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Friday, September 17, 2021

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पुण्यतिथि पर विशेष: इस्लाम को शरीर और हिंदू धर्म को मस्तिष्क की संज्ञा देते थे स्वामी विवेकानंद

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स्वामी विवेकानंद देश के महानतम प्रज्ञा पुरुष थे। 4 जुलाई, उनकी 118वीं पुण्यतिथि है। साल 1902 में आज ही के दिन पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में ध्यानावस्था में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली थी। महज 39 साल की उम्र में वे इस दुनिया से विदा हो गए थे। महात्मा गौतम बुद्ध के बाद विवेकानंद देश के पहले धार्मिक, सांस्कृतिक राजदूत थे। उन्होंने सभी तरह की कुंठाओं और वर्जनाओं को त्याग, पश्चिमी बुद्धिजीवियों को उनकी ही सरजमीं पर निर्णायक तौर से हराया था। आधुनिक भारत के राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और साहित्यिक जीवन की कई हस्तियां उनकी जिंदगी से किसी न किसी तरीके से प्रभावित थीं।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने विवेकानंद के बारे में लिखा है,‘‘स्वामी विवेकानंद का धर्म राष्ट्रीयता को उत्तेजना देने वाला धर्म था। नई पीढ़ी के लोगों में उन्होंने भारत के प्रति भक्ति जगायी। उसके अतीत के प्रति गौरव एवं उनके भविष्य के प्रति आस्था उत्पन्न की। उनके उद्गारों से लोगों में आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान के भाव जगे हैं।’’ एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के बीस में से लगभग कंठस्थ ग्यारह खण्डों पर विवेकानंद का असाधारण अधिकार था। वे विवेकानंद ही थे जिन्होंने पतंजलि के प्रकृतियोग के सिद्धान्त का पूरक सिद्धान्त प्रतिपादित किया। ऋग्वेद से लेकर कालिदास तक देश के अन्यतम ग्रन्थों से वे अच्छी तरह वाकिफ थे। यही नहीं विवेकानंद ने पश्चिमी विद्वानों को भी पढ़ा था। कांट, शोपेनहावर, मिल तथा स्पेन्सर जैसे विचारकों का उन्होंने खूब अध्ययन किया। स्वामी विवेकानंद की मेधा से प्रभावित होकर पश्चिम ने उन्हें ‘हिन्दू-नेपोलियन‘ और ‘चक्रवातिक हिन्दू‘ की संज्ञाएं दी थीं।

12 जनवरी, 1863 को कलकत्ता में जन्मे स्वामी विवेकानंद न सिर्फ अपने समय में, बल्कि आज भी अपने क्रांतिकारी विचारों से नौजवानों के दिलो-दिमाग को उद्वेलित करते हैं। देश के लाखों-लाख युवा तरुणाई के लिए उनके विचार, आज भी प्रेरणा स्त्रोत हैं। स्वामी विवेकानंद का कहना था कि युवा राष्ट्र की असली शक्ति हैं। राष्ट्र कवि दिनकर ने स्वामी विवेकानंद के बारे में कहा था,‘‘विवेकानंद वो समुद्र हैं जिसमें धर्म और राजनीति, राष्ट्रीयता और अंतरराष्ट्रीयता तथा उपनिषद और विज्ञान सब के सब समाहित होते हैं।’’ उनकी यह बात सही भी है। विवेकानंद ऋषि, विचारक, सन्त और दार्शनिक थे, जिन्होंने आधुनिक इतिहास की समाजशास्त्रीय व्याख्या की।

विवेकानंद के दर्शन के तीन मुख्य स्त्रोत रहे हैं-पहला, वेद तथा वेदान्त की महान परम्परा, दूसरा श्रीरामकृष्णदेव का शिष्यत्व और तीसरा अपने जीवन का अनुभव। विवेकानंद ने कहा था,‘‘किसी की भी कोई बात या सिद्धांत को तर्क और बहस-मुबाहिसे के जरिए परखे बिना नहीं मानना चाहिए।’’ विवेकानंद पुरोहितवाद, धार्मिक आडंबरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर ही आध्यात्मिक चिंतन किया था। उनका कहना था,‘‘मैं उस ईश्वर का उपासक हूं, जिसे अज्ञानी लोग मनुष्य कहते हैं।’’ स्वामी विवेकानंद स्वभाव से ही विद्रोही प्रकृति के थे। उनके बगावती तेवर अक्सर उनके भाषणों से झलकते थे।

