Subscribe for notification

जयंतीः गीतकार पंडित नरेन्द्र शर्मा ने ही आकाशवाणी को दिया ‘विविध भारती’

वे हिंदी की आन-बान और शान थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। कवि-गीतकार, लेखक, अनुवादक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और प्रशासक अपने जीवन में पंडित नरेन्द्र शर्मा को जो भी भूमिका मिली, उन्होंने उसके साथ पूरा न्याय किया। हिंदी साहित्य में प्रगतिवाद के वे प्रारंभिक कवियों में से एक थे। साल 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में उन्होंने शिरकत की, तो अपने गीतों के माध्यम से उन्होंने देशवासियों में स्वतंत्रता की चेतना जागृत करने का महत्वपूर्ण काम किया।

रामधारी सिंह ‘दिनकर’, रामेश्वर शुक्ल ‘अंचल’, सुमित्रानंदन पंत, भगवतीचरण वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जगन्नाथ प्रसाद ‘मिलिन्द’ और हरिवंशराय बच्चन जैसे कद्दावर कवि उनके समकालीन थे। ये वे कवि हैं जिन्होंने कविता को एक नयी जमीन पर, जीवन के अधिक निकट लाने की कोशिश की। पं. नरेन्द्र शर्मा के गीतों का विस्तृत अध्ययन करें, तो उनमें रागात्मक संवेदना और सामाजिक यथार्थवाद स्पष्ट दिखलाई देता है।

एक नई आशा और विश्वास उनके गीतों का स्थायी भाव है। नरेन्द्र शर्मा के गीतों में प्रकृति और मानवीय सौन्दर्य है, तो विरह और मिलन की सघन अनुभूतियां भी हैं। संस्कृत, हिन्दी, उर्दू और अंग्रेजी भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ थी। यही नहीं मराठी, बंगाली, गुजराती आदि भाषाओं की भी उन्हें अच्छी जानकारी थी। ज्योतिष विद्या और आयुर्वेद का उन्हें अच्छा ज्ञान था। अपने नाम के आगे लगे ‘पंडित’ शब्द को वे पूरी तरह से चरितार्थ करते थे। उनका पांडित्य ओढ़ा हुआ नहीं था। पं. नरेन्द्र शर्मा की विद्वता उनके कामों से झलकती थी।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले की तहसील खुर्जा के एक छोटे से गांव जहांगीरपुर में 28 फरवरी, 1913 में जन्मे नरेन्द्र शर्मा का महामना मदनमोहन मालवीय के अखबार ‘अभ्युदय’ और इलाहाबाद से निकलने वाले एक और अखबार ‘भारत’ के संपादकीय विभाग से नाता रहा। इन अखबारों में काम करने से न सिर्फ नरेन्द्र शर्मा की भाषा सुधरी, बल्कि देश-दुनिया की समस्याओं से भी उनका सीधा वास्ता पड़ा।

उन दिनों इलाहाबाद का वातावरण सांस्कृतिक और साहित्यिक दृष्टि से कुछ अलग ही था। इलाहाबाद की पहचान, देश की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में थी। छायावाद के तीन प्रमुख कवि सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा तो वहां थे ही, हरिवंश राय बच्चन, फिराक गोरखपुरी की कर्मस्थली भी इलाहाबाद बना हुआ था। जाहिर है कि ऐसे सांस्कृतिक और साहित्यिक माहौल का असर, नरेन्द्र शर्मा की जिंदगी पर पड़ा।

वे भी गीत-कविताएं लिखने लगे। साल 1931 में पंडित नरेंद्र शर्मा की पहली कविता ’चांद’ में छपी। साल 1934 तक आते-आते, इक्कीस साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह ‘शूल-फूल’ आ गया। नरेन्द्र शर्मा की नौजवानी का दौर, देश की आजादी के संघर्षों का दौर था। वे भी इस आंदोलन में अपने लेखन से हिस्सेदारी कर रहे थे। वामपंथी संगठनों के संपर्क में आने के बाद, नरेन्द्र शर्मा की कविताओं में और भी ज्यादा आक्रमकता आई। ‘अग्नि शस्य’, ‘पलाश वन’ आदि कविता संग्रह में संकलित उनकी कविताओं में मार्क्सवादी दर्शन और विचारधारा का खुलकर इजहार किया गया है। मिसाल के तौर पर अपनी कविता ‘स्वर्ण शस्य’ में वे कहते हैं,
दो तत्व विरोधी मिले
जीवन गति, निद्रा गई छीज!
गतिमय जीवन का जन्म
आदि में तम-प्रकाश का रति रहस्य


