Monday, April 15, 2024

जो अब तक भाजपा में शामिल नहीं हो पाए, उन्हें राज्यसभा चुनाव में आखेट बनाया जा रहा

तीन राज्यों में राज्य सभा चुनावों को लेकर बड़ी खबर आ रही है। उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में जहां समाजवादी पार्टी और कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है, वहीं कर्नाटक में भाजपा की उम्मीदों के विपरीत उसके दो विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है। कर्नाटक से तस्वीर आ रही है, उसमें साफ़ लगता है कि कांग्रेस अपने तीनों उम्मीदवारों को आसानी से जिताने में कामयाब रही है, वहीं यूपी में समाजवादी पार्टी के चीफ व्हिप ने ही ऐन मौके पर इस्तीफ़ा देकर, पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव को सकते की स्थिति में ला दिया है।

लेकिन असली भूचाल तो हिमाचल प्रदेश में देखने को मिल रहा है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू को प्रेस के साथ बातचीत में यह कहते सुना जा सकता है कि 2-3 विधायक अगर बिक गये हों, तो यह संभव है, लेकिन हम चुनाव जीत रहे हैं। उधर गोदी मीडिया में अभी से भाजपा की जीत के दावे किये जा रहे हैं, और सोशल मीडिया पर कई सूत्र 8-9 विधायकों के व्हिप का उल्लंघन करने और 3 निर्दलीय वोटों के साथ भाजपा उम्मीदवार की जीत के दावे कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर दावा कर रहे हैं कि कांग्रेस सरकार बहुमत खो चुकी है, और मुख्यमंत्री सुक्खू से इस्त्तीफे तक की मांग होने लगी है।

भारतीय लोकतंत्र के पुर्जे-पुर्जे करने की पहल तो लंबे अर्से से चल रही थी, लेकिन 2024 आम चुनाव की सुगबुगाहट शुरू होते ही यह बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रही है। बुलेट ट्रेन के बारे में हम भारतीयों की कल्पना जापान, फ़्रांस और चीन में दौड़ती ट्रेनों से ही पूरी हो पाती है, भारत में बुलेट ट्रेन के सपने को पिछले 10 वर्ष से बेचने वाले पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में लेकिन भारतीय लोकतंत्र के पतन में यह रफ्तार अवश्य देखने को मिल रही है।

विशेषकर अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति को प्रतिस्थापित करने के बाद से सत्तारूढ़ पार्टी के भीतर अचानक से इतना अधिक नैतिक बल आ चुका है कि अब विपक्षी पार्टियों से पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद और विधायकों का भाजपा में प्रवेश आम जन के लिए एक रोजमर्रा का विषय हो चुका है। पहले हम देखते थे कि किसी बड़े नेता के भाजपा में शामिल होने की प्रक्रिया को देश की राजधानी में बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से संपन्न कराया जाता था। लेकिन आजकल इतना समय ही नहीं रहा।

यह कुछ वैसा ही है, जैसे शुरू-शुरू में आम के सीजन के दौरान पेड़ों पर इक्का-दुक्का पके आम को देख गांव में बच्चे चोरी-छुपे धेला मारकर पहलेपहल स्वाद लेने से खुद को रोक नहीं पाते, लेकिन बाद के दौर में जब हर तरफ तरह-तरह की वैरायटी वाले आमों से पूरा गांव महकने लगता है, तो महत्व उतना नहीं रह जाता।

आज भाजपा की स्थिति यही है। ऐसा जान पड़ता है, मानो एक ही पार्टी में समुद्र मंथन के बाद अमृत मिला है, जिसे पाने के लिए देश में भांति-भांति के दलों का आविष्कार किया गया था। बसपा को अनाथ बनाकर भाजपा में जाने वाले नेताओं और कार्यकर्ताओं की संख्या सबसे अधिक है। कुछ कांग्रेस और समाजवादी पार्टी में भी अपना भविष्य देख रहे हैं। लेकिन सपा और कांग्रेस से भी निकल-निकलकर देश की सत्ताधारी पार्टी में जाने वाले विधायकों, सांसदों का तांता लगा हुआ है।

