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क्या भारत बनेगा अमेरिका का आर्मी बेस?

लेह के एयरबेस पर उतरते भारतीय वायुसेना के सी-17 ग्लोबमास्टर ट्रांसपोर्ट विमान की तस्वीर एक साथ देश के तकरीबन सभी अखबारों में छपी है। यह बड़ा महँगा अमेरिकी विमान है। 960 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ने वाला यह विमान जब चाहे 72575 किलो गोला-बारूद देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंचा सकता है। शानदार प्रिट एंड व्हीटनी इंजन से सुसज्जित ऐसे 11 अद्वितीय विमान भारतीय वायु सेना के पास हैं। 1760 करोड़ रुपये की कीमत वाला इनमें से एक बेजोड़ विमान इसी साल मार्च में उड़ान भरते ही गिर कर स्वाहा हो गया था। भारतीय नागरिकों के पैसे से खरीदा गया यह विमान क्यों गिरा? कैसे गिरा? मामला बेहद गोपनीय है इसलिए भारतीय नागरिक कभी नहीं जान पायेंगे।

वैसे भी इन सब बातों का इस विमान के साथ छपी ‘ख़ास-ख़बर’ से कोई लेना-देना भी नहीं है। ख़ास-ख़बर तो यह है कि किसी समाचार एजेंसी ने या किसी भारतीय नेता ने नहीं अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने शुक्रवार को एक टीवी शो पर भारत को बताया, ‘भारतीय देख रहे हैं कि उनकी उत्तरी सीमा पर 60,000 चीनी सैनिक तैनात हैं।’

यह देश के इतिहास में पहली बार हुआ है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतान्त्रिक देश के प्रधानमंत्री और देश की जनता को अमेरिकी विदेश मंत्री बता रहा है कि भारत को किसे अपना दोस्त और किसे अपना दुश्मन मान लेना चाहिए। सिर्फ इतना ही नहीं पोम्पिओ ने यह भी बताया कि ‘मैं भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान के अपने समकक्षों के साथ था, चार बड़े लोकतंत्रों, चार शक्तिशाली अर्थव्यवस्थाओं, चार राष्ट्रों के इस प्रारूप को ‘क्वाड’ कहते हैं। इन सभी चारों देशों को चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की ओर से पेश खतरों से जुड़े वास्तविक जोखिम हैं।….. इस लड़ाई में निश्चित ही उन्हें एक सहयोगी और साझेदार के रूप में अमेरिका की जरूरत है।’ मान ना मान मैं तेरा मेहमान।

पोम्पिओ ने यह नहीं बताया कि उसे बुलाया किसने है? उन्होंने स्पष्ट शब्दों में यह कह दिया है कि कोई बुलाये या ना बुलाये भारत के साथ चीन की इस लड़ाई में हम तो एक सहयोगी और साझेदार के रूप में आ गए। तो क्या यह बयान पोम्पिओ ने प्रधानमंत्री मोदी की सहमति से दिया है? जबकि भारतीय सेना की चीन की सेना पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के साथ सातवें दौर की कोर कमांडर स्तर की वार्ता आज होने जा रही है।

यह भी ख़बर है कि विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी वार्ता में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा बन सकते हैं, जिसका नेतृत्व भारतीय सेना की लेह स्थित 14 कोर के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरिंदर सिंह करेंगे। इन हालात में जब भारत और चीन की सेना के बीच बातचीत चल रही है, पोम्पिओ के इस बयान का क्या मतलब निकलता है? सवाल यह उठता है कि भारत के साथ चीन का युद्ध होने जा रहा है यह पहले से अमेरिका और भारत की ओर से तय है? अगर नहीं तो क्या अपनी भावी रणनीति के तहत अमेरिका चीन के साथ अपने युद्ध का निर्णय भारत पर थोप रहा है?

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब प्रख्यात जर्मन चिंतक विलियम एंग्दाहल ने अपने एक आलेख में भी यह सवाल उठाया था कि क्या वाशिंगटन भारत को चीन के साथ युद्ध के लिए उकसा रहा है? यह सवाल उन्होंने तब उठाया था जब जर्मनी से अमेरिका अपनी सेना हटा रहा था तो ऐसा वह क्यों कर रहा है पूछे जाने पर 25 जून को ब्रसेल्स जर्मन मार्शल फंड फोरम से बात करते हुए पोम्पिओ ने बताया था कि भारत और दक्षिण-पूर्व एशियाई राष्ट्रों के लिए चीनी खतरा एक कारण है जिसके चलते अमेरिका यूरोप में अपनी सैन्य उपस्थिति को कम कर रहा है ….हम यह सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि अमेरिकी सेना को चुनौतियों का सामना करने के लिए उचित रूप से नियुक्त किया जाए।

