Monday, April 15, 2024

मेहनती लोगों के दुःख दर्द से दूर धन्ना सेठों को खुश करता बजट

किसी भी देश का बजट आने वाले साल के सरकारी आमदनी और खर्चे का एक आकलन होता है और सरकारी मंशाओं का एक ब्यौरा। दिमागी गुलाम या मूर्खों की बात छोड़ दी जाये तो समाज का हर तबका स्वाभाविक तौर पर बजट को इस नज़र से देखता है कि उसकी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने के लिए या उसके ज्वलंत समस्याओं के हल के लिए बजट में क्या किया जाना चाहिए था और क्या किया गया है। हम इस बजट पर मेहनत करने वाले लोगों के नज़रिए से ही अपनी राय रखेंगे।

बजट पर विस्तार में राय रखने से पहले, एक सीधी सी बात जानकारी के लिए, इस साल सरकार बजट में कुल 45 लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी। यदि देश की आबादी 130 करोड़ मानें तो प्रतिव्यक्ति 34/35 हज़ार रुपये खर्च होगा। औसत 5 आदमी का परिवार मानें तो 26 करोड़ परिवारों पर यह राशि पौने दो लाख रुपया प्रति परिवार की दर से खर्च होगी। यह भी मान लिया जाये कि इस राशि का आधा पैसा देश को चलाने के काम-काज में खर्च होता होगा तो भी प्रति परिवार शेष 85000 रुपये की राशि बांट दी जाये तो लोगों की ज़िन्दगी में बहुत फर्क पड़ सकता है। लेकिन वर्तमान सरकार को इसकी चिंता हो तब न।

देश के मजदूर और किसान उम्मीद कर रहे थे कि बजट में उनकी कमाई या नौकरी, दवाई, पढ़ाई की हालत बेहतर बनाने के लिए कुछ कदम उठाये जायेंगे। आइये एक-एक करके सरकारी बयानों को मेहनती तबकों की उम्मीदों पर कसा जाए।

किसानों को क्या मिला?

संयुक्त किसान मोर्चा ने याद दिलाया है कि सरकार वादे के अनुसार किसानों की जो औसत प्रति परिवार आय वर्ष 2016 (घोषणा का वर्ष में) 8000 रुपये प्रतिमाह थी वो 2022 में बढ़कर 21000 रुपये प्रतिमाह हो जाना चाहिए थी। पर आज का कड़वा सच है कि यह आय अब भी केवल 12400 रुपये प्रति परिवार प्रतिमाह (अनुमानित) है। 13000 रुपये सालाना की लक्षित वृद्धि में से केवल 4400 रुपये की वृद्धि हासिल हो पाई है। किसानों के साथ बाकी 8600 रुपये का सालाना का धोखा क्यों हुआ। किसान उम्मीद कर रहे थे कि सरकार बताएगी कि इस घटत का क्या कारण है और इस वादे को पूरा करने के लिए सरकार क्या कर रही है। लेकिन सरकार की इस मामले में बेईमानी उजागर न हो इसलिए सरकार ने इस पर कोई जानकारी ही नहीं दी है। केंद्रीय बजट किसानों की आय को दोगुना करने पर मौन है। बजट में कोई आंकड़े नहीं दिए गए हैं।

और आज जब देश की तकरीबन आधी आबादी यानि करीब 13 करोड़ परिवार खेती पर निर्भर है तो सरकार ने खेती और ग्रामीण विकास पर केवल 3.82 लाख करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान किया है। यानि बजट के कुल अनुमानित 45 लाख करोड़ के खर्चे का केवल 8 प्रतिशत या केवल 30000 रुपये प्रति परिवार दिया गया है। तुलनात्मक रूप से किसानों की हिस्सेदारी 85000 रुपये प्रति परिवार बनती है (देखें पैरा 2 ऊपर) आधी किसान आबादी के लिए देश के बजट का इतना कम हिस्सा किसानों के साथ धोखा न कहा जाए तो क्या कहा जाये।

आज खेती में लगे किसानों और मजदूरों की आमदनी में बढ़ोत्तरी करके ही खेती में गतिशीलता लाकर ही जन-कल्याणकारी विकास के बंद दरवाज़े खोले जा सकते हैं। और खेती में गतिशीलता लाने के लिए जरूरी है कि सरकार कम से कम खेती में भारी मात्रा में (यानि कम से कम 10 लाख करोड़ रुपया जो किसानों का देश के बजट में मोटा मोटी तुलनात्मक हिस्सा बनता है) पैसा आवंटित करे, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर अमल करे। खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए भारी पैमाने पर कृषि शोध में निवेश करे। सिचाईं सुविधाओं और एक फसली जमीन को दो फसल उत्पादित करने लायक बनाने पर निवेश करे। पर ये सब इस जनविरोधी सरकार की चिंता के विषय नहीं हैं।

बेरोज़गारी से निपटने के लिए क्या किया?

