मुस्लिम सांसदों की घटती संख्या: 1980 में सबसे ज्यादा और 2014 में सबसे कम सांसद लोकसभा पहुंचे

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नई दिल्ली। देश के लोकतंत्र में सभी धर्मों, क्षेत्रों और जातियों को उचित प्रतिनिधित्व देने की मांग होती रही है। संसद और विधानसभाओं में तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जन-जाति के प्रतिनिधित्व के लिए सीटों को आरक्षित किया गया है। लेकिन संसद में अब कई जातियों और धर्मों का प्रतिनिधित्व घटता रहा है, जो उनकी आबादी के लिहाज से बहुत कम है। आज राजनातिक रूप से मुसलमान सबसे अधिक हाशिए पर हैं। संसद और विधानसभाओं में उनके प्रतिनिधित्व की कौन कहे, उनके राजनीतिक दल टिकट देने से ही बच रहे हैं।

एक समय था जब लोकसभा में मुस्लिम सांसदों की संख्या 49 थी। सातवीं लोकसभा यानि 1980 में देश में कुल 49 मुस्लिम सांसद लोकसभा पहुंचे थे। आंकड़े के मुताबिक 2014 से लोकसभा, राज्यसभा और राज्य विधानसभाओं में मुसलमानों का प्रतिनिधित्व कम हो रहा है। यह उनके जनसंख्या के मुताबिक बहुत ही कम है। 16 वीं लोकसभा यानि 2014 के लोकसभा चुनाव में केवल 22 मुस्लिम सांसद ही लोकसभा पहुंचे थे। वहीं 17 वीं लोकसभा यानि 2019 में 26 मुस्लिम सांसद चुनकर आए थे। 17 वीं लोकसभा का कार्यकाल अब समाप्त हो रहा है और 18 वीं लोकसभा का गठन जून में हो जाएगा। ऐसे में सवाल उठता है कि 18वीं लोकसभा में कितने मुस्लिम सांसद चुनकर आएंगे। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि इस बार कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों ने मुसलमानों को 2019 की अपेक्षा आधा टिकट दिया है।

इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित खबर के मुताबिक भाजपा ने जहां मौजूदा आम चुनावों में केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, और उसके सहयोगी जदयू ने बिहार में एक और उम्मीदवार खड़ा किया है। भाजपा और उसके सहयोगी दलों की बात छोड़ दिया जाए तो प्रमुख विपक्षी दलों ने भी मुसलमानों को टिकट देना फायदे का सौदा नहीं माना है। तभी तो कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राजद, राकांपा और सीपीआई (एम) ने इस बार 78 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है, जो 2019 में 115 से कम है।

2019 में, 26 मुस्लिम उम्मीदवार सांसद के रूप में चुने गए; उनमें से कांग्रेस और टीएमसी के चार-चार, बीएसपी और एसपी के तीन-तीन, और एनसीपी और सीपीआई (एम) के एक-एक सदस्य हैं। अन्य लोग असम के एआईयूडीएफ, लोक जनशक्ति पासवान (अब दो गुटों में विभाजित), आईयूएमएल और जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस से थे।

बसपा ने 2024 में 35 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे हैं, जो सभी पार्टियों में सबसे ज्यादा है; इनमें से आधे से अधिक (17) उत्तर प्रदेश में, इसके अलावा मध्य प्रदेश में चार, बिहार और दिल्ली में तीन-तीन, उत्तराखंड में दो और राजस्थान, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, झारखंड, तेलंगाना और गुजरात में एक-एक हैं।

यह 2019 की तुलना में मामूली गिरावट है, जब बसपा ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में लड़े चुनाव में 39 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जिनमें से तीन जीते थे। हालांकि 2024 में बसपा ने 35 प्रत्याशी मुस्लिम समुदाय से उतारे हैं लेकिन बसपा ने 2014 में 61 मुस्लिम उम्मीदवारों को उतारा था, यह बात अलग है कि उसमें से कोई जीत नहीं सका था। बसपा के पास इस बार यूपी में 17 मुस्लिम उम्मीदवार हैं, 2019 में उसने राज्य में केवल छह को खड़ा किया था।

इंडिया ब्लॉक पार्टियों, जिनमें कांग्रेस और एसपी शामिल हैं, ने बीएसपी पर इस बार यूपी में रणनीतिक रूप से मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारने का आरोप लगाया है ताकि उनका हिस्सा कम हो सके और बीजेपी को मदद मिल सके।

मौजूदा लोकसभा चुनावों में 19 मुस्लिम उम्मीदवारों के साथ कांग्रेस दूसरे स्थान पर है, जिनमें सबसे अधिक संख्या पश्चिम बंगाल में छह है, इसके बाद आंध्र प्रदेश, असम, बिहार और यूपी में दो-दो और कर्नाटक, केरल, ओडिशा, तेलंगाना और लक्षद्वीप में एक-एक उम्मीदवार हैं।

2019 में, पार्टी, जो मौजूदा चुनावों में “अल्पसंख्यक तुष्टीकरण” को लेकर भाजपा के हमलों का निशाना रही है, ने 34 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से 10 बंगाल में और 8 यूपी में थे। इनमें से चार जीते। लेकिन कांग्रेस भी 2019 की तुलना में लगभग 100 सीटों पर चुनाव नहीं लड़ रही है, कांग्रेस उस समय की 421 सीटों पर चुनाव लड़ी थी जो 2024 में घटकर 328 रह गई है।

