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Thursday, September 23, 2021

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जयंती पर विशेष: रुढ़िवादी परंपराओं और दकियानूसी बेड़ियों को तोड़कर सावित्रीबाई ने रचा इतिहास

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आज भारत की प्रथम महिला शिक्षिका राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले की 190 वीं जयंती हैं। 19वीं शताब्दी में उनके द्वारा किये गए साहसिक कार्यों को आज 21वीं सदी में भी जब हम देखते हैं, तो हमें आश्चर्य होता है, और हमारा मस्तक विस्मय और गर्व से ऊंचा हो जाता है। इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर जब मैं उनके जीवन और कार्यों पर विचार करता हूं, तो मुझे लगता है कि ‘आधुनिकता’ के सभी अर्थों में वे भारत की पहली आधुनिक महिला थीं। ज्योतिराव फुले की साथी और जीवन संगिनी होते हुए भी उनका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व एवं स्थान था।

     ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले के नामों और कामों से मेरा प्रथम परिचय ‘6’ अथवा ‘7’ वीं कक्षा में मेरे गुरु श्री गोमती प्रसाद जी ने करवाया था। और तभी से मेरे बाल मन में यह नाम अंकित है। बाद में इतिहास के विद्यार्थी के तौर पर जब मैंने यह देखा कि भारत के सामाजिक इतिहास में फुले दंपति का जिक्र बहुत कम शब्दों में आता है। तब मुझे इतिहास में जाति पूर्वाग्रहों का सही मायने में सही अहसास हुआ और इस अहसास ने मुझे ज्योतिबा को जानने के लिए प्रेरित किया। उनके जीवन और कार्यों के अध्ययन के सिलसिले में सावित्रीबाई के जीवन और कार्यों से मेरा परिचय बढ़ता गया और मैं उनके प्रति श्रद्धावनत होता गया।

     ‘हिंदू’ धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपरा में शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की स्थिति को आधुनिक भारत में पहली बार जिस महिला ने चुनौती दी, उनका नाम सावित्रीबाई फुले है। उनका जन्म 3 जनवरी, 1831 ई. को महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित गांव ‘नाय’ गांव में हुआ था। यह स्थान पूना के नजदीक है। उनके पिता का नाम खंडोजी नेवसे था, जो शूद्र जाति के थे। उस जमाने में शूद्र जाति में पैदा किसी लड़की के लिए, शिक्षा पाने का कोई सवाल ही नहीं था, लिहाजा वह घर के काम करती थीं और खेती के कामों में अपने पिता का सहयोग करती थीं। पहली बार पुस्तक से उनकी भेंट विदेशी मिशनरी लोगों द्वारा बांटी जा रही ईसा मसीह के जीवन से संबंधित पुस्तिका के रूप में हुई।

इस घटना के बारे में सावित्री बाई ने लिखा है, वे अपने गांव के पास लगाने वाले साप्ताहिक बाजार शिवाल में गांव के लोगों के साथ गई थीं। जब वे लौट रही थीं, तो उन्होंने देखा कि बहुत सारी विदेशी महिलाएं और पुरुष एक पेड़ के नीचे ईसा मसीह को प्रार्थना करते हुए गाना गा रहे थे। वे कौतूहलवश वहां रुक गईं और उन्हीं में से किसी महिला या पुरुष ने उनके हाथ में एक पुस्तिका थमा दी। सावित्रीबाई पुस्तिका लेने से हिचक रही थीं तो देने वाले ने कहा, यदि तुम्हें पढ़ना नहीं भी आता है, तो भी तुम इसे ले जाओ। तुम्हें इसमें छपे चित्रों को देखकर आनंद आएगा। इस तरह सावित्रीबाई को पहली बार कोई पुस्तक देखने को मिला, उन्होंने सवाल कर रख लिया।