यानि भारत में अपना सैनिक जमावड़ा लगाने की योजना पहले से चल रही थी। अब प्रधानमंत्री मोदी और उनके दोस्त डोनाल्ड ट्रम्प के बीच इस योजना पर कब से बातचीत चल रही है, यह तो वही बता सकते हैं। चूंकि बहुत दिनों से प्रधानमंत्री मोदी अपने मित्र ट्रम्प के लिए ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के नारे लगा-लगा कर चुनाव प्रचार कर रहे हैं इसलिए पूछना तो बनता ही है कि क्या यह योजना भी उनके चुनावी अभियान का हिस्सा है?

यहाँ हमारी कोई मंशा नहीं है कि बिना किसी सबूत के किसी पर इल्ज़ाम धर दें। वैसे भी आजकल गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम एक्ट (Unlawful Activities Prevention Act –UAPA) का फ़ैशन चल रहा है। जो जरा सा सरकार के खिलाफ़ तिड़-मिड़ करे, सरकारी मेहमान बना लो। मोदी है तो मुमकिन है। मरना है क्या? वैसे इस तरह के सख्त कानून के तहत देश के जाने-माने बुद्धिजीवी जेल में क्यों डाल दिये गए हैं? बक़ौल भाई गोरख पाण्डेय:

वे डरते हैं

किस चीज से डरते हैं वे

तमाम धन-दौलत

गोला-बारूद पुलिस-फौज के बावजूद ?

वे डरते हैं

कि एक दिन

निहत्थे और गरीब लोग

उनसे डरना

बंद कर देंगे

उन बेचारों का डर भी अपनी जगह वाज़िब है। एक किस्सा याद आया। एक बार ज़नाब हबीब ज़ालिब साहब एक मुशायरे में बुलाये जाने पर शिरकत करने के लिए चले गए। ताज़ा-ताज़ा जेल से छूट कर आए थे। माहौल का ज़ायक़ा कुछ ठीक न था। वहाँ मंच पर ज़िया-उल-हक़ की तस्वीर लगी हुई थी। मंच पर जाते ही तस्वीर की तरफ़ देखा और बोले: बहुत पुरानी बात है लेकिन अब तक याद है मुझे। जब मैं पिछली बार यहाँ आया था तो तस्वीर अय्यूब खान की लगी हुई थी। ज़ाहिर सी बात है, तानाशाह आते-जाते रहते हैं, बस उन बेचारों को यह पता नहीं होता कि तानाशाह ख़ाक हो जाते हैं, शायर कमबख़्त कभी मरते ही नहीं।

फिर से प्रधानमंत्री मोदी के नारे पर आते हैं ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’। खून-खराबे और चुनाव का बहुत पुराना रिश्ता है। अभी ज्यादा पुरानी बात नहीं है। पुलवामा में परंपरागत नियमों को ताक पर रखकर निकले सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर आतंकी हमला हुआ था। जैसा कि जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन गवर्नर सत्यपाल मलिक ने बताया था प्रशासन को पहले से इस हमले की ख़बर थी। लेकिन लापरवाही बरती गई। हमला हो जाने दिया गया। 40 जवान शहीद हो गए। बाद में ‘घर में घुसके मारेंगे’ बोलकर इसी बहाने बालाकोट हमला हुआ। पता नहीं किसके कहने पर ऐसा हुआ और इस बात का जवाब आज तक नहीं मिला लेकिन भारतीय सेना ने अपना ही हेलीकॉप्टर उड़ा दिया जिसमें अपने ही 6 जवान थे।

इसके पहले कि आगे कुछ होता अचानक डोनाल्ड ट्रम्प अवतरित हुए और जंगबंदी का ऐलान कर दिया। तो क्या यह डोनाल्ड ट्रम्प के नियंत्रण में चल रहा था? ‘घर में घुसके मारेंगे’ कहने वाले घरों में घुसके बैठ गए। चुनाव हुए, और शहीदों के नाम पर वोट मांगे गए। हवा में सवाल लहराया ‘पाकिस्तान को घर में घुसके मारने वाले को वोट देना चाहिए कि नहीं देना चाहिए?’ देश के जवानों की शहादत की कीमत पर राष्ट्रवाद का जादू चल गया। 2019 में जब किसी को कोई उम्मीद नहीं थी, पूर्ण बहुमत के साथ मोदी फिर से प्रधानमंत्री बन गए। जंगबाजी और राष्ट्रवाद का अलग ही खेल होता है, यह इन्सानों के समझ में आने वाली बात नहीं है। तभी तो दुष्यंत ने कहा था:

