भय भ्रष्टाचार का मामला और संवैधानिक नैतिकता का सवाल

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सामने, बिल्कुल सामने 2024 लोकसभा के लिए आम चुनाव घोषित है। आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) ‎ लागू है। संवैधानिक संस्थाएं चुनाव संघर्ष के लिए समान अवसर (Level Playing Field)‎ बनाने की शासकीय हैसियत और दायित्व के प्रति लापरवाह दिखती है। मीडिया में बहस और लाइव प्रसारण का पलड़ा एक तरफ झुका हुआ है। तथ्य विलोपन और तथ्यों के भ्रमाच्छादन की शासकीय प्रवृत्ति को कहीं से कोई चुनौती नहीं है।

राजनीतिक दल केंद्रीय चुनाव आयोग (ECI) के सामने शिकायती प्रतिवेदन जमा किये जा रहे हैं। धरना-प्रदर्शन हो रहा है। गिरफ्तारी और रिहाई भी हो रही है। विपक्षी खेमों के दो-दो मुख्यमंत्री हिरासत में हैं। कानूनी प्रक्रिया जारी है। एक मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा न देने पर अड़े हुए हैं और जेल से अपना शासकीय काम कर रहे हैं। भ्रष्टाचार-भ्रष्टाचार के राग-अनुराग की लपकी-झपकी जारी है। रह-रहकर संवैधानिक नैतिकता का सवाल उठता है और पछाड़ खाकर गिर रहा है। आशंकाएं ‘फलीभूत’ हो रही हैं।

आबकारी नीति से संबंधित शराब घोटाला के मामले में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की गिरफ्तारी की स्थिति में लोगों को एक स्वाभाविक उम्मीद थी कि वे इस्तीफा दे देंगे। अरविंद केजरीवाल इस समय न्यायिक हिरासत ‎में हैं। उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। छः महीने जेल में रहने के बाद, इस बीच आम आदमी पार्टी के नेता और सांसद (राज्य सभा), संजय सिंह को माननीय अदालत ने जमानत पर सशर्त ‎ रिहा कर दिया है।

अपनी रिहाई के बारे में या अपने ऊपर चल रहे मुकदमा के बारे में सार्वजनिक अवसरों पर चर्चा करने और मुंह खोलने ‎की अदालती मनाही का सम्मान करते हुए वे राजनीतिक साहस के साथ प्रभावी ढंग से शराब घोटाला पर ‎चर्चा कर रहे हैं। उनकी ‘चर्चा’ से राजनीतिक माहौल एकदम गरमा गया है। वे बार-बार जोर देकर कह रहे हैं शराब घोटाला भारतीय जनता पार्टी ने किया है। संजय सिंह  बार-बार जोर देकर कह रहे हैं‎ कि अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा नहीं देंगे।

अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा के मामले में आम आदमी पार्टी के रुख से भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक परेशानी बढ़ गई है। पिछले दस साल के भारतीय जनता पार्टी के राज में नागरिक जीवन की स्वाभाविकता पर छाये हुए शासकीय संकटों का दबाव इतना बढ़ गया है कि नैतिकता का हर प्रसंग उस के नीचे दबकर रह गया है। नैतिकता तो नैतिकता, संवैधानिकता का भी कोई प्रसंग अनाहत स्थिति में नहीं है।

भारतीय जनता पार्टी आम आदमी पार्टी की सरकार को बर्खास्त करने की राजनीतिक स्थिति में नहीं ही है। अरविंद केजरीवाल की सरकार की बरखास्त‎गी की कोई कानूनी स्थिति भी नहीं है। भाजपा अदालती आजमाइश कर चुकी है, उस के मंसूबे पूरे नहीं हुए। ऐसी ही मजबूर परिस्थितियों में नैतिकता के सवाल उठा करते हैं, सो उठ रहे हैं। सत्ता और शक्ति की अनैतिकता के शिकार बने व्यक्ति के सामने नैतिकता का सवाल उठाना गैर-वाजिब है। शासकीय हैसियत रखनेवालों के द्वारा सत्ता  और शक्ति का अनैतिक इस्तेमाल करनेवालों से नैतिकता का सवाल किया जाना चाहिए।

