Wednesday, May 18, 2022

तीर कभी बन जाते हैं खुद निशाने!

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यूक्रेन के मुद्दे पर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने बार-बार धमकी दी थी कि अगर रूस ने यूक्रेन पर हमला किया, तो उसे अंतरराष्ट्रीय भुगतान के सिस्टम- स्विफ्ट से बाहर कर दिया जाएगा। 24 फरवरी को जब रूस ने सचमुच यूक्रेन के खिलाफ ‘विशेष सैनिक कार्रवाई’ शुरू कर दी, तो शुरुआत में यह कदम उठाने के सवाल पर पश्चिमी देशों में मतभेद के संकेत मिले। खुद अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने प्रेस कांफ्रेंस में यह स्वीकार किया कि अमेरिका के ‘यूरोपीय सहयोगी’ इस कदम के लिए तैयार नहीं हैं। बहरहाल, रूस की आगे बढ़ती कार्रवाई के बीच प्रभावी कदम उठाने में विफलता को लेकर पश्चिमी देशों की बढ़ती आलोचना के कारण अमेरिका ने मुहिम तेज की। आखिरकार अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन में ये सहमति बनी कि रूस के कुछ बैंकों को इस सिस्टम से बाहर कर दिया जाएगा।

यहां यह ध्यान देने की बात है कि अभी भी रूस को पूरी तरह से इस सिस्टम से निकाल देने पर सहमति नहीं बनी है। खबरों के मुताबिक इस कार्रवाई से उन बैंकों को बख्श दिया जाएगा, जिनके जरिए रूस से खरीदे जाने वाले कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बदले कीमत का भुगतान यूरोपीय देश करते हैं। जाहिर है, ये देश- जिनमें जर्मनी प्रमुख है- रूस पर कार्रवाई करने के उत्साह में अपने लिए मुश्किल नहीं बढ़ाना चाहते। इन देशों को मालूम है कि भुगतान के सिस्टम से रूस को अलग किया गया, तो तेल और गैस की सप्लाई रुक जाएगी। पहले से ही संकटग्रस्त उनकी अर्थव्यवस्था पर इससे जो मार पड़ेगी, उसके लिए वे तैयार नहीं हैं। गौरतलब है कि खुद पश्चिमी विश्लेषकों ने यह कहा है कि स्विफ्ट सिस्टम से रूस को बाहर करना एक दोधारी तलवार है। यानी उसकी चोट दोनों ओर पड़ेगी।

चूंकि अब उन बैंकों की सूची सामने नहीं आई है, जिन्हें स्विफ्ट से बाहर किया जाने वाला है, इसलिए इस कदम से रूस को कितना नुकसान होगा, उसका पूरा अंदाजा लगा पाना अभी कठिन है। लेकिन पश्चिमी देशों के इस फैसले ने स्विफ्ट सिस्टम का विकल्प तैयार करने की चर्चा में नई जान फूंक दी है। और इसके साथ ही De- Dollarization की संभावना अधिक ठोस रूप लेती नजर आने लगी है। De- Dollarization का मतलब अंतरराष्ट्रीय कारोबार में डॉलर पर निर्भरता घटाना और अंततः इसे पूरी तरह खत्म करना है। इस परिघटना के परिणाम दूरगामी और बुनियादी उलटफेर करने वाले होंगे।

सोसायटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनेंशियल टेलीकम्यूनिकेशन (स्विफ्ट) एक मेसेज (संदेश) आधारित सिस्टम है, जिससे दुनिया भर के 11 हजार से अधिक बैंक जुड़े हुए हैँ। इन बैंकों का कोई खाताधारी जब कोई ट्रांजैक्शन (लेन-देन) करता है, तो ये सिस्टम दूसरे बैंक में स्थित खाते को तुरंत सूचित कर देता है। इस तरह दुनिया के किसी एक हिस्से से दूसरे किसी हिस्से में एक खाते से दूसरे खाते में धन जाने की प्रक्रिया पूरी हो जाती है। स्विफ्ट एक डॉलर आधारित सिस्टम है। यानी धन के लेन-देन की मुद्रा डॉलर है। किसी अन्य मुद्रा से मनी ट्रांसफर करने पर पहले वह डॉलर में कन्वर्ट होती है और फिर जिस मुद्रा वाले खाते में ट्रांसफर किया गया है, उसमें वह पहुंचती है। दोनों संबंधित मुद्राओं का उस रोज डॉलर की तुलना में जो भाव होता है, वही रकम ट्रांसफर होती है।

