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हमारे जिया भाई: इतिहास का एक अहम दौर जिनकी आंखों से होकर गुजरा!

इलाहाबाद के प्रगतिशील राजनीति और साहित्य से जुड़ा हर व्यक्ति जिया भाई को जानता ही जानता है, वे इन दोनों ही क्षेत्रों में शहर के ‘आदिपुरुष’ थे। इस कारण 1997-98 से राजनीति में सक्रियता शुरू होने के साथ ही मैंने भी जिया भाई का नाम सुन लिया था और कई कार्यक्रमों में उन्हें देखा-सुना भी था। लेकिन उनसे मेरी व्यक्तिगत जान-पहचान 2005 में हुई, जब मुझे ‘सहारा समय’ के लिए इलाहाबाद के कम्युनिस्ट आन्दोलन पर कुछ लिखना था। जाहिर है शहर के इस ‘आदिपुरुष’ से मिले बगैर यह लेख लिखा ही नहीं जा सकता था। वे अविभाजित कम्युनिष्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्यकर्ता रहे हैं। कम्युनिस्ट पार्टी के हर विघटन के साक्षी रहे हैं। प्रतिष्ठित समाचार पत्र “एशियन एज” में उन्होंने पत्रकारिता भी की। उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी साहित्य के जानकार थे।

भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन से उनका जुड़ाव रहा है। 27 फरवरी, 1931 में जब कंपनी बाग में चन्द्रशेखर आजाद की शहादत हुई, तो वे 5वीं कक्षा के छात्र थे, जिसके बारे में याद करते हुए वे बताते हैं कि पूरा इलाहाबाद कंपनी बाग में उमड़ पड़ा था, जिसमें छोटे जिया भाई भी थे। यह बात उनके मुंह से सुनना हमारे लिए एक रोमांचक अनुभव था, उनकी आंख से हमने भी चंद्रशेखर आज़ाद की शहादत को देखा और उसके दर्द को कई बार महसूस किया है। भारत पाकिस्तान का बंटवारा उन्होंने न सिर्फ देखा था, बल्कि व्यक्तिगत तौर पर उसे झेला भी था, उनके परिजन पाकिस्तान चले गये लेकिन उन्होंने अपने रहने के लिए भारत को ही चुना। बंटवारे का दर्द हमने भी ज़िया भाई की कहानियों के दर्द से गुजर कर महसूस किया है। उन्होंने 1947 के बाद पूरे भारत का सफर देखा और भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का भी।

अपनी पत्नी के साथ नागरिक अभिनंदन में।

बेशक वे आज तक सीपीआई के पक्के समर्थक और सदस्य थे, लेकिन हर आन्दोलनकारी को अपनी बिरादरी का ही मानते थे। इसीलिए किसी भी पार्टी-संगठन से जुड़ा हर व्यक्ति उनसे बेहद प्यार करता था, और उन्हें अपना सरपरस्त मानता था। वे इस बड़े कुनबे के बुजुर्गवार की तरह हमारे बीच रहे।.. तो इनसे बात किये बगैर वह लेख लिखा ही नहीं जा सकता था, यह मेरे लिए उत्साह की बात थी, कि इसी बहाने जिया भाई को करीब से जानने का मौका मिलेगा। उनसे फोन पर बात कर मैं सुबह-सुबह मिलने पहुंच गयी। उस वक्त उनके यहां आये 5 अखबारों को पढ़कर सुनाने के लिए हिमांशु रंजन जी आया करते थे। जब मैं पहुंची, तो हिमांशु जी बाहर ही बैठे उन्हें अखबार पढ़कर सुना रहे थे और यह आखिरी अखबार था।

लेख से सम्बन्धित बातचीत करते हुए ही मुझे इसका अन्दाजा हुआ कि वे बहुत अधिक पढ़े-लिखे व्यक्ति थे और कोई ऐसा क्षेत्र नहीं था, जिसमें उनका हस्तक्षेप न हो। बात-बात में एक से बढ़कर एक नायाब शेर सुनाते थे। उस वक्त तो काफी कुछ मेरे सिर के ऊपर से भी निकल गया और आज की तरह रोक कर उसका मतलब पूछने की हिम्मत भी नहीं थी। नक्सलबाड़ी के आन्दोलन और आज की कम्युनिस्ट पार्टियों के सन्दर्भ में हिंसा-अहिंसा के सवाल पर उनसे काफी देर तक बातचीत और बहस भी हुई। समापन इस पर हुआ कि ‘‘जिसे जो ठीक लगे वो करना चाहिए, कुछ न करना गलत है।’’

