Subscribe for notification

जयंती पर विशेष: जेपी का इस्तेमाल छोड़ें, उन्हें समझने की कोशिश करें

आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण की जयंती है और जाहिर है उन्हें पूरे देश में अलग-अलग तरीके से याद किया जा रहा है। जेपी से जुड़े वे लोग तो बचे नहीं हैं जो उनके साथ स्वाधीनता संग्राम में शामिल हुए थे इसलिए अब उन्हें 1974 के बिहार और गुजरात के छात्र आंदोलन के सिलसिले में ही याद किया जाता है। उनके साथ जुड़े छात्र नेताओं ने अपनी अलग-अलग राजनीतिक हैसियत बनाई और भारतीय राजनीति का मंडलीकरण और फिर हिंदूकरण करने के साथ उसे फासीवादी मुकाम पर ला छोड़ा है। इसलिए आज के बहुत सारे नेता जेपी को अपने पाप धोने के लिए याद करते हैं। वे जेपी जैसे राजनीतिक ऋषि की स्मृतियों की पवित्र गंगा में नहाकर आगे के पाप की तैयारी में लग जाएंगे।

दूसरी ओर जेपी जो अपने आरंभिक जीवन में मार्क्सवादी थे और आखिर में उन्होंने संपूर्ण क्रांति के लिए कार्ल मार्क्स का ही शब्द प्रयोग किया और अपनी व्हाई सोशलिज्म से ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे लोगों को कम्युनिस्ट होने के लिए प्रेरित किया वे मार्क्सवादी आख्यान में अनुपस्थित हैं। जेपी को लोगों ने कांग्रेसवाद और गैर कांग्रेसवाद में बांट दिया है और इस प्रकार उस कांग्रेस में भी उन्हें नहीं याद किया जाता जिसके साथ 18 साल तक सक्रिय रहने के बाद वे उससे अलग हो गए थे और अपने जीवन के आखिरी चरण में कांग्रेस को सत्ता से हटाने वाले आंदोलन के नेता थे। जेपी को सर्वोदयी और गांधीवादी अपने अपने ढंग से याद करते हैं और वे उन्हें अपना स्वाभाविक रहनुमा मानते हैं लेकिन वहां भी बहुत सारे जातिवादी और संस्थावादी संकीर्ण स्वार्थ हावी हैं। 

ऐसे में जेपी के राजनीतिक जीवन के प्रसंगों से ज्यादा जरूरी है उनके उन विचारों को याद करना जो कभी उन्हें बलिदानी संघर्ष के लिए प्रेरित करते हैं और कभी संघर्ष के अनुभवों से नया रूप लेते हैं। निश्चित रूप से जेपी स्वतंत्रता के अनन्य सिद्धांतकार और योद्धा थे और इसीलिए उन्होंने कहा है, “ जैसे-जैसे समय बीत रहा है वैसे-वैसे स्वतंत्रता मेरे लिए सिर्फ मेरे देश की स्वतंत्रता नहीं रह गई है। अब वह मेरे लिए हर व्यक्ति की स्वतंत्रता बन चुकी है और हर प्रकार के जाल से मुक्त होने का विचार बन चुकी है। इन सबसे ऊपर मेरे लिए स्वतंत्रता का अर्थ है मानव व्यक्तित्व की स्वतंत्रता, मानव मस्तिष्क की स्वतंत्रता, आत्मा की स्वतंत्रता। यह स्वतंत्रता मेरे लिए जिंदगी का जज्बा बन चुकी है। मैं इसे रोटी, सत्ता, समाज, समृद्धि, राज्य के वैभव या किसी अन्य चीज के लिए गिरवी नहीं रख सकता।’’

स्वतंत्रता के इसी जज्बे के कारण जेपी अपने आरंभिक युवा जीवन में मार्क्सवादी होने के बावजूद उस राजनीतिक प्रणाली के समर्थक नहीं बन सके जो बोल्शेविक क्रांति के बाद सोवियत संघ में कायम हुई थी। हालांकि अमेरिका के ओहियो विश्वविद्यालय में अपने अध्ययन के दौरान जेपी एवराम लैंडी नाम के एक पोलैंड के यहूदी के संपर्क में आए जो अमेरिकी कम्युनिस्ट पार्टी का सदस्य था और पार्टी की भूमिगत शाखा से भी जुड़ा था। अमेरिकी कम्युनिस्ट पार्टी का दूसरा सदस्य मैनुअल गोमेज था जिससे भी जेपी की गहरी छनने लगी थी। उन लोगों के प्रभाव में उन्होंने अंग्रेजी में मार्क्स, लेनिन, ट्राटस्की का लिखा हुआ जो भी साहित्य था उसे पढ़ डाला था। उन्होंने स्वीकार किया है कि पूंजीवादी सफलता वाले देश अमेरिका में वे मार्क्सवादी बन गए थे। वे इस बीच अपने मित्र लैंडी की प्रेरणा से सोवियत संघ जाना भी चाहते थे लेकिन इस बीच उनकी मां बीमार हो गईं और उन्हें भारत लौटना पड़ा। 