उन्होंने ही यह विद्रोही बयान दिया था, ‘‘इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी देवताओं की तरह मंदिरों में स्थापित कर दिया जाए और मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए।’’ विवेकानंद ने अपनी किताबों और भाषणों में पुरोहितवाद, ब्राम्हणवाद, धार्मिक कर्मकांड और रूढ़ियों की जमकर आलोचना की और लगभग आक्रमणकारी भाषा में ऐसी विसंगतियों के खिलाफ हल्ला बोला। उनका कहना था,‘‘जब पड़ोसी भूखों मरता हो, तब मंदिर में भोग चढ़ाना पुण्य नहीं पाप है। जब मनुष्य दुर्बल और क्षीण हो तब हवन में घृत डालना अमानुषिक कर्म है।’’

विवेकानंद धार्मिक कठमुल्लापन के खिलाफ थे और इस तरह की प्रवृत्तियों से उन्होंने हमेशा संघर्ष किया। उनका कहना था, ‘‘जिनके लिए धर्म एक व्यापार बन गया है, वे संकीर्ण हो जाते हैं। उनमें धार्मिक प्रतिस्पर्धा का विष पैदा हो जाता है और वे अपने स्वार्थ में अंधे होकर वैसे ही लड़ते हैं, जैसे व्यापारी अपने लाभ के लिए दांव-पेंच लगाते हैं।’’ स्वामी विवेकानंद न सिर्फ धार्मिक कट्टरता और रूढ़िवाद के विरोधी थे, बल्कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता को भी इंसानियत का बड़ा दुश्मन मानते थे। साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के बारे में उनके विचार थे,‘‘साम्प्रदायिक हठधर्मिता और उसकी वीभत्स वंशधर धर्मान्धता इस सुंदर धरती पर बहुत समय तक राज कर चुकी है।

वे पृथ्वी को हिंसा से भरती रही, उसको बार-बार मानवता के रक्त से नहलाती रही है। सभ्यताओं को विध्वंस करती और पूरे-पूरे देशों को निराशा के गर्त में डालती रही हैं। यदि वे वीभत्स और दानवी न होती, तो मानव समाज आज की अवस्था से कहीं अधिक उन्नत हो गया होता।’’ स्वामी विवेकानंद विश्व बंधुत्व के बेखौफ प्रवक्ता थे। उनके दिल में सभी धर्मों का समान रूप से सम्मान था। धर्म उनकी नजरों में एक अलग ही मायने रखता था। उनका कहना था,‘‘अगर कोई इसका ख्वाब देखता है कि सिर्फ उसी का धर्म बचा रह जाएगा और दूसरे सभी नष्ट हो जाएंगे, तो मैं अपने दिल की गहराइयों से उस पर तरस ही खा सकता हूं। जल्द ही सभी झंडों पर, कुछ लोगों के विरोध के बावजूद यह अंकित होगा कि लड़ाई नहीं दूसरों की सहायता, विनाश नहीं मेलजोल, वैमनस्य नहीं बल्कि सद्भाव और शांति।’’

विवेकानंद को अपने भारतीय होने पर बेहद गर्व था। भारतीयों के गुणों का बखान करते हुए उन्होंने कहा था, ‘’हम भारतीय केवल सहिष्णु ही नहीं हैं। हम सभी धर्मों से स्वयं को एकाकार कर देते हैं। हम पारसियों की अग्नि को पूजते हैं। यहूदियों के सिनेगॉग में प्रार्थना करते हैं। मनुष्य की आत्मा की एकता के लिए तिल-तिलकर अपना शरीर सुखाने वाले महात्मा बुद्ध को हम नमन करते हैं। हम भगवान महावीर के रास्ते के पथिक हैं। हम ईसा की सलीब के सम्मुख झुकते हैं। हम हिन्दू देवी देवताओं के विश्वास में बहते हैं।’‘ स्वामी विवेकानंद ने दुनिया के दो बड़े मजहब, हिंदू धर्म और इस्लाम धर्म के बीच आपसी सहकार की बात करते हुए कहा था,‘‘हमारी मातृभूमि, दो समाजों हिंदुओं और मुस्लिम की मिलनस्थली है।

मैं अपने मानस नेत्रों से देख रहा हूं कि आज के संघात और बवंडर के अंदर से एक सही और अपराजेय भारत का आविर्भाव होगा, वेदांत का मस्तिक और इस्लाम का शरीर लेकर।’’ विवेकानंद ने न सिर्फ पूरे भारत को करीब से देखा था, बल्कि दुनिया के कई देशों मसलन जापान, चीन, इंग्लैंड, अमेरिका और यूरोप के कई देशों की भी यात्राएं कीं। अमेरिका स्थित शिकागो में साल 1893 में आयोजित ‘विश्व धर्म महासभा’ में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। स्वामी विवेकानंद की वक्तव्य शैली और ज्ञान को देखकर वहां की मीडिया भी हैरान रह गई और उसने उन्हें ‘साइक्लॉनिक हिंदू’ का खिताब दिया। सच बात तो यह है कि अमेरिका और यूरोप में वेदांत दर्शन यदि पहुंचा, तो उसमें भी उन्हीं का योगदान था।