आप यह सोचकर सोते हैं कि चलो आज कांग्रेस के दो ही विधायक भाजपा ने अपने पाले में लाने में सफलता हासिल की है, अगली सुबह अख़बार में दो-तीन और लोगों के देर रात मन बदलने की खबर आ जाती है।

राज्य सभा के लिए सांसदों के चुनाव में बेशर्मी शबाब पर है। सबसे अधिक खलबली कांग्रेस और सपा के खेमे में देखी जा रही है। सपा के लिए उत्तर प्रदेश में अपने खेमे को एकजुट रखने में दिक्कत आ रही है, जबकि कांग्रेस के सामने हिमाचल प्रदेश में सुक्खू सरकार का भविष्य ही दांव पर लग गया है। खबर आ रही है कि समाजवादी पार्टी के 8 विधायकों ने पार्टी व्हिप की अवहेलना की है। विधायकों में राकेश पांडेय, राकेश प्रताप सिंह, अभय सिंह, विनोद चतुर्वेदी, मनोज पांडेय और पूजा पाल के द्वारा एनडीए के उम्मीदवार के पक्ष में अपना वोट डालने की बात कही जा रही है, जबकि महाराजी देवी और आशुतोष मौर्य मतदान के लिए ही नहीं पहुंचे।

उत्तर प्रदेश में सपा तोड़फोड़ की शिकार

उत्तर प्रदेश में कुल 10 राज्य सभा सीट का चुनाव किया जाना है। संख्या बल के लिहाज से उत्तर प्रदेश से भाजपा के 7 और समाजवादी पार्टी के 3 राज्य सभा उम्मीदवारों को निर्विरोध चुना जाना तय था, लेकिन भाजपा ने 8 वें उम्मीदवार के रूप में संजय सेठ को उतारकर विपक्षी खेमे में तोड़-फोड़ की रणनीति बना ली थी। यूपी में 37 वोट पर एक सीट पक्की है। भाजपा के पास कुल 259 विधायक हैं। इसके अलावा उसे रालोद के 9 और जेडी(एल) के दो वोट मिल जाने के बाद भी 9 वोट चाहिए। इसी प्रकार इंडिया गठबंधन के पास कुल 110 वोट हैं, और तीसरे उम्मीदवार को जिताने के लिए उसे 3 वोटों की जरूरत है।

भाजपा से आरपीएन सिंह, सुधांशु त्रिवेदी, तेजवीर सिंह, साधना सिंह, अमरपाल मौर्य, संगीता बलवंत और नवीन जैन का जीतना तय है, वहीं सपा से आलोक रंजन और जया बच्चन का मार्ग निष्कंटक है। तीसरे उम्मीदवार रामजी लाल सुमन को समाजवादी पार्टी जिता पाती है, या उसे इस चुनाव में बड़ा खामियाजा भुगतना होगा, यह थोड़ी ही देर में स्पष्ट हो जायेगा।

हिमाचल में सुक्खू सरकार दांव पर

कांग्रेस के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य सभा चुनाव एक नई अग्नि-परीक्षा साबित हो रहा है। यहां से सिर्फ एक सीट का चुनाव होना है, जिसके लिए कांग्रेस ने देश के जाने-माने वकील अभिषेक मनु सिंघवी को मैदान में उतारा है। चूंकि इस सीट पर हिमाचल प्रदेश के पुराने कांग्रेस कार्यकर्ता वरिष्ठ कांग्रेसी नेता आनंद शर्मा को देखना चाहते थे, जबकि सिंघवी को बाहरी व्यक्ति बताया जा रहा है। भाजपा ने हिमाचल प्रदेश की सियासत में उलटफेर को ध्यान में रखते हुए पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीरभद्र सिंह के नजदीकी, हर्ष महाजन को अपना उम्मीदवार बनाया है।

