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एक ज़िंदा कसक का नाम है मंटो, जो हमेशा बनी रहेगी

आज, 11 मई को उर्दू के अनोखे अफसानानिगार सआदत हसन मंटो का जन्मदिन है। उन्हें याद करते हुए पहले उनकी कहानियों के कुछ सियाह हाशिये पढ़िये।

इस्लाह
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“कौन हो तुम?”
“तुम कौन हो?”
“हर-हर महादेव – हर-हर महादेव – हर हर महादेव।”
“सबूत क्या है?”
“सबूत – मेरा नाम धर्मचन्द है।”
“यह कोई सबूत नहीं।”
“चार वेदों में से कोई भी बात मुझसे पूछ लो।”
“हम वेदों को नहीं जानते। सबूत दो।”
“क्‍या?”
“पायजामा ढीला करो।”
पायजामा ढीला हुआ तो शोर मच गया- “मार डालो, मार डालो।”
“ठहरो, ठहरो, मैं तुम्हारा भाई हूँ। भगवान की क़सम तुम्हारा भाई हूँ।”
“तो यह क्या सिलसिला है?”
“जिस इलाके से आ रहा हूँ, हमारे दुश्मनों का था इसलिए मजबूरन मुझे ऐसा करना पड़ा, सिर्फ़ अपनी जान बचाने के लिये। एक यही चीज़ ग़लत हो गयी है। बाकी बिल्कुल ठीक हूँ।”
“उड़ा दो ग़लती को।”
ग़लती उड़ा दी गयी। धर्मचन्द भी साथ ही उड़ गया।

दावते-अमल
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आग लगी तो सारा मुहल्ला जल गया- सिर्फ़ एक दुकान बच गयी, जिसकी पेशानी पर यह बोर्ड लगा हुआ थाः “यहाँ इमारतसाज़ी का सारा सामान मिलता है।’

पेशबन्दी
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पहली वारदात नाके के होटल के पास हुई। फौरन ही वहाँ एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया।

दूसरे रोज शाम को स्टोर के सामने हुई। सिपाही को पहली जगह से हटाकर दूसरी वारदात के मुकाम पर नियुक्त कर दिया गया।

तीसरा केस रात के बारह बजे लॉण्ड्री के पास हुआ।

जब इन्सपेक्टर ने सिपाही को इस नयी जगह पहरा देने का हुक्म दिया तो उसने कुछ देर ग़ौर करने के बाद कहा,  “मुझे वहाँ खड़ा कीजिए, जहाँ नयी वारदात होने वाली हो। “

मंटो, भारत-पाक बंटवारे के दौरान जो उन्माद और पागलपन उफान पर था, के सबसे सशक्त और यथार्थवादी कथाकार रहे हैं। कभी-कभी वह यथार्थ इतना अविश्वसनीय और हौलनाक दिखता और व्यक्त हो जाता है कि वह किस्सा वहीं छोड़ देना मुनासिब लगता है। ऐसे यथार्थ से मुंह चुराने वाले के लिये आलोचक यह भी तोहमत उन पर लगा देते हैं कि यह लेखन अश्लील है और समाज पर इसका बुरा प्रभाव पड़ेगा। मंटो पर अश्लीलता के आरोप कई बार लगे हैं।

एक बार उन पर अश्लीलता का आरोप औरत की छाती शब्द लिखने पर लाहौर के एक मौलवी ने लगाया था। इस रोचक प्रसंग का उल्लेख इस्मत चुगताई ने अपनी आत्मकथा ‘कागज़ी है पैराहन’ में बेहद बेबाकी से किया। यह किस्सा तब का है जब देश बंटा नहीं था। मंटो और इस्मत दोनों ही भारत के थे। पर विडंबना देखिये, इस मुक़दमे के कुछ ही साल बाद इस्मत तो भारतीय ही रहीं, पर मंटो पाकिस्तान के हो गए। पर साहित्य प्रेमियों के लिये न मंटो बदले न इस्मत। भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में इस मिट्टी से जन्में ये दोनों साहित्यकार खूब पढ़े भी जाते हैं और सराहे भी।

