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जब नेहरू और पटेल एक दूसरे से लिपटकर फूट-फूट कर रोने लगे

(आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का शहादत दिवस है। देश के सामने जो संकट आया है उसमें किसी और समय के मुकाबले गांधी आज ज्यादा प्रासंगिक हो गए हैं। एक ऐसे मौके पर जब सत्तारूढ़ जमात द्वारा गांधी के बरखिलाफ उनके हत्यारे गोडसे को स्थापित करने की कोशिश की जा रही है तब गांधी जनता के आंदोलनों के जरिये न केवल फिर से जिंदा हो गए हैं बल्कि अपने पूरे वजूद और ताकत के साथ उठ खड़े हुए हैं। और इस कड़ी में पूरे देश के लिए एक बार फिर सबसे बड़े पथ-प्रदर्शक का काम कर रहे हैं। 72वें शहादत दिवस के मौके पर गांधी से संबंधित कुछ संस्मरण यहां दिए जा रहे हैं-संपादक)

गांधी जी के निजी सचिव प्यारेलाल ने लिखा है- तीस जनवरी को जब गांधी जी की हत्या हुई तो ख़बर सुनते ही नेहरू और पटेल दौड़े चले आए। नेहरू जी गांधी जी की चादर में मुंह छुपाकर बच्चों की तरह रोने लगे। सरदार पटेल, जो अभी चंद मिनटों पहले तक गांधी जी से बतिया रहे थे, पत्थर की मूरत की तरह अडोल बैठे रहे।

लॉर्ड माउंटबेटन पहुंचे। उन्होंने प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से कहा, “गांधी जी ने अपनी अंतिम बातचीत में मुझसे कहा था, जवाहर और सरदार को समझाइयेगा कि उन दोनों की दोस्ती आज देश के लिए सबसे ज़रूरी है। वो तो अब मेरी सुनते नहीं, शायद आपका कहा मान लें।” यह सुनते ही नेहरू और पटेल एक-दूसरे के गले से लिपटकर रो पड़े।

कुछ समय बाद किसी ने कहा- “प्रधानमंत्री जी, हमें अंतिम यात्रा की तैयारियां करना है। कार्यक्रम कैसे होगा, आप निर्देश दें।”

नेहरू जी ने जैसे कुछ सुना ही नहीं। फिर किंचित प्रकृतिस्थ हुए तो चंद पल सोचकर बोले- “ज़रा रुको, बापू से पूछकर आता हूं!” और फिर, भूल से यह क्या कह गए, सोचते ही अवाक् हो गए।

प्यारेलाल ने अपनी पुस्तक “पूर्णाहुति” के दूसरे खण्ड में इसका वृत्तांत देते हुए लिखा है- “बीते तीस-पैंतीस सालों में हम सब अपनी तमाम दुविधाओं और समस्याओं और प्रश्नों को बापू के पास ले जाने के इतने आदी हो चुके थे कि हम भूल ही गए कि अब ऐसा कभी हो नहीं सकेगा।”

उस रात राष्ट्र के नाम अपने संदेश में नेहरू जी ने रूंधे गले से ठीक ही कहा था-

“हमारे जीवन से रौशनी चली गई!”

(कवि और साहित्यकार विवेक मिश्र की वाल से साभार।)

सभापति कुर्सी छोड़ कर भागा और गांधी जी को अपना वक्तव्य समाप्त करना पड़ा !

4 फरवरी 1916 : काशी हिन्दूविश्वविद्यालय में लार्ड हार्डिंग ने शिलान्यास किया और उसके बाद सभा की कार्यवाही प्रारंभ हो गयी ।

देश के प्रमुख राजा अपनी राजसी पोशाक और हीरे-जवाहरात के आभूषणों से सजे-सजाये बैठे थे, गवर्नर भी अलंकरणों से सुसज्जित थे, सेठ, साहूकार,जमींदार, ताल्लुकेदार भी अपनी-अपनी शान के मुताबिक सुशोभित हो रहे थे, वकील, डॉक्टर भी बड़ी संख्या में मौजूद थे ।

गांधीजी दक्षिण-अफ्रीका से अभी-अभी लौटे ही थे, दक्षिण-अफ्रीका में आन्दोलन के कारण यहां उन्हें लोग जान तो गये थे किन्तु उनका भाषण लोगों ने सुना नहीं था ।

कई लोगों के द्वारा अंग्रेजी में दिये गये वक्तव्यों के बाद समारोह में गांधीजी से भी बोलने के लिये कहा गया :

गांधीजी ने हिन्दी में बोलना प्रारंभ किया तो श्रीमती एनी वेसेंट ने उनसे कहा कि आप भी अंग्रेजी में ही बोलें, किन्तु

