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आंकड़ों की राजनीति और लॉकडाउन से होने वाली मौतें

यूरोमोमो (EuroMOMO) नामक संस्था ने 24 यूरोपीय देशों में 16 मार्च, 2020 से 19 अप्रैल , 2020 के बीच हुई ‘अतिरिक्त मौतों’ के आँकड़े जारी किए हैं। उन्होंने इसकी तुलना वर्ष 2009 से 2019 के बीच इसी अवधि में हुई औसत मृत्यु से की है। यानी, पिछले दस सालों की तुलना में इस अवधि में कितने लोग अधिक मरे, उन्होंने यह बताया है। किसी महामारी को समझने के लिए “अतिरिक्त मृत्यु दर” (excess mortality) को एक विश्वसनीय स्रोत माना जाता है। “अतिरिक्त मृत्यु दर” का अर्थ है किसी भी कारण से मरने वाले लोगों की कुल संख्या और एक ही स्थान और वर्ष में मरने वालों के ऐतिहासिक औसत के बीच का अंतर।

‘द इकॉनामिस्ट’ सहित कई मीडिया समूहों ने इन आँकड़ों की अपने-अपने तरीके से व्याख्या की है।

आँकड़ों का संकलन एक मुकम्मल राजनीतिक काम है। कौन से आँकड़े जमा किए जाने हैं; किसे, कब, कैसे जारी किया जाना है; कौन से आँकड़े नहीं संकलित किए जाने हैं, किसको नहीं जारी किया जाना है; यह वर्चस्वशाली तबका अपनी जरूरत के हिसाब से तय करता है।

मसलन, भारत में पिछले कई वर्षों से जाति आधारित आँकड़े (संसाधनों पर अधिकार की जानकारी सहित जाति-गणना) पर विवाद चल रहा है। एक वर्ग चाहता है कि यह गणना हो, जबकि दूसरा इसका विरोध करता है।

रोगों से संबंधित आँकड़ों का संकलन और प्रसारण भी जाति-गणना जैसे मामले से अलग नहीं है।

अगर भारत में टीबी और मलेरिया से मरने वालों की संख्या रीयल-टाइम में जारी की जाने लगे तो उससे कोरोना से कई गुणा अधिक अफरातफरी फैलने की आशंका है।

भारत में हर साल टीबी से 5 लाख लोगों की मौत होती है। टीबी से मौतों के मामले में भारत दुनिया में सबसे अव्वल है। न्यूमोनिया से यहां हर साल 1.27 लाख लोग मरते हैं, जिनमें सबसे अधिक बच्चे होते हैं। न्यूमोनिया से मरने वालों में विश्व में भारत का नंबर दूसरा है। पहले नंबर पर नाइजीरिया है। भारत में हर साल मलेरिया से लगभग 2 लाख लोग मरते हैं, जिनमें ज्यादातर युवा आदिवासी होते हैं। हमारे देश में हर साल एक लाख से अधिक बच्चे डायरिया से मर जाते हैं।

इन आंकड़ों को प्रतिदिन के हिसाब से विभाजित कर लीजिए और  कल्पना कीजिए कि रोज हो रही ये मौतें आपके सामने सुबह आने वाले अखबार के पहले पन्ने पर दर्ज हों और टीवी एंकर चीख कर बता रहे हों कि आज भारत में 1300 से अधिक लोग टीबी से मर गए और 350 बच्चे न्यूमोनिया से हलाक हो गए। आप पर क्या बीतेगी?

विश्व में हर साल लगभग 1 करोड़ लोगों को टीबी के लक्षण उभरते हैं। इन एक करोड़ लोगों में से लगभग 15 लाख लोगों की हर साल मौत होती है। दुनिया में हर दिन 4100 से अधिक लोगों के टीबी से तड़प-तड़प कर मरने की खबर होती है, जो हम तक नहीं पहुंचती। दुनिया में 180 करोड़ लोग, यानी दुनिया की एक चौथाई आबादी,  टीबी के बैक्टेरिया ‘माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरक्लोसिस’ की साइलेंट कैरियर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनिया में हर सेकेंड एक नए व्यक्ति को टीबी का संक्रमण हो रहा है।

दुनिया के गरीब जिन अन्य संक्रामक बीमारियों से सबसे अधिक मरते हैं, उनका आधिकारिक आंकड़ा इस प्रकार है : विश्व में  डायरिया से हर साल लगभग 10 लाख, न्यूमोनिया से 8 लाख, मलेरिया से 4 लाख, हेपेटाइटिस-सी से 3.99 लाख और हैजा से लगभग 1.43 लाख लोग मरते हैं। इनके अतिरिक्त और भी कई जानलेवा संक्रामक बीमारियाँ हैं, जिनमें से अनेक अभी भी ला-ईलाज़ हैं।