लाहौर की अदालत में तब दो मुक़दमे लगे थे। एक इस्मत चुगताई की कहानी, लिहाफ के संबंध में दूसरी मंटो के अफसाना बू के सम्बंध में। अदालत में जब यह दोनों लेखक अपने-अपने मुक़दमे के संबंध में पहुंचे तो अदालत भीड़ से भरी थी। दोनों ही लोकप्रिय लेखक थे। लोग उन्हें चाव से पढ़ते भी थे। और बात जब अश्लीलता की हो तो वह लोगों को यूं भी खींचती ही है। अब अदालत में मंटो के मुक़दमे में क्या हुआ यह इस्मत चुगताई के ही शब्दों में पढ़ें तो अधिक रोचक लगेगा।

इस्मत लिखती हैं,

मेरे वकील ने मुझे समझा दिया था कि जब तक मुझसे सीधे न सवाल किये जायें मैं मुँह न खोलूँ। वकील जो मुनासिब समझेगा, कहेगा। पहले ‘बू’ का नम्बर आया।

“यह कहानी अश्लील है?” मंटो के वकील ने पूछा।

“जी हाँ।” गवाह बोला।

“किस शब्द में आपको मालूम हुआ कि अश्लील है?”

गवाह: शब्द “छाती!”

वकील: माई लार्ड, शब्द “छाती” अश्लील नहीं है।

जज: दुरुस्त!

वकील: शब्द “छाती” अश्लील नहीं।

गवाह: “नहीं, मगर यहाँ लेखक ने औरत के सीने को छाती कहा है।”

मंटो एक दम से खड़ा हो गया, और बोला “औरत के सीने को छाती न कहूँ तो मूँगफली कहूँ।”

कोर्ट में क़हक़हा लगा और मंटो हंसने लगा। “अगर अभियुक्त ने फिर इस तरह का छिछोरा मज़ाक किया तो कंटेम्पट ऑफ कोर्ट के जुर्म में बाहर निकाल दिया जायेगा। या फिर सज़ा दी जायेगी।” अदालत ने कहा।

मंटो को उसके वकील ने चुपके-चुपके समझाया और वह समझ गया। बहस चलती रही और घूम-फिरकर गवाहों को बस एक “छाती” मिलता था जो अश्लील साबित हो पाता था।

“शब्द “छाती” अश्लील है, घुटना या केहुनी क्यों अश्लील नहीं है?” मैंने मंटो से पूछा।

“बकवास” मंटो फिर भड़क उठा।

यह मुकदमा खारिज हो गया और छाती शब्द अश्लील नहीं साबित हो सका।

मंटो ताज़िन्दगी अपनी लिखी कहानियों पर बेमतलब के आरोपों के लिये अदालतों के चक्कर लगाते हुए, मुफ़लिसी में समाज की नफ़रत झेलते रहे और चर्चा में बने रहे। आज भी एक सच कहने और लिखने वाले कथाकार के रूप में मंटो किसी से कम नहीं हैं। अपने लेखन पर टिप्पणी करते हुए, मंटो ने अपनी कहानी ‘गंदे फरिश्ते’ में समाज की ओढ़ी हुयी नैतिकता पर खुल कर बोलते हुये लिखा है कि,

” मैं ऐसे समाज पर हज़ार लानत भेजता हूं जहां यह उसूल हो कि मरने के बाद हर शख़्स के किरदार को लॉन्ड्री में भेज दिया जाए जहां से वो धुल धुलाकर आए। “

कुछ नैतिकतावादियों की नज़र में मंटो,

एक महान लेखक होकर भी एक ‘बदनाम’ लेखक ही समझे गये।

उनकी लिखी यह पांच कहानियों धुंआ, बू, ठंडा गोश्त, काली सलवार और ऊपर, नीचे और दरमियां बेहद चर्चित रहीं और इन पर अश्लीलता का भी आरोप लगा। मुक़दमे भी चले। बू के सम्बन्ध में अदालती कार्यवाही का उल्लेख आप इस्मत चुगताई के शब्दों में पढ़ चुके हैं। मंटो पर चार मुकदमे ब्रिटिश राज में और एक मुकदमा बंटवारे के बाद पाकिस्तान की अदालत में चला था।

