Mon. Feb 24th, 2020

जसवंत सिंह कंवल: विदा हो गया पंजाबी लोकाचार का प्रतिबद्ध महान कलमकार!   

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जसवंत सिंह।

पंजाबी साहित्य को मानों ग्रहण लग गया है। कल डॉ. दलीप कौर टिवाणा विदा हुईं, अभी उनका अंतिम संस्कार भी नहीं हुआ था कि खबर मिली, पंजाबी गल्प की महान शख्सियत जसवंत सिंह कंवल जिस्मानी तौर पर अलविदा कह गए। ‘बाबा बोहड़’ (वटवृक्ष) के नाम से जाने जाते कंवल ने मोगा स्थित अपने गांव ढूडिके में एक फरवरी की दोपहर चढ़ने से पहले आखरी सांसें लीं। वह 101 साल के थे। उन्होंने 20 साल की उम्र में लिखना शुरू किया था और 100 साल की उम्र तक यानी एक साल पहले तक उनकी कलम लगातार चलती रही। उनके पाठकों की तादाद लाखों में है। पंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में उनका नाम शुमार है। कुछ लोग उन्हें पंजाब का रसूल हमजातोव भी कहते हैं। उनके उपन्यासों में पंजाब के ग्रामीण जीवन की हर धड़कन बखूबी मौजूद है। पंजाब की लगभग हर सियासी, सामाजिक और सांस्कृतिक लहर उनकी रचनाओं का आधार विषय बनती रही है। आलोचक उन्हें ‘लहरों का लेखक’ भी कहते थे।                                                

1969 में पंजाब में नक्सलबाड़ी लहर ने दस्तक दी थी। उस लहर ने कई गहरे प्रभाव पंजाब के जनजीवन पर छोड़े जो आज 50 साल के बाद भी कायम हैं। पंजाबी के पाश, लाल सिंह दिल, सुरजीत पातर, संत राम उदासी, अमरजीत चंदन और हरभजन हलवारवी नक्सलबाड़ी आंदोलन की देन हैं। लेकिन उस लहर अथवा आंदोलन की एक बड़ी देन जसवंत सिंह कंवल का लिखा उपन्यास ‘लहू दी लौ’ है। जिसके अनगिनत संस्करणों की 5 लाख से ज्यादा प्रतियां पढ़ी गईं। 1970 के बाद जसवंत सिंह कंवल ने इसे लिखा था। जब इसकी पांडुलिपि प्रकाशन के लिए तैयार हुई तो पंजाब में इसे किसी ने नहीं छापा। तब बर्बर आपातकाल लागू हो गया था और कई किस्म की पाबंदियां थीं लेकिन कंवल इसे छपवा कर घर घर पहुंचाने को बाजिद थे। आखिरकार उन्होंने ‘लहू दी लौ’ सिंगापुर से छपवाया और गुप्त रूप से उसे पंजाब लाया गया।

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बड़ी तादाद में लोगों ने इसे पढ़ा और सराहा। पंजाब में यह आपातकाल हटने के बाद प्रकाशित हुआ, तब भी लोगों ने इसे खूब खरीदा और पढ़ा। यह उपन्यास पंजाब के किसानों के संघर्ष, उनकी मुश्किलों और उस दौर में नक्सलवाद की प्रासंगिकता की गाथा कहता है। आज भी ‘लहू दी लौ’ पंजाबी में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली पुस्तकों में शुमार है। हर साल इसका नया संस्करण छपता है। इसका अंग्रेजी अनुवाद भी खूब पढ़ा गया और इसे जसवंतजी की प्रतिनिधि कृति माना जाता है।               

‘रात बाकी है’, ‘पूर्णमासी’, ‘पाली’ और ‘तोशाली दी हंसो’ उनके अन्य बहुचर्चित और बहुपठित उपन्यास हैं। ‘तोशाली दी हंसो’ के लिए उन्हें भारतीय साहित्य अकादमी पुरस्कार से 1998 में नवाजा गया था। 1996 में कहानी संग्रह ‘पक्खी’ के लिए साहित्य अकादमी फेलोशिप दी गई थी। कंवल का जन्म 27 जून, 1919 को हुआ था। कई बार अपने गांव के निर्विरोध सरपंच चुने गए जसवंत सिंह कंवल ग्रामीण पंजाब, पंजाबी सभ्याचार और समाज के हर उतार-चढ़ाव से बखूबी वाकिफ थे।