जाहिर है, गरीबों को मारने वाली बीमारियों के इन सच्चे आकड़ों को रीयल-टाइम में जारी होने से रोकने के लिए कदम उठाए जाते हैं। उन्हें प्राय: छुपाया जाता है, या बहुत आवश्यक होने पर इस प्रकार दबा कर प्रस्तुत किया जाता है कि वे समाज में उद्वेलन न पैदा करें।

इसी प्रकार, आकड़ों की व्याख्या तो और भी राजनीतिक काम है। यह दो दुना चार, जितना सरल नहीं है, जैसा कि अक्सर लोग समझते हैं। अगर ठीक मंशा से प्रयुक्त न हों तो तर्क और गणित दुनिया की सबसे घातक, झूठी और फरेबी चीजें हैं।

बहरहाल, हम पहले उन आंकड़ों को देखें, जिनका जिक्र लेख के शुरू में किया गया है।

यूरोमोमो द्वारा जारी इन आकड़ों से पता लगता है कि उपरोक्त 24 यूरोपीय देशों में  16 मार्च, 2020 से 19 अप्रैल , 2020 के बीच पिछले 10 वर्षों के औसत की तुलना में 1 लाख 20 हजार लोगों की “अतिरिक्त मृत्यु” हुई।

लेकिन जब ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने इसका मिलान उन देशों में कोविड से हुई मृत्यु के आंकड़ों से किया तो उन्होंने पाया कि कोविड से मरने वालों की संख्या हर जगह इससे कम है। मसलन,  इंग्लैंड और वेल्स में 14 मार्च से 17 अप्रैल के बीच कुल 19088 लोग कोविड से मरे, लेकिन वहां अब तक हुई “अतिरिक्त मौतों” की संख्या  27035 है। इसी प्रकार, स्पेन में लगभग इसी अवधि में 18021 लोग कोविड से मरे, जबकि  अतिरिक्त मौतों की संख्या 26844 थी। नीदरलैण्ड में तो सिर्फ 3664 लोग कोविड से मरे, जबकि अतिरिक्त मौतों की संख्या 7569 रही। दोगुने से भी ज्यादा!  ‘द इकोनॉमिस्ट’ के अनुसार इटली में भी यह अंतर लगभग दोगुने का रहा।

‘द इकोनॉमिस्ट’ से लिया गया यह चार्ट देखें और गणना करें। यह गणना न यूरोमोमो  ने की है, न ही इकॉनॉमिस्ट ने इसकी जहमत उठाई है। इसलिए हमें इसे स्वयं करना होगा।

यूरोपीय देशों में कोविड से मरने वालों की संख्या व अतिरिक्त मृत्यु दर। इसी अवधि में इन देशों में लॉकडाउन किया गया

‘द इकॉनामिस्ट’ ने अपनी “व्याख्या” के लिए इन देशों में पहले पचास कोविड मरीजों की मृत्यु के बाद की अवधि को चुना है।

इस गणना को करने पर हम पाते हैं कि इंग्लैंड और वेल्स में इस अवधि में औसत से अधिक 7947 लोग ऐसे मरे; जिन्हें कोविड नहीं था। स्पेन में बिना कोविड वाली अतिरक्त मौतों की संख्या 8823, फ्रांस 2461, न्यूर्याक सिटी 731, बेल्जियम 358, इस्ताम्बुल 1724 तथा नीदरलैंड में 3905 है। अन्य देशों-जगहों में गैर-कोविड कारणों से हुई औसत के “अतिरिक्त” संख्या को आप भी इस प्रकार निकाल सकते हैं।