इसलिए जो देश De- Dollarization की कोशिश से जुड़े रहे हैं, वे गुजरे कई वर्षों से स्विफ्ट का विकल्प तैयार करने की कोशिश में भी जुटे रहे हैँ। खुद रूस ने फाइनेंशियल मेसेज ट्रांसफर सिस्टम (एसपीएफएस) नाम से एक वैकल्पिक व्यवस्था बना रखी है। उसका रूस के अंदर मनी ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल भी हो रहा है। चीन ने 2015 में सिप्स (क्रॉस-बॉर्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम) शुरू किया था। दुनिया भर के तकरीबन 400 बैंक इसके सदस्य बन चुके हैँ। जाहिर है, ये दोनों प्रयास स्विफ्ट की तुलना में बेहद छोटे हैँ। लेकिन ध्यान देने का पहलू यह है कि स्विफ्ट का तकनीकी रूप से सक्षम विकल्प दुनिया में मौजूद है। साथ ही इनका उपयोग भी क्रमिक रूप से बढ़ा है।

रूस को स्विफ्ट से निकालने की घोषणाओं के बीच 27 फरवरी को जर्मन अखबार डाय वेल्ट ने लिखा- ‘सिप्स के जरिए अभी रोज 50 बिलियन डॉलर का ट्रांजैक्शन हो रहा है। स्विफ्ट के जरिए रोज होने वाले लगभग 400 बिलियन डॉलर के ट्रांजैक्शन की तुलना में यह बहुत कम है, लेकिन सिप्स के इस्तेमाल में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। अगर रूस और चीन अपने सिस्टमों को जोड़ दें, और दूसरे ऑथेरिटेरियन (तानाशाही व्यवस्था वाले) देशों को भी यह विकल्प मुहैया कराएं, तो उससे वित्तीय बाजारों पर अमेरिकी वर्चस्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है।’

उसी रोज चीन के सरकार समर्थक अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा- ‘रूस और यूक्रेन में जारी सैनिक टकराव के बीच अमेरिका और उसके यूरोपियन सहयोगी रूस सरकार पर दबाव बढ़ाने के एक अन्य तरीके को आगे बढ़ा रहे हैं। वे रूस को स्विफ्ट से बाहर करने की तरफ बढ़ रहे हैं, जिसे विशेषज्ञों ने अभूतपूर्व रूप से सख्त कार्रवाई कहा है। लेकिन इस कार्रवाई का रूस पर घातक असर होने की संभावना नहीं है। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि रूस ने लंबे समय से इसका मुकाबला करने की तैयारी कर रखी है, बल्कि यह भी है कि इससे पश्चिम- खास कर यूरोप को जो आर्थिक मूल्य प्राप्त होता है, उसका विकल्प ढूंढना उनके लिए कठिन है। साथ ही ये प्रतिबंध de-dollarization के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं, क्योंकि बहुत-सी कंपनियां रूस से व्यापार जारी रखने को प्रेरित होंगी। ऐसी कंपनियां डॉलर आधारित व्यवस्था के विकल्प को अपनाना चाहेंगी।’

यहां यह उल्लेखनीय है कि रूस ने de-dollarization की प्रक्रिया 2014 से शुरू कर दी थी, जब क्राइमिया को उसने अपने देश का हिस्सा बनाया था और उसकी प्रतिक्रिया में पश्चिमी देशों ने पहली बार उस पर प्रतिबंध लगाए थे। रूस की ये कोशिश पिछले साल जुलाई में एक खास मुकाम पर पहुंची, जब उसने अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की मात्रा शून्य करने का एलान किया। तब से रूस के विदेशी मुद्रा भंडार में सिर्फ यूरो, येन (जापान की मुद्रा), युवान (चीन की मुद्रा) और स्वर्ण को रखा गया है।

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के शासनकाल में जब से अमेरिका ने चीन के खिलाफ व्यापार युद्ध छेड़ा, चीन ने भी डॉलर से हटते हुए कारोबार करने की सुनियोजित कोशिशें की हैँ। इस सिलसिले में उसने रूस, ईरान, और उन अन्य देशों के साथ उनकी अपनी मुद्राओं में व्यापार शुरू किया है। ये वो देश हैं, जिन पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा रखे हैँ। चीन के विदेशी मुद्रा भंडार में तकरीबन चार ट्रिलियन डॉलर की विदेशी मुद्राएं हैं।