माननीय सुप्रीम कोर्ट को ऐसी न्यायिक व्यवस्था को सक्रिय करने पर विचार करना चाहिए कि जानबूझकर, गलत इरादों (Malafide Intentions)‎ से किसी व्यक्ति को किसी सरकारी संस्था के अधिकारियों के द्वारा कानूनी प्रक्रियाओं में उलझाने पर अधिकारियों के विरुद्ध न्यायालय स्वतः कार्रवाई करे। कम-से-कम ऐसे मामलों में अदालतों को अपनी टिप्पणी स्पष्टता से दर्ज करनी चाहिए। इस से न्यायालयों के फैसले पर लोगों का सम्मानजनक भरोसा बढ़ेगा। अदालती फैसलों पर विपरीत टिका-टिप्पणी की अनावश्यकता को लोग समझ और बरत सकेंगे।

इस समय तो माननीय सुप्रीम कोर्ट ही उम्मीद में प्राण भर रहा है। ‘शॉर्ट सर्विस कमीशन’ से महिला अधिकारी की सेवा मुक्ति पर सुनवाई के दौरान ‎भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और ‎न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि न्यायपालिका‎ को ध्वजवाहक बनना ‎होगा और राष्ट्र के साथ चलना होगा। इस बेहद महत्वपूर्ण आम चुनाव में भी ‎स्वतंत्र निष्पक्ष निर्भय एवं दबाव से मुक्त वातावरण में चुनाव संपन्न हो इस के लिए भी न्यायपालिका‎ के ध्वजवाहक बनने और राष्ट्र के साथ चलने की उम्मीद राष्ट्र करता ‎है।  ‎

भूल-चूक किसी से भी हो सकती है, गिरफ्तारी का अधिकार रखनेवाले अधिकारी के अधिकार प्रयोग में भी भूल-चूक हो ही सकती है। इसलिए संविधान न्यायपूर्ण कर्तव्य निर्वाह के लिए लोक अधिकारियों को संवैधानिक और नैतिक कवच प्रदान करता है। ‎हाल के दिनों में लोक अधिकारियों की निष्पक्षता संदेह में के घेरे में बार-बार आती रही है। भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तू के हवाले से ठीक ही कहा कि मनुष्य राजनीतिक प्राणी है।

प्रसंगवश, कलकत्ता हाई कोर्ट के जज अभिजीत गंगोपाध्याय ने इस्तीफा देकर अरस्तू के सही होने का ही सबूत दिया है। जाहिर है, अरस्तू का अपवाद होने की उम्मीद किसी से नहीं की सकती है। लेकिन, लोक हर लोक अधिकारी से यह उम्मीद अवश्य करता है कि लोक अधिकारी के रूप में शासकीय हैसियत से काम करते समय वह अपने राजनीतिक रुझान को परे रखे। दुखद है कि इस या उस कारण से अधिकतर लोक अधिकारी बहुत मुश्किल से ही इस लोक उम्मीद पर खरा उतर पाते हैं।

लोक अधिकारियों का लोक की उम्मीद पर खरा नहीं उतरना एक विचित्र स्थिति है। इस विचित्रता के खतरे हमारे लोकतंत्र की बुनियाद को खोखला कर रहे हैं। संविधान निर्माताओं को इस खतरे का एहसास था। हमारे संविधान निर्माताओं में से अधिकतर वकील थे। वे कानून की संवेदनशीलता को अपने लहजे से और कानूनी पेचीदगियों को अपने अनुभव से जानते थे। इतना ही नहीं ब्रिटिश शासन में कानून के लंबे हाथ और पेचीदगियों की कृपा से जेल से भी हो आने का समृद्ध अनुभव रखते थे। लिए उन्होंने ‎‘शक्ति के पृथक्करण के सिद्धांत’‎ को संवैधानिक व्यवहार का हिस्सा बनाते हुए जांच और संतुलन (Check and Balance)‎ की भी संवैधानिक व्यवस्था की।