अंग्रेजों के शासन काल में हुए तो एक मुकदमा देश के बंटवारे के बाद के पाकिस्तान में हुआ। लेकिन जरा सोचिए कि अगर मंटो बदनाम लेखक न होते तो फिर उर्दू के एक आम अफसानानिगार ही तो होते। लेकिन, किसी भी मामले में मंटो को सज़ा नहीं हुई। सिर्फ एक मामले में पाकिस्तान की अदालत ने उन पर जुर्माना लगाया था। यह भी एक  विडंबना ही है, सभ्यता और संस्कृति के झंडाबरदारों की ओढ़ी हुयी नैतिकता की नज़र में वे समाज को प्रदूषित करने वाले लेखक समझे जाते थे, पर मंटो ने समाज के इस पाखंडी स्वरूप की कभी परवाह नहीं की, उनकी कलम, जब तक वे लिखने में सक्षम रहे,  समाज की नंगी सच्चाइयों को अपने दृष्टिकोण से बेनकाब करती रही ।

मंटो ने लिखा है,

‘मुझमें जो बुराइयां हैं दरअसल वो इस युग की बुराइयां हैं। मेरे लिखने में कोई कमी नहीं। जिस कमी को मेरी कमी बताया जाता है वह मौजूदा व्यवस्था की कमी है। मैं हंगामा पसंद नहीं हूं। मैं उस सभ्यता, समाज और संस्कृति की चोली क्या उतारूंगा जो है ही नंगी। ”

मंटो के समीक्षक और उनके पाठक उनको वक़्त के पहले जन्मा हुआ लेखक मानते हैं। पर वक़्त का मिजाज कब बदलता है ? वक़्त बार बार अतीत की ही खोह की ओर लौट जाना चाहता है। उसे उसी खोह में सारा गौरव और कीर्ति बसी हुयी दिखाई देती है। पर जो लेखक अतीत के उस संवेग को तोड़ कर आगे बढ़ जाते हैं वे ही कालजयी होते हैं। मंटो को एक बदनाम लेखक माना जाता है । उनकी महानता के साथ यह बदनामी बावस्ता है। बदनाम तो ग़ालिब को भी उनके समय में माना गया था। हज़ार ऐब उनके तब भी गिनाए गए थे जब उनके लिखे शेर और ग़ज़ल लोगों की ज़ुबान पर छा गए थे। “शायर तो वो अच्छा है, पर बदनाम बहुत है। ” समाज भी एक विचित्र मनोग्रंथि में रहता है। एक विकृत और विद्रूप समाज भी हर उस व्यक्ति से नैतिकता के उच्च मानदंडों के पालन की अपेक्षा करता है जो समाज की इन विद्रूपताओं पर अंगुली उठाने लगता है।

उनकी कहानी के मुख्य विषय औरत-मर्द के रिश्ते, साम्प्रदायिक दंगे और भारत-पाकिस्तान का बंटवारा थे। मंटो का जन्म लुधियाना में हुआ था और उनकी कर्मभूमि बम्बई थी। मंटो, फिल्मों के लिये भी लिखते थे।

उनकी कहानियां, जो औरत मर्द के रिश्तों पर लिखी गई है, अपने समय में थोड़ी अजीब सी लगती हैं। वह युग स्त्री विमर्श का नहीं था। फिर भी उर्दू साहित्य में, उस वक़्त, मंटो और इस्मत ने औरतों पर ऐसी कहानियां लिख कर धूम मचा दी थी, जो तब बोल्ड कही जाती थीं। लेकिन आज समय बहुत बदल गया है। सिमोन के ‘द सेकेंड सेक्स’ ने स्त्रियों के प्रति बहुत से लोगों का नज़रिया ही बदल दिया है। वर्तमान कालखंड में जब स्त्रीवादी लेखन और विचार के अनेक नए नए आयाम सामने आ रहे हैं, तब मंटो की उन औरतों की कहानियों को दुबारा पढ़ा जाना चाहिए।

