Saturday, October 16, 2021

Add News

5 अगस्त को राम मंदिर भूमिपूजन यानी राष्ट्रीय शर्म और शोक का दिवस

ज़रूर पढ़े

मेरे लिए 5 अगस्त राष्ट्रीय शर्म और शोक का दिवस है। वैसे तो किसी भी लोकतांत्रिक एवं आधुनिक मानस के व्यक्ति के लिए यह राष्ट्रीय शर्म एवं शोक का दिवस होना चाहिए। 

क्योंकि यह वह दिन है, जब भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्षता के झीने आवरण का या मुखौटे का अंतिम संस्कार होगा और चांदी की ईंट के रूप में प्रधानमंत्री हिंदू राष्ट्र की पक्की नींव डालेंगे। इसके साथ उसी नींव में धर्मनिरपेक्षता के सभी मूल्यों को दफ्न कर दिया जाएगा। राम मंदिर के ध्वज की पताका फहराने के साथ ही भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने का संघ (आरएसएस) का करीब  95 वर्ष पुराना स्वप्न भी पूरा हो जाएगा। इस दिन अंतिम तौर पर देश के मुसलमानों को यह बता दिया जाएगा कि यह हिंदुओं का देश है, आप दोयम दर्जे के नागरिक हैं और आप को हिंदुओं के रहमो-करम पर जीने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाना चाहिए।

कोई पूछ सकता है कि भाई जिस दिन सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू बहुमत की आस्थाओं का ख्याल करते हुए मंदिर बनाने के पक्ष में निर्णय दे दिया था, उसी दिन उस कोर्ट ने संविधान के धर्मनिरपेक्षता के मूल्य की ऐसी-तैसी कर दी थी, फिर आप आज क्यों शर्म एवं शोक मना रहे हैं। इसका उत्तर यह है कि जब कोई अपना मरता है, तब भी हम रोते हैं, शव उठता है, तब भी हम रोते हैं, लेकिन जब अंतिम संस्कार होता है, तब भी हम रो पड़ते हैं, यह पता होते हुए भी कि वह व्यक्ति पहले ही मर चुका है। इसी तरह 5 अगस्त को इस देश में धर्मनिरपेक्षता का अंतिम संस्कार होगा। इसलिए शोक मना रहा हूं और रो रहा हूं।

कोई यह भी पूछ सकता है कि जब आपकी नजर में धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान एवं समाज के लिए सिर्फ एक झीना आवरण (पर्दा) था, फिर आप उस झीने आवरण के हट जाने से क्यों दुखी हैं। लेकिन, मित्र, आवरण चाहे जितना भी झीना हो, नंगेपन को कुछ हद तक तो ढके ही रहता है। बिना आवरण के नंगापन शर्मनाक तो होता ही है और उस नंगेपन को देखकर शर्म से आंख बंद कर लेने के अलावा कोई रास्ता भी तो नहीं बचता।

सुप्रीम कोर्ट।

इस पूरे मामले में सबसे शर्मनाक यह है कि धर्मनिरपेक्षता के इस अंतिम संस्कार में भारतीय लोकतंत्र के तीन स्तंभों- कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया की भूमिका। कार्यपालिका के प्रधान के तौर पर प्रधानमंत्री धर्मनिरपेक्षता का यह अंतिम संस्कार खुद अपने हाथों संपन्न करेंगे। सर्वोच्च न्यायपालिका तो हिंदू बहुमत की आस्थाओं का ख्याल करते हुए बाबरी मस्जिद को राम मंदिर घोषित करके हिंदू राष्ट्र का मार्ग प्रशस्त करने का कार्य पहले ही कर चुकी है, और मीडिया का जश्न तो देखते ही बन रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय ने आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा के इस तर्क के आगे घुटने टेक दिए कि “बाबरी मस्जिद ही रामजन्मभूमि है या नहीं, यह प्रश्न तथ्य एवं तर्क का प्रश्न नहीं, बल्कि हिंदुओं की आस्था का प्रश्न है।” 9 नवंबर 2019 को पांच न्यायाधीशों की बेंच ने सर्वसम्मति से कहा कि “हिंदू श्रद्धालुओं की आस्था और विश्वास के अनुसार विवादित स्थल भगवान राम का जन्मस्थान है।” अपने निर्णय का आधार अदालत ने दस्तावेजों और मौखिक प्रमाणों को बनाया। अदालत ने कहा कि “इसलिए अंत में हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि हिंदुओं का यह आस्था और विश्वास है कि मस्जिद और उससे संबंधित अन्य चीजों के बनने से पहले यह स्थान भगवान राम का जन्मस्थान रहा है, जहां बाबरी मस्जिद बनाई गई। हिंदुओं की यह आस्था और विश्वास दस्तावेजों और मौखिक प्रमाणों से पुष्ट होता है।”

