Sat. Jan 25th, 2020

जम्मू-कश्मीर में पाबंदियों पर सुप्रीम कोर्ट का ‘सॉफ्ट’ फैसला

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उच्चतम न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर में इंटरनेट पर पाबंदी हटाने की मांग वाली जनहित याचिका पर सॉफ्ट फैसला दिया है। इसमें सभी पक्ष (सरकार और दूसरे पक्ष) अपनी-अपनी जीत का दावा कर सकते हैं।

उच्चतम न्यायालय ने साफ कहा है कि इंटरनेट को सरकार ऐसे अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं कर सकती। इंटरनेट और बुनियादी स्वतंत्रता का निलंबन शक्ति का एक मनमानी एक्सरसाइज नहीं हो सकती। इसके साथ ही प्रशासन से पाबंदी लगाने वाले सभी आदेशों को एक हफ्ते के अंदर रिव्यू करने को उच्चतम न्यायालय ने कहा है।

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उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में इंटरनेट बंद करने के खिलाफ बाध्यकारी आदेश पारित नहीं किया है। इसके बावजूद वर्ष 2019 के उलट उच्चतम न्यायालय ने सरकार को यह संकेत जरूर दे दिया है कि संविधान और कानून का शासन सर्वोपरि है और न्यायालय के कंधे पर बंदूक रखकर चलाना उचित नहीं है।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि इंटरनेट मौलिक अधिकार तो नहीं है, लेकिन अभिव्‍यक्ति की आजादी की ही तरह है। इंटरनेट के जरिये होने वाले सभी कारोबार या पेशे संविधान के अनुच्‍छेद-19(1)(ए) और अनुच्‍छेद-19(1)(जी) के तहत संरक्षित हैं। जब उच्चतम न्यायालय यह मान रहा है कि इंटरनेट अनुच्‍छेद-19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) के प्रावधानों से जुड़ा है तो इस सवाल पर चुप क्यों है कि क्या जम्मू कश्मीर में आपातकाल है? यदि नहीं है तो संविधान के किस प्रावधान के तहत इस पर प्रतिबन्ध लगाया गया? 

इसका जवाब उच्चतम न्यायालय ने प्रकारांतर से यह कहकर दिया कि कश्मीर ने काफी हिंसा देखी है। हम सुरक्षा के मुद्दे, मानवाधिकारों और आजादी के मुद्दों के बीच संतुलन बनाने की सर्वश्रेष्ठ कोशिश करेंगे, लेकिन यहां फिर संविधान और कानून के शासन की अवधारणा का प्रश्न खड़ा हो जाता है कि देश संविधान से चलेगा या संतुलन के लिए संविधान की अनदेखी की जाएगी?

गौरतलब है कि संविधान में आपातकाल लागू होने के अलावा ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जब अनुच्‍छेद-19 (वाक् व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता अंतर्निहित है पर प्रतिबंध लगाया जा सके। आपातकाल तो संविधान के अनुच्छेद 352, 356 और 360 के तहत लगाया जा सकता है, लेकिन वाक् स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाने के दो प्रावधान हैं, जो अनुच्छेद 356 और 359 में प्रावधानित हैं, लेकिन कश्मीर के मामले में इन दोनों प्रावधानों में से किसी का उल्लेख नहीं किया गया है।

जस्टिस एनवी रमना, जस्टिस आर सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की तीन सदस्यीय बेंच ने कहा कि लोगों को असहमति जताने का पूरा अधिकार है। पीठ ने धारा 144 का जिक्र करते हुए कहा कि इसका इस्तेमाल सोच-विचार कर ही किया जाना चाहिए। विरोधी विचार को कुचलने के औजार के तौर पर इसका दुरुपयोग न हो। पीठ ने कश्मीर में जरूरी सेवाओं के इस्तेमाल के लिए इंटरनेट की बहाली का आदेश देते हुए बड़ी बात कही।

फैसले में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी में इंटरनेट का अधिकार शामिल है।

धारा 144 सीआरपीसी के तहत बार-बार आदेश देने से सत्ता का दुरुपयोग होगा। इंटरनेट पर प्रतिबंध का अनुच्छेद 19(2) के तहत तालमेल होना चाहिए। अनिश्चित काल के लिए इंटरनेट पर बैन नहीं लगाया जा सकता है। अनिश्चितकाल के लिए इंटरनेट पर रोक का आदेश टेलिकॉम (टेंपररी सस्पेंशन) रूल्स का उल्लंघन है। यह केवल एक उचित समय सीमा के लिए हो सकता है और समय-समय पर इसकी समीक्षा की जानी चाहिए।