उनकी कविताओं में भाषायी सौंदर्य और यथार्थ का चित्रण एक साथ मिलता है। किसान, कामगार और हाशिए से नीचे के समाज का संघर्ष उनकी कविताओं, गीतों में बार-बार आता है।

योद्धा को तलवार श्रमिकों को मिलती छैनी
कृषकों को हल, कवि को मिली लेखनी पैनी
कहीं शस्ययुत क्षेत्र, कहीं उद्ग्रीव गान है
हम किसान हैं

साल 1938 से लेकर 1940 तक पंडित नरेन्द्र शर्मा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी, स्वराज्य भवन में हिंदी अधिकारी रहे। यहां उनका काम महात्मा गांधी के भाषण और दीगर महत्वपूर्ण दस्तावेजों को अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद करना था। कुछ दिन उन्होंने काशी विद्यापीठ में अध्यापन का कार्य किया। काशी विद्यापीठ में ही थे कि साल 1940 में ब्रिटिश सरकार ने सरकार विरोधी गतिविधियों के इल्जाम में उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। साल 1943 तक वे जेल में रहे।

पंडित नरेन्द्र शर्मा बनारस, आगरा और देवली के कारागारों में कांग्रेसी एवं कम्युनिस्ट लीडरों शचीन्द्रनाथ सान्याल, सोहन सिंह जोश, जयप्रकाश नारायण और सम्पूर्णानंद आदि के साथ नज़रबंद रहे। साल 1939 में आई ‘प्रवासी के गीत’ वह किताब थी, जिसने हिंदी साहित्य में नरेन्द्र शर्मा को स्थापित कर दिया। ‘प्रवासी के गीत’ न सिर्फ आम पाठकों को पसंद आए, बल्कि आलोचकों ने भी इसे मुक्त कंठ से सराहा। इस संग्रह में हिन्दी काव्य जगत के श्रेष्ठ प्रेम गीत मौजूद हैं।

आज के बिछुड़े न जाने कब मिलेंगे?
आज से दो प्रेम योगी, अब वियोगी ही रहेंगे


लय व छंद में बंधे इन सुमधुर गीतों का कोई जवाब नहीं। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ लिखी, तो अपनी इस किताब में छायावाद के बाद हिंदी के मानचित्र पर उभरे हरिवंश राय बच्चन, रामधारी सिंह दिनकर और माखनलाल चतुर्वेदी जैसे बड़े कवियों के साथ नरेन्द्र शर्मा का भी उल्लेख किया। नरेन्द्र शर्मा ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद, सरमायेदारी और सामंतवाद के खिलाफ जमकर लिखा। उनकी प्रतिबद्धता किसानों और कामगारों के प्रति थी। श्रमजीवियों को वे नायक मानते थे और यह भी जानते थे कि यही वर्ग देश में क्रांति करेगा।

खलिहान खेत में खड़ा हुआ वह नया कृषक
बिजली का खंभा गाड़ रहा जो बिना हिचक!
अभिमंत्रित मंत्र-शक्ति से अब तू भी न झिझक
विद्युत के अश्वारोही का कर अभिनन्दन!
युग बदला, देता तुझे चुनौती युग-जीवन!