मस्लहत आमेज़ होते हैं सियासत के कदम,

तू न समझेगा सियासत तू अभी इंसान है।      

विलियम एंग्दाहल ने एक अन्य रेडियो वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी और ट्रम्प की नीयत पर शक जताते हुए कहा था कि चीन पिछले एक दशक से बड़े ठंडे दिमाग से काम ले रहा है और दुनिया के साथ अपने आर्थिक सम्बन्धों को देखते हुए किसी से भी तल्खी से पेश नहीं आया है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी जो कल तक शी जिनपिंग को झूला झुला रहे थे, अचानक ट्रम्प के चुनाव नजदीक आते ही चीन की बुलेट ट्रेन से उतरकर अमेरिकी अपाचे चॉपर पर सवार हो गए, यह बात उन्हें शक के घेरे में लाती है। चीन की सरहद पर क्या फिर वही पुलवामा-बालाकोट वाला राष्ट्रवादी खेल खेला जा रहा है। क्या इस बार फिर जंग का यह चुनावी खेल भारतीय जवानों की कीमत पर खेला जाएगा?

आप सिर्फ़ शक कर सकते हैं दावे के साथ कुछ नहीं कह सकते। मरना है? हालाँकि यह साफ दिखाई दे रहा है कि मोदी बौराये हुए हैं और सूझ नहीं रहा है कि क्या कहें? हड़बड़ी में कह दिया, ‘न कोई हमारी सीमा में आया था, ना हम कहीं अंदर गए थे?’ सवाल उठा कि जो हमारे 20 जवान शहीद हुए थे, वह कैसे? सवाल उठा तो कोई और ‘मन की बात’ करने लगे। आगे-आगे ट्रम्प और पोम्पिओ, पीछे-पीछे मोदी। थेथर के दू आगे थेथर, थेथर के दू पीछे थेथर, कुल थेथरन के देख तमासा, हमहुं भइनी थेथर।

चुनावी सर्वेक्षण तो यही बता रहे हैं कि ट्रम्प के हालात अच्छे नहीं हैं। हो सकता है मोदी उन्हें गच्चा दे दें। लेकिन अब इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका ने भारत में सैन्य अड्डा बनाने का मन बना लिया है और जो भी राष्ट्रपति बने इससे पीछे हटने वाला नहीं है। टीवी 9 जैसे चैनल पिछले कई महीनों से देश को बता रहे हैं कि अमेरिका अपने तीन बी 2 स्टील्थ परमाणु बमवर्षक पहले ही हिन्द महासागर में तैनात कर चुका है जो 40 घंटे तक लगातार उड़ान भर सकते हैं और रडार की पकड़ में लगभग नहीं आते हैं। अमेरिका ने जो 25 हजार सैनिक जर्मनी से वापस बुलाये थे, कहाँ बिठाये गए हैं इसको लेकर किसी ने, किसी से ‘मन की बात’ नहीं की। न ही यह बताया कि उन्हें यहाँ तक घुस आने की इजाज़त किसने दी?

अब तक तो तमाम मीडिया हमें यही बताता रहा कि भारत के पास दुनिया की चौथी सबसे ताकतवर सेना है। सैन्य शक्ति के आधार पर इस सूची में शीर्ष स्थान पर अमेरिका, रूस और चीन है और उसके बाद भारत का नंबर है। भारत के पास कुल 42,07,250 सैनिक हैं जबकि चीन के पास केवल 37,12,500 जवान हैं। हमारे पास सुखोई है, ब्रह्मोस है, आईएनएस चक्र है, फैलकॉन है, अलां है, बलां है। लोग भी पढ़-पढ़कर मित्रों में लंबी-लंबी हाँकते रहे। जब राफेल आया तो राहुल गाँधी चिल्लाते रह गए ‘चौकीदार चोर है’ और मीडिया बताता रहा कि चीन के पसीने छूट गए हैं और पाकिस्तान डर के मारे थर-थर काँप रहा है। लेकिन अचानक यह क्या हुआ कि प्रधानमंत्री कहने लगे हमें आत्मनिर्भर होना होगा। इस ‘आत्मनिर्भरता’ की कमी वाला नेरेटिव क्या अमेरिकी सेना की आमद के लिए गढ़ा गया?

