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उग्रवाद नियंत्रित कर सुशासन कायम करने के लिए याद रखे जाएंगे तरुण गोगोई

अपने जीवन के लिए दो महीने तक लंबी लड़ाई के बाद असम के तीन बार के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने सोमवार को 86 वर्ष की आयु में राज्य की राजधानी शहर के गौहाटी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल (जीएमसीएच) में अंतिम सांस ली। गोगोई के देहांत से असम की राजनीति में जो शून्य पैदा हुआ है उसकी भरपाई आसानी से नहीं होगी। असम के मुख्यमंत्री के पद पर पंद्रह सालों तक रहने वाले गोगोई का नाम इतिहास के पन्नों में एक ऐसे दूरदर्शी राजनेता के तौर पर अंकित रहेगा जिन्होंने असम को उग्रवाद के अंधेरे से बाहर निकालकर सुशासन का उदाहरण कायम किया।
गोगोई का जन्म 1 अप्रैल, 1934 को असम के जोरहाट जिले के रंगाजान टी एस्टेट में एक आहोम परिवार में हुआ था।
तरुण गोगोई ने लोकसभा के सांसद के रूप में छह कार्यकाल पूरे किए। उन्होंने पहली बार 1971-85 में जोरहाट सीट का प्रतिनिधित्व किया। 1976 में प्रधान मंत्री इंदिरा गांधी के नेतृत्व में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के संयुक्त सचिव चुने जाने के बाद गोगोई राष्ट्रीय कद के साथ नेता बन गए। बाद में उन्होंने प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व में अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (1985-90) के महासचिव के रूप में कार्य किया।
गोगोई ने प्रधान मंत्री पी. वी. नरसिम्हा राव के केंद्रीय मंत्रिमंडल में खाद्य और प्रसंस्करण उद्योग विभाग में केंद्रीय राज्य मंत्री (1991-96) के रूप में कार्य किया।
गोगोई असम विधान सभा के विधायक (एमएलए) के रूप में चार बार चुने गए। उन्होंने 1996-98 में पहली बार मार्घेरिटा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। गोगोई 2001 से तीताबर निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते रहे।
तरुण गोगोई 2001 में असम के मुख्यमंत्री चुने गए थे। उन्होंने राज्य चुनावों में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का नेतृत्व किया था। उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में राज्य में लगातार तीन बार चुनावी जीत हासिल करते हुए पार्टी का नेतृत्व किया।
असम में तीन दिन के शोक की घोषणा करते हुए मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल ने गोगोई के मार्गदर्शन को याद करते हुए कहा कि उन्हें लगता है कि उन्होंने पिता को खो दिया है। सोनोवाल ने अपने सारे कार्यक्रम रद्द कर दिये थे और डिब्रूगढ़ से वापस लौटकर गोगोई से मिलने अस्पताल पहुंचे थे। यह असमिया संस्कृति की खूबसूरती ही है कि राजनीतिक विरोध के बावजूद दो पीढ़ी के नेता के बीच ऐसा अपनेपन का रिश्ता नजर आता है।
नेहरू-गांधी परिवार के एक वफादार नेता गोगोई ने असम के विकास की योजना के लिए अपने राजनीतिक अनुभव का इस्तेमाल किया। मुख्यमंत्री के रूप में उनके पंद्रह वर्षों में से दस वर्ष केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के साथ गुजरे थे।
गोगोई ने लोगों की नब्ज समझी और उसी के अनुसार फैसले लिए। गोगोई चाहते थे कि कांग्रेस राज्य में प्रमुख राजनीतिक ताकत बनी रहे और अन्य समुदाय-आधारित समूहों पर निर्भर नहीं रहे।
गोगोई के अंतिम कार्यकाल में असंतोष देखा गया और हिमंत विश्व शर्मा ने भाजपा में शामिल होने के लिए पार्टी छोड़ दी। गोगोई को भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के हाथों 2016 के चुनावों में हार मिली।
तीन बार असम के मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले तरुण गोगोई पेशे से वकील थे। वह 1960 के दशक के उत्तरार्ध में असम बार काउंसिल के सदस्य थे, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री ने गोगोई में एक राजनेता को देखा और उन्हें 1971 के चुनाव के लिए लोकसभा का टिकट दिया।