कोई विधिवत निर्वाचित मुख्यमंत्री हो या जनप्रतिनिधि हो उस पर किसी मामले में आरोप लगना लोकतंत्र में बिल्कुल स्वाभाविक है। मिली-भगत (Quid Pro Quo) के चलते नीति निरुपण में भ्रष्टाचार की बहुतेरी आशंकाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है, खासकर इलेक्ट्रॉल बांड के खुलासे के बाद तो बिल्कुल नहीं। इसलिए, ऐसे आरोपों की विधिवत जांच होना भी अनिवार्य है। लेकिन किसी मामले में जन और जनप्रतिनिधियों की ‎लापरवाह गिरफ्तारी बहुत संवेदनशील और भूल-चूक की आशंकाओं से भरा मामला होता है।

सामान्यतः राजनीतिक कारणों से जनप्रतिनिधियों को और अन्य कारणों से आम आदमी को उलझाने और परेशान करने के लिए कानूनी प्रावधानों का इस्तेमाल हथियार की तरह नहीं किया सकता है। लेकिन, ऐसा करने के प्रचलन के  बढ़ते जाने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। इस प्रचलन की बढ़ती प्रवृत्ति पर अंकुश तभी लग सकता है, जब जांच एजेंसियों के अधिकारीगण निष्पक्ष होकर काम करने के अपने प्राथमिक दायित्व का निर्वाह करें। सामान्यतः, किसी की गिरफ्तारी से गिरफ्तार व्यक्ति के सारे क्रिया-कलाप ठप हो जाते हैं।

अभी जिस ढंग से आम आदमी पार्टी के नेता और सांसद (राज्य सभा) की जमानत का प्रवर्तन निदेशालय ने कोई विरोध नहीं किया, शायद सबूतों के अभाव में, एक नजीर है। खैर, अभी जांच जारी है। जांच एजेंसियों अधिकारियों का सरकार के इशारे पर या किन्हीं अन्य कारणों से अपने प्राथमिक दायित्व के पालन से पीछे हटना या आगा-पाछा करना बहुत दुर्भाग्यजनक है। लोक दृष्टि से यह दुर्भाग्यजनक स्थिति ओझल नहीं है।

अरविंद केजरीवाल के इस्तीफा के मामले में आम आदमी पार्टी के रुख से असहमत लोग संवैधानिक नैतिकता की बात उठा रहे हैं। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी को राजनीतिक मामला माननेवाले सामान्य नागरिक की राजनीतिक सहानुभूति आम आदमी पार्टी और अरविंद केजरीवाल के प्रति दिखने लगी है। यह दिखती हुई सहानुभूति और दहाड़ती हुई पार्टी से भारतीय जनता पार्टी का चुनावी समीकरण बिगड़ रहा है।

आम आदमी पार्टी के समर्थकों और कार्यकर्ताओं में भरपूर राजनीतिक उत्साह है। आम आदमी पार्टी और उस के नेताओं और कार्यकर्ताओं के राजनीतिक उत्साह की तारीफ करनी ही पड़ेगी। नेताओं पर जब इतना दबाव है तो दूसरी-तीसरी-चौथी पंक्ति के नेताओं पर दबाव पैदा नहीं किया गया होगा यह मानना किसी के लिए भी मुश्किल होगा। ध्यान देने की बात है कि दूसरी-तीसरी-चौथी पंक्ति के नेताओं ‎और कार्यकर्ताओं दबाव झेलने में कामयाब रहे हैं अब तक।