उनमें दो ट्रिलियन डॉलर के अमेरिकी ट्रेजरी सिक्युरिटीज (प्रतिभूतियां) भी शामिल हैं। यानी चीन के पास समृद्ध विदेशी मुद्रा भंडार है। हाल में de-dollarization की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए चीन ने उन देशों के साथ करेंसी स्वैपिंग (मुद्राओं की अदला-बदली) शुरू की है, जो विदेशी मुद्रा भंडार के क्षीण होने के संकट से ग्रस्त हैँ। इस नीति के तहत चीन ने श्रीलंका और इंडोनेशिया जैसे देशों को डॉलर उपलब्ध कराए हैँ। लेकिन उसका दूसरा मतलब यह है कि उन देशों के साथ उनकी मुद्रा और युवान की अदला-बदली के जरिए व्यापार करने की शुरुआत की गई है। इंडोनेशिया के साथ करेंसी स्वैपिंग करते समय ऐसा खास समझौता हुआ।

क्यों अहम है de-dollarization

तो अब यह समझने की बात है कि आखिर de-dollarization को इतना महत्त्वपूर्ण क्यों समझा जाता है। इसकी वजह यह है कि डॉलर में सारा कारोबार होने से विश्व अर्थव्यवस्था पर अमेरिका का स्वतः वर्चस्व बन जाता है। गौरतलब है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद जो विश्व आर्थिक व्यवस्था बनी थी, उसे गोल्ड स्टैंडर्ड पर आधारित सिस्टम कहा गया था। उसका मतलब था कि देशों की मुद्रा की कीमत उनके भंडार में मौजूद सोने की मात्रा के अनुपात में तय होगी। लेकिन 1971 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने गोल्ड स्टैंडर्ड के सिस्टम को भंग कर दिया। उन्होंने डॉलर का सोने से संबंध तोड़ दिया। तब तक दुनिया की आर्थिक एवं सामरिक व्यवस्था पर अमेरिका का शिकंजा इतना कस चुका था कि कोई देश इसका विरोध करने की स्थिति में नहीं था।

तब से डॉलर एक स्टैंडर्ड यानी पैमाना बन गया। विभिन्न देशों के लिए अपने मुद्रा भंडार में डॉलर का रखना अंतरराष्ट्रीय भुगतान के लिए जरूरी हो गया। इसका मतलब यह है कि मूल्य चाहे जिस देश में पैदा हो, डॉलर रखने की मजबूरी के कारण सभी देश अपने यहां पैदा हुए मूल्य (value) का एक हिस्सा बिना कोई वस्तु या सेवा लिए अमेरिका को भेज देते हैं। यह अमेरिकी समृद्धि का एक बड़ा कारण है। इसी कारण अमेरिका असीमित रूप से डॉलर छापने की स्थिति में रहा है। जबकि कोई दूसरा देश अपनी अर्थव्यवस्था की शक्ति की तुलना में अधिक नोट छापे, तो उसकी मुद्रा की कीमत गिरने लगती है। वह अनियंत्रित मुद्रास्फीति का शिकार हो जाता है। 

डॉलर आधारित ये व्यवस्था निर्बाध चल रही थी। लेकिन दो घटनाओं ने विभिन्न देशों को इसका विकल्प ढूंढने के लिए प्रेरित किया। पहली घटना तो यह है कि 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद बनी एक-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अमेरिका ने एकतरफा प्रतिबंध लगाने की नीति अपना ली। उसने संयुक्त राष्ट्र को दरकिनार कर अपने लिए असहज देशों को दंडित करने का ये तरीका चुना। डॉलर के वर्चस्व के कारण प्रतिबंध का शिकार होने वाले देशों के लिए दूसरे देशों से व्यापार करना कठिन होता गया। ईरान, क्यूबा, वेनेजुएला, रूस, सीरिया, आदि जैसे कई देश प्रतिबंध की नीति के शिकार हुए हैं। दूसरी घटना 2008 में अमेरिका में आई मंदी थी। चूंकि सारे देश डॉलर से जुड़े हुए हैं, इसलिए अमेरिका में आई मंदी की चपेट में सारी दुनिया आ गई। इसीलिए भी डॉलर से खुद को अलग करने की चर्चा सक्षम देशों में शुरू हुई।