(कविता ‘युग बदला’)

देवली कैंप से रिहा होने के बाद पंडित नरेन्द्र शर्मा साल 1943 में बंबई पहुंच गए। उस वक्त हिंदी साहित्यकारों और शायरों का एक बड़ा ठिकाना फिल्मी दुनिया थी। जहां कई बड़े लेखक और शायर फिल्मों के लिए काम कर रहे थे। साहित्यकार भगवती चरण वर्मा ‘बॉम्बे टॉकीज’ से जुड़े हुए थे। भगवती चरण वर्मा ने ही उन्हें ‘बॉम्बे टॉकीज’ के मालिक हिमांशु राय और देविका रानी से मिलवाया। गीतकार के तौर पर नरेन्द्र शर्मा को पहली फिल्म ‘हमारी बात’ मिली। साल 1943 में आई इस फिल्म में नौ गीत थे और सभी नरेन्द्र शर्मा ने ही लिखे। इस फिल्म का अनिल विश्वास और पारुल घोष द्वारा गाया गीत ‘बादल दल सा निकल चला ये दल मतवाला रे’ खूब लोकप्रिय हुआ। कहने को ये फिल्मी गीत था, लेकिन इस गीत में भी पं. नरेन्द्र शर्मा ने बड़े बेहतरीन तरीके से अपने क्रांतिकारी विचार पेश कर दिये।

बादल दल सा निकला ये दल मतवाला रे
हम मस्तों में आन मिले कोई हिम्मतवाला रे
बिजली सी तड़पन नस-नस में आज नहीं हम अपने बस में
नये खून में लहर ले रही जीवन-ज्वाला रे
तूफानों से टक्कर लें हम परबत को दो टूक करें हम
बहुत दिनों अन्याय का हमने बोझ संभाला रे

भारत छोड़ो आंदोलन के बाद, जब अंग्रेजों का पूरे मुल्क में दमन चक्र चल रहा था, ऐसे प्रतिकूल हालात में इस तरह का आंदोलनकारी गीत लिखना, सचमुच हिम्मत का काम था। आज भी यह गीत जन आंदोलनों में गाया जाता है। अपनी पहली ही फिल्म में नरेन्द्र शर्मा ने यह साबित कर दिखाया कि वे फिल्म की सिचुएशन के हिसाब से गाने लिख सकते हैं। फिल्म ‘हमारी बात’ के बाद ‘ज्वार भाटा’, ‘मीरा’, ‘वीणा’, ‘उद्धार’, ‘सती अहिल्या’, ‘नरसिंहावतार’, ‘संत जनाबाई’ ‘श्रीकृष्ण दर्शन’ और ‘मालती माधव’ जैसी धार्मिक-संगीतप्रधान फिल्में आईं, जिनमें नरेन्द्र शर्मा ने संगीतकार वसंत देसाई और सुधीर फड़के जैसे प्रतिभाशाली संगीतकारों के साथ काम किया। फिल्मों के विषय के अनुसार उन्होंने उत्कृष्ट गीत रचे।

साल 1961 में आई फिल्म ‘भाभी की चूड़ियां’ वह फिल्म थी, जिसके गानों ने लोकप्रियता के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। खास तौर पर ‘ज्योति कलश छलके..’ गीत का आज भी कोई जवाब नहीं। संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लिखे गए इस बेहतरीन गीत के अलावा फिल्म के बाकी गीत ‘मेरा नन्हा कन्हैया घर आया रे’, ‘लाज राखो गिरधारी, मोरी लाल राखो’, ‘‘लौ लगाती गीत गाती’ भी हिट हुए। फिल्म ‘भाभी की चूड़ियां’ के गीतों की बेशुमार कामयाबी के बाद भी नरेन्द्र शर्मा को फिल्मों में गीत लिखने का उतना मौका नहीं मिला, जितना वे उसके हकदार थे। साल 1978 में आई निर्देशक राज कपूर की फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के शीर्षक गीत के अलावा उनका गीत ‘यशोमति मैया से बोले नंदलाला’ खूब लोकप्रिय हुआ।