अपनी कहानी में औरतों के संदर्भ में मंटो कहते हैं,

” मेरे पड़ोस में अगर कोई महिला हर दिन अपने पति से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए जरा भी हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई महिला अपने पति से लड़कर और आत्महत्या की धमकी दे कर सिनेमा देखने चली जाती है और पति को दो घंटे परेशानी में देखता हूं तो मुझे हमदर्दी होती है। “

मंटो के स्त्री विमर्श की कहानियों पर एक समीक्षक की यह टिप्पणी पढ़ें,

” मंटो जिस बारीकी के साथ औरत-मर्द के रिश्ते के मनोविज्ञान को समझते थे उससे लगता था कि उनके अंदर एक मर्द के साथ एक औरत भी ज़िंदा है। उनकी कहानियां जुगुप्साएं पैदा करती हैं और अंत में एक करारा तमाचा मारती हैं और फिर आप पानी-पानी हो जाते हैं।”

धार्मिक उन्माद और, धर्म के आधार पर भारत का बंटवारा मंटो की कहानियों का एक मुख्य विषय रहा है। ‘टोबा टेक सिंह’ उनकी एक और कालजयी कहानी है। नो मेन्स लैंड पर पड़ा टोबा टेक सिंह कहानी का वह विक्षिप्त नायक, पूरी कहानी में दिल को हिला देने वाला चरित्र है। कहानी का वह पागल नायक उस समय इतिहास के महान नायकों की तुलना में सबसे अधिक समझदार दिखता है। मंटो की कलम से निकला, यह एक अद्भुत प्रतीक और विम्ब है। जीवन भर, मंटो मजहबी कट्टरता के खिलाफ लिखते रहे। सांप्रदायिक दंगों की वीभत्सता और पागलपन को मंटो ने अपनी कहानियों में, इस प्रकार प्रस्तुत किया है कि उस वक़्त के सारे रहनुमा बौने नज़र आते हैं। मंटो के लिए मजहब से ज्यादा कीमत इंसानियत की थी। मंटो ने लिखा,

” मत कहिए कि हज़ारों हिंदू मारे गए या फिर हज़ारों मुसलमान मारे गए। सिर्फ ये कहिए कि हज़ारों इंसान मारे गए और ये भी इतनी बड़ी त्रासदी नहीं है कि हज़ारों लोग मारे गए। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये है कि हज़ारों लोग बेवजह मारे गए। “

वे आगे लिखते हैं,

” हज़ार हिंदुओं को मारकर मुसलमान समझते हैं कि हिंदू धर्म ख़त्म हो गया लेकिन ये अभी भी ज़िंदा है और आगे भी रहेगा। उसी तरह हज़ार मुसलमानों को मारकर हिंदू इस बात का जश्न मनाते हैं कि इस्लाम ख़त्म हो चुका। लेकिन सच्चाई आपके सामने है। सिर्फ मूर्ख ही ये सोच सकते हैं कि मजहब को बंदूक से मार गिराया जा सकता है। ”

वक्त के अफसानानिगारों, कृश्न चंदर, राजिन्दर सिंह बेदी, अहमद नदीम क़ासमी, इस्मत चुग़ताई और ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे लेखकों के होते हुए भी मंटो अपनी तरह के अकेले कथाकार थे। बंटवारे का दर्द हमेशा उन्हें सालता रहा। 1948 में पाकिस्तान जाने के बाद वे वहां सिर्फ सात साल ही जी सके और 1912 में भारत के पूर्वी पंजाब के समराला में पैदा हुए मंटो 1955 में पाकिस्तान के पश्चिमी पंजाब के लाहौर में दफन हो गए।

आज इन्हीं महान कथाकार सआदत हसन मंटो के जन्मदिन पर उनका विनम्र स्मरण।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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This post was last modified on May 11, 2020 2:18 pm

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