Tuesday, October 19, 2021

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चीन पर नेहरू को कटघरे में खड़ा करने वाले क्या पंडित दीनदयाल भी थे ‘राष्ट्र विरोधी’?

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यदि गलवान घाटी में हुए खूनी झड़प के बारे में केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार से सवाल कर विपक्ष ने “गैर-ज़िम्मेदारी” का सबूत दिया है और उसके प्रश्न “देशघाती” हैं और सैनिकों के मनोबल गिराने वाले हैं, तो सवाल यह भी  उठता है कि क्या यही पैमाना भाजपा के विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ऊपर नहीं लगाना चाहिए? भारत-चीन सीमा विवाद पर ही पंडित दीनदयाल ने जवाहर लाल नेहरु सरकार पर कड़े प्रहार करते हुए उनकी सरकार को कटघरे में डाल दिया था। 

सवाल तो यह भी होना चाहिए कि अगर विपक्षी पार्टियाँ सामरिक मामलों पर सरकार से सवाल कर “देशघाती” काम कर रही हैं, तो कैसे भाजपा के विचारक  “राष्ट्र विरोधी” नहीं थे? क्या सत्ताधारी भाजपा इस सवाल का जवाब देगी? या फिर वह विपक्ष और खुद के लिए दोहरे मापदंड का इस्तेमाल करती रहेगी?

ख्याल रहे कि 1950 के दशक के अंत में सीमा विवाद और तिब्बत के मसले को लेकर भारत-चीन संबंध तेजी से बिगड़ने लगे थे। उन दिनों पंडित दीनदयाल ने आरएसएस के अंग्रेजी मुखपत्र “ऑर्गनाइजर” के मंच से नेहरु के ऊपर आरोपों की छड़ी लगा दी थी।  उनका लेख “पोलिटिकल डायरी” के कॉलम में छपता था।  उनके कुछ लेख जो साल 1959 में प्रकाशित हुए थे, का ज़िक्र यहाँ करेंगे। याद रहे कि उनके लेख बाद में चलकर “पोलिटिकल डायरी” नाम की एक किताब में शामिल किए गए। पंडित दीनदयाल के लेखों का फिर से पाठ करने का एक मकसद यह है कि सत्ता पक्ष को यह याद दिलाया जाए कि जब वे विपक्ष में थे तो उन्होंने भी सामरिक मामलों पर तब की सरकार को घेरा था। 

मगर अफ़सोस कि अपनी सुविधा के मुताबिक भाजपा इन बातों को याद नहीं करना चाहती और सवाल का जवाब देने से भाग रही है। भाजपा समर्थक मीडिया भी विपक्षी नेताओं- विशेष रूप से पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी- पर इस बात के लिए हमले कर रहा है कि वे गलवान घाटी जैसे “संवेदनशील” मसले पर मोदी सरकार की सारी बातों को सच क्यों नहीं मान लेते। 

मगर विपक्ष सरकार से यह मालूम करना चाहता है कि भारत-चीन सीमा पर 15/16 जून को क्या हुआ था? कैसे भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच खूनी संघर्ष फूट पड़ा? इन सवालों के जवाब देने और संदेह को दूर करने के बजाय सत्तारूढ़ भाजपा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी पर “सबसे गैर-जिम्मेदार राजनीतिज्ञ” होने का इलज़ाम थोप रही है। 

कुछ दिन पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने कांग्रेस पार्टी पर “गैर-जिम्मेदार” विपक्ष होने और राष्ट्र को नुकसान पहुंचाने और सैनिकों का मनोबल “पस्त करने” का आरोप लगाया। मुख्यधारा के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सरकार के इशारे पर विपक्षी दलों को कोस रहा है। 