एक जुलूस में। साथ में साहित्यकार दूधनाथ सिंह, राजेंद्र कुमार, रामजी राय, हरिश्चंद्र द्विवेदी और एडवोकेट रविकिरन जैन।

बातचीत के दौरान ही उन्होने मेरे बारे में पूछा। मैंने बताया और अपनी पत्रिका ‘दस्तक’ निकालकर झिझकते हुए उनकी ओर बढ़ा दिया। सोच रही थी कि इतना पढ़ा-लिखा आदमी छात्रों को ध्यान में रखकर निकाली जा रही पत्रिका भला क्यों पसन्द करेगा। लेकिन उन्होंने लिया और उलट-पुलटकर देखा और सम्पादकीय मेरे सामने ही बैठकर बिना किसी मदद के पढ़ भी डाला। फिर लम्बी सांस लेकर बोले ‘‘बहुत अच्छा।’’ कुछ देर में उठकर अन्दर गये और सीपीआई का मुखपत्र  लेकर आये। उसके बाद से मेरा उनका पत्रिकाओं के लेन-देन का सिलसिला शुरू हो गया। इस बहाने उनसे कम से कम दो महीने में एक बार मुलाकात जरूर होती रही।

2010 में जब मैं जेल गयी तो हमारी रिहाई के लिए परेशान रहे। जेल में मिलने गये मेरे भाई ने बताया कि एक जिया भाई हैं, छड़ी लेकर मीटिंग में आते हैं, तुम्हारी रिहाई के प्रयास बढ़ाने के लिए लोगों को बोलते रहते हैं। बाद में उनके बेटे सुहेल एक डेलीगेशन के साथ हमसे मिलने जेल में आये तो उनसे बिना पूछे मैंने ये मान लिया कि उन्हें जिया भाई ने ही भेजा होगा। जेल से बाहर आने के बाद मैं और विश्वविजय उनसे मिलने उनके घर गये, तो बहुत ही गर्मजोशी के साथ उन्होंने हमारा स्वागत किया। घर में हमारी रिहाई के लिए लगाया गया एक पोस्टर भी दिखाया, जिसमें से एक हमें भेंट में दे दिया। उसके बाद फिर से हमारे बीच ‘दस्तक’ और उनके पास आने वाली CPI की पत्रिकाओं का आदान-प्रदान शुरू हो गया। हमारे ही नहीं, शहर के किसी भी प्रगतिशील आयोजन की शुरूआत जिया भाई के बगैर नहीं हो सकती थी।

उनकी अस्वस्थता के बावजूद हम सब चाहते थे कि जिया भाई उसमें जरूर रहें। 2016 में हमने साम्राज्यवाद पर लेनिन की पुस्तक के 100 साल पूरे होने पर मार्क्सवाद के विचारों के साथ साम्राज्यवाद के विरोध में एक बड़ा आयोजन किया, जिसमें क्रांतिकारी कवि वरवर राव को भी आना था। जिया भाई ने अस्वस्थ होने और उस वक्त शहर का माहौल खराब होने के बावजूद आकर दो दिवसीय सेमिनार का उद्घाटन किया। अगले दिन चन्द्रशेखर आजाद के शहादत दिवस पर होने वाली रैली का आगाज भी अपने जोशीले नारों से किया। वरवर राव, नन्दिनी सुन्दर, सुधीर ढावले और बाहर से आये सभी मेहमान बुजुर्ग जिया भाई का जोश देखकर बहुत प्रभावित हुए। 2018 में जेल जाने के पहले तक फोन पर बातचीत में वरवर राव और उनकी पत्नी जिया भाई का हाल-चाल लेना नहीं भूलती थीं।

