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Monday, September 27, 2021

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विराट व्यक्तित्व के मालिक थे जवाहरलाल नेहरू

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स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में से एक, पंडित जवाहर लाल नेहरू का भारतीय इतिहास में अविस्मरणीय योगदान है। परतंत्र भारत में पंडित नेहरु का महत्व जहां देश को स्वतंत्र कराने के लिए किए गए उनके अथक प्रयासों के चलते है, तो वहीं स्वतंत्र भारत में प्रधानमंत्री के रूप में उनके द्वारा आधुनिक जीवन मूल्यों के प्रचार-प्रसार की वजह से। नेहरु देश को वैज्ञानिक खोजों और तकनीकी विकास के आधुनिक दौर में ले जाने के लिए दृढ़ संकल्पित थे। उन्होंने देशवासियों में दलितों, पिछड़ों और हाशिए से नीचे रहने वाले वंचित जनों के प्रति जागरुकता पैदा करने का महती कार्य किया।

लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी अगाध आस्था थी और वे चाहते थे यही आस्था देशवासियों के दिल में भी हो। लिहाजा इसके लिए उन्होंने अनथक प्रयास किए। नेहरू, समाजवादी विचारधारा से बेहद प्रभावित थे। समाजवादी विचारधारा का ही प्रभाव था कि उन्होंने भारत में लोकतांत्रिक समाजवाद की स्थापना का लक्ष्य रखा। लोकतंत्र, समाजवाद, एकता और धर्मनिरपेक्षता उनकी घरेलू नीति के चार ठोस स्तंभ थे। अपने आखिरी वक्त तक वे इन्हीं नीतियों पर कायम रहे।

जातीय तथा धार्मिक विभिन्नताओं के बावजूद जवाहरलाल नेहरू ने हमेशा देश की एकता और अखंडता पर जोर दिया। वे किसी भी तरह की संकीर्णता और साम्प्रदायिकता के घोर विरोधी थे। उनकी नजर में संस्कृति के अलग ही मायने थे। संस्कृति को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा था,‘‘संस्कृति का मतलब है-मन और आत्मा की विशालता और व्यापकता। इसका मतलब दिमाग को तंग रखना या आदमी या मुल्क की भावना को सीमित करना कभी नहीं होता।’’ नेहरू मौजूदा दौर के राजनेताओं की तरह उथले विचारों वाले नेता नहीं थे, न ही वे बड़बोले थे। वे जो भी बोलते, सोच समझकर बोलते। नेहरू के विचारों के पीछे उनका गहरा अध्ययन-मनन साफ झलकता था। वे एक गंभीर विचारक थे। हर मौजू पर उनकी एक स्पष्ट राय थी।

नेहरू द्वारा समय-समय पर दिए गए भाषणों का यदि अध्ययन करें, तो मालूम चलता है कि उनकी सोच कितनी आगे थी। किसी भी मसले पर उनके विचार निकालकर देख लीजिए, वे जितने उस वक्त प्रासंगिक थे, आज उससे भी कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं। त्रिचुर में 26 दिसम्बर 1955 को दिए गए एक भाषण में जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, ‘‘मैं भारत की एकता पर जोर देता हूं, केवल राजनीतिक एकता पर नहीं, वह तो हमने हासिल कर ली है, उससे भी महत्वपूर्ण यानी भावनात्मक एकता हमारे विचारों और दिलों का मिलन, अपने भीतर से अलगाववादी भावनाओं को खत्म करना। जहां सब लोग भारत की एकता के बारे में सहमत हैं, वहीं बहुत से लोग और कुछ पार्टियां ऐसे काम करती हैं, जिसके परिणाम से भारत की एकता टूट सकती है। वे ऐसा क्यों करते हैं, मैं नहीं जानता।

जब हम भारत के लोग एक ओर अपनी संस्कृति, समान उद्देश्य, मैत्री, प्यार आदि के बंधनों में बंधे हैं, दूसरी ओर दुर्भाग्यवश भारत में अलगावादी और विघटनकारी प्रवृत्तियां छिपी हुई हैं, जो कोई नई समस्या खड़े होते ही सिर उठा लेती हैं।’’ अपने इसी भाषण में वे ऐसी ताकतों से सावधान करते हुए आगे कहते हैं, ‘‘हमें ऐसी विघटनकारी प्रवृत्तियों से होशियार रहना चाहिए, जो मौका पाते ही देश में सिर उठाने लगती हैं। इन विघटनकारी प्रवृत्तियों में कुछ ऐसी हैं जो साम्प्रदायिकता की श्रेणी में आती हैं, अर्थात् किसी धर्म की आड़ में खेली जाने वाली राजनीति, जिसमें एक धार्मिक वर्ग को दूसरे से नफरत करने के लिए उकसाया जाता है।’’