दूसरे नंबर पर बेरोज़गारी इस देश के बड़े तबके की समस्या है। लेकिन इसके बारे में भी सरकार चिंतित नहीं है। सरकार महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) जो ग्रामीण श्रमिकों को महत्त्वपूर्ण आय समर्थन प्रदान करती है, के लिए आवंटन को जबर्दस्त रूप से कम कर रही है। 2022 में मनरेगा के लिए बजट आवंटन 73000 करोड़ रुपये था। लेकिन ग्रामीण बेरोजगारी और बढ़ती मांग के सामने सरकार को मजबूरन 90000 करोड़ रुपये खर्च करना पड़ा था।

आज जब सामान्य अर्थव्यवस्था और विशेष रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है, यह अकल्पनीय है कि सरकार ने मनरेगा के आवंटन में 30000 करोड़ रुपये की कटौती करके 600000 करोड़ रुपये कर दिया है। हिंदुस्तान के गांवों में रह रहे करोड़ों लोग अपने रोजगार के लिए जिस मनरेगा योजना पर निर्भर है, उसके लिए आवंटित राशि बढ़ती महंगाई और लचर विकास के बावजूद, कम करके सरकार ने आम लोगों के साथ दूसरा बड़ा धोखा किया है। शहरी बेरोज़गारी में कटौती करने के लिए तो बजट में कोई घोषणा ही नहीं है।

यहां यह भी याद दिलाना उचित होगा कि सरकार अपने भिन्न महकमों में 10 लाख से ज्यादा खाली पदों को भरने में आना-कानी कर रही है।

खेती का नकार और बेरोज़गारी में मदद के लिए मनरेगा के आवंटन में कटौती का एक ही उद्देश्य दिखता है कि गांवों से शहरों की ओर पलायन बढ़े। मोदी के दोस्त उद्योगपतियों को सस्ते -सस्ते मजदूर मिले।

यही बेईमानी आम लोगों के लिये पढ़ाई और दवाई की सुविधाओं के मामले में भी की गयी है। शिक्षा में केवल 1 लाख 13 हज़ार करोड़ रुपये और स्वास्थ्य के लिए केवल 89 हज़ार करोड़ रुपये दिए गए हैं। इतनी कम राशि इन दोनों विकराल समस्याओं के लिए बिलकुल नकाफी साबित होंगे।

इसी तरह जब भारत में भूख की समस्या विकराल रूप लिए हुए है खाद्य सब्सिडी में 90 हज़ार करोड़ रुपये की कमी की गई है। वैश्विक भूख सूचकांक भारत को 121 देशों में से 107वें स्थान पर रखता है। एक विशाल बहुमत के पास पौष्टिक भोजन तक पहुंच नहीं है। भूख संकट को दूर करने के लिए बजट में एक गंभीर पहल होना चाहिए था, फिर भी हम खाद्य सब्सिडी में भारी कटौती देखते हैं।

तो फिर सरकार किस पर मेहरबान है?

साफ़ है कि बजट आम मेहनती लोगों की समस्याओं को हल करने की बजाए लोगों की बदहाली को ही बढ़ाएगा। तो फिर सवाल उठता है कि ये बजट किसके लिए है।सच कहें तो इस बजट में सारा फायदा मोदी प्रिय बड़े उद्योगपति और उच्च मध्यम वर्ग को ही दिया गया है।

बजट में वर्णित नया आयकर ढांचा कहने को तो कम आय वालों को आयकर में कुछ छूट देता है पर वास्तव में वह उच्च आय वर्ग द्वारा दिए जाने वाले आय कर की दर में ही भारी कटौती करता है। छूट के हिसाब को बरीकी से देखने से पता चलता है कि आयकर के दर में कमी से 5 करोड़ रुपये सालाना से ऊपर कमाने वालों को 20 लाख रुपया सालाना से ऊपर के इनकम टैक्स में फायदा होगा। शायद यही कारण है की सरकार तो क्या विपक्ष के नेता भी बजट के इस पहलू के बारे में जोर से नहीं बोल रहे हैं।

बजट में एक और दावा जोर शोर से किया गया है कि 13 लाख 70 हज़ार करोड़ रुपये देश के विकास के लिए नयी संपत्ति बनाने के लिए खर्च किया जायेगा। लेकिन ये पैसा आम लोगों की जरूरत के संसाधन जैसे-सिंचाई, खेती में उत्पादकता बढ़ाने के लिए शोध कार्यों या स्कूल या अस्पताल या पुस्तकालय आदि बनाने के लिए नहीं खर्च किया जायेगा। यह पैसे हवाई अड्डे, सड़क निर्माण (ग्रामीण सड़क नहीं राष्ट्रीय राज मार्ग, जिस पर कारों के मालिक फर्राटे से चल सकें) आदि पर खर्च किया जायगा। इसका फायदा धनी तबकों को ही होगा। गरीब मेहनती लोगों को तो नुक्सान ही होता है। देश में जगह-जगह बिना उचित पैसे दिए ली जा रही ज़मीनों पर किसान, नागरिक गुस्सा इस नंगे सच का सबूत है।

संक्षेप में कहा जाए तो यह बजट एक दम्भी जनविरोधी सरकार का ऐसा चिट्ठा है जिससे कोई उम्मीद नहीं की जा सकती।

बजट सरकारी मंशा के बारे में क्या इशारा करता है ?

एक बात और जो गौर की जानी चाहिए..2024 में चुनाव के मद्देनज़र उम्मीद थी कि सरकार कुछ लोक लुभावन नीतियों का सहारा लेगी। लेकिन सरकार आमजन के महत्व के मुद्दों पर जो बेहयाई दिखाई है उससे लगता है कि अगला चुनाव सरकार लोक भलाई के मुद्दे पर नहीं बल्कि उग्र हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम विरोध की ज़हरीली राजनीति पर लड़ना चाहती है जिसे नाकामयाब करना हर जागरूक भारतीय की जिम्मेदारी है।

(रवींद्र गोयल दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं।)

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