किसी क्रांतिकारी से क्रांतिकारी दर्शन-विचार की सैद्धांतिक और औपचारिक स्वीकृति कोई बहुत मुश्किल भरा काम नहीं होता है। कई बार तो इस तरह की सैद्धांतिक स्वीकृतियों से व्यक्ति या समूह को महत्ता भी प्राप्त होती है। नाम और शोहरत भी प्राप्त होती है, कैरियर भी बनता है। बड़े व्यक्तित्व के रूप में खूब ख्याति भी मिल सकती है। मुश्किल तब पैदा होती है, जब उस दर्शन-विचार को व्यवहार में बरतने और उसे जमीन पर उतारने का अवसर और सवाल आता है।
सैद्धांतिक स्वीकृतियां, उन पर विमर्श और लेखन भाषा की दुनिया में होता है। यह एक भाषायी खेल भी हो सकता है, जिसमें शामिल होना रोमांचक और रोमांटिक हो सकता है। पर उस क्रांतिकारी दर्शन-विचार को व्यक्तिगत व्यवहार और आर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक संघर्षों में उतारना भाषायी खेल नहीं होता। व्यवहार में उतारना बहुत सारी कुर्बानियों-कठिनाइयों यहां तक कि जिंदगी को दांव लगाने की कई बार मांग करता है।
मार्क्स-एंगेल्स ने इतिहास में पहली बार उन मेहनतकशों को इतिहास के केंद्र में ला दिया, जो उससे पहले इतिहास के वर्णनों-विमर्शों में हाशिए पर थे। जिन्हें दास, भूदास और मजदूर के रूप के रूप में देखा जाता था। मार्क्स-एंगेल्स की ऐतिहासिक-भौतिकवादी इतिहास दृष्टि ने यह साबित कर दिया कि अब के इतिहास के असली निर्माता यही मेहनतकश लोग रहे हैं और हैं, जिन्हें हम दास, भूदास और मजदूर के रूप में नगण्य समझते रहे हैं।
मानव जाति ने महान से महान उपलब्धियां इन्हीं के कंधे पर चढ़कर हासिल की हैं। उन्होंने यह पुरजोर तरीके से रेखांकित कर दिया कि पूंजीवाद ने दुनिया को वहां पहुंचा दिया है, जिसके आगे की मानव जाति की उन्नति की यात्रा तभी हो सकती है, जब इन्हीं मेहनतकशों के नेतृत्व में मानव जाति की आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सत्ता हो। इन्हीं मेहनतकशों की अगुवाई में ही मानव जाति उन्नति के शिखरों को छू सकती है।
सभी इंसानों के व्यक्तित्व के पूर्ण विकास के लिए जरूरी भौतिक स्थितियां और मानवीय परिस्थितियां मुहैया कराई जा सकती हैं। इसके लिए पूंजीवाद, सामंतवाद और दास प्रथा के सभी रूपों को पूरी तरह नेस्तनाबूत करना जरूरी है। निजी संपत्ति की उस व्यवस्था को पूरी तरह खत्म करना जरूरी है, जहां कोई व्यक्ति या वर्ग या समुदाय इस संपत्ति का इस्तेमाल करके किसी व्यक्ति, वर्ग या समुदाय का शोषण-उत्पीड़न करता हो या कर सके।
मार्क्स-एंगेल्स आजीवन अपने जैसे समानधर्मा साथियों के साथ मिलकर निजी संपत्ति आधारित इस वर्गीय शोषण-उत्पीड़न को खत्म करने के लिए सिद्धांत विकसित किए और उसे जमीन पर उतारने के लिए संघर्षों में हिस्सेदारी भी की। उनके जीते जी ऐसी कई कोशिशें हुईं, बहुत सारी असफल रही हैं। सबसे बड़ी कोशिश पेरिस कम्यून था। लेकिन वह अंत में थोड़े दिनों बाद असफल हो गया।
जिस व्यक्ति ने मार्क्स-एंगेल्स के मेहनतकशों के नेतृत्व में क्रांति के स्वप्न को जमीन पर उतार दिया, उस व्यक्ति का नाम कॉमरेड लेनिन था। उन्होंने रूस में शोषक-उत्पीड़क जार (राजा-महाराजा, सम्राट आदि) और उनके सहयोगी पूंजीपतियों को सत्ता से उखाड़ फेंका। रूस में मेहनतकशों का राज्य कायम कर दिया। मार्क्स-एंगेल्स के उन सिद्धांतों को जमीन पर उतार दिया, जिसे सिर्फ एक सैद्धांतिक कल्पना माना जाता था। जिसके बारे में ज्यादातर उदारवादी बुद्धिजीवियों का कहना था कि यह कभी व्यवहार में लागू नहीं हो पाएगा।