प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate) की सफलता और विफलता दर की कहानियां और उसके पीछे के कारणों की बात अपनी जगह है। फिलहाल तो यह कि संजय सिंह की जमानत के मामले में इडी (ED) की भूमिका बहुत चौंकानेवाली रही। कहना न होगा कि माननीय सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और सुनवाई करनेवाले न्यायाधीशों की न्यायिक दृढ़ता के बाद हुए इलेक्ट्रॉल बांड के खुलासे ने संवैधानिक और सरकारी संस्थाओं की नैतिकता की कई नई कहानियां सामने आने लगी है। निष्पक्षता और नैतिकता एक ही सूत्र के दो सिरे हैं; अंधकार और प्रकाश की तरह।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इडी (ED) के आमने-सामने और न्यायिक हिरासत में हैं। मुख्यमंत्री, हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी को आदिवासी अस्मिता और अपमान से जोड़ते हुए संबंधित इडी (ED) अधिकारियों के खिलाफ एससी एसटी अधिनियम (SC ST Act) ‎के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज है।

पश्चिम बंगाल में जांच अधिकारियों के व्यवहार और उन के साथ हो रहे दुर्व्यवहार की घटनाएं भी कोई कम चिंताजनक नहीं है। सत्ता परिवर्तन की स्थिति में विधायिका और कार्यपालिका में एक भिन्न और अवांछित किस्म की रस्साकशी की आशंकाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है। सत्ता परिवर्तन न होने की स्थिति में विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों के बीच के संवैधानिक संबंधों के सहज रहने की संभावना के कम होने से भी इनकार नहीं किया जा सकता है।

लोकतंत्र के तीनों आधारशिलाओं के संवैधानिक संबंध में असहजता की आशंकाओं के प्रति आम नागरिकों की चिंताओं को असंगत नहीं कहा जा सकता है। राजनीतिक आका (पॉलिटिकल बॉस) के दबाव में, राजनीतिक उत्साह में या जिन भी कारणों के चलते  नौकरशाही में से कुछ-कुछ का ही सही, राजनीतिक कार्यकर्ता में बदल जाना लोकतंत्र में एक बड़ी दुर्घटना की तरह इतिहास में दर्ज होगा। एक बात साफ-साफ समझ में आ रही है कि अशांति के खतरे दोनों तरफ हैं, लेकिन निकास का उपाय सिर्फ सत्ता परिवर्तन में है।  

इस अनैतिक समय में संवैधानिक नैतिकता बहुत गंभीर मामला है। इस पर बात की जानी चाहिए। अरविंद केजरीवाल तो अपनी गिरफ्तारी की संवैधानिकता पर ही सवाल उठा रहे हैं, वे अपनी गिरफ्तारी के गैर-कानूनी होने की बात कह रहे हैं। उन्होंने जमानत पाने का नहीं गिरफ्तारी को गैर-कानूनी घोषित करने का मामला दायर किया है। मामले की सुनवाई पूरी हो चुकी है। फैसला सुरक्षित है, अभी सार्वजनिक नहीं हुआ है। अदालत के फैसले का इंतजार है।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने मुख्यमंत्री पद से अरविंद केजरीवाल को हटाये जाने के मामले में अपना रुख कई बार स्पष्ट कर चुका है। अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी की वैधता पर माननीय अदालत के फैसले का इंतजार है। वैसे तो नैतिकता के सवालों को अदालती फैसलों का इंतजार नहीं किया जाता है। लेकिन यह मामला भिन्न चरित्र का है। भारत में जब कभी संवैधानिक नैतिकता का मसला भारत की राजनीति में उठेगा इस मामले का संदर्भ जरूर लिया जायेगा। इसलिए इस मामले के नैतिक पक्ष पर बार-बार विचार करने की जरूरत है।  

