“आज का समय अलग तरह की जटिलताओं का समय है। हालांकि अलग अलग समय में जटिलताओं की अलग अलग परिभाषाएं रही हैं। आज़ादी के तुरंत बाद मोहभंग का समय रहा है। ऐसे समय में भी प्रतिरोध की कविताएं लिखी गईं। आज के इस चुनावी फ़ासीवाद के समय में हमें नये-नये प्रतिमान, नये बिम्ब और प्रतीक लाने होंगे। अमृता बेरा द्वारा अनुवादित कविताएं और उनकी खुद की कविताएं भी प्रतिरोध की कविताएं हैं। शोभा सिंह की कविताएं आज के समय की जटिलताओं को पकड़ने की कोशिश करती हैं। उनकी कविताएं भविष्य की उम्मीद भी जगाती हैं।”
यह बात राजनीतिक विश्लेषक और कवि अजय सिंह ने अनुवादक एवं कवि अमृता बेरा और कवि-कहानीकार शोभा सिंह के कविता पाठ कार्यक्रम के दौरान बातचीत के सत्र में कहीं।
‘गुलमोहर किताब’ प्रकाशन की ओर से इस कार्यक्रम का आयोजन 14 सितंबर 2026 को ईस्ट पटेल नगर, दिल्ली में किया गया।
सबसे पहले अमृता बेरा ने अपनी और बांग्ला से अनुवादित कविताओं का पाठ किया। फ़ासला नाम की उनकी एक कविता की बानगी देखिए–
धूसर गाँवों, वीरान शहरों में हड़ियल मवेशियों-सी बीमार माएं रटा रही थी पाठ हिंसा और नफ़रतों के
अभ्यास करा रहे थे पिता बंदूके साफ़ करने और कटारों में धार देने के तरीकों का अपने नौनिहालों को
इस काल के लोगों की आँखें सुर्ख़ लाल थीं और बहते थे काले रंग के दरिया
यहाँ गुलाबी, हरे, नीले, ऐसे कई रंगों के बारे में नहीं जानते थे यहाँ के लोग
अमृता बेरा ने सुभाष मुखोपाध्याय की बांग्ला कविता का अनुवाद ‘एजेंट चाहिए’, मणिभूषण भट्टाचार्य की कविता ‘प्रश्नोत्तर’, नवरोज भट्टाचार्य की फ़िलिस्तीन में इज़रायल युद्ध में मारे गए बच्चों के बारे में मार्मिक कविता, सुबोध भट्टाचार्य की युद्ध के दौरान फिलिस्तीन में मारे गए बच्चों के बारे में ‘ताबूत’ कविता, नीलेंद्रनाथ चक्रवर्ती की कविता ‘राजा नंगा है’ सुनाईं।
उनके बाद कवि कहानीकार शोभा सिंह ने अपनी कविताएं सुनाई। उनकी कविता में ‘उमर ख़़ालिद’ पर लिखी कविता बहुत सराही गई। उसके कुछ अंश देखिए :
उमर ख़ालिद
एक दिन लौटोगे
जैसे समुंदर की लहरें
लौटती हैं तट की ओर
लौटना है पपड़ियाई धरती पर
गरजता मौसम बन
उसकी हरियाली लौटाने
तुम्हारी प्यारी सरज़मीं
तुम्हारा इस्तिक़बाल करेगी
उमर ख़ालिद तुम्हें मेरा सलाम |
शोभा सिंह की एक और कविता के अंश देखें :
शब्द पिघलेंगे
सही वक़्त की पहचान
सीख लो
चुप्पी तोड़ो
खोने के लिए अब क्या है..
उन्होंने ‘सांझ की धूल’, ‘जेन ज़ी आंदोलन’, ‘गटर में अब और मौतें नहीं’, ‘गढ़ो अब नई परभिाषा’, ‘मछली, औरत और शब्द’, ‘मां का गीला चुंबन’ और ‘डरता है तानाशाह’ जैसी कविताएं सुनाई जिन्हें श्रोताओं से खूब सराहा।
डरता तानाशाह में वह कहती हैं–
अंधेरे काल में सीना तान कर खड़ी होती है कविता
शब्द खुलते हैं जैसे अंधकार को खोलती है सुबह
डरे हुओं पर शब्दों की चोट हथौड़े-सी
निडरता से डरता है तानाशाह
कविताओं पर हुई चर्चा में सफाई कर्मचारी आंदोलन के नेता बेजवाड़ा विल्सन ने कहा कि ‘प्रतिरोध की कविताएं लिखने का मतलब है कि हम अन्याय के विरूद्ध हैं। अत्याचार के विरूद्ध हैं। हम समानता, न्याय और बंधुत्व चाहते हैं। मौजूदा दौर में बदलाव जरूरी है। हमें नया रास्ता बनाना है।
कवि-कहानीकार पूनम तुषामड़ ने अमृता बेरा के अनुवाद की सराहना की। उन्होंने शोभा सिंह की कविता के बारे में कहा कि वह अपने समय के प्रवाह को दर्ज करती हैं। सचेतन कवि वही है जो अपने समय को दर्ज करे।
शायर-पत्रकार मुकुल सरल ने अमृता बेरा की कविताओं और अनुवाद को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने शोभा सिंह के बारे में कहा कि वह अपने को हमेशा अपडेट रखती हैं। और हर नई घटना और करवट को कविताओं में बखूबी दर्ज कर लेती हैं।
कार्यक्रम का संचालन कर रहीं कवि-पत्रकार भाषा सिंह ने कहा कि इस दौर में पाबंदियां ज़्यादा हैं। आज हमले और तेज़ हुए हैं। हमारे लोकतंत्र के खंभे कमजोर हुए हैं और आज मनुवाद अपने बर्बर रूप में है। ऐसे में अनुभवों और संघर्षों को साझा करना जरूरी है। और इसके औज़ार के रूप में कविता का हस्तक्षेप महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी कड़ी में उन्होंने कहा कि शोभा सिंह की कविताएं उम्मीद की कविताए हैं और अमृता बेरा की कविताएं और अनुवाद हमें उसी प्रतिरोध की विरासत से जोड़ता है।
इस अवसर पर अनेक प्रबुद्ध श्रोता उपस्थित रहे। उन्होंने भी रचनाओं पर अपनी प्रतिक्रियाएं दीं जिनमें हीरालाल नागर, हेमंत सिंह, सरिता संधू, सुलेखा सिंह, डॉ. पूरन सिंह, अंजनी, लोकेश जैन, लालसा, सना, पूनम डेनवाल, खिलखिल भाषानंदनी, उपेंद्र स्वामी, मुकंद झा सहित अन्य लोग शामिल थे।
(राज वाल्मीकि अनुवादक, पत्रकार हैं और सफ़ाई कर्मचारी आंदोलन से जुड़े हैं।)