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बिरसा मुंडा की शहादत दिवस पर विशेष : “नहीं बदली व्यवस्था, बनी हुई है उलगुलान की जरूरत”

”मैं केवल देह नहीं

मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ

पुश्तें और उनके दावे मरते नहीं

मैं भी मर नहीं सकता

मुझे कोई भी जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता

उलगुलान!

उलगुलान!!

उलगुलान!!!”

‘बिरसा मुंडा की याद में’ शीर्षक से यह कविता आदिवासी साहित्यकार हरीराम मीणा ने लिखी है। ‘उलगुलान’ यानी आदिवासियों का जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी का संघर्ष।

महाश्वेता देवी के उपन्यास ‘जंगल के दावेदार’ का एक अंश है- ”सवेरे आठ बजे बिरसा मुंडा खून की उलटी कर, अचेत हो गया। बिरसा मुंडा- सुगना मुंडा का बेटा; उम्र पच्चीस वर्ष-विचाराधीन बंदी। तीसरी फ़रवरी को बिरसा पकड़ा गया था, किन्तु उस मास के अंतिम सप्ताह तक बिरसा और अन्य मुंडाओं के विरुद्ध केस तैयार नहीं हुआ था….क्रिमिनल प्रोसीजर कोड की बहुत सी धाराओं में मुंडा पकड़ा गया था, लेकिन बिरसा जानता था उसे सज़ा नहीं होगी, डॉक्टर को बुलाया गया उसने मुंडा की नाड़ी देखी। वो बंद हो चुकी थी। बिरसा मुंडा नहीं मरा था, आदिवासी मुंडाओं का ‘भगवान’ मर चुका था।”

आदिवासी और स्त्री मुद्दों पर अपने काम के लिए चर्चित साहित्यकार रमणिका गुप्ता अपनी किताब ‘आदिवासी अस्मिता का संकट’ में लिखती हैं, ”आदिवासी इलाकों के जंगलों और ज़मीनों पर, राजा-नवाब या अंग्रेजों का नहीं जनता का कब्ज़ा था। राजा-नवाब थे तो ज़रूर, वे उन्हें लूटते भी थे, पर वे उनकी संस्कृति और व्यवस्था में दखल नहीं देते थे। अंग्रेज़ भी शुरू में वहां जा नहीं पाए थे। रेलों के विस्तार के लिए, जब उन्होंने पुराने मानभूम और दामिन-ई-कोह (वर्तमान में संथाल परगना) के इलाकों के जंगल काटने शुरू कर दिए और बड़े पैमाने पर आदिवासी विस्थापित होने लगे, आदिवासी चौंके और मंत्रणा शुरू हुई।” वे आगे लिखती हैं, ”अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के वे गांव, जहां वे सामूहिक खेती किया करते थे, ज़मींदारों, दलालों में बांटकर, राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी। इसके विरुद्ध बड़े पैमाने पर लोग आंदोलित हुए और उस व्यवस्था के ख़िलाफ़ विद्रोह शुरू कर दिए।”

अंग्रेजी हुकूमत ने ‘इंडियन फारेस्ट एक्ट 1882’ पारित कर आदिवासियों को जंगल के अधिकार से वंचित कर दिया था। वहीं दूसरी तरफ अंग्रेजों ने ज़मींदारी व्यवस्था लागू कर आदिवासियों के गांवों को ज़मींदारों, दलालों और महाजनों में बांटकर राजस्व की नयी व्यवस्था लागू कर दी थी जिन पर आदिवासी सामूहिक खेती करते थे। इसके बाद से ही शुरू हुआ अंग्रेजों, जमींदारों व महाजनों द्वारा भोले-भाले आदिवासियों का शोषण।

इसी शोषण के खिलाफ बिरसा ने आदिवासियों में विद्रोह की चिंगारी फूंकी और जल-जंगल-जमीन पर दावेदारी से पैदा हुआ उलगुलान। इस उलगुलान को ‘अबुआ दिशुम अबुआ राज’ यानी ‘हमारा देश, हमारा राज’ का यह नारा बिरसा ने जब दिया तब आदिवासियों को लगा जैसे उन्हें उनका भगवान मिल गया।