अपने इस वक्तव्य में नेहरू ने जिन विघटनकारी प्रवृत्तियां और शक्तियों की शिनाख्त की है, वे आज देश की मुख्यधारा में आ गई हैं। आज भले ही उनके चेहरे बदल गए हों, लेकिन फितरत नहीं बदली। धर्म की आड़ में वे आज भी देश के अंदर खतरनाक खेल खेलने से बाज नहीं आतीं। महज अपने सियासी फायदे के लिए वे भाई को भाई से लड़ाती हैं। जवाहरलाल नेहरू साम्प्रदायिकता को पिछड़ेपन की निशानी मानते थे। 19 जुलाई, 1961 को श्रीनगर में दिए अपने भाषण में कश्मीर वासियों को समझाइश देते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘राजनीति में धर्म या मजहब को लाना और देश को तोड़ना वैसा ही है, जैसा कि तीन सौ या चार सौ वर्ष पहले यूरोप में हुआ था। भारत में हमें इस चीज से अपने आपको दूर रखना होगा।’’

अपने इसी भाषण में वे उन लोगों को आगाह करते हैं, जो राष्ट्रवाद की सतही परिभाषा करते हैं,‘‘साम्प्रदायिकता के साथ राष्ट्रवाद जीवित नहीं रह सकता। राष्ट्रवाद का मतलब हिंदू राष्ट्रवाद, मुस्लिम राष्ट्रवाद या सिख राष्ट्रवाद कभी नहीं होता। ज्यों ही आप हिंदू, सिख, मुसलमान की बात करते हैं, त्यों ही आप हिंदुस्तान के बारे में बात नहीं कर सकते।’’ जाहिर है उनकी नजर में राष्ट्रवाद की परिभाषा संकीर्ण नहीं। भारत का जिस तरह का चरित्र है, उसमें सिर्फ हिंदू राष्ट्रवाद की बात करना, अंततः देश का नुकसान करना है। हिंदुस्तान का तसव्वुर किसी एक धर्म या मजहब को लेकर नहीं किया जा सकता। ये देश कई धर्मों और पंथों से मिलकर बना है। इसी भाषण में वे कहते हैं,‘‘अलगाव हमेशा भारत की कमजोरी रही है। पृथकतावादी प्रवृत्तियां चाहे वे हिंदुओं की रही हों या मुसलमानों की, सिखों की या और किसी की, हमेशा खतरनाक और गलत रही हैं। ये छोटे और तंग दिमागों की उपज होती हैं। आज कोई भी आदमी जो वक्त की नब्ज पहचानता है, साम्प्रदायिक ढंग से नहीं चल सकता।’’

राजनीति और धर्म का क्या रिश्ता होना चाहिए ? इस विषय पर लंबे समय से बहस चलती रही है। आज भी यह बहस बदस्तूर जारी है। आजादी के बाद, संविधान सभा में इस सवाल पर बाकायदा एक विस्तृत बहस हुई। संविधान सभा के एक सदस्य अनन्तशयनम अयंगर ने जब अपने एक प्रस्ताव, जिसमें उन्होंने धर्म, मजहब, जाति और बिरादरी के आधार पर हर वर्ग की साम्प्रदायिक गतिविधियों को रोकने के लिए कानूनी और प्रशासकीय कदम उठाए जाने की बात की, तो इस बहस में हिस्सा लेते हुए 3 अप्रैल, 1948 को अपने विधायी भाषण में पंडित नेहरू ने कहा, ‘‘राजनीति और मजहब का (संकीर्ण से संकीर्ण मायने में) गठबंधन सबसे ज्यादा खतरनाक गठबंधन है और इसको खत्म कर देना चाहिए।