जब तक विशेषाधिकार का दावा नहीं किया जाता तब तक सरकार प्रतिबंधों के आदेशों को कोर्ट से छिपा नहीं सकती है। असहमति की आवाज को दबाने के लिए सीआरपीसी की धारा 144 के प्रतिबंध के आदेश नहीं जारी किए जा सकते हैं। सीआरपीसी की धारा 144 के तहत आदेश जारी करते वक्त मजिस्ट्रेट को व्यक्तिगत अधिकार और राज्य की चिंताओं के बीच सामंजस्य बिठाना पड़ेगा।

उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि लोगों को असहमति जताने का पूरा अधिकार है। सरकार अपने सभी आदेशों की एक हफ्ते में समीक्षा करे। सरकार कश्मीर में अपने गैरक़ानूनी आदेश वापस ले। बैन से सभी जुड़े आदेशों को सरकार सार्वजनिक करे। आदेशों की बीच-बीच में समीक्षा करे। बिना वजह इंटरनेट पर प्रतिबन्ध न लगे। सभी जरूरी सेवाओं में इंटरनेट को बहाल किया जाए तथा चिकित्सा जैसी सभी जरूरी सेवाओं में कोई बाधा न आए।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अंग है। धारा 144 का इस्तेमाल किसी के विचारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। उच्च्तम न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर प्रशासन से अस्पतालों, शैक्षणिक संस्थानों जैसी आवश्यक सेवाएं प्रदान करने वाली सभी संस्थाओं में इंटरनेट सेवाओं को तत्‍काल बहाल करने के लिए कहा है।  

उच्च्तम न्यायालय ने कहा है कि अगर पुख्ता जानकारी नहीं है तो धारा-144 नहीं लगाई जा सकती है। कोर्ट ने कहा है कि आप मनमर्जी से धारा-144 लागू नहीं कर सकते। लोगों को अधिकार होगा कि वे इसे कोर्ट में चुनौती दें। कोर्ट ने यह भी कहा कि धारा-144 का इस्तेमाल किसी के विचारों को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता। सरकार इंटरनेट पर रोक और धारा-144 लगाने के आदेश सार्वजनिक करे।

मजिस्ट्रेट को धारा 144 के तहत पाबंदियों के आदेश देते समय नागरिकों की स्वतंत्रता और सुरक्षा को खतरे की अनुपातिका को देखकर विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए। बार-बार एक ही तरीके के आदेश जारी करना उल्लंघन है। धारा 144 सीआरपीसी के तहत निषेधाज्ञा आदेश असंतोष जताने पर नहीं लगाया जा सकता। जम्मू कश्मीर सरकार धारा 144 लगाने के फैसले को सार्वजनिक करे और चाहे तो प्रभावित व्यक्ति उसे चुनौती दे सकता है।

उच्चतम न्यायालय ने सरकार से सभी पाबंदियों पर एक हफ्ते में फिर से रिव्यू करने को कहा है। साथ ही इसकी जानकारी को पब्लिक डोमेन में लाने को कहा है ताकि लोग कोर्ट जा सकें। इंटरनेट बंद करना न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि धारा 144 लगाना भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आता है। धारा 144 सीआरपीसी के तहत बार-बार आदेश देने से सत्ता का दुरुपयोग होगा। सरकार इंटरनेट व दूसरी पाबंदियों से छूट नहीं पा सकती। पाबंदियों, इंटरनेट और बुनियादी स्वतंत्रता की निलंबन शक्ति की एक मनमानी एक्सरसाइज नहीं हो सकती।

जम्मू कश्मीर में प्रतिबंधों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर उच्चतम न्यायालय ने पिछले साल 27 नवंबर को सुनवाई पूरी की थी। केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्रदान करने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान समाप्त करने के बाद वहां लगाए गए प्रतिबंधों को 21 नवंबर को सही ठहराया था। केंद्र ने न्यायालय में कहा था कि सरकार के एहतियाती उपायों की वजह से ही राज्य में किसी व्यक्ति की न तो जान गई और न ही एक भी गोली चलानी पड़ी।

गौरतलब है कि पांच अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर उसे दो केंद्र शासित राज्यों में बांट दिया गया है। जम्मू-कश्मीर में तब से इंटरनेट बंद है। सिर्फ ब्रॉड बैंड से ही संपर्क कायम है। विपक्षी दल जम्मू-कश्मीर के हालातों को लेकर मोदी सरकार पर हमलावर हैं।

गुलाम नबी आजाद के अलावा, कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन और कई अन्य ने घाटी में संचार व्यवस्था ठप होने सहित अनेक प्रतिबंधों को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थीं। केंद्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का हवाला देते हुए कहा था कि कई सालों से सीमा पार से आतंकवादियों को यहां भेजा जाता था, स्थानीय उग्रवादी और अलगावादी संगठनों ने पूरे क्षेत्र को बंधक बना रखा था और ऐसी स्थिति में अगर सरकार नागरिकों की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाती तो यह ‘मूर्खता’ होती।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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