ज्यादातर दस्तावेजी प्रमाणों के रूप में धार्मिक ग्रंथों को प्रस्तुत किया गया है और हम सभी जानते हैं कि मौखिक प्रमाणों की जमीनी मालिकाने के हक का निर्धारण करने में कोई भूमिका नहीं होती है। लेकिन अदालत ने मुख्य धार्मिक ग्रंथों के दस्तावेजी प्रमाणों और अप्रासंगिक मौखिक प्रमाणों को ठोस सबूत मानते हुए हिंदुओं की इस आस्था एवं विश्वास को सही ठहराया कि सन् 1527 में बनी बाबरी मस्जिद स्थल ही भगवान राम का जन्मस्थान है और इस तरह हिंदू राष्ट्र की परियोजना के सामने घुटने टेक दिए या राम जी के सामने साष्टांग हो गए।

वैसे यह सब कुछ नया भी नहीं हैं। बाबरी मस्जिद में रातों-रात मूर्तियां रखने (22 दिसंबर 1949), ताला खोलने (1986), शिलान्यास की इजाजत (1989) देने और मस्जिद तोड़ने (6 दिसंबर 1992) में करीब-करीब कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया सभी किसी न किसी रूप में अपनी-अपनी भूमिका निभाती रही हैं। नेहरू युग में मूर्ति रखी गई, राजीव गांधी की ताला खुलवाने और शिलान्यास की इजाजत देने में अहम भूमिका रही है, संघ-भाजपा के गुंडों ने मस्जिद तोड़ी और कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की मौन सहमति ने इसे अंजाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। इन सब का जश्न मीडिया के बहुलांश हिस्से ने मनाया और न्यायपालिका ने भी अपनी भूमिका बढ़-चढ़ कर निभाई।

अयोध्या की तस्वीर।

सच तो यह है कि बाबरी मस्जिद का धीरे-धीरे राम मंदिर बनते जाना और अंत में बाबरी मस्जिद का नामोनिशान मिट जाना भारतीय लोकतंत्र के हिंदू राष्ट्र बनने की यात्रा के विविध पड़ाव रहे हैं जिसकी अंतिम मंजिल है उस जगह पर भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए गाजे-बाजे के साथ राष्ट्रीय स्तर पर जश्न मनाते हुए 5 अगस्त को भूमि पूजन। 

भले ही यह तथ्य कितना भी डरावना एवं दुखद लगे, लेकिन सबसे भयावह एवं शर्मनाक यह है कि बाबरी मस्जिद को धीरे-धीरे राम मंदिर में बदलने की 72 वर्षों की यात्रा को भारतीय जनता के भी एक बड़े हिस्से का समर्थन प्राप्त होता रहा है और आज भी प्राप्त है। भाजपा के उभार, विस्तार और भारी बहुमत के साथ सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने में राम मंदिर आंदोलन की एक अहम भूमिका रही है। जनता का यह बहुमत कैसे और किस तरह प्राप्त किया गया है, यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन कड़वा सत्य यही है कि जिस जनता में भारत की संप्रभुता निहित है और जिसके भरोसे लोकतंत्र के कायम रहने की उम्मीद की जाती है, उसके भी एक बड़े हिस्से का समर्थन और सक्रिय सहयोग धर्मनिरपेक्षता के अंतिम संस्कार को प्राप्त है।

शर्म और शोक का एक अन्य कारण यह है कि राम मंदिर भूमिपूजन दिवस (5 अगस्त 2020) इस देश को प्रगतिशील, आधुनिक, लोकतांत्रिक और समता आधारित धर्मनिरपेक्ष देश बनाने के स्वप्न की भारी पराजय का दिवस है। यह पराजय कितनी तात्कालिक या दीर्घकालिक है, यह तो भविष्य के गर्भ में है। लेकिन सच यह है कि आधुनिक लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित धर्मनिरपेक्ष भारत की परियोजना का फिलहाल अंत हो गया है। इसका प्रमाण यह है कि देश की सभी लोकतांत्रिक संस्थाओं का हिंदूकरण हो चुका है और सभी ने बहुसंख्यकवाद की हिंदू परियोजना के सामने समर्पण कर दिया है।