गांधीजी ने उनकी ओर से मुंह फेर लिया और धारा-प्रवाह बोलने लगे।

एक ओर तो आप भारत की गरीबी पर भी बोल रहे हैं तथा दूसरी ओर आप लोग इतने भव्य रत्नाभूषणों से सज कर आये हैं कि पेरिस से आया हुआ जौहरी भी चकित हो जायेगा, मैं कहता हूं कि जब तक आप इन गहनों को उतार कर देशवासियों को अमानत के रूप में नहीं सौंप देंगे तब तक भारत का विस्तार नहीं हो सकता।

विद्यार्थी तो ताली बजाने लगे और राजा लोग नाराज होकर सभा में से उठने लगे। गांधीजी कहे जा रहे थे- यह धन आया कहां से है, यह धन तो किसानों के पास से आया हुआ है। आप किसानों की मेहनत को इस प्रकार से छीन लेते हैं ।

यह भावना स्वराज के खिलाफ है !

बार-बार टोके जाने पर भी गांधीजी बिना रुके बोले जा रहे थे..

आप समझते हैं कि मैंने शिष्टाचार का उल्लंघन किया है तो मैं आपसे क्षमा मांग रहा हूं लेकिन मुझे तो अपने दिल की ही बात कहनी है।

और वह तो कहूंगा ।

वायसराय बनारस में आये तो इतने जासूस तैनात किये गये कि हम थर्रा गये हैं, यह अविश्वास क्यों ? इससे तो अच्छा यही होता कि वायसराय हार्डिंग मर जांय!

शक्तिशाली सम्राट का प्रतिनिधि इतना डरता है ?

वह तो जीते-जी डर से मर रहा है ।

आपने इतने जासूस हम पर थोपे कि भारत में इसकी प्रतिक्रिया में विप्लवकारी सेना पैदा हो गयी है और मैं स्वयं भी विप्लवी हूं ।

हमें किसी से डरने की जरूरत नहीं है, न वायसराय से न महाराजा से, न जासूसों से, न जज से क्योंकि हम ईश्वर में विश्वास करते हैं ।

तभी श्रीमती एनी वेसेंट ने चिल्ला कर कहा कि इसे बन्द कर दीजिये, इसे बन्द कर दीजिये ।

गांधीजी बोले जा रहे थे- यदि आप सोचती हैं कि मेरे बोलने से देश और साम्राज्य का हित-साधन नहीं हो रहा है, तो मैं बन्द कर दूंगा ।

सभा चिल्लाने लगी- बोलते रहें ,बोलते रहें ।

तभी सभापति महाराज-दरभंगा कुर्सी छोड़ कर भाग गये।

गांधीजी को भाषण बन्द करना पड़ा ।

श्री लुई फिशर ने गांधीजी के इस भाषण का विस्तार से वर्णन किया है !

(राजेन्द्र रंजन चतुर्वेदी के वाल से साभार)

जब गांधी को लगा कि भारत की बदहाल हालत के लिए भारत वासियों का शराब के ठेके भी जिम्मेदार हैं

तो गांधी ने कहा कि शराब के ठेकों को बंद किया जाएगा

यह भी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन का एक कार्यक्रम होगा

और शराब के ठेकों पर धरना देने के काम को जिसे पिकेटिंग कहा जाता था वह महिलाएं करेंगी

उस वक्त के कांग्रेसी नेताओं ने कहा यह बुड्ढा पागल हो गया है

कई लोगों ने कहा कि बापू शराब के ठेकों पर तो गुंडे बदमाश लोग आते हैं वहां आप महिलाओं को जाकर धरना देने की बात कह रहे

गांधी ने कहा महिलाएं नैतिक शक्ति में पुरुषों के मुकाबले बहुत ऊंची हैं

गांधी ने कहा शराबी और गुंडों का मुकाबला सिर्फ महिलाओं की नैतिक शक्ति कर सकती है

गांधी ने शराबबंदी के कार्यक्रम में महिलाओं को आगे किया

गांधी द्वारा शुरू की गई परंपरा आज तक भारत में जारी है

आज भी शराबबंदी कार्यक्रमों का नेतृत्व महिलाएं ही करती हैं

आजादी की लड़ाई में महिलाओं को घरों से बाहर निकालने का काम गांधी ने किया

आज भारत भर के शाहीन आंदोलन का नेतृत्व जो महिलाएं कर रही हैं वह गांधी की शुरू करी गई परंपरा है।

(गांधीवादी हिमांशु कुमार की वाल से साभार।)

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This post was last modified on January 30, 2020 10:08 am

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