Saturday, February 4, 2023

गणतंत्र दोराहे पर: 26 जनवरी के मूल्य बनाम 30 जनवरी के हत्यारे गिरोह के मंसूबे

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26 जनवरी और 30 जनवरी हमारे राष्ट्रीय इतिहास की दो अहम तारीखें हैं- 26 जनवरी, हमारा गणतंत्र दिवस, उन मूल्यों की याद दिलाता है जिनके लिए आज़ादी की जंग लड़ी गयी और 30 जनवरी, जिस दिन उस ऐतिहासिक लड़ाई के सर्वोच्च नेता की हत्या की गई।

आज देश एक दोराहे पर खड़ा है। देश के सामने मुंह बाए खड़ा अब यह कोई काल्पनिक प्रश्न नहीं है कि 26 जनवरी जिन मूल्यों की प्रतीक है- इंसाफ, स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व-की, देश उस राह पर बढ़ेगा या 30 जनवरी, ’48 को गांधी के हत्यारों के जो मंसूबे थे, उस मंजिल की ओर बढ़ेगा और गणतंत्र की कब्र पर भारत एक फासीवादी हिन्दूराष्ट्र बन जाएगा?

भारत एक संवैधानिक लोकतन्त्र बना रहेगा या एक majoritarion अधिनायकवाद की राह पकड़ेगा? क्या हमारे संविधान का वर्तमान स्वरूप बना रहेगा, उसका मूल ढांचा बचा रहेगा?

वैसे तो हमारा संविधान अपनी पूरी स्पिरिट में कभी लागू ही नहीं हो सका, पर आज़ादी की लड़ाई का सारतत्व होने के नाते वह भारतीय जनगण के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई का प्रकाश स्तम्भ और नैतिक सम्बल जरूर बना रहा। उसमें निहित लक्ष्यों, मूल्यों और आदर्शों के fullest realisation के लिए जद्दोजहद अनथक चलती रही है।

सच तो यह है कि मौजूदा निज़ाम ने संविधान में कोई बदलाव किए बिना ही, उसकी आत्मा को रौंद डाला है, उसके सारे मूल्यों, प्रक्रियाओं-प्रावधानों, संस्थाओं को अर्थहीन बना दिया है, अब वे औपचारिक तौर पर भी उससे छुट्टी पा लेने की तैयारी में हैं ताकि full-fledged फासीवाद के राजमार्ग पर निर्बाध बढ़ सकें।

हाल ही में उपराष्ट्रपति धनखड़ तथा केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू के बयान गवाह हैं कि जो खेल पर्दे की आड़ में गुपचुप ढंग से चल रहा था, अब उसे खुल कर खेलने की तैयारी है।

यह सरकार के सारे अपराधों को संवैधानिक वैधता का जामा पहनाने की कवायद है। Separation of power के तहत जिन तमाम संवैधानिक संस्थाओं को सरकार की निरंकुशता पर check and balance के mechanism के बतौर बनाया गया था, उन्हें लगभग जेबी बना लिया गया है, जो कहीं कहीं कुछ स्वायत्तता बची है उसे भी खत्म करने का अभियान तेज हो गया है।

यह अपहृत हो चुकी संवैधानिक संस्थाओं का इस्तेमाल कर अपने धतकर्मों को justify करने और वैधता हासिल करने की कवायद है। गोदी मीडिया द्वारा इसे उन फैसलों के सही होने के प्रमाणपत्र के बतौर पेशकर सर्वोच्च नेता की infallibility के मिथक को भोलीभाली जनता के दिमाग में और गाढ़ा किया जा रहा है। और उल्टे सरकार के गलत फैसलों की आलोचना करने वालों तथा विपक्ष को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है।

दरअसल, 1947 में हमें राजनीतिक आज़ादी मिली और भारत एक संवैधानिक लोकतन्त्र बन गया। लेकिन आज़ाद भारत की यह यात्रा अपने प्रारम्भ से ही गहरे अंतर्विरोधों से भरी थी।

इनकी ओर संविधान ड्राफ्टिंग कमेटी के अध्यक्ष डॉ0 आंबेडकर ने संविधान-सभा के अपने आखिरी भाषण में स्वयं इशारा किया था, “आज हम अंतर्विरोधों भरी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं, जहां राजनीतिक जीवन में बराबरी होगी, लेकिन सामाजिक-आर्थिक जीवन में गैर-बराबरी। आखिर कितने समय तक हम इस अंतर्विरोधों भरे जीवन को जी पाएंगे ? सामाजिक-आर्थिक गैर-बराबरी को अगर हम लंबे समय तक नकारते रहे तो हमारा राजनीतिक लोकतन्त्र भी खतरे में पड़ जायेगा।”, उन्होंने यह भी जोड़ा “संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो, अगर उसे लागू करने वाले खराब निकले, तो संविधान निश्चित रूप से अच्छा साबित नहीं होगा।”

एक दशक के अंदर ही महिला अधिकारों के सवाल पर स्वयं डॉ0 अंबेडकर को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा, केरल में नम्बूदरीपाद की सरकार (जो संसदीय प्रणाली में जनता द्वारा चुनी हुई दुनियां की पहली सरकार थी!) रैडिकल सुधारों के कारण शासकों का कोप-भाजन बनी और बर्खास्त की गई, अयोध्या में तब की बाबरी मस्जिद में मूर्ति रख दी गयी, स्वयं गांधी जी के कड़े disapproval के बावजूद अंग्रेज़ी राज का राजद्रोह कानून बरकरार रहा, Presidential Order से मुस्लिम और ईसाई दलितों को आरक्षण से वंचित किया गया, गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, लेकिन जल्द ही कुछ शर्तों को मानने के नाम पर उसे हटा लिया गया, तेलंगाना सशस्त्र किसान विद्रोह का अभूतपूर्व बर्बरता के साथ दमन किया गया।

