Monday, October 18, 2021

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राम के नाम पर संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर हमलाः भाकपा माले

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पटना। भाकपा माले ने पूरे बिहार में पांच अगस्त को प्रतिवाद दिवस मनाया। अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन समारोह को सरकारी आयोजन में तब्दील कर देने और उत्तर प्रदेश और केंद्र सरकार की इसमें पूर्ण भागीदारी के खिलाफ भाकपा-माले ने देशव्यापी प्रतिवाद दिवस मनाने का एलान किया था।

राजधानी पटना में माले राज्य कार्यालय में माले राज्य सचिव कुणाल, विधायक दल के नेता महबूब आलम, बीबी पांडेय, सरोज चौबे, उमेश सिंह, प्रदीप झा, प्रकाश कुमार आदि नेताओं ने हाथ में तख्तियां लेकर प्रदर्शन किया। वहीं, किसान महासभा के राष्ट्रीय महासचिव राजाराम सिंह, वरिष्ठ नेता केडी यादव, ऐपवा की महासचिव मीना तिवारी, खेग्रामस कार्यालय में धीरेंद्र झा, ऐपवा की बिहार राज्य सचिव शशि यादव आदि नेताओं ने भी प्रतिवाद किया।

राज्य सचिव कुणाल ने कहा कि राम के नाम पर बहुसंख्यक की आक्रमकता और धर्म व राजनीति का घालमेल देश के संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर हमला है। भारतीय संविधान की मूल भावना को सोच समझ कर नष्ट करने का यह कृत्य है। सुप्रीम कोर्ट के जिस फैसले ने मंदिर निर्माण की राह खोली थी, उसी फैसले में छह दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद ढाहने को आपराधिक कृत्य के रूप में स्पष्ट तौर पर आलोचना की गई है।

उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार का प्रधानमंत्री के स्तर पर भूमि पूजन में शरीक होना, उस अपराध को वैधता प्रदान करने की कार्रवाई है। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का मखौल उड़ाना तो है ही, भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर भी हमला है।

महबूब आलम ने कहा कि अयोध्या में आज पांच अगस्त का आयोजन केंद्रीय गृह मंत्रालय से जारी कोविड 19 से बचाव के प्रोटोकॉल का भी उल्लंघन है। इसमें धार्मिक आयोजनों, बड़ी जुटान और 65 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की भागीदारी पर रोक है।

उन्होंने कहा कि अयोध्या में पुजारी और तैनात पुलिस वालों का कोरोना पॉज़िटिव पाया जाना, बढ़ती महामारी के बीच लोगों को आमंत्रित करने से मानव जीवन के लिए पैदा किए जा रहे खतरे को रेखांकित करता है। राम मंदिर को कोरोना वायरस का इलाज बताने वाले भाजपा नेताओं के बयान संघ-भाजपा की धर्मांधता और कोरोना महामारी के बीच सरकार की अनुपयुक्त प्राथमिकताओं को ही दर्शाते हैं।

उन्होंने कहा कि जब कोरोना के केस दिन दूनी-रात चौगुनी गति से बढ़ रहे हैं, तब सरकार अपनी पूर्ण विफलता को लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ के जरिए ढकना चाहती है।

धीरेंद्र झा ने कहा कि धर्म का राजनीतिकरण करने और जन स्वास्थ्य के बजाय धार्मिक आयोजन को प्राथमिकता देने के मोदी सरकार की कार्यवाही को खारिज करना होगा और धर्मनिरपेक्षता और न्याय के संवैधानिक उसूलों को बुलंद करना हम जारी रखेंगे।

भाकपा-माले ने राष्ट्रव्यापी विरोध दिवस के तहत आशियाना नगर, पटना में भी विरोध किया। इसमें जितेंद्र कुमार, धर्मेंद्र कुमार, राजेश राम, मोहम्मद अजीज, गुड्डू राम, शंकर पासवान, जितेंद्र मांझी समेत अन्य लोगों ने भाग लिया। दीघा, पटना में भाकपा माले नेता राम कल्याण सिंह एवं डॉ. बशिष्ठ प्रसाद शामिल हुए। कंकड़बाग, पटना सिटी आदि जगहों पर भी विरोध-प्रदर्शन किए गए।

आरा में माले विधायक सुदामा प्रसाद, राजू यादव, मनोज मंजिल, अजित कुशवाहा, सिवान में विधायक सत्यदेव राम, पूर्व विधायक अमरनाथ यादव ने संविधान की मूल मान्यताओं पर हो रहे हमले के खिलाफ देश के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को बचाने की अपील की।

जहानाबाद, अरवल, सिवान, गया, भोजपुर, दरभंगा, समस्तीपुर, गोपालगंज, पूर्णिया आदि तमाम जिलों में भी सैंकड़ों जगह प्रतिवाद दर्ज कराया गया।

प्रतिवाद के जरिये भाकपा-माले ने की मांग
1. उच्चतम न्यायालय जिसने अयोध्या की जमीन मंदिर ट्रस्ट को दी, उसने यह भी कहा कि बाबरी मस्जिद का ढहाया जाना एक अपराध था। भारत के प्रधानमंत्री, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनकी सरकारें, शिलान्यास में शामिल हो कर उस आपराधिक कृत्य का राजनीतिक लाभ क्यूं उठाना चाहते हैं? भारत के नागरिक के तौर पर हम बाबरी मस्जिद गिराने के अपराधियों को राजनीतिक लाभ नहीं सजा दिए जाने की मांग करते हैं। 

2. अनलॉक-3 के दिशा-निर्देशों के अनुसार सभी धार्मिक आयोजनों पर रोक है। 65 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों को घर पर और भीड़भाड़ से अलग रहने की सलाह दी गई है। जब 69 वर्षीय प्रधानमंत्री इन दिशा निर्देशन का उल्लंघन करते हैं और धार्मिक समारोह में शामिल होते हैं, क्या वे सभी भारतीयों को कोरोना से बचाव के दिशा-निर्देशों को अनदेखा करने और उनका उल्लंघन करने के लिए उकसा नहीं रहे हैं?

3. भारत का संविधान इस बात में दृढ़ है कि धर्म और राजनीति का मिश्रण नहीं होना चाहिए। तब भारत के प्रधानमंत्री और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री क्यूं एक मंदिर के भूमिपूजन समारोह से राजनीतिक लाभ बटोरने की कोशिश कर रहे हैं?

4. पूरा देश कोविड-19 और लॉकडाउन संकट से जूझ रहा है, साथ ही बाढ़ भी झेल रहा है, जो हर साल अपने साथ अन्य महामारियां भी लाती है। ऐसे समय में जनता को इन जानलेवा संकटों से बचाने के बजाय भारत के प्रधानमंत्री, मंदिर के शिलान्यास समारोह को राजनीतिक मंच में तब्दील करने में क्यूं व्यस्त हैं?

5. सरकार को धार्मिक आयोजनों से दूर रहना होगा। राम मंदिर को कोरोना वायरस का इलाज बताकर अंधविश्वास फैलाना बंद किया जाए। कोरोना नियंत्रण में विफलता को लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ के जरिए ढकना बंद किया जाए और धर्म का राजनीतिकरण करना बंद हो। साथ ही, जन स्वास्थ्य  को प्रमुखता दी जाए।

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