मंदी ने यह भी साबित कर दिया कि डॉलर की जितनी कीमत है, अमेरिकी अर्थव्यवस्था असल में उतना मूल्य पैदा नहीं करती। यानी उसकी अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत उतनी नहीं है। ऐसे में जो देश वस्तु और सेवाओं का अधिक उत्पादन करते हैं, वे अमेरिकी समृद्धि को फाइनेंस करते रहें, इसका कोई तर्क नहीं हो सकता। ये समझ धीरे-धीरे दुनिया में गहराती गई है।

डॉलर के वर्चस्व का क्या मतलब है, इसे ठीक ढंग से समझने के लिए विश्व प्रसिद्ध अर्थशास्त्री माइकल हडसन की इस टिप्पणी पर ध्यान देना चाहिए- ‘वियतनाम युद्ध के दौरान अमेरिका ने अपने स्वर्ण भंडार का लगभग पूरा हिस्सा गंवा दिया। उससे एक बहुत महंगे युद्ध को जारी रखने में समस्या खड़ी हुई। मुख्य बात होती है भुगतान संतुलन कायम रखना। इसलिए सिद्धांततः अमेरिका ने अपने भुगतान घाटे को संतुलित रखने के लिए यह सब निर्मित किया। आखिर अमेरिका अपने विशाल वैश्विक सैन्य तंत्र को कैसे चला सकता है? ऐसा तभी संभव है, जब डॉलर की कीमत नीचे ना जाए।’ हडसन ने 2019 में दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि जो देश स्वतंत्र रूप से विकसित होना चाहते हैं, भविष्य में उनकी मुद्रा डॉलर नहीं रहेगी। उन्होंने तभी कहा था- भविष्य में रूस या चीन या बहुत से विकासशील देशों के लिए डॉलर रिजर्व करेंसी नहीं रहेगा।

कहने का तात्पर्य यह कि de-dollarization की परिघटना पहले जारी थी। साल 2000 में दुनिया में लगभग 65 अंतरराष्ट्रीय कारोबार डॉलर में होता था, जो 2021 में घट कर करीब 59 प्रतिशत रह गया। इस बीच यूरो, युवान और अन्य देशों की मुद्राओं में होने वाले व्यापार में क्रमिक वृद्धि हुई है। अब बनी परिस्थितियों में अगर रूस के साथ चीन भी de-dollarization की प्रक्रिया को सुनियोजित ढंग से तेज करने में जुट जाता है, तो जो परिघटना धीमी गति से आगे बढ़ रही थी, वह अप्रत्याशित तीव्रता ग्रहण कर सकती है।

ग्लोबल टाइम्स ने एक चीनी विश्लेषक के हवाले से कहा है- ‘रूस पर स्विफ्ट संबंधी लगाए गए प्रतिबंध ने जाहिर कर दिया है कि वित्त का एक राजनीतिक रूप है। पूंजी की कोई सरहद नहीं होती, यह कथन इससे झूठा साबित हो गया है। यह खतरे की घंटी है। स्पष्ट हो गया है कि पश्चिमी वित्तीय व्यवस्थाएं चीन जैसे देश के लिए अविश्वसनीय है, जिसे पश्चिमी देश प्रतिस्पर्धी के रूप में देखते हैं। हमें अवश्य ही एक ऐसा वैश्विक वित्तीय सिस्टम स्थापित करना चाहिए, जिस पर अपना नियंत्रण हो।’ इस विश्लेषक ने यह भी कहा कि अब युवान को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा का रूप देना जरूरी हो गया है।

यहां यह रेखांकित करने का पहलू है कि चीन आज दुनिया में आयात-निर्यात के लिहाज से सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। रूस की अकेले हैसियत ऐसी नहीं है कि वह डॉलर के वर्चस्व को तोड़ पाए। लेकिन चीन ने अपनी हैसियत ऐसी बना ली है। चीन के साथ कारोबार करना आज ज्यादातर देशों की मजबूरी बन गई है। ऐसे में अगर चीन ने सायास ढंग से नई वित्तीय व्यवस्था को आगे बढ़ाना शुरू किया, तो उसके शीघ्र और दूरगामी परिणाम होंगे।

