विकास के लिए लगातार जजों के कई क्रोधी तेवर झेलते जद्दोजहद कर रहे हैं। अभी भी सब कुछ बरबाद नहीं हुआ है। डॉ. राजीव धवन, दुष्यंत दवे, कोलिन गोन्जाल्वीस, इंदिरा जयसिंह, कामिनी जायसवाल, वृंदा ग्रोवर जैसे प्रसिद्ध वकीलों ने कई सवाल उठाए हैं।

न्यायिक प्रक्रिया की हड़बड़ी में उनका व्यापक विचारण कई बार नहीं हो पाता। यह पहला वक्त है जब एक नागरिक/वकील पर सुप्रीम कोर्ट ने अवमानना का मामला चलाने का खुद संज्ञान इस तेज गति और मति से लिया है, लेकिन नेपथ्य से प्रांप्टिंग की कई आवाजें फुसफुसाती हुई लग रही हैं। संविधान के अंतरिक्ष में अब अनसुनी कैसे हो सकती हैं?

प्रशांत भूषण द्वारा दिए गए जवाब पर कोई टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया के चलते नहीं की जानी चाहिए। वह तो तीन सदस्यीय पीठ के जेहन में है ही।

पहली बार लेकिन कुछ नए सवाल पैदा हुए हैं। सोशल मीडिया की वजह से जन-इजलास में इन मुद्दों पर बातचीत करना संभव और जरूरी है। वह बातचीत संविधान के निर्माता ‘हम भारत के लोग’ कर सकते हैं। इन्हें सारसंक्षेप में समेटा जा सकता हैः

(1) अरुंधति के समर्थन में सैकड़ों बुद्धिजीवियों की राय को इसलिए दरकिनार किया गया होगा, क्योंकि वे ‘बाहरी व्यक्ति’ थे। उनकी राय अकादमिक लगने से संविधान के इस्तेमाल के अनुभवों की विशेषज्ञता की नहीं रही होगी। प्रशांत भूषण के मामले में जस्टिस, चीफ जस्टिस रहे राजेन्द्रमल लोढ़ा ने (जिनकी अध्यक्षता के कॉलेजियम में मौजूदा तीन सदस्यीय पीठ के मुखिया जज की नियुक्ति की सिफारिश की गई थी) तो कह दिया है कि कोविड-19 की महामारी के चलते यह महत्वपूर्ण मामला ‘वर्चुअल कोर्ट’ के जरिए निपटाने की क्या ज़रूरत थी?

उसे महामारी के बाद औपचारिक भौतिक अदालती प्रक्रिया के तहत निपटाने से बहुत कुछ कहने-सुनने की स्थिति बनती। इंग्लैंड से भारत ने संवैधानिक ज्ञान उधार लिया है। वहां की पुष्ट परंपराएं कहती हैं, ‘न्याय केवल होना नहीं चाहिए। वह होता हुआ दिखना भी चाहिए।’ बिना आपातकाल लगाए और अब तो मैदान में लाए गए (गोदी?) इलेक्ट्रानिक मीडिया के साथ गलबहियां करते प्रिंट मीडिया बेतरह, बेवजह चुप हैं।

प्रशांत भूषण के मामले में सुप्रीम कोर्ट की चिंतातुर व्याकुलता पर साजिशी चुप्पी साधकर जैसे सेंसर लगा है। अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत का मामला मीडिया के अंतरिक्ष में नया उपग्रह बनाकर उछाला गया है। उस घटना का इतना प्रचार है कि भारत में चीन की घुसपैठ, लाखों लोगों का कोरोना में मरना-खपना और सदा मीडिया के फोकस में रहने वाले बेचैन प्रधानमंत्री तक के लिए जगह और समय की कमी हो रही है। संविधान सभा ने कभी नहीं सोचा होगा कि मीडिया (तब प्रेस कहा था) जनता के मुद्दों तो क्या मुंह पर सेंसर लगा देगा। जन अभिव्यक्तियों के खिलाफ लिख और कुचलकर सत्ता प्रतिष्ठान का बगलगीर बनेगा। फिर भी नागरिकों के बराबर आजादी पा लेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारों के तहत जनता और न्याय हित में कई अदालती प्रक्रियाओं की खबरों को मीडिया में प्रकाशित होने से रोका है। सुप्रीम कोर्ट को यह अजूबा भी तो देखना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट खुद नागरिक आज़ादी के अहम सवाल से जूझते अपने ही वरिष्ठ रहे पूर्व जजों की राय तक को मीडिया में नहीं पढ़ या सुन पा रहा हो। तब क्या करना चाहिए? सोशल मीडिया नहीं होता तो इस मामले की जनसरोकारिता की ही मौत हो जाती!

