Sunday, March 3, 2024

अदालत की अवमानना की गाईडलाइंस क्यों नहीं बनाती सुप्रीम कोर्ट!

आजकल न्यायपालिका के फैसलों और न्यायाधीशों की कड़ी आलोचना सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया पर हो रही है। इनमें सामान्य जन के साथ विशिष्ट जन भी शामिल हैं। किसी को अनदेखा कर दिया जा रहा है तो किसी पर न्यायालय अवमान अधिनियम के तहत अवमानना कार्रवाई की अनुमति नहीं दी जा रही है तो किसी पर बिना अनुमति के अवमानना की कार्रवाई हो रही है। इस संबंध में उच्चतम न्यायालय की कोई स्थापित गाईडलाइन्स नहीं है कि कहने और करने की सीमा रेखा क्या है?

देश में लोकतंत्र है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक प्रावधान है। इसके बाद भी यदि किसी न्यायाधीश के व्यक्तिगत आचरण की निंदा हो, या किसी निर्णय के निहितार्थ को कोई बताये तो उसे तो न्यायालय अवमान अधिनियम के तहत अवमानना में घसीट लिया जाता है और कई विशिष्ट लोग पूरी न्यायपालिका की शुचिता पर ही सवाल उठा देते हैं तो भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती। यह पूरे देश की जनता देख रही है और रोज सुन रही है, झेल रही है।        

अभी राजदीप सरदेसाई से एक टीवी वार्ता में पूर्व अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी ने कहा कि उच्च न्यायालयों और उच्च्तम न्यायालय  को स्वतंत्रता और जमानत के मामलों से निपटते हुए, न्यायाधीश धर्मेंद्र राणा के उस आदेश से प्रेरणा लेना चाहिए चाहिए, जो उन्होंने टूलकिट एफआईआर आरोपी दिशा रवि को जमानत देते हुए दिया है। रोहतगी ने कहा कि मैं न्यायपालिका के लिए बहुत सम्मान के साथ कह सकता हूं, तो उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय इस मोर्चे पर पिछड़ रहे हैं। रोहतगी ने यह भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में अदालतों, विशेष रूप से उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय ने जमानत देने में अनिच्छा दिखाई है। रोहतगी ने कहा कि जमानत न देकर वे एक प्रकार से दंड दे रहे हैं।

रोहतगी ने कहा की हम नौकरशाही पर सिर्फ फाइलों को लालफीताशाही में दबाने का आरोप लगाते हैं। अब यही बात न्यायपालिका में भी हो रही है। पहली अदालत कहती है, आप जिला अदालत जाइए। जिला अदालत कहती है, आप उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय जाएं, मैं जमानत नहीं दूंगा। आपको जेल में कुछ समय बिताना होगा। यह अब मानसिकता है- कुछ समय बिताओ।

अब यह पूरी न्यायपालिका की न्याय प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह है या नहीं? एक ओर अर्णब गोस्वामी और अमिश देवगन जैसों का मामला न्यायपालिका के सामने आता है तो उन्हें सिद्धांत के मुलम्मे में तत्काल राहत मिलती है पर केरल के पत्रकार का मामला आता है तो बेल नहीं जेल का नियम लागू हो जाता है, क्योंकि एफ़आईआर में देशद्रोह और यूएपीए की धाराएं जोड़ दी गई होती हैं।   

इसी तरह इंडिया टुडे समूह द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान पूर्व चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने एक इंटरव्यू में कहा कि आप पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था चाहते हैं, लेकिन आपके पास एक न्यायपालिका है। यदि आप अदालत में जाने वाले हैं, तो आप केवल अदालत में अपना गंदा लिनन धो रहे होंगे, आपको वहां न्याय नहीं मिलेगा। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है। केवल कॉरपोरेट लाखों रुपये लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने को तैयार रहते हैं। न्यायिक प्रणाली ने एक से अधिक कारणों से काम नहीं किया है। दुर्भाग्य से, ऐसे कई न्यायाधीश हैं, जो मीडिया में की गई आलोचना के शिकार हैं।

भारत के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने एक इंटरव्यू के दौरान पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा दिए गए बयानों के लिए उनके खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने पर अपनी सहमति देने से इनकार कर दिया है। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यह जवाब एक्टिविस्ट साकेत गोखले द्वारा न्यायपालिका और उच्चतम न्यायालय के बारे में अपने बयानों के लिए गोगोई के खिलाफ अवमानना कार्यवाही शुरू करने के बारे में पूछने पर दिया।