मार्क्स के वर्ग संघर्ष, द्वंद्वात्मक ऐतिहासिक भौतिकवाद, अतिरिक्त मूल्य के सिद्धांत और सर्वहारा की तानाशाही के दर्शन-सिद्धांतों-विचारों ने बहुत सारे अर्थशास्त्रियों, इतिहासकारों, साहित्यकारों, कलाकारों, विद्वानों और बुद्धिजीवियों को जीवन-जगत को देखने की एक भौतिकवादी, तार्किक, वैज्ञानिक और ताजी दृष्टि दी। इसे उन्होंने लपक लिया। इसका इस्तेमाल करके नाम, शोहरत और प्रतिष्ठा अर्जित की। लेकिन ऐसे लोग मार्क्स के दूसरे पक्ष को धूमिल करने में लगे रहे हैं, उसे ओझल किया। वह था कि यह सारा कुछ दुनिया बदलने के लिए है, हर तरह के शोषण-उत्पीड़न का खात्मा करने के लिए है, मेहनतकशों का राज्य कायम करने के लिए है। नए समाज का निर्माण करने के लिए।
लेनिन ने मार्क्स के पहले पक्ष (सैद्धांतिक) को तो पकड़ा, लेकिन दूसरा पक्ष क्रांति को संपन्न करने का है। उन्होंने यह रेखांकित किया कि यही मार्क्स के सिद्धांतों का कोर है, यही उनके सिद्धांतों की बुनियाद है। उन्होंने यह क्रांति संपन्न करके दिखा दिया। न केवल उन्होंने रूस में क्रांति संपन्न कर दिया, बल्कि दुनिया भर में क्रांतियों का रास्ता खोल दिया। मेहनतकशों को यह अहसास दिला दिया कि आपके नेतृत्व में आपका राज्य कायम हो सकता है, रूस आपके सामने इसका उदाहरण है।
लेनिन रूसी क्रांति संपन्न करने के बाद लेनिन मुश्किल से पांच वर्ष जिंदा रहे। रूसी क्रांति 1917 में संपन्न हुई और लेनिन 1924 में इस दुनिया में नहीं रहे।
रूसी क्रांति को मूर्त रूप देने, उसे सच्चे अर्थों में बहुसंख्यक मेहनतकशों का राज्य बनाने, हर तरह के शोषकों-उत्पीड़कों का सफाया करने (व्यक्तिगत सफाया नहीं, उनके शोषण-उत्पीड़न के भौतिक और वैचारिक आधारों का सफाया करने), समाजवाद और उसके बाद साम्यवाद की स्थापना करने का ठोस कार्यभार था। इतना ही नहीं दुनिया भर में क्रांतियों के सिलसिले को आगे बढ़ाने, हर तरह के क्रांतिकारी संघर्षों को मदद करने, हर तरह साम्राज्यवाद-उपनिवेशवाद विरोधी और सामंतवाद विरोधी संघर्षों को मदद करने का कार्यभार था। बहुत ही सीमित समय में रूसी क्रांति ने जो महान सफलताएं हासिल कीं। खुद को दुनिया के उन्नत से उन्नत पूंजीवादी देशों से बेहतर देश में बदल लिया। बहुसंख्यक आबादी की जिंदगी में जिस तरह की खुशहाली पैदा की, जैसा उनको गरिमामय जीवन मिला। यह सब कुछ कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में हुआ।
इतना ही नहीं, जर्मनी, इटली और जापान के फासीवादी गिरोह को निर्णायक शिकस्त रूसी जनता ने कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में ही पूरा किया। पूंजीवादी दुनिया रूस के बिना हिटलर और अन्य फासीवादी पिशाचों को पराजित करने के बार में सोच भी नहीं सकती थी। अमेरिका (यूएसए) इस फासीवाद विरोधी युद्ध में अंतिम समय तक हथियार बेंचकर और ऋण देकर मुनाफा कमा रहा था। वह हिटलर और उसके फासीवादी हमलों के खिलाफ अंतिम समय में शामिल हुआ, जापान पर अपने परमाणु बम का परीक्षण करके। यूरोप तबाह और बर्बाद हो चुका था। रूस करीब-करीब अकेले हिटलर मुकाबला कर रहा था।
सच यह है कि स्टालिन ही वह व्यक्ति थे। पूरी पश्चिम दुनिया और पूंजीवाद के लिए सबसे बड़ी चुनौती बने। उन्होंने अपने करीब 32 वर्षों में सोवियत रूस को उन्नति के उन शिखरों पर पहुंचा दिया, जिसकी किसी के लिए कल्पना करना भी मुश्किल था। वह अकेले न केवल यूरोप-अमेरिका के साम्राज्यवादियों-पूंजीपतियों के हर तरह के हमलों से जूझे, बल्कि हिटलर और उसके फासीवादी गिरोह के खिलाफ भी उतने ही मजबूती से खड़े हुए। उन्होंने मानव जाति के इतिहास में वह कर दिखाया, जो एक असंभव सी कल्पना लगती थी।