हालांकि भाजपा यह बहुत जल्दी भूल गयी है कि जब वह साल 2004-2014 के बीच विपक्ष की भूमिका में थी, तो वह भी चीन के सवाल पर कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार को बुरी तरह से घेरती रही। भगवा दल ने भी सामरिक मसले पर कई बार कांग्रेस से सार्वजनिक तौर पर “स्पष्टीकरण” मांगा। 

मिसाल के तौर पर “द इंडियन एक्सप्रेस” में हाल के दिनों में प्रकाशित एक रिपोर्ट में इन तथ्यों को सामने लाया गया है कि इस मुद्दे पर भाजपा ने चीन के सवाल पर दो दर्जन से ज्यादा बयान जारी किए थे। तत्कालीन यूपीए सरकार से उसने सामरिक मामलों पर कई बार स्पष्टीकरण मांगा। मिसाल के तौर पर भाजपा की पणजी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक (2013) में पारित प्रस्ताव में सरहद पर चीनी घुसपैठ पर सरकार से तीखे सवाल किए गए। 

इसी तरह पंडित दीनदयाल उधायाय ने भी अपनी लेखनी में नेहरु की चीन के सवाल पर जमकर घेरेबंदी की थी। अपने साप्ताहिक कॉलम में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री पर “कमजोर” और “डरपोक” होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि चीन के मामले को हल करने में नेहरु “स्वभावगत कमजोर” (temperamental weakness) हैं। नेहरु भारतीय भूभाग को लेकर “लगभग-लगभग” चीन के सामने “आत्मसमर्पण” (practically surrendering) कर चुके हैं। 

संक्षेप में, पंडित दीनदयाल की मुख्य आलोचना यह थी कि (क) नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने सीमा पर चीन के साथ समझौता किया और (ख) नेहरु सरकार  चीन के साथ मजबूती से निपटने में असमर्थ साबित हुई है। क्या पंडित दीनदयाल के सवाल आज के विपक्ष के सवाल से बहुत अलग हैं? भाजपा को यह स्पष्ट करना चाहिए।

पंडित दीनदयाल की लेखनी उस वक़्त की है जब 1950 के दशक के अंत में भारत चीन के बीच विवाद बढ़ने लगा था। तब राजनीतिक दृश्य आज से विपरीत था। जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस सत्ता में थी, जबकि हिंदुत्व दल विपक्ष की भूमिका में था। उस वक्त चीन ने उत्तर-पूर्व सीमांत प्रदेश (नॉर्थ-ईस्ट फ़्रंटियर एजेंसी) और लद्दाख के बड़े हिस्से पर अपना दावा ठोक दिया था। चीन ‘मैकमहोन लाइन’ को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। इसे चीन “ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति” का एक हिस्सा मानता था। दूसरी तरह भारत ‘मैकमहोन लाइन’  के आधार पर सीमा विवाद हल चाहता रहा है।
तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा और उनके समर्थकों के भारत में  राजनीतिक शरण ने मामले को और गर्म कर दिया। उस वक़्त देश के कई हिस्सों में चीन विरोधी और तिब्बत हिमायती प्रदर्शनों हो रहे थे। इन सब घटनाओं ने चीन-भारत संबंध के काफी बिगाड़ दिया था।

इन बीच, पंडित दीनदयाल  “आर्गेनाइजर” में अपने लेख लिख रहे थे। 27 अप्रैल, 1959 को प्रकाशित एक लेख में जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष ने प्रधानमंत्री नेहरू पर आरोप लगाया कि तिब्बत मुद्दे पर उनकी नीति “बेहद निराशाजनक” है। उन्होंने नेहरू की विदेश नीति पर सवाल उठाते हुए कहा कि तिब्बत मसले पर प्रधानमंत्री ने बेहद निराश किया है। उन्होंने उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। उनकी नीति न तिब्बत की आज़ादी और न भारत के राष्ट्रहित में उपयोगी है। 