सहमति देने से इनकार करते हुए एजी वेणुगोपाल ने स्वीकार किया है कि गोगोई ने हाल के एक इंटरव्यू में न्यायपालिका और उच्चतम न्यायालय के बारे में कुछ बहुत ही कड़े बयान दिए हैं और उनकी ‘उन निराशाओं के साथ गहरी चिंता को प्रतिबिंबित किया, जो निस्संदेह न्याय व्यवस्था के सामने खड़े हैं।’एजी वेणुगोपाल ने यह दावा किया कि गोगोई ने जो कुछ भी इंटरव्यू में कहा था वह संस्थान की भलाई के लिए कहा था।  इसके साथ ही उनके वे बयान किसी भी तरह से अदालत में बिखराव या जनता की नजरों में उसका सम्मान कम नहीं करेगा।

एक्टिविस्ट साकेत गोखले ने 23 फरवरी को एजी वेणुगोपाल को पत्र लिखकर पूर्व चीफ जस्टिस और वर्तमान राज्यसभा सांसद रंजन गोगोई के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का अपमान करने और उसकी गरिमा को कम करने और अपमानित करने का प्रयास करने के खिलाफ अवमानना कार्यवाही की मांग की थी। गोखले के अनुसार, गोगोई के बयानों ने अदालत की घोर अवमानना की और उच्चतम न्यायालय को कमतर आंका।  विशेष रूप से यह देखते हुए कि बयानों की व्याख्या किसी व्यक्ति से नहीं बल्कि न्यायपालिका की सर्वोच्च संस्था पर बैठे किसी व्यक्ति ने है।

गोखले ने कॉमेडियन कुणाल कामरा और काटूर्निस्ट रचिता तनेजा के अवमानना मामलों को भी संदर्भित किया, जिसमें कहा गया था कि उन अवमानना मामलों में एजी के कार्यालय द्वारा दी गई अभियोजन सहमति ने आपकी राय में अदालत की अवमानना का एक मानक स्थापित किया है।  उनकी कही बात में और अधिक अवमानना और सुप्रीम कोर्ट की गंभीर निंदा है।

इस बीच केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने विधिक कार्यकर्ताओं द्वारा उन न्यायाधीशों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियां करने पर शनिवार को सख्त एतराज जताया, जो उनकी याचिकाओं पर अनुकूल आदेश जारी नहीं करते हैं और इसे ‘परेशान करने वाली एक नई प्रवृत्ति’ करार दिया। प्रसाद भारत के चीफ जस्टिस एसए बोबडे द्वारा पटना उच्च न्यायालय की एक नई इमारत के उद्घाटन के मौके पर यहां एक समारोह को संबोधित कर रहे थे।

प्रसाद ने जनहित याचिकाएं दायर करने वालों के अनुकूल फैसला नहीं आने पर उनके द्वारा न्यायाधीशों के खिलाफ सोशल मीडिया पर ‘घोर अनुचित’ टिप्पणियों का जिक्र करते हुए कहा कि हम निश्चित रूप से एक फैसले के तर्क की आलोचना कर सकते हैं, लेकिन मैं एक नई प्रवृत्ति देख रहा हूं, जिस पर मैं आज बात करने की जरूरत समझता हूं। उन्होंने कहा कि मैं अपनी चिंताओं को सार्वजनिक करने की सोच रहा था। मैंने यहां ऐसा करने के बारे में फैसला किया।

केन्द्रीय मंत्री ने सोशल मीडिया का उपयोग करने के लिए हाल ही में जारी किए गए दिशानिर्देशों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि हम स्वतंत्रता के समर्थक हैं। हम आलोचना के समर्थक हैं। हम असहमति के भी समर्थक हैं, लेकिन मुद्दा सोशल मीडिया के दुरुपयोग का है। सोशल मीडिया पर किसी के लिए भी शिकायत निवारण तंत्र होना चाहिए।

ये वही रविशंकर प्रसाद हैं जो उच्चतम न्यायालय पर न्यायिक सक्रियता का आरोप लगाते थे और यहां तक कहते हैं कि क्या न्यायपालिका सरकार चलाएगी। 26 फरवरी 2018 को केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने पटना में आयोजित एक समारोह में कहा कि न्यायपालिका को अपनी सीमाएं नहीं लांघनी चाहिए।

प्रसाद ने भारत में राज्य न्यायाधिकरणों के द्वितीय राष्ट्रीय सम्मलेन के समापन समारोह को संबोधित करते हुए कहा कि देश के संविधान में विधायिका को कानून बनाने, कार्यपालिका को उसे क्रियान्वित करने और न्यायपालिका को उसकी व्याख्या करने का अधिकार दिया गया है। इस लक्ष्मण रेखा को न्यायपालिका द्वारा लांघा नहीं जाना चाहिए, लेकिन पिछले कुछ समय से ये न्यापालिका के पक्ष में बोल रहे हैं, क्योंकि तमाम मुद्दों पर न्यायपालिका सरकार के साथ खड़ी नजर आ रही है, जिसके कारण पब्लिक डोमेन में न्यायपालिका लोगों के निशाने पर है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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