इन गीतों के अलावा ‘ढोला ढोल मंजीरा बाजे रे’ (फिल्म-अखंड सौभाग्यवती), ‘भंवरे ने खिलाया फूल, फूल को ले’ (फिल्म-प्रेम रोग), ‘खेल खेल कर कुलेल नंदजी का लाल’ (फिल्म-दूसरी दुलहन), ‘तुम आशा विश्वास हमारी तुम धरती आकाश..’ (फिल्म-सुबह) जैसे काव्यात्मक गीत नरेन्द्र शर्मा की ही कलम से निकले। नरेन्द्र शर्मा के फिल्मी गीतों को भी हम कमतर नहीं आंक सकते। भाषा और शिल्प को लेकर उन्होंने कभी कोई समझौता नहीं किया।

फिल्मी गीतों के अलावा नरेन्द्र शर्मा ने अनेक गैर फिल्मी गीत लिखे। खास तौर पर भजन लिखने में उन्हे महारथ हासिल थी। उनके इन भजनों को लता मंगेशकर और भीमसेन जोशी जैसे चोटी के गायकों ने गाया है। पं. नरेन्द्र शर्मा, भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से भी जुड़े रहे। साल 1982 में देश में हुए एशियन गेम का थीम सांग,
अथ स्वागतम, शुभ स्वागतम
आनंद मंगल मंगलम
नित प्रियं भारत भारतम

उन्हीं का लिखा हुआ है। गीतकार नरेन्द्र शर्मा का एक महत्वपूर्ण योगदान आकाशवाणी के विविध रंगी कार्यक्रम ‘विविध भारती’ की परिकल्पना और नामकरण था। उन्होंने न सिर्फ विविध भारती के ‘पंचरंगी कार्यक्रम’ के लिए एक विशेष गीत ‘नाच रे मयूरा खोल कर सहस्त्र नयन’ लिखा, बल्कि कई लोकप्रिय कार्यक्रमों ‘हवा महल’, ‘जयमाला’, ‘मधुमालती’, ‘बेला के फूल’, ‘चौबारा’, ‘छाया गीत’, ‘चित्रशाला’, ‘उदय गान’, ‘गजरा’, ‘बंदनवार’, ‘मंजूषा’, ‘स्वर संगम’, ‘पत्रावली’ आदि की शुरुआत की। अनेक रूपक लिखे। नरेन्द्र शर्मा साल 1955 से लेकर 1971 तक ‘विविध भारती’ के चीफ प्रोड्यूसर रहे। उनके कार्यकाल में आकाशवाणी ने नए मुकाम छुए। आकाशवाणी की लोकप्रियता सात समंदर पार पहुंची।

पंडित नरेन्द्र शर्मा की विद्वता का सभी सम्मान करते थे। न सिर्फ उनके जूनियर, सीनियर बल्कि समकालीन भी। वे जब 60 वर्ष के हुए, तो मुंबई में उनके ऊपर एक बड़ा कार्यक्रम हुआ। इस कार्यक्रम में नरेन्द्र शर्मा के समकालीन डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने उनकी कविता के बारे में जो कहा, वह हिंदी साहित्य में नरेन्द्र शर्मा के योगदान को दर्शाता है। ‘‘इन चालीस वर्षों में हमारी हिन्दी कविता जितने सोपानों से होकर निकली है, पंडित नरेन्द्र शर्मा उन सब पर बराबर पांव रखते हुए चले हैं।

शायद प्रारम्भिक छायावादी, उसके बाद जीवन के संपर्क मांसलता लेते हुए ऐसी कविताएं, प्रगतिशील कविताएं, दार्शनिक कविताएं, सब सोपानों में इनकी अपनी छाप है….. मैं आपसे यह कहना चाहता हूं कि प्रेमानुभूति के कवि के रूप में नरेन्द्र जी में जितनी सूक्षमताएं हैं और जितना उद्बोधन है, मैं कोई अतिश्योक्ति नहीं कर रहा हूं, वह आपको हिन्दी के किसी कवि में नहीं मिलेगी।’’ 11 फरवरी, 1989 को एक सार्थक जीवन जीने के बाद पं. नरेन्द्र शर्मा इस दुनिया से हमेशा के लिए विदा हो गए।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार और लेखक हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on February 28, 2021 11:31 am

Share