राज्यसभा की एक ही सीट के लिए उपचुनाव क्यों, सीटें तो 8 खाली हैं!

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पिछले छह-सात सालों के दौरान वैसे तो देश के हर प्रमुख संवैधानिक संस्थान ने सरकार के आगे ज्यादा या कम समर्पण करके अपनी साख और विश्वसनीयता पर बट्टा लगवाया है, लेकिन चुनाव आयोग की साख तो लगभग पूरी तरह ही चौपट हो गई है। हैरानी की बात यह है कि अपने कामकाज और फैसलों पर लगातार उठते सवालों के बावजूद चुनाव आयोग ऐसा कुछ करता नहीं दिखता, जिससे लगे कि वह अपनी मटियामेट हो चुकी साख को लेकर जरा भी चिंतित है। उसकी निष्पक्षता का पलड़ा हमेशा सरकार और सत्तारूढ़ दल के पक्ष में झुका देखते हुए अब तो आम लोग भी उसे चुनाव मंत्रालय और केंचुआ तक कहने लगे हैं।

चूंकि आयोग अपने मान-अपमान की चिंता से मुक्त है और उसके पास अपनी कारगुजारियों के पक्ष में तार्किक दलील नहीं होती, लिहाजा वह अपनी आलोचना का जवाब देने भी सामने नहीं आता। अलबत्ता उसकी ओर से खुद प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी के नेता जरूर जवाब देते हैं और कहते हैं कि विपक्षी दल चुनाव आयोग का अपमान कर रहे हैं। दूसरी ओर चुनाव आयोग पूरे मनोयोग से जैसा सरकार चाहती है, वैसा ही करता है, चाहे मामला लोकसभा, राज्यसभा और विधानसभा के चुनाव का हो या उपचुनाव का।

ताजा मामला है कि राज्यसभा की खाली हुई कुछ सीटों का। पिछले दिनों पांच राज्यों से राज्यसभा की 8 सीटें खाली हुई हैं, जिनके लिए उपचुनाव होना है। इन आठ सीटों में दो सीटें पश्चिम बंगाल की, तीन सीटें तमिलनाडु की और एक-एक सीट मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र तथा असम की हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने इनमें से फिलहाल सिर्फ पश्चिम बंगाल की एक सीट के लिए उपचुनाव कराने का ऐलान किया है। बाकी सात सीटों के लिए उपचुनाव का ऐलान क्यों नहीं किया गया और उनके लिए चुनाव कब कराया जाएगा, इस सवाल पर चुनाव आयोग मौन है।

चुनाव आयोग के ऐलान के मुताबिक पश्चिम बंगाल की एक सीट के लिए 9 अगस्त को उपचुनाव होगा, जिसके लिए 22 जुलाई को अधिसूचना जारी हो गई है। यह सीट दिनेश त्रिवेदी के इस्तीफे से खाली हुई है। गौरतलब है कि दिनेश त्रिवेदी इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर अप्रैल 2020 में चुने गए थे। उनका कार्यकाल 2026 में खत्म होना था, लेकिन भाजपा में शामिल होने के लिए उन्होंने इसी साल 12 फरवरी को तृणमूल कांग्रेस और राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। पश्चिम बंगाल से दूसरी सीट तृणमूल कांग्रेस के ही मानस भुइंया के इस्तीफे से खाली हुई है। वे तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा का चुनाव जीतकर अब पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री हो गए हैं, उनकी खाली हुई राज्यसभा सीट पर चुनाव आयोग अभी चुनाव नहीं करा रहा है। यहां जिस एक सीट पर चुनाव कराया जा रहा है वह तृणमूल कांग्रेस को ही मिलना है और दूसरी सीट पर भी जब चुनाव होगा तो वह भी तृणमूल कांग्रेस के खाते में ही जाएगी।

तमिलनाडु में भी राज्यसभा की 3 सीटें खाली हुई हैं। इनमें से 1 सीट ऑल इंडिया अन्नाद्रमुक के ए. मोहम्मद जान की है, जिनका इसी साल मार्च में निधन हो गया था। यानी यह सीट चार महीने से खाली है लेकिन चुनाव आयोग ने इस पर चुनाव कराने का फैसला नहीं किया है। दो अन्य सीटें द्रमुक के दो राज्यसभा सदस्यों के विधायक बन जाने से खाली हुई हैं। केपी मुनुस्वामी और आर वैद्यलिंगम ने विधानसभा चुनाव जीत जाने पर मई में राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। यानी इन सीटों को भी खाली हुए दो महीने से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन इन पर भी आयोग चुनाव नहीं करा रहा है। राज्य विधानसभा में संख्या बल के आधार ये तीनों सीटें द्रमुक की अगुवाई वाले गठबंधन के खाते में जाना है।