इससे साम्प्रदायिक राजनीति पनपती है। इस बारे में कोई भी शिकायत नहीं होना चाहिए। यह साफ है कि जैसा माननीय प्रस्तावक ने कहा है कि यह गठजोड़ सारे मुल्क के लिए नुकसान देने वाला है। यह बहुमत के लिए भी हानिकर है लेकिन संभवतः यह उस अल्पसंख्यक वर्ग के लिए नुकसानदेह है, जो इससे कुछ फायदा लेना चाहता है।’’ जाहिर है कि पंडित नेहरू राजनीति में धर्म के इस्तेमाल के विरोधी थे। वे इस गठबंधन को बेहद खतरनाक मानते थे। न सिर्फ बहुसंख्यक वर्ग के लिए, बल्कि अल्पसंख्यक वर्ग के लिए भी।

‘‘संस्कृति क्या है ?, राष्ट्रवाद की सियासत कितनी सही है ?’’ इन सब सवालों के सही जवाब भी पंडित जवाहरलाल नेहरू के विचारों में खोजे जा सकते हैं। 9 अप्रैल, 1950 को नई दिल्ली में ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ के उद्घाटन अवसर पर इन विषयों पर अपनी राय रखते हुए पंडित नेहरू ने कहा था, ‘‘दुनिया में ऐसी कोई संस्कृति नहीं रही, जिसे पूर्णतया शुद्ध या दूसरी संस्कृति से अप्रभावित कहा जा सके। ऐसा होना उसी तरह असंभव है, जैसे कि कोई कहे कि मैं शत-प्रतिशत एक विशेष जाति का ही हूं, क्योंकि सैंकड़ों-हजारों सालों की अवधि में अनेक अवश्यम्भावी परिवर्तन और मिश्रण होते रहते हैं। इस प्रकार संस्कृति में कुछ न कुछ मिश्रण होना लाजिमी है। यह ठीक है कि किसी विशेष राष्ट्रीय संस्कृति के बुनियादी तत्व उसमें प्रधान रहते हैं।

अगर यह चीज शांति से होती रहे, तो इसमें कोई हानि नहीं। लेकिन इसमें अक्सर टकराव हुआ करते हैं। इससे किसी एक वर्ग या समूह के मन में अक्सर यह डर घर कर जाता है कि उसकी संस्कृति पर कोई ऐसा प्रभाव छाता जा रहा है, जिसे वह बाहरी या परकीय समझता है। फिर यह वर्ग अपने आपको चारों तरफ समेटकर एक खोल में बंद कर लेता है। ताकि उसके विचार आदि बाहर न जा सकें। यह बड़ी खराब स्थिति होती है, क्योंकि यों तो किसी भी विषय में और जिसे हम संस्कृति कहते हैं, उसके विषय में तो गतिहीनता और भी बुरी चीज है। अगर संस्कृति का कोई मूल्य है, तो उसमें कुछ गहराई भी अवश्य होना चाहिए।

उसमें कुछ गति भी होना चाहिए।’’ यानी पंडित नेहरू की नजर में संस्कृति एक बहता पानी है, जो रूका तो उसमें निश्चित तौर पर सड़ांध आएगी। यहां भी वे संस्कृति की संकीर्ण परिभाषा के हक में नहीं। किसी भी देश की संस्कृति, कई संस्कृतियों से मिलकर बनती है। हमारा देश, इसकी एक सबसे बड़ी मिसाल है। जिसमें हिंदू, इस्लामिक, बौद्ध, सिख और जैन संस्कृति इस तरह से घुल-मिल गई हैं कि यह पहचानना भी मुश्किल है कि कौन सा तत्व किस संस्कृति का है ?

अपने इसी भाषण में उन्होंने आगे कहा, ‘‘भारत के इतिहास के बारे में मेरा अपना दृष्टिकोण यही है कि जब-जब भारत ने अपना दिमाग बाहरी दुनिया के लिए खुला रखा, तब-तब उसने तरक्की की और जब उसने दिमाग बंद कर लेना चाहा, तब उसकी अवनति हुई। जितना ज्यादा उसने अपना दिमाग बंद किया, उतना ही अधिक वह गतिहीन होता चला गया। जीवन चाहे वह किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र का हो, अनिवार्य रूप से गतिमय, परिवर्तनशील और परिवर्धनशील वस्तु है। जो चीज भी इस गतिमान विकास को रोकती है, वह उसे मिटाती है।’’ संघ परिवार जिस ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ या ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की बात करता है, उस राष्ट्रवाद के पंडित नेहरू विरोधी थे। उनकी यह सोच अचानक नहीं बनी थी। उन्होंने दुनिया के कई देशों की सियासत का अच्छी तरह से अध्ययन किया था, तब जाकर वे इस नतीजे पर पहुंचे थे।