चीन ने हाल में रूस के साथ ऊर्जा खरीदारी का बड़ा करार किया है। यूक्रेन संकट के बीच रूस पर लगाए जा रहे प्रतिबंधों के बीच चीन ने एलान किया कि वह रूस से गेहूं की खरीदारी पर से तमाम आपत्तियां हटा रहा है। ये आपत्तियां गेहूं की क्वालिटी को लेकर थीं। तो संदेश साफ है। चीन इस संकट की घड़ी में रूस का मददगार बन कर खड़ा हुआ है तो इसलिए कि रूस को साथ लेने में उसे अपने दीर्घकालिक उद्देश्य के पूरा होने की संभावना दिखती है। यह मकसद है वैश्विक व्यवस्था पर अमेरिका वर्चस्व तोड़ना। इस क्रम में सबसे बड़ी बात यही होगी अगर डॉलर दुनिया की प्राथमिक मुद्रा ना रह जाए।

इस दिशा में बढ़ने का संक्रमण काल शुरू हो चुका है। जो देश पश्चिम को चुनौती देने के लिए एक धुरी पर इकट्ठे हो रहे हैं, उनके बीच कारोबार में डॉलर की जरूरत ना रहे, यह इस मकसद का प्राथमिक हिस्सा है। इस धुरी का केंद्र चीन है, जो बड़ी आर्थिक ताकत है। इसीलिए इस प्रयास को अमेरिकी दबदबे के लिए खतरे की घंटी समझा जा रहा है।

हाल में चीन में शंघाई स्थित जियाओतोंग यूनिवर्सिटी के एडवांस्ड इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस में प्रोफेसर चेन शी एक इंटरव्यू में कहा कि अगर चीन ने स्विफ्ट सिस्टम को नाकाम करने में रूस की मदद की, तो चीन के लिए उसके हानिकारक परिणाम हो सकते हैं, क्योंकि तब अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश चीन पर भी प्रतिबंध लगा देंगे। लेकिन उन्होंने कहा- ‘अंततः महाशक्तियों के बीच रस्साकशी का परिणाम ताकत पर निर्भर करता है। अगर अमेरिका को रूसी संसाधनों की बिल्कुल जरूरत ना हो और साथ ही उसे चीनी उत्पादों की भी जरूरत ना हो, तो वह निश्चित रूप से सख्त प्रतिबंध लगा सकता है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय विनिमय के वर्तमान स्तर को देखते हुए अगर चीन और रूस को व्यापार से पूरी तरह काट दिया गया, तो उससे एडजस्ट करने में अमेरिका को बहुत लंबा समय लेगा। और उससे सप्लाई चेन को जो क्षति पहुंचेगी, उससे पूरे विश्व अर्थव्यवस्था को नुकसान होगा। यह एक भीषण कदम होगा, जिसके दीर्घकालिक वित्तीय और आर्थिक परिणाम होंगे।’

ताजा घटनाओं पर गौर करें, तो पश्चिमी देश इन परिणामों की तरफ बढ़ चुके हैं। अमेरिका ने अपने सहयोगी देशों को खुद उनके लिए हानिकारक कदम उठाने पर मजबूर किया है, ताकि यह संदेश जाए कि दुनिया पर अमेरिका का वर्चस्व बना हुआ है। ये धारणा बनी रहे कि अमेरिका उसकी मर्जी से ना चलने वाले देशों को दंडित करने की स्थिति में है। लेकिन हकीकत यह है कि इस बीच विश्व का आर्थिक एवं सामरिक शक्ति संतुलन बदल चुका है। इसलिए अमेरिका ने जो तीर चलाए हैं, उनमें से कई लौट कर खुद उसको ही निशाना बना सकते हैं।

रूस के राष्ट्रपति व्लादीमीर पुतिन इस बदली सूरत से कहीं बेहतर अवगत हैँ। तभी उन्होंने इस मौके पर आकर अपने देश की सुरक्षा चिंताओं को हल करने के लिए पश्चिमी देशों पर दबाव बढ़ाया। उनसे उचित उत्तर ना मिलने पर वे इस विवाद को उस हद तक ले गए, जहां चीजें बहुत अनिश्चित हो गई हैँ। इस अनिश्चिय के बीच यह स्पष्ट है कि इसके बाद जब दुनिया में स्थिरता आएगी, तब बड़ी ताकतों के बीच समीकरण वैसा नहीं रह जाएगा, जैसा अब तक रहा है।

(सत्येंद्र रंजन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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