दरअसल जेपी की विचारयात्रा राष्ट्रवाद या देशभक्ति से शुरू हुई थी जो अमेरिका में मार्क्सवादी हो गई। लेकिन भारत में गांधी के संपर्क में आने के बाद वे लोकतांत्रिक समाजवाद के रास्ते से गांधीवादी हो गए। जेपी आजीवन व्यापक सामाजिक राजनीतिक परिवर्तन का प्रयास करते रहे और मनुष्य और व्यवस्था के भीतर नई चेतना भरने के साथ उसे नया रूप देन में लगे रहे। इस दौरान जीवन के आखिरी तीन वर्षों में जब वे जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क में आए तो बिहार और गुजरात से होते हुए पूरे देश के युवाओं से संपूर्ण क्रांति की उम्मीद कर बैठे। जेपी ने पांच जून 1974 को पटना के गांधी मैदान में संपूर्ण क्रांति शब्द का प्रयोग पहली बार किया और उसके बाद उनका यह शब्द एक मंत्र बनकर देश पर छा गया। 

लेकिन विडंबना देखिए कि आज जेपी को याद करने वाले संघ परिवार के लोग सिर्फ उनके कांग्रेस विरोधी आंदोलन का इस्तेमाल करते हैं और कांग्रेसी और कम्युनिस्ट उन्हें फासीवाद के लिए खाद पानी देने वाला नायक बताते हैं। संघ के लोग अगर जेपी को इंदिरा गांधी विरोध की डिबिया में बंद किए हुए हैं तो दूसरे लोगों ने उन्हें फासीवादी शक्तियों के कूड़ेदान पर फेंक रखा है। ऐसा मूल्यांकन जेपी के साथ अन्याय है। 

इसलिए हमें यह याद रखना होगा कि जेपी ने संपूर्ण क्रांति या टोटल रिवोल्यूशन शब्द कहां से लिया और उसका भारत के संदर्भ में कब प्रयोग किया। जेपी 1969 में पहली बार संपूर्ण क्रांति की बात अपने लेखन में करते हैं। उससे पहले वे परमानेंट रिवोल्यूशन यानी स्थायी क्रांति की बात करते थे। लेकिन यह शब्द 1846 में कार्ल मार्क्स की पुस्तक पावर्टी आफ फिलास्फी में पहली बार आया है। मार्क्स कहते हैं, “ इस बीच सर्वहारा और बुर्जुआ के बीच का संघर्ष एक वर्ग का दूसरे वर्ग से संघर्ष है। इसकी सर्वोच्च अभिव्यक्ति संपूर्ण क्रांति में होती है।’’

जेपी मार्क्स की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को भारतीय संदर्भ में लागू कर रहे थे और उसके लिए गांधीवादी साधनों का प्रयोग कर रहे थे। इसीलिए उन्होंने कहा था , “ सर्वोदय और संपूर्ण क्रांति में कोई फर्क नहीं है। अगर कोई फर्क है तो वह यही कि सर्वोदय साध्य है और संपूर्ण क्रांति साधन।’’ इस काम के लिए जेपी लोक समिति, लोक संघर्ष समिति और जनता सरकार का गठन करना चाहते थे। उनकी जनता सरकार में शामिल लोगों का किसी पार्टी से संबंध नहीं होना था।’’

जेपी यूरोप की मार्क्सवादी क्रांतियों का अध्ययन कर रहे थे और भारतीय सामाजिक राजनीतिक स्थितियों से भी परिचित थे। इसलिए वे उसका भारतीय संस्करण तैयार कर रहे थे। लेकिन उन्हें इस बात की गलतफहमी नहीं थी कि कोई बड़ा नेता अपने बूते पर बड़ा सामाजिक परिवर्तन या क्रांति कर सकता है। यानी उसके लिए वहां की भौतिक स्थितियां जिम्मेदार होती हैं। इसीलिए जेपी ने कहा था, “इतिहास का बड़ा से बड़ा नेता चाहे वह लेनिन, माओ या गांधी हों, अपने आप क्रांति नहीं कर सकते , क्रांतियां तो घटित होती हैं।’’