1894 में छोटा नागपुर में भयंकर अकाल और महामारी फैली। बिरसा ने मात्र 19 साल की उम्र में पूरी तन्मयता और समर्पण के साथ अपने लोगों की सेवा की। उन्होंने लोगों को अन्धविश्वास से बाहर निकल कर बीमारी का इलाज करने के प्रति जागरूक किया। उसी वक्त वे आदिवासियों के लिए ‘धरती आबा’ यानी ‘धरती पिता’ हो गये।

जून का महीना झारखंड के लिए महत्वपूर्ण इसलिए है कि 9 जून को धरती आबा (धरती पिता) बिरसा मुंडा का शहादत दिवस है, अंग्रेजों द्वारा उन्हें 9 जून 1900 को धीमा जहर देकर मार दिया गया था। यही वजह बनती है कि 9 जून को हम बिरसा मुंडा की पुण्य तिथि नहीं शहादत दिवस मनाना जरूरी समझते हैं।

वहीं 30 जून हुल दिवस के रूप में जाना जाता है, क्योंकि 30 जून 1855 को सिदो-कान्हू के नेतृत्व में अंग्रेजों, महाजनों, के खिलाफ एक जोरदार उलगुलान (आंदोलन) हुआ था, जिसमें करीब 20 हजार लोग मारे गए थे।

यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि बिरसा मुंडा का जन्म करमी हातू और सुगना मुंडा के घर में 15 नवम्बर 1875 को वर्तमान झारखंड राज्य के रांची जिले के उलिहातु गांव में हुआ था।

बरसाईत, जो बिरसा के अनुयायी हैं।

बिरसा मुंडा का बचपन ‘होनहार पूत के होत चिकने पात’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रहा था। पढ़ाई में उनकी रुचि के कारण समाज के लोगों ने सुगना मुंडा को राय दी कि बिरसा को अच्छे स्कूल में पढ़ाएं। उस वक्त जर्मन स्कूल नाम का एक स्कूल हुआ करता था, जिसमें तेज तर्रार लड़कों का ही दाखिला होता था, मगर इसके लिए पहली शर्त ईसाईयत स्वीकार करना जरूरी था। जिसे बिरसा को स्वीकार नहीं था और उसने जर्मन स्कूल में पढ़ना स्वीकार नहीं किया।

आदिवासी सामाजिक संस्था के योगो पुर्ती बताते हैं कि ”वे और उनकी टीम 2014 के आखिरी में पश्चिमी सिंहभूम के उस क्षेत्र का दौरा किया था, जहां बिरसा मुंडा अपने आखिरी समय में केयंटाइ गांव और जोंकोपई गांव के बीच की पहाड़ी “कोरोंटेया बुरु” पर पनाह लिए हुए थे। हमने बंदगांव प्रखण्ड के टेबो पंचायत रोगोद (रोग्तो) गांव जो बंदगांव से करीब 25 किमी की दूरी पर है और टेबो से 7-8 किमी दूर पोड़ाहाट के जंगलों के बीच बसा है, सहित जोंकोपाई, कोटागड़ा, संकरा, कुदाबेड़ा, देयाईं, कुकुरूबरू, हलमद, राइगाड़ा आदि का दौरा किया।”

वे बताते हैं कि ”उस वक्त झारखंड विधानसभा का आम चुनाव था, बावजूद इसके क्षेत्र में इसकी कोई सुगबुगाहट तो दूर, कहीं चर्चा तक नहीं थी। गाड़ियों से चुनाव प्रचार तो दूर, कहीं कोई बैनर पोस्टर भी नहीं था। क्षेत्र के लड़कों को कहीं कहीं मैदानी इलाकों में हॉकी खेलते हुए हमने पाया। चूंकि हमें जानकारी मिली थी कि बिरसा मुंडा की पहली गिरफ्तारी रोगोद (रोग्तो) के शंकरा के एक स्कूल से हुई थी, अत: हम लोग उसी गांव में जा रहे थे।”