साफ है कि राजनीतिक आज़ादी मिल गयी, पर भारतीय राज्य के अंदर गहरी गैर-लोकतान्त्रिक प्रवृत्तियां मौजूद थीं, जो भारतीय राज और समाज पर सामंती-ब्राह्मणवादी दबदबे तथा साम्राज्यवादी पूंजी से गठजोड़ बनाये उदीयमान देशी पूंजीपतियों के भारी प्रभाव का ही प्रतिबिंब थीं। 1975 आते-आते देश में आपातकाल लगा और 19 महीने बाद ही लोकतान्त्रिक अधिकारों की पुनर्बहाली हो सकी। जाहिर है एक सुसंगत लोकतन्त्र बनने के लिए लंबी जद्दोजहद बाकी थी।

जिस तरह भीषण दंगों के बीच धर्म के आधार पर देश के बंटवारे के साथ आज़ादी मिली, उसके चलते भारतीय राज्य साम्प्रदयिकता के सवाल पर सबसे ज्यादा vulnerable था।

करिश्माई राष्ट्रीय नेतृत्व की उपस्थिति और आज़ादी की लड़ाई के महान मूल्यों के दबाव में इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान के बरक्स भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र घोषित जरूर किया गया, परन्तु भारतीय राज्य के व्यवहार में एक उदार हिन्दू राज्य के लक्षण शुरू से ही साफ देखे जा सकते हैं। गांधी जी की हत्या से भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के RSS के प्रोजेक्ट को सामयिक तौर पर धक्का जरूर लगा, लेकिन कालांतर में पाकिस्तान-विरोध के भारतीय राष्ट्रवाद की defining धुरी बनते जाने के साथ राज्य के चरित्र में  communal distortions बढ़ते गए।

राजनीतिक फायदे के लिए धर्म के इस्तेमाल के मध्यमार्गी दलों के राजनीतिक अवसरवाद ने भारत को हिन्दूराष्ट्र बनाने के अनथक प्रयास में लगे RSS की कोशिशों को परवान चढ़ाने में मदद की।

उदारवादी, लोकतान्त्रिक, प्रगतिशील धाराओं के retreat से पैदा अनुकूल (conducive ) माहौल और vacuum का फायदा उठाते हुए साम्प्रदयिक फासीवाद की धारा मजबूत होती गयी तथा कुशल रणनीति के साथ भारतीय राजनीति में व्याप्त अवसरवाद और पतन का इस्तेमाल करते हुए राज्यों से होते केंद्रीय सत्ता तक पहुंच गई।

कालांतर में जैसे जैसे नवउदारवादी अर्थनीति का संकट गहराता गया और कांग्रेस उसे संभाल पाने में अक्षम साबित होती गयी, post- गोधरा ” गुजरात-मॉडल” द्वारा tested हिंदुत्व के फायर ब्रांड नेता नरेंद्र मोदी (जिनके व्यक्तित्व में एक क्लासिक फासीवादी नेता की झलक की चर्चा राजनीतिक विचारक आशीष नन्दी पहले ही कर चुके थे) कॉरपोरेट और हिंदुत्व गठजोड़ के सबसे भरोसेमंद choice के बतौर उभरते गए और PM के रूप में उनके राज्यारोहण का मार्ग प्रशस्त होता गया।

अपने 9 साल के राज में नरेंद्र मोदी कॉरपोरेट और हिंदुत्व प्रतिष्ठान, दोनों के भरोसे पर खरे उतरे। फासीवादी राज्यसंचालन द्वारा जनअसंतोष के दमन और distraction से न सिर्फ वे संकट को manage करते रहे, बल्कि कॉरपोरेट के लिए अकूत मुनाफे के अवसर पैदा करने में उन्होंने कुछ भी उठा नहीं रखा ( इसके फलस्वरूप पैदा आय की अभूतपूर्व असमानता की झलक ताजा ऑक्सफैम रिपोर्ट ने दिखाई है )।

आज़ाद भारत अपनी 75 साल (गणतंत्र की 73 साल) की यात्रा में आज़ादी की लड़ाई के लक्ष्यों, शहीदों के सपनों, संवैधानिक मूल्यों व आदर्शों से इतना दूर कभी नहीं रहा, जितना आज है। मौजूदा निज़ाम ने उसे उल्टी दिशा में एक अंधेरी ढलान पर धकेल दिया है।

30 वर्ष पूर्व, बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद तत्कालीन भाकपा (माले) महासचिव स्वर्गीय विनोद मिश्र द्वारा कहे गए शब्द prophetic साबित हुए हैं, “नियति से साक्षात्कार की राह पर भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है, जहां से एक रास्ता सीधे फासीवादी हिन्दू राष्ट्र की ओर जाता है, और दूसरा, निश्चय ही zig-zag course से होते हुए, एक आधुनिक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र की ओर।”

आज भारतीय जनगण के लिए, तमाम लोकतान्त्रिक शक्तियों, जनान्दोलन की ताकतों के लिए यह गणतंत्र दिवस एक अवसर है गणतंत्र की रक्षा के लिए, गणतंत्र को reclaim करने के लिए अपने को समर्पित करने का। यही आज़ादी और गणतंत्र के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले शहीदों को कृतज्ञ राष्ट्र की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

(लाल बहादुर सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे हैं)

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