यहां यह जानना भी प्रासंगिक होगा न्यूर्याक सिटी और इंग्लैड-वेल्स में जमा किए गए इन आंकड़ों में डॉक्टरों द्वारा दिए गए डेथ सर्टिफिकेट को आधार बनाया गया। इनमें विभिन्न क्रोनिक बीमािरयों से पीड़ित बहुत बुजुर्ग लोगों की संख्या भी जोड़ दी गई। इन लोगों को कोरोना का भी इंफेक्शन था, लेकिन चिकित्सक यह बताने की स्थिति में नहीं थे कि वे कोरोना से मरे या अन्य बीमारी से। बेल्जियम, उन देशों  में शामिल है, जहां प्रति लाख आबादी पर कोरोना से मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा कह कर प्रचारित की गई है। लेकिन ‘द इकॉनामिस्ट’ की यह रिपोर्ट बताती है कि बेल्जियम में “कोरोना जैसे लक्षण ” से हुई मौतों को भी बिना टेस्ट के कोरोना से हुई मौतों में गिन दिया गया। गौरतलब है कि ‘कोरोना’ जैसे लक्षण टीबी, दमा, फ्लू समेत अनेक ऐसी बीमारियों में होते हैं, जो सांस की नली और फेफड़े से संबंधित होती हैं।

इंग्लैंड और वेल्स में अतिरिक्त मृत्यु दर। यहां  कुल 19088 लोग कोविड से मरे, जबकि “अतिरिक्त मौतों” की संख्या  27035 है। इसी प्रकार, नीदरलैण्ड में तो सिर्फ 3664 लोग कोविड से मरे, जबकि अतिरिक्त मौतों की संख्या 7569 रही। दोगुने से भी ज्यादा!

खैर, उन गड़बड़ियों को फिलहाल छोड़कर हम यह देखें कि इन ‘आधिकारिक’ आंकड़ों में  कोविड के अतिरिक्त औसत से अधिक यह “अतिरिक्त मृत्यु” किस कारण हुई? यूरोमोमो ने इस बारे में कुछ नहीं कहा है, जबकि ‘द इकॉनॉमिस्ट’ ने इसका ठीकरा एक ओर सरकारों द्वारा देर से पेश किए जाने वाले आंकड़ों पर फोड़ने की कोशिश की है, तो दूसरी ओर कहा है कि – हो सकता है कि अनेक ऐसे लोग भी मरे हों, जिन्हें कोविड हो, लेकिन जिनकी जांच नहीं हुई हो।

यह इन आँकड़ों की एक राजनीतिक व्याख्या है, जो कोविड के भय को बढ़ाती है।

लेकिन हम चाहें तो इसकी एक दूसरी सीधी और सच्ची  व्याख्या कर सकते हैं। चूंकि इन्हीं तिथियों के आस पास इन देशों में लॉक डाउन की शुरूआत हुई, इसलिए गैर-कोविड अतिरक्त मौतें लॉक डाउन के कारण हुई हैं। लॉकडाउन ने अस्पतालों के ओ.पी.डी. बंद करवा दिया। कैंसर, हृदय रोग, किडनी की बीमारी आदि से पीड़ित लोगों का इलाज होना बंद हो गया। तनाव और अनिश्चितता बढ़ गई, इसलिए स्वाभाविक तौर पर कोविड के अतिरिक्त हुई मौतों का प्रतिशत भी बढ़ गया।

क्योंकि, इसी आँकड़े में हम देखते हैं कि स्वीडन में, जहां लॉकडाउन नहीं था, औसत से अधिक होने वाली अतिरिक्त मौतों की संख्या बहुत कम है। स्वीडन में 18 मार्च, 2020 से 14 अप्रैल, 2020 के बीच 1509 लोग कोविड से मरे, और औसत के अतिरक्त होने वाली मौतों की संख्या 1677 रही। यानी, सिर्फ 168 ज्यादा। वह भी इसलिए क्योंकि वहां भी गैर-कोविड रोगियों के अस्पताल जाने को लेकर कुछ बंदिशें थीं।

आप इस व्याख्या को असंगठित  क्षेत्रों में कार्यरत दुनिया की 61 फीसदी आबादी के पक्ष की “राजनीतिक व्याख्या” कह सकते हैं, जो दुनिया की  अधिकांश आबादी का वर्तमान और भविष्य तय करते हैं।

स्वीडन की अतिक्त मृत्यु दर। स्वीडन में लॉकडाउन नहीं होने के कारण गैर-कोविड कारणों से मरने वाले अतिरिक्त लोगों की संख्या नगण्य रही

वैसे, हमारी यह व्याख्या शायद एकदम नई और अदेखी भी नहीं है। दो दिन पहले ही आख़िर विश्व स्वास्थ संगठन (WHO) ने पहली बार स्वीकार किया है कि कोरोना से पार पाने के लिए स्वीडन का मॉडल “आदर्श” है और यह दुनिया को दिशा दे सकता है।

यह मॉडल क्या है? स्वीडन ने जबरन लॉकडॉउन नहीं किया। वहां बार-रेस्त्रां सब खुले रहे। स्वीडन ने अपने लोकतंत्र और लोगों के विवेक पर भरोसा किया। लोगों को भरपूर सूचना दी, कुछ भी छिपाया नहीं। लोगों ने स्वाभाविक तौर पर स्वयं भौतिक दूरी अपनाई, और साफ सफाई पर विशेष ध्यान दिया।

नतीजा सामने है।

क्या स्वीडन की आलोचना करने वाले विश्व के बड़े मीडिया संस्थान अब उसके नागरिकों से माफी मांगेंगे? क्या बिल गेट्स दुनिया को लॉकडाउन में धकेलने वाली सलाहें जारी करने से बाज आएंगे?