सिंबुआ पहाड़ की चोटी समतल है। उलगुलान के दिनों में बिरसा मुंडा इसी पहाड़ की चोटी पर यदा-कदा बैठकें किया करते थे। यहां से आधे मील पर सरवादा चर्च है जिस पर बिरसा के अनुयायियों ने एक बार तीर चलाया था। क्योंकि चर्च द्वारा धर्म प्रचार करके यहां के लड़कों को ईसाईयत की ओर प्रभावित करने की कोशिश की गई थी।

संकरा गांव के लोग।

कूदाबेड़ा के पास नदी पार कर दुर्गम जंगल-पहाड़ होते हुए केवल पैदल जाया जा सकता है, साइकिल से भी नहीं जाया जा सकता है। यह रास्ता संकरा होते हुए रोगोत पहुंचता है।

योगो बताते हैं कि आज भी यह क्षेत्र विकास से कोसों दूर है। इन गांवों में जाने के रास्ते काफी दुर्गम हैं। बरसात में यहां की स्थिति तो और भी भयावह हो जाती है।

योगो पुर्ती के अनुसार कोरोंटेया बुरु पहाड़ी के आस पास में करीब 10-12 गांव हैं। इन गांवों में लगभग 200 घर हैं, जिनकी जनसंख्या एक हजार के आस पास होगी।

बताते चलें कि इन तमाम गांव के लोग बिरसा मुंडा के अनुयायी के तौर पर जाने जाते हैं, यही कारण है कि इन्हें बिरसाईत कहा जाता है। ये लोग बिरसा की ही पूजा करते हैं। ये किसी भी तरह का नशा नहीं करते। इन्हें विश्वास है कि एक दिन बिरसा आएगा तब इनके तमाम दुख दर्द समाप्त हो जाएंगे।

बिरसाईत सफेद कपड़ा ही पहनते हैं और अगर इनके घर लड़का पैदा होता है तो ये उसका नाम बिरसा रखते हैं। शायद बिरसा नाम रखने के पीछे बिरसा होने का दर्शन हो सकता है।

बिरसा मुंडा के उलगुलान के संदर्भ में उनके पड़पोते कन्हैया मुंडा ने फोन पर बताया कि ”केवल समय काल में बदलाव हुआ है, व्यवस्थाएं वही हैं, उनका केवल स्वरूप बदला है। उस वक्त ब्रिटिश शासन था, जमींदारी व महाजनी प्रथा थी, जो आज भी नए रूप में हमारे सामने है, जो इस बात की ताकीद करता है कि आज हमें एक नए उलगुलान की जरूरत है।” वे आगे कहते हैं कि ”आजादी के बाद बिरसा मुंडा को राष्ट्रीय पटल पर आजादी की लड़ाई में जो एक क्रांतिकारी का सम्मान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। वहीं झारखंड अलग राज्य बनने के बाद से अब तक केवल उनका राजनीतिक इस्तेमाल हुआ है। आदिवासियों के हक-अधिकार, संस्कृति, सम्मान, शिक्षा, जल, जंगल व जमीन आदि के सवाल आज भी वहीं खड़े हैं। इन्हीं सवालों को लेकर आज एक नए उलगुलान की जरूरत है।”

गांव में जाने का रास्ता।

बता देना होगा कि बिरसा मुंडा के पड़पोते कन्हैया मुंडा (21 वर्ष) योगदा सत्संग महाविद्यालय, जगन्नाथ पुर, रांची में इतिहास के अंतिम वर्ष के छात्र हैं। जब मैंने कन्हैया मुंडा से उनकी एक तस्वीर की मांग की तो उन्होंने बताया कि ”उनके पास बड़ा मोबाइल नहीं है कि वे अपना फोटो भेज सकें। उनकी आर्थिक स्थिति भी ऐसी नहीं है कि वे एन्ड्रोएड खरीद सकें।” उन्होंने बताया कि ”मेरे पिता मंगल सिंह मुंडा पढ़े लिखे नहीं हैं। अत: घर पर ही मजदूरी वगैरह करते हैं और किसी तरह मेरी पढ़ाई हो रही है।”