उनका कहना था,‘‘राष्ट्रवाद एक विचित्र वस्तु है, जो देश के इतिहास के किसी खास मुकाम पर तो जीवन, उन्नति, शक्ति और एकता प्रदान करती है, लेकिन साथ ही इसकी सीमित कर देने की भी प्रवृत्ति है। क्योंकि आदमी यह सोचने लगता है कि मेरा देश बाकी दुनिया से भिन्न है। इस तरह, देखने का नजरिया बदलता जाता है और आदमी अपने ही संघर्षों और अच्छाइयों और बुराइयों के सोच में फंसा रहता है और दूसरे विचार उसके सामने आते ही नहीं। नतीजा यह होता है कि वही राष्ट्रवाद, जो किसी जाति की उन्नति का प्रतीक होता है, मानसिक विकास के अवरुद्ध होने का प्रतीक बन जाता है। राष्ट्रवाद जब सफल होता जाता है, तो कभी-कभी यह बड़े आक्रामक तरीके से चारों तरफ फैलता है और दुनिया के लिए एक खतरा बन जाता है। आप किसी भी विचार को मानें, इसी नतीजे पर पहुंचेंगे कि किसी न किसी प्रकार का संतुलन अवश्य होना चाहिए। वरना अच्छी चीज भी बुराई में बदल जाती है। संस्कृति, जो लाजिमी तौर पर अच्छी चीज है, गलत नजरिया रखने से केवल गतिहीन ही नहीं, बल्कि आक्रामक और ऐसी चीज बन जाती है जिससे झगड़ा-फसाद और नफरत पैदा होती है।’’

भारत के लिए जवाहरलाल नेहरू के दिल में क्या सपना था और वे किस तरह का देश बनाना चाहते थे ? इस संबंध में देशवासियों से उनकी क्या अपेक्षा थी ? इन सब सवालों के जवाब उनके एक नहीं, कई भाषणों में मिल जाएंगे। आजादी के तुरंत बाद 13 दिसम्बर, 1947 को इलाहाबाद विश्वविद्यालय के एक विशेष दीक्षांत समारोह में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था, ‘‘अपने राष्ट्रीय लक्ष्य के बारे में हमारी स्पष्ट कल्पना होनी चाहिए। हमारा लक्ष्य स्वतंत्र, सशक्त और लोकतंत्रीय भारत है। हम चाहते हैं कि भारत सशक्त, स्वाधीन और लोकतंत्र हो, जहां हर नागरिक को समान स्थान और तरक्की तथा सेवा के समान अवसर मिलें, जहां आजकल की जैसी धन-संपत्ति और हैसियत की असमानताएं मिट जाएं, जहां हमारा उत्साह और भावनाएं रचनात्मक और सहकारी अध्यवसाय की दिशा में काम करें।

ऐसे भारत में साम्प्रदायिकता, अलगाव, पृथकता, छुआछूत, दंभ और आदमी द्वारा आदमी के शोषण का कोई स्थान नहीं होगा। धर्म जहां स्वतंत्र रहेगा, लेकिन उसे राष्ट्रीय जीवन के आर्थिक और राजनीतिक पक्ष में दखल देने की इजाजत नहीं दी जाएगी। अगर ऐसा होता है तो हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई के ये सब झगड़े राजनीतिक जीवन से बिल्कुल खत्म हो जाएंगे। हमें एक संगठित और मिले-जुले राष्ट्र का निर्माण करना चाहिए, जिसमें व्यक्तिगत और सामूहिक आजादी सुरक्षित रहेगी।’’ आज हम जो आधुनिक, सशक्त, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक भारत देख रहे हैं, वह पंडित जवाहरलाल नेहरू की दूरदर्शिता और प्रगतिशील दृष्टिकोण का ही नतीजा है। ऐसी बेमिसाल शख्सियत, सदियों में एक बार जन्म लेती हैं।

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

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