(2) चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के वक्त जनवरी 2018 में वरिष्ठ जजों रंजन गोगोई, जे चेलमेश्वर, मदन बी लोकुर और कुरियन जोसेफ ने सीधे मीडिया से बात की थी। वह सुप्रीम कोर्ट के इतिहास का अकेला अपवाद है। उन्होंने खुलकर चीफ जस्टिस पर कई आरोप लगाए। उनमें यह भी था कि चीफ जस्टिस बहुत संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों को भी उस वक्त के सुप्रीम कोर्ट के 24 जजों में से अपेक्षाकृत कनिष्ठ जज की अध्यक्षता की पीठ को दे देते हैं।

प्रशांत भूषण के मामले में भी वरिष्ठता का सिद्धांत नहीं, चीफ जस्टिस के अधिकार से वरिष्ठता क्रम के जजों को सौंपा नहीं गया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा था मामला देने का चीफ जस्टिस का अधिकार है, क्योंकि अंगरेजी परंपरा में वही ‘मास्टर ऑफ द रोस्टर’ होता है। अंगरेजी परंपरा में तो वरिष्ठता का भी सिद्धांत रहा है, यह नहीं कहा था। परंपरा में तो यह भी है जिस जज साहब पर भरोसा नहीं हो, तो उन्हें मामले से हट जाना चाहिए।

प्रशांत भूषण ने तो ऐसा कुछ नहीं कहा है। सुप्रीम कोर्ट के एक जज एचएस कपाड़िया के कई शेयर एक प्राइवेट कंपनी स्टरलाइट में रहे हैं। फिर भी वकीलों से उन्होंने स्टरलाइट कंपनी के मामले में वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) थे। इसकी आलोचना प्रशांत भूषण ने खुलकर की। उन्होंने ही प्रशांत भूषण के खिलाफ जजों के भ्रष्टाचार वाले कथन के खिलाफ अवमानना की शिकायत की थी। उसे अभी सुना जा रहा है।

किसी भी आरोपी को पूरी सुनवाई का मौका दिए बिना या उठाए गए मुद्दों पर संवैधानिक तुष्टि हासिल किए बिना फैसला नहीं देना चाहिए। जजों के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया का अनुपालन किया जाना चाहिए। शुरुआती पांच जज सुप्रीम कोर्ट की कॉलेजियम के सदस्य होते हैं। जस्टिस रंजन गोगोई के विवादास्पद अपवाद को छोड़कर (जो राम मंदिर के फैसले के बाद राज्यसभा में मनोनीत हुए) तीन वरिष्ठ जजों जस्टिस चेलमेश्वर, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ ने प्रशांत भूषण के पक्ष में खुलकर बयान दिए हैं कि कोई मामला ही नहीं बनता।

(3) जस्टिस कुरियन जोसेफ के तर्क में बहुत दम है कि सुप्रीम कोर्ट खुद अवमानना करार देकर मामला चलाना चाहे तब भी जब आरोपी कहे मुझे अभिव्यक्ति की अबाधित आजादी है। सच तो यह है यह मामला भारत-चीन की सरहदों की तरह नहीं, माता पिता के प्रेम के बटवारे की सरहद का किसी तरह निर्धारण करे) यही संविधान का बेहद ऩाजुक बिंदु है।

संविधान निर्माता जनता के भी खिलाफ सुप्रीम कोर्ट न्यायिक व्याख्या का संवैधानिक अधिकारी होने से कोई विपरीत अमलकारी फैसला दे, तो भाष्यकार जनता का क्या होगा? ऐसे (संभावित) विवाद की कल्पना संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू, डॉ. भीमराव अंबेडकर और डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की अगुवाई के करीब 300 सदस्यों को नहीं रही है, इसलिए कुरियन जोसेफ ठीक कहते हैं कि प्रशांत भूषण का मामला कम से कम पांच या अधिक जजों की संविधान पीठ को भेजा जाना चाहिए। उनके अनुसार प्रकरण में कई सैद्धांतिक सवाल निहित हैं। जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती।

जस्टिस कर्णन के अवमानना मामले में पूरी सुप्रीम कोर्ट की राय के अनुपालन में सात वरिष्ठ जजों की पीठ में सुनवाई होकर फैसला हुआ था। अभी तो उन्हीं में से कुछ सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जजों ने संयुक्त पत्र प्रशांत भूषण के तर्कों के पक्ष में लिखा है।

(4) कानून यह है कि फौजदारी नस्ल का अवमानना मामला आवश्यकतानुसार अटॉर्नी जनरल की अनुमति के बाद अदालत के सामने रखा जाए। अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 15 के अनुसार ‘‘आपराधिक अवमानना की दशा में, उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय या तो स्वप्ररेणा से या (क) महाधिवक्ता के, अथवा (ख) महाधिवक्ता की लिखित सम्मति से किसी अन्य व्यक्ति के समावेदन पर कार्रवाई कर सकेगा। स्पष्टीकरण-इस धारा में ‘‘महाधिवक्ता’’ पद से अभिप्रेत है- (क) उच्चतम न्यायालय के सम्बन्ध में, महान्यायवादी या महासालिसिटर।

प्रशांत भूषण के मामले में रजिस्ट्री को या तो संकोच रहा या उसने इस नियम के अनुसार एटार्नी जनरल की राय लेने संबंधी नोट लगाकर जजों के सामने मामला रखा होगा। बेंच ने उसे गैरजरूरी प्रावधान मानते हुए सुनवाई की होगी। अटॉर्नी जनरल से सहमति ले ली जाती तो क्या दिक्कत थी?