इसमें सत्ताधारी दल के साथ विपक्षी पार्टियां, बौद्धिक वर्ग का बड़ा हिस्सा, सर्वोच्च न्यायालय और मीडिया भी शामिल है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा तो हिंदू राष्ट्र का भोंपू ही बन गया है। इसका निहितार्थ यह भी है कि आधुनिक लोकतांत्रिक भारत का स्वप्न देखने वाले उदारवादी, वामपंथी और बहुजन-दलित संगठनों-पार्टियों एवं समूहों की वैचारिक एवं राजनीतिक धाराएं फिलहाल पराजित हो चुकी हैं और हिंदुत्व के अश्वमेध का घोड़ा बेलगाम अपने विजय-अभियान पर निकला हुआ है। फिलहाल अभी तो कोई उसकी नकेल कसने वाला दिखाई नहीं दे रहा है और यह घोड़ा सबको रौंदता हुआ आगे बढ़ रहा है और अधिकांश ने उसके सामने समर्पण कर दिया है।

ऊपर हिंदू राष्ट्र को मुसलमानों के संदर्भ में देखने का मतलब यह नहीं है कि मैं हिंदू राष्ट्र के असल निहितार्थ से मुंह मोड़ रहा हूं या उसके असल सच पता नहीं हैं। मेरे लिए हमेशा हिंदू राष्ट्र का मतलब सर्वण हिंदू मर्दों का राष्ट्र रहा है, जिसे मैं ब्राह्मणवादी-वर्ण-जातिवादी एवं पितृसत्तावादी राष्ट्र कहता हूं। मुसलमानों एवं ईसाइयों के प्रति हिंदू राष्ट्रवादियों की घृणा हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा की केवल ऊपरी सतह है। सच यह है कि हिंदू राष्ट्र जितना मुसलमानों या अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए खतरा है, उतना ही वह हिंदू धर्म का हिस्सा कही जानी वाली महिलाओं, अति पिछड़ों और दलितों के लिए भी खतरनाक है, जिन्हें हिंदू धर्म दोयम दर्जे का ठहराता है।

यह उन आदिवासियों के लिए भी उतना ही खतरनाक है, जो अपने प्राकृतिक धर्म का पालन करते हैं और काफी हद तक समता की जिंदगी जीते हैं, जिनका हिंदूकरण करने और वर्ण-जाति व्यवस्था और पितृसत्ता की असमानता की व्यवस्था के भीतर जिन्हें लाने की कोशिश संघ निरंतर कर रहा है। यह उसके हिंदू राष्ट्र की परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसीलिए डॉ. आंबेडकर हिंदू धर्म पर टिके हिंदू राष्ट्र को हर तरह की स्वतंत्रता, समता और बंधुता के लिए खतरा मानते थे और इसे पूर्णतया लोकतंत्र के खिलाफ मानते थे। डॉ. आंबेडकर के लिए हिंदू धर्म पर आधारित हिंदू राष्ट्र का निहितार्थ शूद्रों-अतिशूद्रों (आज के पिछड़ों-दलितों) पर द्विजों के वर्चस्व और नियंत्रण को स्वीकृति और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व और नियंत्रण को मान्यता प्रदान करना है। दशरथ-पुत्र राम सवर्ण हिंदू मर्दों के हिंदू राष्ट्रवाद के प्रतीक पुरुष हैं। 

संघ के हिंदू राष्ट्र की परिकल्पना के नायक राम हिंदू राष्ट्र के आधार स्तंभ हैं। राम मंदिर आंदोलन का रथ हिंदू राष्ट्र के निर्माण का आंदोलन साबित हुआ। उसने जहां एक ओर भाजपा को चुनावी सफलता दिलाई, वहीं दूसरी ओर दलित-बहुजनों के उभार को नियंत्रित करने और उनका हिंदुत्वीकरण करने में मदद किया। मंडल की राजनीति को नियंत्रित करने में कमंडल की राजनीति ने एक अहम भूमिका अदा किया। राम मंदिर आंदोलन के माध्यम से भाजपा ने कई निशाने एक साथ साधे। इस पूरे शोरगुल में कब देश को कार्पोरेट के हवाले कर दिया गया, यह गंभीर बहस-विमर्श का विषय नहीं बन पाया। राम मंदिर का भूमिपूजन इन सभी विजयों  का शंखनाद है।