     1840 ई. में ‘9’ वर्ष की अवस्था में उनकी शादी ‘13’ वर्षीय ज्योतिराव फुले के साथ हुई और वह अपने घर से ससुराल आईं तो यह पुस्तिका भी साथ ले आईं। ज्योतिराव फुले भी तब नाबालिक ही थे। बाल विवाह उस समय व्यापक तौर पर प्रचलित परंपरा थी।

     आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के दो केंद्र रहे हैं- बंगाल और महाराष्ट्र। बंगाली पुनर्जागरण मूलतः हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के भीतर सुधार चाहता था और इसके अगुवा उच्च जाति व उच्च वर्ग के लोग थे। इसके विपरीत ज्योतिराव का कार्य हिंदू धर्म, सामाजिक व्यवस्था और परंपराओं के लिए चुनौती था।

     वर्ण-जाति व्यवस्था को तोड़ने और महिलाओं पर पुरुषों के वर्चस्व के खात्मे के लिए संघर्ष किया। महाराष्ट्र में पुनर्जागरण की अगुवाई शूद्र और महिलाएं कर रही थीं। ज्योतिराव फुले, सावित्रीबाई फुले, पंडित रमाबाई और ताराबाई शिंदे इसकी अगुवाई कर रहे थे। महाराष्ट्र के पुनर्जागरण के सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति ज्योतिबाई फुले थे। ज्योतिराव गोविंदराव फुले (जन्म 11 अप्रैल, 1827, मृत्यु-28 नवंबर, 1890) एक विचारक, समाजसेवी, लेखक, दार्शनिक, तथा क्रांतिकारी कार्यकर्ता थे। ज्योतिराव फुले भी ब्राह्मण जाति वर्ण व्यवस्था के हिसाब से शूद्र वर्ण और माली जाति के थे, जिनके लिए ब्राह्मणवादी धर्मग्रंथों का आदेश है कि उनका काम ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों की सेवा करना है।

ज्योतिराव के पूर्वज सतारा के कप्तगुल गांव में रहते थे और खेती करते थे। बाद में वह पूना के पास खानवड़ी गांव में बस गए, और उसके बाद वह पूना में बस गए। उनके परिवार ने माली के काम में महारत हासिल की। धीरे-धीरे उनकी ख्याति पेशवाओं तक पहुंची और उन्हें पेशवाओं की फुलवारी में काम मिला। उनके काम से प्रसन्न होकर पेशवा ने उन्हें 35 एकड़ जमीन ईनाम में दे दी। यहीं से लोग उन्हें फुले कहने लगे। ज्योतिराव की आयु साल भर की थी, तभी उनकी मां का निधन हो गया। पिता गोविंदराव ने नन्हें ज्योतिराव के पालन के लिए सगुणाबाई का सहयोग लिया। ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले की शिक्षा-दीक्षा में सगुणाबाई की अहम भूमिका है।

     सगुणाबाई खंडोजी क्षीरसागर का जन्म महाराष्ट्र के सतारा जिले में हुआ था। बचपन में उनका विवाह हो गया था और बहुत जल्दी वे विधवा हो गई, तब उन्होंने जीविकोपार्जन के लिए एक अनाथालय में काम करना शुरू किया, जिसे ईसाई मिशनरी द्वारा चलाया जाता था। इसके संरक्षक मि. जान थे, जिनके सान्निध्य में रहकर सगुणाबाई ने अंग्रेजी भाषा सीखी और पश्चिम के स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे जैसे मूल्यों की शिक्षा ग्रहण किया। अपनी शिक्षा और इन मूल्यों में ज्योतिराव फुले और बाद में सावित्र बाई फुले को परिचित कराया। उन्हें आधुनिक मूल्यों से सींचा। वस्तुतः सगुणाबाई ने ही ज्योतिराव फुले और सावित्रीबाई फुले को गढ़ा था। उनको याद करते हुए सावित्रीबाई फुले ने एक कविता लिखी है, जिसमें वे उनके प्यार, दुलार, मेहनत और ज्ञान की प्रशंसा की है। और उन्हें मां कहकर संबोधित किया है।