कन्हैया मुंडा की स्थिति जो तस्वीर पेश कर रही है उसे झारखंड अलग राज्य के मौजूदा परिदृश्य का राजनीतिक दस्तावेज कहा जा सकता है।

कहना ना होगा कि 1895 में बिरसा ने अंग्रेजों के खिलाफ जो लड़ाई छेड़ी वह अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था के साथ-साथ जल-जंगल-ज़मीन की लड़ाई थी। यह मात्र एक विद्रोह नहीं बल्कि आदिवासी अस्मिता, स्वायत्तता और संस्कृति को बचाने के लिए संग्राम था। बिरसा ने सूदखोर महाजनों के ख़िलाफ़ भी जंग का ऐलान किया, ये महाजन गांवों के दलितों, आदिवासियों व अन्य सामाजिक व आर्थिक स्तर से पिछड़ों को कर्ज़ देने के बदले में उनकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लेते थे। यही वजह रही कि बिरसा के उलगुलान में समाज का वह हर तबका किसी न किसी रूप में शामिल रहा, जो अंग्रेजी हुकूमत द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी प्रथा और राजस्व-व्यवस्था से प्रभावित था।

इस कड़ी में फिल्म के माध्यम से लोगों के बीच झारखंडी संस्कृति को परोसने वाले फिल्म निर्माता मेघनाथ बताते हैं कि “बिरसा का उलगुलान केवल आदिवासियों का उलगुलान नहीं था। इस उलगुलान में समाज के उन तमाम लोगों की भागीदारी थी जो ब्रिटिश हुकूमत, जमींदारों व महाजनों से त्रस्त थे। जैसे डोम जाति के लोगों के जिम्मे था ढोल व मांदर बनाना, लोहार के जिम्मे था तीर वगैरह बनाना, मोची के जिम्मे था लड़ाकों के लिए पैरों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर जूते वगैरह बनाना। बिरसा ने एक बेहतर फौजी कमांडर की तरह का सामाजिक ताना बाना तैयार किया था जिसमें आदिवासी गैरआदिवासी सभी साथ थे।“

कहना ना होगा कि अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ होने वाला आदिवासियों और जनजातियों का संग्राम इतिहास की मुख्य और प्रचलित धारा में हमेशा हाशिये पर रखा जाता रहा है। अपने अधिकारों और सम्प्रभुता के लिए किया गया यह संघर्ष आज भी कई रूपों में जारी है। कोई दो मत नहीं कि बिरसा मुंडा के नेतृत्व में चलने वाला ‘उलगुलान’ जिसने अनेक लोक गाथाओं और किंवदंतियों को जन्म दिया, यह एक ऐसा आन्दोलन था, जिसमें राजनीति, समाज और संस्कृति के सभी सूत्र आपस में गुंथे हुए थे।

ऐसे में बिरसा केवल आदिवासियों के महानायक नहीं हैं बल्कि ये जुल्म के खिलाफ होने वाले उन तमाम उलगुलानों के प्रेरक हैं, जिनकी प्रासंगिकता निरन्तर बनी हुई है और बनी रहेगी।

बताते चलें कि इतिहास में आदिवासियों के प्रमुख विद्रोह की शुरुआत 1831-32 में कोल विद्रोह से मानी जाती है, लेकिन कुमार सुरेश सिंह अपनी किताब ‘बिरसा मुंडा और उनका आंदोलन’ में लिखते हैं कि ”भूमि व्यवस्था के बिखराव और सांस्कृतिक जीवन की दोहरी चुनौतियों के प्रतिक्रिया स्वरूप 1789 से 1831-32 के बीच मुंडाओं के अनेक आंदोलन हुए और भूमि समस्या और पुराने मूल्यों की पुन:स्थापना के फल स्वरूप सरदारों का आंदोलन भी छिड़ा’’

(विशद कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और झारखंड के बोकारो में रहते हैं।)

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This post was last modified on June 17, 2020 1:54 am

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