ग्रामीण समाज में जमीनी स्तर पर विचर कर वह उसका सूक्ष्म अध्ययन किया करते थे। इसीलिए उनकी रचनाओं में ग्रामीण समाज की ऐसी छवियां और परछाइयां तथा पहलू मिलेंगे जो अन्यत्र कहीं नहीं हैं। लोकभावना की कंवल सरीखी सूक्ष्म समझ उनके किसी दूसरे समकालीन के यहां नहीं पाई गई। इसीलिए कहने वालों ने उन्हें पंजाब का रसूल हमजातोव कहा तो उनकी रचनाओं पर लेव टॉलस्टॉय की छाप भी देखी। लेखकीय स्तर पर वह कई आंदोलनों से जुड़े। 1969 के पंजाब के नक्सलवादी आंदोलन का खुला समर्थन किया तो स्टेट (व्यवस्था) के खिलाफ जाते हुए सिख अलगाववादी आंदोलन से भी खुली सहानुभूति रखी। दोनों बार ऐसा करते हुए वह एकदम बेखौफ, बेबाक और तार्किक दिखे।

खालिस्तानी लहर के दौरान उनकी वैचारिक पुस्तक ‘पंजाब बोलदा है’ रिकॉर्ड संख्या में बिकी। नक्सलवादी आंदोलन और खालिस्तानी लहर के दौरान कई बार सरगोशियां हुईं कि हुकूमत उन्हें बाकायदा गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे डालेगी। इस बाबत उन्हें सरकारी स्तर पर चेतावनियां अथवा धमकियां भी दी जाती रहीं लेकिन वह अपनी सोच पर अडिग रहे। यह उनकी बुलंद कलम का भी करिश्मा था। वैचारिक लेखन में उन्होंने नशों का छठा दरिया बनते पंजाब और पंजाबियों के विदेश-प्रवास पर जमकर लिखा तथा बुजुर्गियत लहजे में लोगों को लताड़ा। उनके लेखों में अक्सर यह पंक्ति कहीं ना कहीं शुमार रहती थी की, “पंजाबियों अब भी संभल जाओ नहीं तो मारे जाओगे!” अंधविश्वास, बिगड़ते सामाजिक ताने-बाने और मरती किसानी पर भी उन्होंने निरंतर लिखा।                                              

जसवंत सिंह कंवल को ‘साहित्य रत्न’ का खिताब भी हासिल था। 27 जून, 2019 को जब उन्होंने उम्र का 100वां पड़ाव पार किया तो उनके गांव में मेला लगा कर जश्न मनाया गया। बाद में पंजाब के लगभग हर जिले, कई कस्बों और गांवों में अवाम ने अपने इस महबूब लेखक का सौ साल का हो जाना किसी पर्व की तरह मनाया। दुनिया भर में कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती कि किसी स्थापित लेखक ने 80 साल लिखने और 100 साल जीने का रिकॉर्ड कायम किया हो। 100 साल तक गंभीर बीमारियां उनसे दूर रहीं। वह अपनी दिनचर्या खेतों में घूम कर, लिखने की मेज पर बैठकर शुरू करते थे और इसी तरह इस सिलसिले का अंत करते थे। बर्नार्ड शॉ, बर्ट्रेंड रसल और खुशवंत सिंह जैसे नामी लेखक जीवन का शतक पूरा करते-करते रह गए।

स्वस्थ जीवन का शतक पूरा करने का कीर्तिमान जसवंत सिंह कंवल के हिस्से आया। 101 साल के करीब पहुंचते-पहुंचते कुछ अरसे के लिए सेहत ने उनका साथ छोड़ा। इस अपवाद को छोड़ दें तो कहा जा सकता है कि मृत्यु का सच उनके जीवन संध्या में बहुत सम्मान के साथ उतरा। ठीक उतने सम्मान के साथ जितने के वह हकदार थे। उन्हें बेवजह ही बाबा बौहड़ नहीं कहा जाता था। समूह पंजाबी अपने इस हरमनप्यारे, महबूब लेखक को स्नेह-सम्मान से ‘बाईजी’ कहा करते थे। जसवंत सिंह कंवल नाम के इस वटवृक्ष की छाया यकीनन सदा रहेगी और उनके रचनात्मक लेखन की रोशनी भी, उस लेखन की जिसे खुद वह मशाल बनाने के तमन्नाई ताउम्र रहे। पंजाबी लोक जीवन के इस महान कलमकार को आखरी सलाम…!!

(अमरीक सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल जालंधर में रहते हैं।)

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