     1848 ई. में ज्योतिराव फुले ने अछूत कही जाने वाली लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो उस स्कूल में 17 वर्षीय सावित्रीबाई के साथ सगुणाबाई और फातिमा शेख भी शिक्षक नियुक्त हुई थीं। ज्योतिबा फुले अशिक्षा को ही सारे अनर्थों की जननी मानते थे, इसलिए उन्होंने सगुणाबाई के साथ मिलकर सावित्रीबाई को पढ़ना-लिखना सिखाया। जिस पहली किताब से उनकी शिक्षा की शुरुआत थी, वह वही तस्वीरों वाली किताब थी। जिसे सावित्रीबाई ने अपने साथ लेकर आई थीं।

     ज्योतिराव और सगुणाबाई के देख-रेख में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद सावित्रीबाई फुले ने औपचारिक शिक्षा अहमदनगर में ग्रहण की। उसके बाद उन्होंने पुणे के अध्यापक प्रशिक्षण संस्थान से प्रशिक्षण लिया। यहीं पर उनकी मुलाकात फातिमा शेख से हुई जो उनकी सहपाठी थी और दोनों के बीच गहरी मित्रता कायम हुई। फातिमा के भाई उस्मान शेख, ज्योतिराव फुले के घनिष्ठ मित्र व सहयोगी थे। बाद में उन दोनों ने अध्यापन का कार्य किया।

     जब 15 मई 1848 ई. को पूना के भिडेवाला में ज्योतिराव ने लड़कियों के लिए स्कूल खोला, इस स्कूल की अध्यापिका सावित्रीबाई फुले, इनके साथ सगुणाबाई और फातिमा शेख भी उस स्कूल की सहायक अध्यापिका बनी। हम कह सकते हैं- सावित्रीबाई, सगुणाबाई और फातिमा शेख पहली भारतीय महिलाएं थीं जो अध्यापिकाएं बनीं।

     लड़कियों के स्कूल खोलने के विषय में ज्योतिराव फुले ने लिखा है कि  काफी विचार करने के बाद मेरा यह स्पष्ट मत था कि लड़कों के स्कूल के बजाए लड़कियों का स्कूल बहुत जरूरी है क्योंकि, महिलाएं 2-3 साल के बच्चों के बीच जो संस्कार डालती हैं, वही संस्कार बच्चों के भविष्य के बीज होते हैं।

     ज्योतिराव फूले और सावित्रीबाई द्वारा शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं के लिए खोले जा रहे स्कूलों की संख्या बढ़ती जा रही थी। 1852 तक यानी 4 वर्षों में इन विद्यालयों की संख्या 18 हो गई। फुले दम्पत्ति का यह काम ब्राह्मणवाद को चुनौती थी। लोकमान्य तिलक जैसे लोगों ने भी इन स्कूलों का विरोध किया। उन्होंने उच्च वर्ग के लोगों के भड़काकर ज्योतिराव के पिता गोविंदराव पर यह दबाव बनाया कि वे इन स्कूलों को बंद करा दें अथवा ज्योतिराव फुले और उनकी पत्नी को घर से निकाल दें। ज्योतिराव ने भारी मन से सावित्रीबाई फुले के साथ घर छोड़ दिया और सामाजिक हित के अपने कार्यों को जारी रखा।

     1852 ई. में सावित्रीबाई फुले को आदर्श शिक्षक का पुरस्कार प्राप्त हुआ था। फुले दम्पति महिलाओं को सिर्फ शिक्षित करना ही नहीं चाहते थे बल्कि उनकी इच्छा यह थी कि महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में बराबरी के अधिकार मिले इसके लिए ज्योतिराव फुले ने चिंतन किया। जिसकी परिणति 1873 ई. में ‘सत्य शोधक समाज’ में हुई।