“तरुण गोगोई असम और पूर्वोत्तर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए एक महान राजनीतिज्ञ थे। 1971 से वह दिल्ली में असम की आवाज़ बन गए थे,” गोगोई की अधिकृत जीवनी तरुण गोगोई: द इनसाइड स्टोरी ऑफ़ ए ब्लंट पॉलिटिशियन के लेखक वासबीर हुसैन ने कहा।
उन्होंने कहा, ” इंदिरा गांधी ने उन्हें चुना था और 1969 में जब कांग्रेस का विभाजन हुआ तो उन्होंने श्रीमती गांधी का साथ दिया। एक युवा कांग्रेस सांसद के रूप में उन्होंने संसद में असम के मुद्दों को सशक्त रूप से व्यक्त किया। वह असम के हितों के लिए इतने जागरूक थे कि उन्होंने कभी-कभी पार्टी लाइन को लांघना शुरू कर दिया था, ”हुसैन ने कहा।
राजनीतिक टिप्पणीकार सुशांत तालुकदार के अनुसार गोगोई के शासन के 15 वर्षों में असम ने दशकों की हिंसक उथल-पुथल को पीछे छोड़ दिया। “गोगोई का मानना था कि शांति और विकास एक साथ चलना चाहिए। सीएम के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान शांति असम में लौट आई। इसके अलावा, राज्य ने शिक्षा और स्वास्थ्य में काफी प्रगति की,” उन्होंने कहा।
तालुकदार ने 1998-2001 में अज्ञात और ज्यादातर नकाबपोश लोगों द्वारा उल्फा सदस्यों के कई करीबी रिश्तेदारों की हत्याओं का जिक्र करते हुए कहा, “उन्होंने असम में गुप्त हत्याओं का सिलसिला खत्म किया।” 2001 में, गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस ने हत्याओं को असम गण परिषद के खिलाफ एक प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाया था।
“वह कानून के शासन में विश्वास करते थे। उनके अधीन एकीकृत कमान संरचना ने बहुत अच्छा काम किया – और जिसके कारण राज्य में शांति की वापसी हुई। यदि किसी जिला के एसपी ने कुछ संदिग्ध कार्य करने की कोशिश की, तो वह इसका समर्थन नहीं कर सकते थे। मुख्यमंत्री के रूप में तरुण गोगोई ने कभी किसी से कुछ भी अवैध करने या किसी का पक्ष लेने के लिए नहीं कहा, ”1985 बैच के एक आईएएस अधिकारी एम जी वी के भानू ने कहा। उन्होंने मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव के रूप में गोगोई के अधीन काम किया था।
कई चुनौतियों को पार करते हुए गोगोई ने असम में तीन बार कांग्रेस को जीत दिलाई। उन्होंने कहा, ‘वह ऐसे समय में असम में कांग्रेस का नेतृत्व करने की जिम्मेदारी निभा रहे थे, जब पार्टी सबसे कमजोर थी। लेकिन तरुण गोगोई ने ऐसा किया, जिससे पार्टी को 2001 के विधानसभा चुनावों में जीत मिली। वह लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे, ”हुसैन ने कहा।
भानु के अनुसार, गोगोई ने जो कुछ अलग किया, वह यह था कि “उन्होंने व्यक्तिगत संपत्ति के निर्माण के लिए कभी परवाह नहीं की”। “2001 में जब वह मुख्यमंत्री बने,  एक व्यापारी एक ब्रीफकेस के साथ उनके कार्यालय में आया और कहा कि वह उपचुनाव के लिए योगदान करना चाहता है। गोगोई सर हँसे, और कहा, मुझे इस पैसे की आवश्यकता क्यों होगी? मैं वैसे भी जीतूंगा। उन्होंने पैसे लौटा दिए,” भानु ने कहा।
गोगोई की देखरेख में असम के राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को तैयार करने का काम 2010 में एक पायलट प्रोजेक्ट के साथ शुरू हुआ, जो निरस्त हो गया। 2012 में, गोगोई की सरकार ने “विदेशियों के मुद्दे पर श्वेत पत्र” प्रकाशित किया, जो राज्य में अवैध प्रवास और इसके खिलाफ उठाए गए कदमों पर एक रिपोर्ट थी।

(दिनकर कुमार ‘द सेंटिनेल’ के संपादक रहे हैं। आप आजकल गुवाहाटी में रहते हैं।)

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This post was last modified on December 3, 2020 3:36 pm

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