पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में बिछ चुकी है चुनावी बिसात

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पूर्वोत्तर की तीन राज्यों की 180 सीटों पर 16 फरवरी को विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। जिसमें भाजपा शासित त्रिपुरा से चुनाव की शुरुआत 16 फरवरी को होगी। इसके बाद मेघालय और नागालैंड में 27 फरवरी को मत डाला जाएगा। जहां भगवा पार्टी क्षेत्रीय दिग्गजों के नेतृत्व वाले गठबंधन के क्रम में दूसरे स्थान पर है। मतगणना दो मार्च को होगा।

ये तीन पूर्वोत्तर राज्य 2023 में भारत के व्यस्त चुनावी मौसम की शुरुआत करेंगे‌। चूंकि इसके बाद कर्नाटक, मिजोरम, छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना में विधानसभा चुनाव होंगे। केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में भी चुनाव हो सकते हैं। ये चुनाव 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए टोन सेट करेंगे, जिसके तहत जनता अपनी नई सरकार को चुनने के लिए मतदान करेगी।

पूर्वोत्तर के सात राज्यों में से चार राज्यों में भाजपा की सरकार है। जिसमें मेघालय को सूची में जोड़कर भाजपा कम से कम एक की वृद्धि की आकांक्षा रखती है। भाजपा के पूर्वोत्तर रणनीतिकार और असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने ईसाई-बहुल मेघालय में अगली सरकार बनाने की पार्टी की आकांक्षा के बारे में खुलकर बताया है। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस भी सीएम संगमा के क्षेत्र में पैठ बनाने का लक्ष्य बना रही है।

साल 2024 को होने वाले लोकसभा चुनाव में पूर्वोत्तर की सीटें भाजपा के लिए बड़ी लड़ाई की तरह है। अधिक सीटें हासिल के करने के लिए भाजपा को अधिक मेहनत के साथ तत्परता दिखानी होगी। सात बहनों ( पूर्वोत्तर के सात राज्यों) के पास संयुक्त रूप से 24 लोकसभा सीटें हैं, जिनमें से 17 वर्तमान में एनडीए के पास हैं। एकमात्र पूर्वोत्तर राज्य जहां भाजपा की सरकार में हिस्सेदारी नहीं है, वह मिजोरम है।

त्रिपुरा में लेफ्ट और कांग्रेस गठबंधन में चुनाव लड़ने वाली है

हालांकि, सीएम ज़ोरमथांगा की एमएनएफ केंद्र में एनडीए की सहयोगी बनी हुई है। मिजोरम में इस साल के अंत में चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस, जिसने दशकों तक इस क्षेत्र पर शासन किया, तीनों चुनावी राज्यों में चोटिल और पस्त पड़ी है। सबसे पुरानी पार्टी पिछली बार नागालैंड और त्रिपुरा में एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। मेघालय में, जहां यह 2018 में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, पूर्व सीएम मुकुल संगमा ने पिछले साल कांग्रेस के आधे से अधिक विधायकों को टीएमसी में ले लिया।

लगभग 62.8 लाख योग्य मतदाता, पुरुषों की तुलना में महिलाओं की अधिक संख्या के साथ, पूर्वोत्तर चुनावी प्रतियोगिता की कुंजी रखते हैं। 60 सदस्यीय विधानसभा वाले तीन राज्यों में 18-19 आयु वर्ग में 1.76 लाख नए पात्र मतदाता हैं और 80 से अधिक आयु वर्ग में 97,100 मतदाता हैं, जिनमें से 2,644 सौ साल से अधिक के हैं।

हिंसा के खतरे के कारण त्रिपुरा में मतदान पहले निर्धारित किए गए हैं, जिसके लिए केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की एक बड़ी संख्या की आवश्यकता थी। इसके अलावा, त्रिपुरा एक रेलहेड होने के नाते केंद्रीय बलों तक सीधी पहुंच की अनुमति देता है, जिनमें से कुछ पहले ही राज्य में पहुंच चुके हैं।

त्रिपुरा में एक बार मतदान पूरा हो जाने के बाद, इनमें से अधिकांश बल नागालैंड और मेघालय में चले जाएंगे। त्रिपुरा और अन्य दो राज्यों में मतदान के बीच 12 दिनों का अंतर प्रक्रिया को सुविधाजनक बनाने के लिए है। त्रिपुरा में 2018 के चुनावों में बीजेपी ने 33 सीटें जीतीं, इंडिजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) ने 4, सीपीएम ने 15 और कांग्रेस की झोली में एक सीट आई थी।