2014 में, कांग्रेस ने लगभग इतनी ही संख्या में 31 मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे, जिसमें से तीन जीते थे, जब उसने 464 सीटों पर चुनाव लड़ा था।

इस बार चुनाव मैदान में तीसरे नंबर पर टीएमसी के छह मुस्लिम उम्मीदवार हैं, जिनमें से पांच को उसने अपने गृह राज्य बंगाल में खड़ा किया है। इसने असम में एक मुस्लिम उम्मीदवार भी खड़ा किया है।

2019 में, टीएमसी ने पश्चिम बंगाल, ओडिशा, त्रिपुरा, असम और बिहार राज्यों में 13 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से अधिकांश बंगाल में थे। इनमें से चार जीते। हालांकि, 2014 में, पश्चिम बंगाल में सत्ता में आने के तीन साल बाद, टीएमसी ने 24 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से तीन जीते।

लेकिन पिछले तीन आम चुनावों में टीएमसी द्वारा लड़ी जाने वाली लोकसभा सीटों की संख्या 131 से घटकर 62 से 48 हो गई है।
समुदाय से मिले मजबूत समर्थन के बावजूद, समाजवादी पार्टी ने इस बार केवल चार मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। यह 2019 की आधी संख्या है, जिनमें से तीन जीते; और 2014 में मैदान में उतरी संख्या का लगभग दसवां हिस्सा, 39, जिनमें से कोई भी नहीं जीता।

जहां 2014 में एसपी ने 197 सीटों पर चुनाव लड़ा था, वहीं 2019 में उसने केवल 49 सीटों पर उम्मीदवार उतारे और इस बार 71 सीटें मैदान में हैं।

अब सपा के मुस्लिम उम्मीदवारों में से तीन यूपी से चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि चौथे को आंध्र प्रदेश से मैदान में उतारा गया है, जहां पार्टी ने कुछ यादव उम्मीदवारों को भी उम्मीदवार बनाया है। यहां तक कि सपा ने यूपी में अपने मौजूदा मुस्लिम सांसदों में से एक, मुरादाबाद के एसटी हसन को हटाकर, हिंदू उम्मीदवार रुचि वीरा को मैदान में उतारा है। बसपा ने इसे क्षेत्र में प्रचार का मुद्दा बनाया है।

जबकि एसपी ने 2019 में महाराष्ट्र से तीन मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, इस बार वह राज्य में चुनाव नहीं लड़ रही है, इसके नेता पार्टी के इंडिया ब्लॉक सहयोगियों के लिए प्रचार कर रहे हैं।

मुस्लिम-यादव वोट बैंक वाली पार्टी राजद ने 2019 में पांच के मुकाबले इस बार बिहार में दो मुसलमानों को मैदान में उतारा था, जिनमें से कोई भी नहीं जीता। 2014 में, इसने छह मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, और एक जीता। महागठबंधन के हिस्से के रूप में राजद पांच साल पहले की तुलना में इस बार बिहार में अधिक सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। इस बार राजद 23 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है जबकि 2019 में उसके हिस्से में 19 सीटें आयी थी।

एनसीपी ने 2019 में तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से एक ने जीत हासिल की। इस बार, पार्टी के दोनों गुटों – एनसीपी और एनसीपी (शरदचंद्र पवार) – ने लक्षद्वीप में एक-एक मुस्लिम उम्मीदवार को मैदान में उतारा है। NCP ने 2014 में तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे जिसमें दो जीते थे।

2019 में, भाजपा ने 436 सीटों पर तीन मुस्लिम उम्मीदवार उतारे, जिनमें से कोई भी नहीं जीता। 2014 में, इसने 428 सीटों पर सात मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, लेकिन फिर भी कोई भी जीत नहीं सका। इस बार बीजेपी 440 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जिसमें केवल एक मुस्लिम उम्मीदवार उतारा है।

सीपीआई और सीपीआई (एम) ने 2019 में सामूहिक रूप से 13 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जिनमें पश्चिम बंगाल में सात और लक्षद्वीप और केरल में 1-1 शामिल था। इनमें से एक जीत गया। 2014 में, उन्होंने एक साथ 17 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा, जिनमें से दो जीते।

2024 में, केवल सीपीआई (एम) ने 10 मुसलमानों को मैदान में उतारा, जिनमें बंगाल में पांच, केरल में चार और तेलंगाना में एक शामिल था।

छोटे दलों में, एआईएमआईएम, आईयूएमएल और एआईयूडीएफ, जिन्हें अनिवार्य रूप से मुस्लिम हितों का प्रतिनिधित्व करते देखा जाता है, ने विभिन्न राज्यों में कुछ मुस्लिम बहुल निर्वाचन क्षेत्रों में समुदाय से उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है।

जम्मू-कश्मीर को छोड़कर, सबसे अधिक मुस्लिम उम्मीदवार यूपी (22) में चुनाव लड़ रहे हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल (17), बिहार (सात), केरल (छह) और मध्य प्रदेश (चार) हैं। जनसंख्या में मुसलमानों की हिस्सेदारी के मामले में सबसे अधिक असम में तीन मुस्लिम उम्मीदवार हैं, जो पिछली बार के चार से कम है।

प्रदीप सिंह https://www.janchowk.com

दो दशक से पत्रकारिता में सक्रिय और जनचौक के राजनीतिक संपादक हैं।

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