     23 वर्ष की आयु में सावित्रीबाई फुले का पहला काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। इस संग्रह की कविताएं शूद्रों और अतिशूद्रों और महिलाओं की भावनाओं को अभिव्यक्ति करती हैं। सावित्रीबाई अपनी कविताओं के माध्यम से ब्राह्मणवाद-मनुवाद पर करारी चोट करती हैं। अंग्रेजी शिक्षा के महत्व को रेखांकित करती हैं, इतिहास की ब्राह्मणवादी व्याख्या को खारिज करती हैं। और नई व्याख्या प्रस्तुत करती इन कविताओं में वे एक नये समाज का सपना देखती हैं, जिसमें किसी तरह का कोई अन्याय न हो। वर्ण, जाति व्यवस्था न हो और महिलाएं पुरुषों के अधीन न हो बल्कि उनकी बराबर की साथी हो।

     शिक्षा के साथ ही फुले दम्पति ने समाज की अन्य समस्याओं की ओर ध्यान देना शुरू किया उन्होंने देखा कि समाज में सबसे बदतर हालत विधवाओं का है, उनका दुबारा विवाह नहीं हो सकता या समाज में उन्हें अशुभ समझा जाता था। रंगीन वस्त्र पहनने, शादी-ब्याह तथा किसी शुभ कार्य में इन्हें शामिल होने का अधिकार नहीं था यहां तक कि इन्हें स्वादिष्ट भोजन की मनाही थी। ये सफेद तथा भगवा वस्त्र पहनने की इजाजत थी। इनके बाल मुंड दिये जाते थे, डा. आंबेडकर ने लिखा है कि ‘‘इस सबका उद्देश्य यह होता था कि वे पर पुरुष की ओर आकर्षित न हों, उनके अंदर कहीं प्रेम की भावना न आ जाये। लेकिन कई बार विधवाएं अपने परिवार और अपने सगे संबंधियों के हवस का शिकार हो जाती थीं या किसी पुरुष की तरफ आकर्षित होकर शारीरिक संबंध कायम कर लेती थीं। इस प्रक्रिया में यदि वे गर्भवती हो जाती थीं, तो उनके पास आत्महत्या करने या बच्चे के जन्म देने के बाद उसकी हत्या करने के अलावा कोई रास्ता नहीं होता था।’’

     ऐसी ही एक घटना ब्राह्मणी विधवा काशीबाई के साथ हुई। वह किसी पुरुष की हवस का शिकार होकर गर्भवती हो गईं। उन्होंने एक बच्चे को जन्म दिया। लोकलाज से विवश होकर उन्होंने उस बच्चे को कुएं में फेंक दिया। उन पर हत्या का मुकदमा चला और 1863 ई. में उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई।

     इस घटना ने फुले दम्पति को भीतर तक हिला दिया। उन्होंने 1863 ई. में ‘बाल हत्या प्रतिबंधक गृह’ शुरू किया। इस जगह आकर कोई भी विधवा अपने बच्चों को जन्म दे सकती थी और उसका नाम गुप्त रखा जाता था। सावित्रीबाई फुले बाल हत्या प्रतिबंधक गृह ने आने वाली महिलाओं और पैदा होने वाले बच्चों की देख-रेख खुद करती थी। 1879 ई. में ऐसी ही एक महिला जो अपना जीवन समाप्त करना चाहती थी। उसे 6 माह का गर्भ था। जिसे ज्योतिराव फुले समझा-बुझा कर अपने घर ले गए। उसने एक बच्चे को जन्म दिया। उसका नाम यशवंत रखा गया। निःसंतान फुले दम्पति के इस बच्चे को गोद ले लिया और उसे अपना कानूनी उत्तराधिकारी घोषित किया। उन्होंने कोशिश किया और आगे चलकर वह एक डॉक्टर बना।

     इसी तरह की एक समस्या शूद्रों-अतिशूद्रों को पीने के पानी के लिए थी तपती दोपहरी में वे पानी के लिए पैदल चल कर थक जाते थे। लेकिन उन्हें एक घूंट पानी मिलना मुश्किल हो जाता था। फुले दम्पति ने 1861 में अपने घर के पानी का हौज इन जातियों के लिए खोल दिया। उन्होंने घोषणा किया, कोई भी, किसी भी समय यहां आकर पानी पी सकता है।