आम तौर पर लोग कहते हैं कि जेपी की संपूर्ण क्रांति वास्तव में लोहिया की सप्त क्रांतियां ही हैं। लेकिन दोनों का सार भले एक जैसा हो लेकिन उनके सूत्रीकरण में अंतर है। जेपी ने जिस संपूर्ण क्रांति की बात की थी उसमें सबसे ऊपर नैतिक और आध्यात्मिक क्रांति है। आज समाज के भयानक नैतिक पतन के दौर में हम उसका आह्वान कर सकते हैं। दूसरी क्रांति सामाजिक क्रांति है जिसमें जातिगत और लैंगिक असमानता दूर करने का कार्यक्रम है। तीसरी क्रांति आर्थिक क्रांति है। इसमें मौजूदा आर्थिक ढांचे को सिर के बल खड़ा करने का सिद्धांत है। जेपी के सर्वहारा मार्क्स के सर्वहारा नहीं हैं। क्योंकि भारत में औद्योगिक समाज का गठन नहीं हो पाया था। इसलिए वे ग्रामीण समाज पर जोर देते हैं। चौथी क्रांति राजनीतिक क्रांति है जिसमें राजनीतिक दलों और संस्थाओं के ढांचे में आमूल बदलाव का संकल्प है।

जेपी दलीय लोकतंत्र को गैर दलीय लोकतंत्र में परिवर्तित करना चाहते थे लेकिन उनका इरादा कम्युनिस्ट व्यवस्था की तरह से अतिकेंद्रीकरण के बजाय अति विकेंद्रीकरण पर था। उसके बाद पांचवें स्तर पर वे सांस्कृतिक क्रांति की बात करते हैं। इसके तहत मनुष्य का समुदाय से रिश्ता क्या हो और एक मनुष्य का दूसरे मनुष्य से रिश्ता क्या हो इस पर जोर था। मनुष्य और मशीन के रिश्तों की भी बात की गई है। उनका छठवां सिद्धांत वैचारिक क्रांति का है। यह मनुष्य को विभिन्न विचारों के प्रति एक खुलापन और उसकी ग्राह्यता की तैयारी भी है। क्योंकि सामान्य मनुष्य विचारधाराओं को समझता नहीं है। सातवीं क्रांति शैक्षणिक क्रांति है। इसमें डिग्री और काम के बीच एक प्रकार से अलगाव करने का सुझाव है। 

जेपी की संपूर्ण क्रांति के मूल में स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व की ही अवधारणा है। उन्होंने उसे भारतीय संदर्भ और अपने अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से नया रूप दिया था। वे अपनी नैतिकता में हमारी पतित होती राजनीतिक व्यवस्था का शुद्धीकरण करना चाहते थे। वे मनुष्य और संस्थाओं में आमूल परिवर्तन करना चाहते थे। यह एक प्रकार से गांधी के आदर्श समाज को मूर्त रूप देने का प्रयास था। इसलिए जेपी से जुड़े कार्यक्रम करना और उनके नाम पर प्रमाण पत्र देना और लेना अलग बात है। यह एक प्रकार से उनका इस्तेमाल है। जरूरत है आज के संदर्भ में जेपी के विचारों को विस्तार देना और उसके लिए नए मनुष्य तैयार करना।

जेपी के जीवन में अपने समय के आदर्श और श्रेष्ठ विचारों का समावेश है। वे इन विचारों के साथ अपनी सक्रियता के उतार-चढ़ाव से गुजरते हैं। लेकिन आखिरी दिनों में उनके भीतर क्रांति की ज्वाला फिर धधकती है। निश्चित तौर पर जेपी उस उद्देश्य में विफल रहे और उनकी क्रांति को संकीर्ण और स्वार्थी राजनीति ले उड़ी। लेकिन यह विफलता जेपी की नहीं इस समाज और उनके अनुयायियों की भी है। हम जिस दिन जेपी का इस्तेमाल छोड़ कर उन्हें समझने और उनके अनुरूप जीने लगेंगे उस दिन संपूर्ण क्रांति का सूर्योदय होता हुआ दिखेगा। 

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on October 11, 2020 12:04 pm

Share
%%footer%%