मध्य प्रदेश और असम की एक-एक सीट भाजपा सांसदों के इस्तीफे से खाली हुई है। मध्य प्रदेश में थावरचंद गहलोत ने इसी महीने राज्यसभा से इस्तीफा दिया है। उन्हें पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिपरिषद से मुक्त कर कर्नाटक का राज्यपाल बनाया गया है। असम में बिस्वजीत दैमरी ने विधानसभा का चुनाव जीतने के बाद मई में राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था। इस सीट से सर्बानंद सोनोवाल को राज्यसभा में भेजा जाएगा, जो पिछले दिनों केंद्र में मंत्री बनाए गए हैं। ये दोनों ही सीटें भाजपा के खाते में जाना है लेकिन यहां भी अभी चुनाव नहीं कराया जा रहा है।

मध्य प्रदेश और असम की तरह महाराष्ट्र में भी राज्यसभा की एक सीट खाली है जो कांग्रेस सांसद राजीव सातव के निधन से खाली हुई है, लेकिन इसके लिए भी चुनाव की घोषणा नहीं हुई है। दरअसल इस सीट पर चुनाव रोके जाने की भी कोई वाजिब वजह नहीं है। माना जा रहा है कि जिस तरह राज्य में विधान परिषद की 12 सीटों पर मनोनयन का मामला पिछले कई महीनों से राज्यपाल ने रोक रखा है, उसी तरह राज्यसभा की इस एक सीट का चुनाव भी रुकवा दिया गया है। इसे राज्य में सत्तारुढ़ गठबंधन की तीनों पार्टियों के बीच चल रही खींचतान से भी जोड़ कर देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि अगर अगले कुछ दिनों में किसी वजह से महाविकास अघाड़ी की सरकार गिर जाती है तो राज्यसभा की सीट तो भाजपा के खाते में आएगी ही, साथ विधान परिषद में भी भाजपा अपने 12 सदस्यों को मनोनीत करा सकेगी।

जो भी हो, राज्यसभा की आठों खाली सीटों के लिए एक साथ उपचुनाव न करा कर चुनाव आयोग या तो अपने नाकारापन का परिचय दे रहा है या फिर वह इस बात की पुष्टि कर रहा है कि चुनाव आयोग अब एक स्वायत्त संवैधानिक निकाय न रह कर केंद्र सरकार के अधीन चुनाव मंत्रालय में तब्दील हो चुका है। एक ही राज्य की दो राज्यसभा सीटों के चुनाव राजनीतिक कारणों से अलग-अलग समय पर कराने का नाटक हाल के वर्षों में वह कई बार दोहरा चुका है।

पिछले साल उत्तर प्रदेश में और उससे पहले गुजरात में भी उसने ऐसा ही किया था। तीन महीने पहले पांच राज्यों के उससे पहले कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव तथा 2019 के लोकसभा चुनाव का कार्यक्रम तय करने में भी उसने अपनी सरकार-भक्ति का भरपूर परिचय दिया था। तीन महीने पहले केरल की दो राज्यसभा सीटों का द्विवार्षिक चुनाव तो उसने सीधे-सीधे कानून मंत्रालय के निर्देश पर रोका था, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने उसे कड़ी फटकार लगाते हुए निर्धारित समय पर चुनाव कराने का निर्देश दिया था।

स्पष्ट तौर पर सरकार के इशारे पर दिखाई जाने वाली चुनाव आयोग की इस कलाबाजी से यह साफ हो गया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘वन नेशन-वन इलेक्शन’ यानी देश में सारे चुनाव एक साथ कराने का जो इरादा अक्सर दोहराते रहते हैं, वह महज शिगूफेबाजी के अलावा कुछ नहीं है। गौरतलब है कि जब-जब भी प्रधानमंत्री या उनकी सरकार से यह शिगूफा छोड़ा जाता है तब-तब चुनाव आयोग भी उनके सुर में सुर मिला कर कहता है कि वह ऐसा करने के तैयार है। सवाल यही है कि जो चुनाव आयोग एक राज्य की दो या पांच राज्यों की आठ राज्यसभा सीटों या दो राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ नहीं करा सकता, वह पूरे देश में सारे चुनाव क्या खा कर एक साथ कराएगा?

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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