     जाति व्यवस्था और ब्राह्मणवाद के अन्य रूपों से संघर्ष करने के लिए ज्योतिराव फुले ने 1863 ई. में सत्यशोधक समाज का निर्माण किया था। इस संस्था के संचालन में भी सावित्रीबाई फुले सक्रिय भूमिका निभाती थी। यह संस्था शूद्रों-अतिशूद्रों और महिलाओं की मुक्ति के लिए संघर्ष करने के साथ ही अन्य सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी और सहयोग करता था। सन् 1876-77 में महाराष्ट्र में अकाल पड़ा तो सत्यशोधक समाज अकाल पीड़ितों को राहत पहुंचाने में जुट गया। फुले दम्पति ने अकाल में अनाथ हुए बच्चों के लिए 52 स्कूल खोले। जिसमें बच्चों के रहने, खाने-पीने और पढ़ने की व्यवस्था थी।

     28 नवंबर 1890 ई. को सावित्रीबाई फुले के पति और शिक्षक ज्योतिराव  फुले का निधन हो गया। जब इसको लेकर बहस होने लगी कि मुखाग्नि दत्तक पुत्र दे, या कोई रिश्तेदार तो सावित्रीबाई ने स्वयं अपने पति को मुखाग्नि देने का निर्णय किया। 19वीं सदी में किसी हिंदू स्त्री द्वारा किया गया यह कार्य क्रांतिकारी था। आज भी ऐसा साहस स्त्रियां नहीं करतीं, परंतु सावित्रीबाई ने सवा सौ साल पहले यह कर दिखाया। इससे पता चलता है कि सावित्रीबाई की सोच कितनी स्वतंत्र और मौलिक थी।

ज्योतिराव फुले की मृत्यु के बाद सत्यशोधक समाज की बागडोर सावित्रीबाई फुले को सौंपी गई और 1877 ई. तक उन्होंने इसका नेतृत्व किया। 1891 ई. सावित्रीबाई का दूसरा काव्य संग्रह ‘बावनकशी सुबोध रत्नाकर’ प्रकाशित हुआ। दो कविता संग्रह के अतिरिक्त, सावित्रीबाई फुले ने ज्योतिराव फुले के चार भाषणों का संपादन भी किया। ये चारों भाषण भारतीय इतिहास पर हैं। सावित्रीबाई फुले के भाषण भी 1892 ई. में प्रकाशित हुए। इसके अलावा उनके द्वारा लिखे गए पत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये पत्र, उनके समय की परिस्थितियों, लोगों की सोच, फुले के प्रति सावित्रीबाई की सोच और उनके विचारों को सामने लाते हैं।

     1896 ई. में एक बार फिर पूना और आस-पास के क्षेत्रों में अकाल पड़ा। सावित्रीबाई फुले ने अकाल पीड़ितों को मदद पहुंचाने के लिए दिन-रात एक दिया। 1897 ई. में पूना में प्लेग की महामारी फैल गई, एक बार फिर वे पीड़ितों की सेवा में और उनकी चिकित्सा में अपने पुत्र यशवंत राव के साथ जुट गईं। बाद में स्वयं भी वे इसी बीमारी का शिकार हो गईं। 10 मार्च 1897 ई. को उनका देहांत हो गया। परंतु उनकी मृत्यु के बाद भी उनके कार्य और विचार मशाल की तरह भारत के बहुजन समाज को प्रेरित कर रहे हैं।

(प्रोफेसर चंद्रभूषण अंकुर गोरखपुर विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग में अध्यापक हैं। आपने कई किबातों का भी लेखन किया है। इसके अलावा फिल्म, साहित्य और पत्रकारिता से भी आपका जीवंत रिश्ता रहा है।)

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