जातिवाद, अस्पृश्यता, स्त्री-पुरुष की बराबरी, वैज्ञानिकता, सर्वधर्म समभाव सम्बन्धी विवेकानंद के विचार अधुनातन हैं। विवेकानंद ने परम्परावादी भारतीय बौद्धिकों से अलग हटकर पश्चिमी स्वस्थ्य मूल्यों की न केवल तारीफ की, बल्कि उन्हें अपनाए जाने का भी आग्रह किया। वे कहते थे,‘‘विज्ञान निरपेक्ष है। उससे भारत का भला ही हो सकता है, नुकसान नहीं।’’ भारतीय राष्ट्रवाद की नदी में बहते हुए विवेकानंद एक प्रतिधारा की तरह थे। उन्होंने प्रचलित, पारम्परिक और ऐतिहासिक विचारधाराओं के खिलाफ हमेशा संघर्ष किया। स्वामी जी ने अपने भाषण में एक बार कहा था,‘‘मैं समाजवादी हूं।’’

उनके विचार इस बात की तस्दीक भी करते हैं। विवेकानंद अस्पृश्यता जैसी घातक, अन्यायपूर्ण और अर्थहीन प्रथा के प्रति बेहद आक्रामक थे। उनके भाषण, लेख और पत्र इस समाज विरोधी आचरण के खिलाफ लगातार आह्वान करते हैं। समाज की कुरीतियां, जिनमें जातिवाद प्रमुख है, हमेशा उनके निशाने पर रहा। स्वामी विवेकानंद ऐसे पहले शख्स थे, जिन्होंने देश में पिछड़ी जातियों अर्थात् शूद्र राज की ऐतिहासिक भविष्यवाणी की थी। अस्पृश्यता का विवेकानंदीय अनुवाद है ‘मतछुओवाद‘। वे कटाक्ष करते हैं, ‘‘वेदान्त के इस देश में जहां मनुष्य की नैसर्गिक आध्यात्मिकता और समानता का दर्शन ईजाद किया गया, वहां अस्पृश्यता की बीमारी एक सामाजिक लक्षण के रूप में अट्टहास करती रहती है।’’ वे विवेकानंद ही थे जिन्होंने ‘रसोई धर्म‘ जैसा शब्द भी गढ़ा। अपनी बेलाग शैली में उन्होंने कहा था,‘‘तुम हिन्दुओं का कोई धर्म नहीं है।

तुम्हारा ईश्वर रसोईघर में है। तुम्हारी बाइबिल खाना पकाने के बर्तन हैं। लोगों ने वेद तो छोड़ दिए हैं और तुम्हारा सारा दर्शन रसोईघर में आ गया है। भारत का धर्म हो गया है ‘मत छुओवाद‘, मौजूदा हिन्दुत्व पतन की पराकाष्ठा।’’ अस्पृश्यता की बीमारी के खिलाफ विवेकानंद का यह आक्रमण रस्मी नहीं था। अस्पृश्यता और जातिवाद के वे घोर विरोधी थे। दलितों का जीवन ऊपर उठे यह उनकी प्रतिबद्धताओं में शामिल था। उन्होंने अपने भाषणों में बार-बार यह कहा है कि ‘मत छुओवाद‘ एक तरह की मानसिक व्याधि है। विवेकानंद के मुताबिक,‘‘एक संयत मस्तिष्क ऐसी उपपत्तियां सामाजिक व्यवहार के लिए निर्मित नहीं कर सकता।’’

स्वामी विवेकानंद आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके विचारों में वर्तमान के कई ज्वलंत सवालों के जवाब ढ़ूढ़ें जा सकते हैं। जरूरत उन सवालों को सही ढंग से समझने की है। उन्नीसवीं सदी में जब भारतीय समाज अपेक्षाकृत ज्यादा मतांध, संकीर्ण और दकियानूस था, उस वक्त विवेकानंद ने जो कुछ भी कहा, वह हर लिहाज से क्रांतिकारी था। समाज की जरा सी भी परवाह न करते हुए, वे अपने साहसिक और मौलिक विचार पूरी दुनिया के बीच बांटते रहे। वे देश के पहले सांस्कृतिक राजदूत थे, जिन्होंने भारतीय परंपरा, दर्शन और संस्कृति को पश्चिमी देशों तक पहुंचाया। स्वामी विवेकानंद की किताबों और भाषणों का सम्यक अध्ययन करने से मालूम चलता है कि उनके विचारों में समकालीन शब्दार्थों से कहीं ज्यादा भविष्य के निहितार्थ छिपे हैं। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि यह होगी कि हम उनके वास्तविक विचारों को जन-जन तक पहुंचाएं।  

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल एमपी के शिवपुरी में रहते हैं।)

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