बीजेपी ने 2018 की अपनी जीत साथ ही राज्य में लंबे समय से चली आ रही वामपंथी शासन का अंत किया और बिप्लब देब को मुख्यमंत्री बनाया। लेकिन पार्टी को अक्षमता के मुद्दों पर मई 2022 में उन्हें हटाना पड़ा और डॉ. माणिक साहा को नया सीएम बनाया गया। इसके अलावा भाजपा के अपने प्रमुख सहयोगी – आदिवासी संगठन इंडीजेनस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) के साथ संबंध खराब हैं।

दूसरी ओर, त्रिपुरा में लेफ्ट और कांग्रेस एक साथ आ गए हैं। इसके अलावा, प्रद्युत माणिक्य, जो पहले कांग्रेस के साथ थे, ने आदिवासी सीटों पर प्रभाव के आधार पर टिपरा मोथा की स्थापना की है। अलग तिप्रालैंड की मांग का जो भी समर्थन करेगा, वह उसका समर्थन करेगी। बीजेपी के हंगशा कुमार त्रिपुरा भी अपने आदिवासी समर्थकों के साथ टिपरा मोथा में शामिल हो गए हैं. इससे पहले सितंबर में भाजपा विधायक बरबा मोहन त्रिपुरा भी तिपरा में शामिल हुए थे।

मेघालय में नेशनल पीपुल्स पार्टी (एनपीपी) के कोनराड संगमा मुख्यमंत्री हैं। एनपीपी के 20, यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी (यूडीपी) के 8, पीपुल्स डेमोक्रेटिक फ्रंट (पीडीएफ) के 2, बीजेपी के 2 और 2 निर्दलीय हैं। विपक्षी टीएमसी के पास 9 सीटें हैं। कांग्रेस से आए मुकुल संगमा के साथ 14 सीटें खाली हैं।

2018 में मेघालय विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी, लेकिन 60 सदस्यीय विधानसभा में उसकी 21 सीटों की संख्या कम हो गई। राज्य में सरकार बनाने के लिए भाजपा ने एनपीपी का समर्थन किया था। कोनराड संगमा मुख्यमंत्री बने। हाल ही में, एनपीपी और भाजपा के बीच दरार पड़ गई है।

2018 में बीजेपी को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी. पार्टी का लक्ष्य इस बार गठबंधन सरकार का नेतृत्व करना है। हिमंत बिस्वा सरमा, जो 2015 में कांग्रेस से बीजेपी में आए थे और अब नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक अलायंस (एनईडीए) के संयोजक हैं, सहयोगी दलों के बीच संबंधों को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

एनपीपी के मेघालय डेमोक्रेटिक अलायंस (एमडीए) और बीजेपी को तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से कड़ी टक्कर मिलेगी। कांग्रेस भी कमर कस चुकी है।
नागालैंड में सत्तारूढ़ गठबंधन यूनाइटेड डेमोक्रेटिक एलायंस में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी,बीजेपी और नागा पीपुल्स फ्रंट शामिल हैं। एनडीपीपी के नेफ्यू रियो मुख्यमंत्री हैं।

2018 के चुनावों से पहले बना एनडीपीपी-बीजेपी गठबंधन नागालैंड में मजबूत होता जा रहा है। नागालैंड में कोई विरोध नहीं है। एनपीएफ के 21 विधायक यूडीए में शामिल हो गए। 2018 में एनपीएफ को 26, एनडीपीपी को 18, बीजेपी को 12, एनपीपी को 2, जेडीयू को 1 और 1 निर्दलीय सीट मिली थी।

सात जनजातियां राज्य के 16 जिलों को अलग कर अलग राज्य ‘फ्रंटियर नागालैंड’ की मांग कर रही हैं। केंद्र सरकार ने हाल ही में ईस्टर्न नगालैंड पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन (ईएनपीओ) के साथ बैठक की ताकि कोई रास्ता निकाला जा सके।

(दिनकर कुमार ‘द सेंटिनेल’ के संपादक रहे हैं।)

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