तीन साल पहले तक जिया भाई शारीरिक रूप से भले ही अशक्त होते जा रहे थे, लेकिन दिमागी रूप से जितना सक्रिय थे, वो हमारे लिए आश्चर्य का विषय है। जाते ही सबसे पहले हाल-चाल पूछते और पूछते कि क्या चल रहा है, फिर एकदम ताजा मसले बात करके पूछते ‘‘आप लोग इस पर क्या कर रहे हैं’’ कभी-कभी थोड़ा नाराजगी के साथ भी बोलते ‘‘आप लोग इस पर कुछ करिये भाई।’’ सन 2017 में जब अखलाक को मारा गया था, तो इस खबर से वे बेहद निराश, दुखी और गुस्से में भी थे। इसके एक-दो रोज बाद ही मैं और विश्वविजय उनसे मिलने गये थे, तो इस घटना को लेकर वे जितना दुखी थे, उतना दुखी मैंने उन्हें कभी नहीं देखा था -‘‘क्या हो रहा है ये सब इस देश में, आप लोग कुछ करिये।’’ उस बीच जो भी उनसे मिलने गया होगा, उन्होंने सबसे यह बात कही होगी, और अगर वे स्वस्थ्य होते तो कुछ करने के लिए पहल भी ले ली होती।

लेखिका सीमा आजाद के साथ जिया उल हक।

इसके बाद उनकी दिमागी सक्रियता कम होने लगी। आज लग रहा है कि शायद यह उनका इस समाज के खिलाफ एक प्रतिरोध था। धीरे-धीरे उन्होंने हम सब लोगों को पहचानना भी छोड़ दिया। पहुंचने पर वे हमसे पूछते थे- ‘‘कहिये, आपका परिचय?’’ एक दो बार दुख हुआ, फिर उनका मिलने का यह अन्दाज गुदगुदाने लगा, और मुझे तो यही सुनने के लिए उनके पास आने का मन करने लगा। कोरोना के कारण कई महीनों से तो यह भी सुनने को नहीं मिला। 28 सितंबर भगत सिंह के जन्मदिन को उन्होंने अपना जन्मदिन भी बना लिया था। उनकी अस्वस्थता के दौर में हम इस दिन उनके घर जाकर उन्हें शुभकामनाएं देते। सौवें जन्मदिन पर यह हर साल की तरह तो नहीं हो सका, लेकिन हम कुछ लोगों ने सुबह के समय जाकर उन्हें शुभकामनाएं दी। उन्हें इस बार इसका एहसास नहीं था कि हम क्यों आए हैं। उन्होंने किसी से ये भी नहीं पूछा- “कहिये, आपका परिचय?” शाम को सुहेल ने उनके चाहने वालों के लिए ज़ूम पार्टी रखी थी।

जन्मदिन की बात करते ही आण्टी याद आ गयीं। जिया भाई ने लम्बी और सक्रिय उम्र इस कारण पाई, क्योंकि उन्हें बशीर आण्टी जैसी हमसफर मिली। जन्मदिन में दोनों एक-दूसरे का हाथ थामे मेहमानों का इन्तजार और स्वागत करते थे। ये प्यारा दृश्य होता है, हम आप दोनों को इसी तरह कई-कई बार साथ देखने के इन्तजार में हैं। इस बार जिया भाई के शतायु होने पर हुई ज़ूम पार्टी में यह भी देखने को नहीं मिला क्योंकि डॉक्टर बशीर काफ़ी बीमार थीं। इस जन्मदिन के कुछ ही दिन बाद 8 अक्टूबर को आंटी का इंतकाल हो गया। उस दिन सबसे ज़्यादा बुरा ज़िया भाई के लिए ही लगा और उसी दिन दिमाग में आया कि अब ज़िया भाई भी ज्यादा नहीं जी सकेंगे।

हालांकि उनकी मानसिक स्थिति ऐसी थी कि उन्हें आंटी की मौत का पता ही नहीं चला, लेकिन ज़रूर उन्होंने इस दूरी का एहसास कर लिया होगा। उनकी मौत के मात्र डेढ़ महीने बाद कल ही (22 नवंबर) वे भी चल बसे। ” कॉमरेड ज़िया भाई को लाल सलाम” के नारों के साथ हम उन्हें भी बशीर आंटी के पास कब्रिस्तान में छोड़ आए। ज़िया भाई ने अपनी नौजवानी में जिस ओर कदम बढ़ाया, उस पर अपने बुढ़ापे तक डटे रहे। देश में बढ़ती साम्प्रदायिकता से वे बहुत दुखी रहने लगे थे, उनकी चिंता अब हमें आत्मसात करनी है। 100 साल का सार्थक जीवन जीने वाले कॉमरेड जिया उल हक, हमारे प्यारे जिया भाई को हमारा सलाम।

(सीमा आजाद एक्टिविस्ट और पत्रकार हैं। आप आजकल इलाहाबाद में रहती हैं।)

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This post was last modified on November 23, 2020 5:56 pm

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