बहुलता भारत की संस्कृति की बुनियाद है। इस अर्थ में स्वतंत्रता, नैतिकता और ‎अस्मिता पर बहुसंख्यकवाद के वर्चस्व का खतरा भी सदा बना रहा है। ‎बहुसंख्यकवाद के वर्चस्व  के खतरों को नियंत्रण में रखने के लिए बहुमत के प्रभुत्व ‎का सहारा लिया गया। इसी अर्थ में भारत ‎‘मदर ऑफ डेमोक्रेसी’‎ है। ‎’बहुसंख्यकवाद’ और ‘बहुमत के प्रभुत्व’ के अंतर को समझना जरूरी है। सारे ‎अधिसंख्यक लोगों का मिलकर कमसंख्यक लोगों को दबाव में लेना बहुसंख्यकवाद ‎है। बहुसंख्यकवाद की नकारात्मकताओं से बचने के लिए तर्कशील चयन पद्धति को अपनाते हुए निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के ‎बहुमत के प्रभुत्व को महत्व दिया जाता रहा है।

पिछले सालों में विकसित हुई दो प्रवृत्तियां ‎गौर करने लायक हैं। पहली यह कि सामाजिक बहुलता की जनप्रातिनिधकता में ‎असंतुलन की स्थिति बन रही है। दूसरी यह कि संसदीय अल्पमत की ही अवहेलना ‎नहीं, बहुमत के प्रातिनिधिक अवयव को भी दरकिनार करते ‎हुए प्रधानमंत्री बहुसंख्यक के वर्चस्व को संपोषित और संबोधित करते रहते हैं। कांग्रेस के घोषणापत्र ‎‎(न्यायपत्र) पर अतार्किक और भ्रामक टिप्पणी करने से उन्हें न कोई नैतिकता ‎रोकती है और न आदर्श आचार संहिता ही रोकती है!

प्रधानमंत्री को कांग्रेस के घोषणापत्र (न्यायपत्र) पर तार्किकता के साथ टिप्पणी करनी होती तो उन मुद्दों की बात करते जो उनकी नीतियों के विपरीत और विरुद्ध हैं, जैसे जाति-गणना और आर्थिक सर्वेक्षण के साथ संपत्ति के वितरण में संतुलन या राष्ट्रीयकरण आदि की बातें। लेकिन नहीं, उनका संकल्पपत्र जितना संकल्प घोषित करता है, उस से अधिक और इतर वे खुद घोषित करते हैं। चुनाव के माहौल में तो उनका पूरा व्यक्तित्व ही साक्षात घोषणा-पत्र और पवित्र आरोप-पत्र में बदल जाता है।  

नैतिक और अनैतिक विचार ‎में सम्यक संतुलन के लिए बहुआयामी तुलनाओं की अनिवार्य अपरिहार्यता को ‎दरकिनार नहीं किया जा सकता है। ‎न्याय-प्रियता शासकीय नीति और व्यक्ति की ‎चारित्रिक न्याय निष्ठता के साथ परिस्थिति की विलक्षणताओं से भी संबंधित ‎होती है। भारत के लोकतंत्र की शासकीय नीति की गति-मति ने नैतिकता की धुरी ‎को क्षतिग्रस्त कर दिया है। इसलिए नैतिकता का हर सवाल अपनी वैधता की ‎शून्यता में समाहित होता जा रहा है। ऐसे में नैतिकता का सवाल ही अनैतिक-सा ‎हो गया है। ‎

भय भ्रष्टाचार का मामला और संवैधानिक नैतिकता ‎का सवाल महत्वपूर्ण है। लेकिन, याद रहे संवैधानिक सत्ताओं पर राजनीतिक दखल की राजनीति में कानून और नैतिकता का इस्तेमाल हथियार की तरह किया जाना लोकतंत्र में ‎ कभी शुभ नहीं होता है। अंततः लोकतंत्र का शुभ लोक ही सुनिश्चित करता है। लोकतंत्र के शुभ को सुनिश्चित करने का बहुत महत्वपूर्ण अवसर चुनाव होता है। याद रखना जरूरी है कि आपदा है तो अवसर भी है। तत्पर तो रहना ही होगा कि अवसर न चूके। कहते हैं कि डाल के चूके बंदर और अवसर के चूके मनुष्य की दुर्गति का कोई ठिकाना नहीं रहता है, इसलिए बस अवसर न चूके।  

(प्रफुल्ल कोलख्यान स्वतंत्र लेखक और टिप्पणीकार हैं)

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