आने वाले दिनों में यही नतीजे लॉकडाउन नहीं करने वाले अन्य देशों से भी आएंगे।

लॉकडाउन संक्रमण रोकने की एक भोंडी और असफल तकनीक है। यह भय और अफरातफरी अधिक पैदा करती है, निदान बहुत कम।

कुछ लोग कह सकते हैं  कि स्वीडन का मॉडल भारत में यहां की बड़ी जनसंख्या और गरीब जनता की अनुशासनहीनता के कारण लागू नहीं हो सकता। लेकिन यह सिर्फ स्वीडन जैसे देश का ही मॉडल नहीं है, बेलारूस, ब्राजील  निकारागुआ, तुर्की जैसे विकासशील  देश भी मुख्यत: इसी नीति पर चल रहे हैं। इस मॉडल के तहत सरकारों ने अपनी जनता को खतरे के बारे में बताया; लेकिन बंदिशें न्यूनतम लगाई हैं।

गरीब-उपेक्षित-सरकारी तानाशाहियों की शिकार जनता को अनुशासनहीन कहना कितना आसान होता है? लेकिन हम यह कहते हुए भूल जाते हैं कि भारत के प्रधानमंत्री के एक इशारे पर पूरे देश ने विभेदों को भूलकर तालियां और मोमबत्तियां जलाईं ! सच तो यह है कि भारत की गरीब जनता का अब भी अपनी सरकार-बहादुर पर अनंत भरोसा है। लेकिन सरकार को इन पर कोई भरोसा नहीं है। वह इन्हें लातों का भूत मानती है।

बहरहाल, जैसा कि उपरोक्त आंकड़ों से भी संकेत मिलता है कि कोविड से “संभावित” मौतों की भारी-भरकम संख्या गणितीय संभावना या कहें कि गणितीय कल्पना पर आधारित है। आवश्यक नहीं कि ये गणितीय परिकल्पनाएं झूठी हों, लेकिन हमें कुछ अन्य कल्पनाएं भी करनी चाहिए। ये कल्पनाएं हमें सच के ज्यादा नजदीक पहुंचाएंगी।

मसलन, कल्पना करें कि अगर भारत सरकार रीयल टाइम में यह आँकड़े जारी करना शुरू कर दे कि 25 मार्च, 2020 को किए गए लॉकडाउन के बाद से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत कितने लोग रोज भूखे सो रहे हैं, कितने गरीब और निम्न मध्यवर्गीय प्रतिदिन आत्महत्या कर रहे हैं, कितनी गरीब युवतियां इस अचानक आई आपदा के कारण रोज अपनी अस्मत बेचने को मजबूर हो रही हैं, टीबी, न्यूमोनिया, हृदय रोग कैंसर के रोज कितने अतिरिक्त मरीज दम तोड़ रहे हैं!

क्या रीयल-टाइम में इन आँकड़ों के जारी होने के बाद आप लॉक डाउन को उचित ठहरा पाएंगे? नहीं न! इसलिए इन आंकड़ों को छुपाया जाना जरूरी है। यह देश हित में है। और देश किनका है, यह तो आप जानते ही हैं!

(पिछले दो दशक से आलोचना व पत्रकारिता में सक्रिय प्रमोद रंजन की दिलचस्पी सबाल्टर्न अध्ययन में रही है। रंजन इन दिनों असम विश्वविद्यालय के रवींद्रनाथ टैगोर स्कूल ऑफ लैग्वेज एंड कल्चरल स्टडीज में प्राध्यापक हैं। ‘साहित्येतिहास का बहुजन पक्ष’, ‘बहुजन साहित्य की प्रस्तावना’, ‘महिषासुर : मिथक व परंपराएं’ (संपादित) और ‘शिमला-डायरी’ (संस्मरणात्मक कोलाज) उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं।)

This post was last modified on May 3, 2020 1:06 pm

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