प्रशांत भूषण ने 2009 में जो कथित अवमाननाकारक बयान दिया, उस मामले में तो अटॉर्नी जनरल की राय ली गई थी। वह मामला 11 साल तक सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड रूम में पड़ा रहा। वहां कई मामले अपना अपना दुखड़ा सुनाते, नसीब ढूंढते-बिसूरते पड़े रहते हैं। मामला इतना विस्फोटक समझा गया होता तो सुप्रीम कोर्ट के जो जज और चीफ जस्टिस 2009 से लेकर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई के वक्त तक रहे हैं, तब तक सुनवाई क्यों नहीं हुई? मौजूदा चीफ जस्टिस भी 18 नवम्बर 2019 से हैं। तब कोरोना और हारवे मोटरसाईकिल वाली दुर्घटना नहीं हुई थी। जो सभी संभावित जज उस मामले को सुन सकते थे। उनमें से ही जज प्रशांत भूषण के पक्ष में खड़े होकर वैधता पर सवाल उठा रहे हैं।

इनमें जस्टिस एके गांगुली (2012), चीफ जस्टिस राजेन्द्रमल लोढ़ा (2014), जस्टिस विक्रमजीत सेन (2015), जस्टिस चेलमेश्वर (2018), जस्टिस कुरियन जोसफ (2019), जस्टिस आफताब आलम, जस्टिस एके गांगुली (2012), जस्टिस मदन बी लोकुर भी (2018), जस्टिस जीएस सिंघवी (2013) कई और जज हैं। सवाल उठ रहे हैं कि हम होते तो क्या फैसला करते? सुदर्षन रेड्डी (2011), जस्टिस गोपाल गौड़ा (2016) रिटायर हो गए हैं। जस्टिस रूमा पॉल भी साथ हैं, जो अलबत्ता 2006 में रिटायर हो गई थीं।

 (5) अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल में असाधारण समझ, योग्यता और निष्ठायुक्त आचरण आदर्श है। पहले झिझकते हुए और बाद में साफगोई में उन्होंने बेंच से अनुरोध किया कि प्रशांत भूषण को सजा नहीं दी जाए। अनुरोध भावुक नहीं है। भारत के महान्यायवादी की संवैधानिक समझ का फलसफा है।

अटॉर्नी जनरल सरकारी नौकर नहीं होते। असाधारण विद्वता के विधिशास्त्री को संविधान की रक्षा के लिए अटॉर्नी जनरल बनाया जाता है। वह राष्ट्रपति/उप राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के साथ संविधान में कार्यपालिका का अंग है। ‘‘52. भारत का राष्ट्रपति-भारत का एक राष्ट्रपति होगा।’’ ‘‘63. भारत का उपराष्ट्रपति-भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा।’’ ‘‘74. राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए मंत्रि-परिषद्-(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने लिए एक मंत्रि-परिषद होगी जिसका प्रधान, प्रधानमंत्री होगा और राष्ट्रपति अपने कृत्यों का प्रयोग करने में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।’’

‘‘76. भारत का महान्यायवादी-(1) राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के लिए अर्हित किसी व्यक्ति को महान्यायवादी नियुक्त करेगा। (2) महान्यायवादी का यह कर्तव्य होगा कि वह भारत सरकार को विधि संबंधी ऐसे विषयों पर सलाह दे और विधिक स्वरूप के ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो राष्ट्रपति उसको समय-समय पर निर्देशित करे या सौंपे और उन कृत्यों का निर्वहन करे जो उसको इस संविधान अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदान किए गए हों। (3) महान्यायवादी को अपने कर्तव्यों के पालन में भारत के राज्यक्षेत्र में सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार होगा।’’

अटॉर्नी जनरल की अनसुनी कर दी गई। इस तरह का सवाल सुप्रीम कोर्ट में पहली बार आया जब सुप्रीम कोर्ट ने खुद संज्ञान लेते वक्त अटॉर्नी जनरल की राय को जरूरी नहीं माना। अटार्नी जनरल से राय नहीं लेने पर भी उनके द्वारा क्षतिपूर्ति के रूप में (?) अनुरोध करने की संवैधानिक स्थिति तय नहीं हुई है। संविधान या अधिनियम खामोश हैं। कहा जा सकता है कि क्या यह भी स्थिति संविधान पीठ के लायक नहीं बनती? फैसला जो हो वह तो संवैधानिक इतिहास का हिस्सा बनेगा। (सितारों के आगे जहां और भी है…।)

(कनक तिवारी छत्तीसगढ़ के एडवोकेट जनरल रहे हैं। यह लेख उनकी फेसबुक वॉल से साभार लिया गया है।)

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This post was last modified on August 23, 2020 3:22 pm

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