समाजवादी रूस का खात्मा साम्राज्यवादी-पूंजीवादी दुनिया के लिए जीवन-मरण का प्रश्न था। यदि समाजवादी रूस और उससे प्रेरित क्रांतियों का सिलसिला उसी तरह आगे बढ़ता रहता, जैसे कॉमरेड स्टालिन के नेतृत्व में बढ़ रहा था, तो साम्राज्यवाद और पूंजीवाद इतिहास के कूड़ेदान में फेंक दिया गया होता।
स्टालिन को उनके जीते जी हत्यारा, क्रूर, जालिम और तानाशाह ठहराने के लिए हजारों किताबें लिखी गईं। झूठ का पुलिंदा खड़ा किया गया। स्टालिन पर इस हमले के बहाने मेहनतकशों के सोवियत राज्य को बदनाम किया किया। समाजवाद को बदनाम किया गया, क्रांति और क्रांति के स्वप्न को बदनाम किया गया। कम्युनिस्ट और कम्युनिस्ट पार्टियों को बदनाम किया गया। इस तरह से लुटेरे पूंजीवाद-साम्राज्यवाद को बचाने की कोशिश की गई।
स्टालिन पर वे भी हमला करते हैं, जो मार्क्स-एंगेल्स की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हैं। वे मार्क्स-एंगेल्स को सैद्धांतिक-वैज्ञानिक विश्लेषण तक सिर्फ स्वीकार करते हैं, जिसमें कई बार समाजवाद शब्द भी शामिल होता है, लेकिन उस समाजवाद को मूर्त शक्ल देने वाले स्टालिन का नाम आते ही नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।
ऐसे लोग मार्क्सवाद को विश्लेषण के टूल के रूप में तो पसंद करते हैं, लेकिन क्रांतिकारी बदलाव के विज्ञान और मेहनतकशों का राज्य कायम करने की उसकी तार्किक परिणति से घृणा करते हैं।
मार्क्स-एंगेल्स का सिद्धांतकार पक्ष ज्यादातर दुनिया के सामने है। कई बुद्धिजीवी यह स्वीकार करते हैं और इसका इस्तेमाल करके प्रोफेसर-लेखक और विद्वान बन जाते हैं, लेकिन उसके व्यवहार के पक्ष से उन्हें घृणा है, मेहनतकशों का राज्य, कम्युनिस्टों का राज्य ना बाबा ना।
ऐसे लोग कुछ किंतु-परंतु के साथ लेनिन को स्वीकार करते हैं, विशेषकर उनके सिद्धांतकार पक्ष को। लेकिन उनके व्यवहारिक पक्ष पर नहीं के बराबर चर्चा करते हैं। यह भी सच है कि क्रांति को मूर्त और ठोस शक्ल देने का उन्हें कम समय मिला था, भले ही रूसी क्रांति के वही शिल्पी थे।
पर स्टालिन बिल्कुल स्वीकार नहीं हैं, क्योंकि स्टालिन की मुख्य पहचान क्रांति को ठोस शक्ल देने वाले, मेहनतकशों के राज्य को साकार रूप देने वाले और दुनिया के हर तरह के प्रतिक्रियावादियों से निपटने वाले योद्धा की है।
यहां माओ की एक बात ध्यान देने लायक है कि क्रांति कोई दस्तरखान की दावत नहीं है, बल्कि क्रांति दो वर्गों के बीच जीवन-मरण का युद्ध है। एक वर्ग की कीमत पर ही दूसरा वर्ग जीवित रह सकता है। इसमें यह चुनना पड़ता है कि आप शोषित-उत्पीड़ित वर्ग के साथ हैं या शोषण-उत्पीड़क वर्ग के साथ। क्रांति और क्रांति के बाद समाजवाद-साम्यवाद का निर्माण कोई शाब्दिक पक्षधरता से नहीं होता है। उसमें दोस्तों को एकजुट करना पड़ता है और दुश्मनों से निपटना पड़ता है। जान देनी और कभी-कभी लेनी भी पड़ती है।
स्टालिन मेहनतकशों के दुश्मनों, क्रांति के दुश्मनों और क्रांति के गद्दारों से निपटे। इन सब से निपटकर क्रांति को साकार रूप दिया। इसी लिए कॉमरेड स्टालिन दुनिया भर के साम्राज्यवादियों-पूंजीवादियों, सामंतवादियों और उनके टुकड़खोर बुद्धिजीवियों के लिए घृणा के, नफरत के पात्र रहे हैं। स्टालिन के खिलाफ जितना नफरत का अभियान चलाया गया, उन्हें बदनाम करने के लिए जितनी किताबें लिखी गईं, फिल्में और डॉक्यूमेंटरी बनाई गई शायद इतिहास में किसी एक व्यक्ति के खिलाफ लिखी और बनाई गई हों।
(डॉ. सिद्धार्थ लेखक और पत्रकार हैं।)