अकारण नहीं है कि जय श्रीराम का नारा भारत की सत्ता पर द्विजों के कब्जे का नारा बन गया है। इस नारे के माध्यम से संघ-भाजपा ने हिंदू राष्ट्र की अपनी कल्पना को साकार किया है। यह प्रच्छन्न तौर पर ब्राह्मणवाद, वर्ण-जाति व्यवस्था और स्त्रियों पर पुरुषों के प्रभुत्व का नारा भी बन गया है। इस नारे ने गैर-हिंदुओं (मुसलमानों-ईसाइयों) को आधुनिक युग का राक्षस यानि म्लेच्छ घोषित कर दिया है और उनके सफाए के घोषित या अघोषित अभियान को राष्ट्रीय गौरव और हिंदू स्वाभिमान के साथ जोड़ दिया है।

इस नारे के साथ ही बाबरी मस्जिद तोड़ी गई; इसी नारे के साथ गुजरात नरसंहार, मुजफ्फरनगर के दंगे और मुस्लिम महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और आज भी इसी नारे के साथ मुसलमानों, दलितों और आदिवासियों की मॉब लिंचिंग की जाती है। दशरथ-पुत्र राम का मिथक अपने जन्म के साथ ही अपने से भिन्न जीवन पद्धतियों के लोगों को अनार्य, असुर और राक्षस ठहराकर उनकी हत्या को प्रोत्साहित और गौरवान्वित करता रहा है। यह नारा हर आधुनिक मूल्य का विरोधी है। 5 अगस्त को इसी नारे की गूंज पूरे देश में सुनाई देगी और इसका दूरदर्शन और अन्य मीडिया चैनलों से सीधा प्रसारण होगा।

Muzaffarnagar riots front
मुजफ्फरनगर दंगे का एक दृश्य।

अंतिम बात यह कि यह हिंदू द्विज मर्दों की विजय, यानि 5 अगस्त, का जश्न अश्लील एवं फूहड़ भी है। जिस समय पूरा देश कोरोना महामारी  की चपेट में है, लोग अपने आत्मीय जनों को खो रहे हैं और भय और आशंका में जी रहे हैं तथा देश की अर्थव्यवस्था करीब तबाह हो चुकी है, बेरोजगारी एवं आसन्न भूख के संकट के चलते लोग आत्म हत्याएं कर रहे हैं, ऐसे समय में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में राष्ट्रीय जश्न मनाना, मिठाइयां बांटना और लोगों से दिए जलाने के लिए कहना न केवल अश्लील एवं फूहड़ है, बल्कि शर्मनाक भी है।   

निष्कर्ष रूप में यह कहना है कि आधुनिकता का सबसे बुनियादी लक्षण है- आस्था पर तर्क की जीत। यदि किसी समाज में व्यापक पैमाने और शीर्ष स्तर पर तर्क की जगह आस्था जीत रही है, तो यह तथ्य इस बात का सबूत है कि समाज मध्यकालीन अंधकार युग की ओर बढ़ रहा है। यदि यह परिघटना किसी लोकतांत्रिक देश की शीर्ष संस्थाओं के स्तर पर घटित हो रही है, तो यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि उस देश ने आधुनिकता, वैज्ञानिकता, तर्कशीलता, सहिष्णुता और भाईचारे का पथ छोड़कर आस्था जनित और घृणा-आधारित मध्यकालीन बर्बरता के मूल्यों को चुन लिया है। भारत के मध्यकालीन बर्बरता के युग में प्रवेश पर शर्म करने और दुख प्रकट करने के अलावा फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा है। 

लेकिन शर्म से सिर तो झुका ही सकते हैं और दुख तो प्रकट ही कर सकते हैं।आखिर हम तो इस के नागरिक हैं, यह मेरा भी तो देश है और जो कुछ भी हो रहा है उसकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर भी तो आती है। आइए 5 अगस्त को राष्ट्रीय शर्म एवं शोक के दिवस के रूप में मनाएं।

(डॉ. सिद्धार्थ जनचौक के सलाहकार संपादक हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

टेनी की बर्खास्तगी: छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों ने केंद्रीय मंत्रियों का पुतला फूंका, यूपी में जगह-जगह नजरबंदी

कांकेर/वाराणसी। दशहरा के अवसर पर जहां पूरे देश में रावण का पुतला दहन कर विजय दशमी पर्व मनाया गया।...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.