जंगबाजों की योजनाएँ जंगबाज़ ही जाने, पर देश की जनता को यह जान लेना चाहिए कि कभी तालिबान कभी रासायनिक हथियारों के बहाने साम्राज्यवादी अमेरिका ने दुनिया में बहुत से निर्दोष लोगों का खून बहाया है। चीन की सरहद पर तो कोई तालिबानी, कोई रासायनिक हथियार नहीं है। भारत और चीन का सरहदी इलाकों को लेकर झगड़ा है, वह मिल-बैठकर सुलझा सकते हैं। बाज़ार पर चीन का कब्ज़ा हथियाने को लेकर अमेरिका और चीन का अगर कोई आपसी लफड़ा है तो वो जानें। भारत की ज़मीन को जंग का मैदान क्यों बनाया जा रहा है? जंग में शासक हमेशा जीतते हैं और जनता हमेशा हार जाती है। खून निर्दोष लोगों का बहता है। कभी आर्य-यहूदी के नाम पर, कभी गोरे-काले के नाम पर कभी हिन्दू-मुस्लिम के नाम पर तानाशाह एक दुश्मन हमेशा आपके सामने खड़ा करके हिंसा/जंग का माहौल बनाए रखते हैं, ताकि हथियारों की खरीद-फ़रोख्त चलती रहे और उनकी वोटों की रोटियाँ सिंकती रहें।

जिस किसी देश के भी आप नागरिक हैं और अपने देश लिए आप जान दे सकते हैं तो अपने शासक पर नज़र रखें कि वह अमेरिका के एक राष्ट्रपति की इस चेतावनी की कितनी परवाह करता है – अगर आप हमारे साथ नहीं है तो हमारे विरुद्ध हैं- एक धृष्ट अहंकार की मिसाल भर है। अगर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ आत्मसम्मान जैसी कोई चीज उसके भीतर  होगी तो आपका शासक धृष्टता की मिसाल पेश करेगा जैसे फिडेल कास्त्रो ने बार-बार पेश की थी। अगर आप भारत के नागरिक हैं तो बात और है। याद रखें, आपका प्रधानमंत्री, अमेरिका के राष्ट्रपति का चुनाव-प्रचारक है। क्या आपने दासता की भव्यता का कोई और ऐसा बेनज़ीर उदाहरण देखा, सुना, पढ़ा है? आपकी निगाह में कोई हो तो कृपया मुझे ज़रूर सूचित करें।

अरुंधति रॉय के शब्दों में कहूँ तो आतंक और क्रूरता के बढ़ते चक्र से निकलने का आज विश्व के सामने कोई आसान रास्ता नहीं बचा है। समय आ गया है कि मानव समुदाय ठहरे और आधुनिक तथा सदियों पुराने सामूहिक ज्ञान और विवेक के अन्तर्मन में झाँके। ज़रूर कोई रास्ता दिखाई देगा।

इस साल की शुरुआत दिल्ली में हुई राजकीय हिंसा से हुई थी फिर ‘कोरोनोवायरस आर्थिक अवसाद’ की खबरें पढ़ते-पढ़ते हम किसानों-मजदूरों की हाल-दुहाई के साथ खड़े-खड़े अचानक लेह में उतरते हुए जब सी-17 ग्लोबमास्टर की तस्वीर देख रहे हैं तो इस दौर की तर्जुमानी करती मरहूम शायर हरजीत सिंह की एक गज़ल याद आ रही है जिसका मतला तो दिल को तसल्ली देता है और मक़ता उदास कर जाता है:

ये जितने अम्न के दुश्मन हैं आसमानों में,

मैं जानता हूँ कि हैं आख़िरी उड़ानों में।

ये क्या कि तुमने इन्हें भर दिया है शोलों से,

तुम्हें चिराग़ जलाने थे इन मकानों में।

बयान थे कि सुलझ जायें मसअले अपने,

उलझ गई वो हक़ीक़त मगर बयानों में।

वो जिनको ज़ख़्म छुपाने की पड़ गई आदत,

उन्हें कभी न समझना तू बेज़ुबानों में।

यहाँ पे बिकते हैं बारूद भी बताशे भी,

ये कैसे जश्न के सामान हैं दुकानों में।

फ़साद जब से हुये हमने फिर नहीं देखी,

किसी के नाम की तख़्ती यहाँ मकानों में।

चलते-चलते फिर वही सवाल क्या वाशिंगटन भारत को चीन के साथ युद्ध के लिए उकसा रहा है? क्या चीन के बहाने अमेरिकी सेना भारत में अपनी छावनी डालना चाहती है? क्या यह सब प्रधानमंत्री मोदी की मर्जी से हो रहा है? क्या आप चाहेंगे कि आपका महान भारत, पाकिस्तान जैसा देश बन जाए, जिसके गले में किसी दूसरे देश का पट्टा हो? अगर नहीं तो जंगबाजी का विरोध कम-अज़-कम अपने पड़ोसी से ही कीजिये, लेकिन कीजिये ज़रूर।

(देवेंद्र पाल स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on October 12, 2020 11:25 am

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