कुल 70 सीट में जीत के लिए 35 वोट की जरूरत है, जबकि कांग्रेस के पास खुद के 40 वोट हैं, और 3 निर्दलीय के साथ उसके पास 8 वोट अधिक हैं। भाजपा के पास 25 वोट हैं, और उसे जीत के लिए 10 विधायकों को अपने पक्ष में करने की चुनौती है। कांग्रेस के कुनबे में पिछले कुछ समय से ही बगावती सुर उठने शुरू हो चुके थे। इसकी शुरुआत तो राज्य में जीत के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर ही हो गई थी, जब प्रदेश के मुखिया पद के लिए वीरभद्र सिंह की पत्नी और सांसद प्रतिभा सिंह और सुखविंदर सिंह सुक्खू को लेकर कई दिनों तक तनातनी का माहौल था। हालांकि कुछ अर्से तक यह मामला ठंडा बना रहा, लेकिन राम मंदिर उद्घाटन के वक्त कांग्रेस अध्यक्ष और सोनिया गांधी को भेजे गए निमंत्रण पत्र को अस्वीकार किये जाने के मुद्दे पर बहुसंख्यक उच्च-जाति वाले राज्य में हिंदुत्व और राजशाही की परंपरा को जारी रखने की मंशा वाले कांग्रेसी तबके से विरोध के स्वर उठने शुरू हो चुके थे।

भाजपा के लिए राज्यसभा चुनाव एक बड़े मौके के रूप में आया है। अगर कांग्रेस पूर्ण बहुमत और 3 निर्दलीय विधायकों का समर्थन होने के बावजूद यह सीट हार जाती है, तो उसके हाथ से राज्य की सत्ता भी जा सकती है। इतने बड़े खतरे और बगावत को भांपते हुए ही राज्य प्रभारी राजीव शुक्ला और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कई दिनों से शिमला में डेरा डाले हुए हैं।

कर्नाटक में डीके शिवकुमार काउंटर-अटैक करते हुए

तीसरा राज्य कर्नाटक है, जहां राज्य सभा के लिए 4 सीटें दांव पर हैं। 45 वोट पर एक राज्यसभा सीट का फैसला होना है। कांग्रेस ने यहाँ से अजय माकन, सैयद नासिर हुसेन और जीसी चन्द्रशेखर को मैदान में उतारा है। 134 वोट के साथ दो सीट पर कोई समस्या नहीं है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे 1 अदद वोट की दरकार है।

एनडीए की ओर से भाजपा और जेडीएस ने एक-एक उम्मीदवार को उतारा है। लेकिन उसके पास कुल जमा 85 वोट हैं, और दूसरी सीट के लिए कम से कम 5 वोट चाहिए। राज्य में 4 निर्दलीय को अपने पाले में लाने के बावजूद उसके लिए 1 वोट हासिल कर पाना टेढ़ी खीर साबित होने जा रहा है। असल में, कहा जा रहा है कि कर्नाटक में एनडीए के भीतर भितरघात की संभावना है। कम से कम 2 विधायकों ने बगावती मुद्रा अपनाई है। इनमें से एक पूर्व मंत्री एसटी सोमशेखर बताये जा रहे हैं, जिन्होंने क्रॉस वोटिंग की है, जबकि एक अन्य विधायक वोटिंग से अनुपस्थित रहने की खबर आ रही है।

कुल मिलाकर देखा जाये तो पार्टियों में तोड़-फोड़ कर सभी नेताओं को एक पार्टी में समाहित करने की मोदी-शाह तकनीक अब कांग्रेस मुक्त भारत से विपक्ष मुक्त भारत में तब्दील हो चुकी है। इसका दूसरा अर्थ है, भले ही देश में नियम से हर 5 वर्ष में चुनाव हो, लेकिन जीत हर हाल में भाजपा-आरएसएस की ही होनी चाहिए। इसके लिए ईडी, सीबीआई, आयकर जैसी जांच एजेंसियों, चुनाव आयोग सहित विपक्षी दलों के खातों पर प्रतिबंध से लेकर उनके विधायकों और कार्यकर्ताओं को हर हाल में तोड़कर अपने पक्ष में लाना ही सच्चा लोकतंत्र हुआ। 2014 से वाकई में नए भारत का उदय हुआ है, जिसे देखकर आम भारतीय फिलहाल दहल रहा है, लेकिन अंत में सही फैसला भी उसे ही लेना है। क्योंकि जो कुछ भी दांव पर लगा है, वह तो उसका ही लगा हुआ है।

(रविंद्र पटवाल जनचौक संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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