पंडित दीनदयाल ने कहा कि दलाई लामा और उनके दूसरे शरणार्थियों को जगह देना ही काफी नहीं है। इस संबंध में नेहरु सरकार को बड़े साहसिक फैसले लेने होंगे। दलाई लामा को चीनी साम्राज्यवाद के खिलाफ अपने लोगों के साथ लड़ने की इजाज़त दी जानी चाहिए। (दीनदयाल उपाध्याय, पोलिटिकलडायरी, सुरूचि प्रकाशन, नई दिल्ली, 2014, पृष्ठ 132)।

पंडित दीनदयाल ने नेहरू पर “चीनी आक्रामकता के मुद्दे से निपटने में स्वभावगत कमजोरी” दिखाने का भी आरोप लगाया। 21 सितंबर, 1959 को प्रकाशित अपने लेख में उन्होंने कहा कि हमेशा की तरह प्रधानमंत्री ने चीनी आक्रामकता के मुद्दे से निपटने में अपनी स्वभावगत कमजोरी का प्रदर्शन किया है। जब नेहरु ने पहली बार घोषणा की कि उत्तर पूर्व सीमा पर सीमाओं की रक्षा सेना को सौंप दी गई थी और भारत अपने क्षेत्र के हर इंच की रक्षा करेगा, तो बड़ी उम्मीदें जगी थीं। लोगों को लगा कि सरकार अपने कर्तव्य के प्रति सजग है और देश की अखंडता और सम्मान उनके हाथों में सुरक्षित है। हालांकि बाद में प्रधानमंत्री ने इन सभी आशाओं पर पानी फेर दिया। (पृष्ठ 123)

आखिर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने आरोप लगाया कि नेहरू देश की अखंडता के बारे में बहुत ज़यादा मतलब नहीं (not very particular) रखते । 21 सितंबर, 1959 के एक लेख में, उन्होंने कहा कि जब नेहरु यह कहते हैं कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि एक मील हमारे पास रहता है या चीन को जाता है, तब वे इस बात का परिचय देते हैं कि उन्हें राष्ट्रीय भूभाग की अखंडता की अवधारणा की समझ नहीं है (पृष्ठ 124)।

पंडित दीनदयाल ने यहाँ तक कहा कि नेहरू “कमजोर” और “डरपोक” स्वभाव के हैं और उन्होंने लगभग-लगभग भारतीय क्षेत्र को चीन को समर्पित कर दिया है। उन्होंने इलजाम लगाया कि उत्तर-पूर्व सीमांत प्रदेश के लोंग्जू, बारा होटी (उत्तर प्रदेश) और लद्दाख से चीनी हमले हुए हैं। प्रधानमंत्री ने अब तक इस तरफ ध्यान दिया है। लद्दाख के संबंध में पंडित दीनदयाल ने कहा कि नेहरु ने इसे लगभग-लगभग चीन को सौंप दिया है। हालांकि आक्रमण दो साल पहले हुआ, लेकिन प्रधानमंत्री ने इस चुनौती का सामना करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है! अपने हालिया बयानों में भी नेहरु ने इस मामले को सुलझाने की कोई इच्छा नहीं दिखाई (पृष्ठ 125)। 

इन सब तथ्यों के आधार पर भाजपा से पूछा जाना चाहिए कि वह किस मुंह से विपक्ष से चुप रहने का फरमान जारी कर रही है? आज विपक्षी दलों के लिए सामरिक मामलों पर सवाल करने के लिए कोसने वाली भाजपा क्या अपने विचारक पंडित उपाध्याय पर भी यही मापदंड लगाएगी? भाजपा से जनता जवाब चाहती है कि क्या चीन से सम्बंधित सामरिक मामलों पर नेहरू सरकार को घेर कर दीनदयाल उपाध्याय ने भी राष्ट्रहित के खिलाफ काम किया था?

(अभय कुमार जेएनयू से पीएचडी हैं। आप अपनी राय इन्हें debatingissues@gmail.com पर भेज सकते हैं।)  

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