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पुण्यतिथि पर विशेष: ‘नीरज’ तो कल यहां न होगा, लेकिन उसका गीत-विधान रहेगा

‘‘कहानी बन कर जिए हैं इस जमाने में/सदियां लग जाएंगी हमें भुलाने में/आज भी होती है दुनिया पागल/जाने क्या बात है नीरज के गुनगुनाने में।’’ इन बेमिसाल पंक्तियों के गीतकार, कवि गोपाल दास ‘नीरज‘ उस कवि सम्मेलन परम्परा के आखिरी वारिस थे, जिन्हें सुनने और पढ़ते हुए देखने के लिए हजारों श्रोता रात-रात भर बैठे रहते थे। उनकी रचनाओं में गीतों का माधुर्य और जीवन का संदेश एक साथ होता था। नीरज का नाम हिन्दी के उन कवियों में शुमार किया जाता है, जिन्होंने मंच पर कविता और गीतों को नई बुलंदियों तक पहुंचाया। उनकी आवाज और गीतों का जादू श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलता था। जब वे अपनी विरल स्वर लहरी में गीत पढ़ते, तो सुनने वालों के जेहन पर नशा सा तारी हो जाता।

श्रोता मदहोश हो जाते। भाव अतिरेक में झूमने लगते। ज्यों-ज्यों नीरज के गीतों को सुनते, उनकी प्यास और भी ज्यादा बढ़ती जाती। शहंशाहे-तरन्नुम शायर जिगर मुरादाबादी तक नीरज की आवाज के शैदाई थे। देहरादून के एक मुशायरे में, जिसकी सदारत जिगर मुरादाबादी खुद कर रहे थे, जब उन्होंने नीरज की कविता सुनी, तो एक के बाद एक उन्होंने उनसे उनकी तीन कविताएं पढ़वाईं और हर कविता के बाद नीरज की पीठ ठोककर यह कहा,’‘उम्र दराज हो इस लड़के की। क्या पढ़ता है, जैसे नगमा गूंजता है।’’ जिगर साहब की दुआओं का ही असर था कि नीरज लंबे समय तक जिए और अपने नगमों से लोगों का मनोरंजन और उन्हें जीवन की नई सीख देते रहे। नीरज नजले के मरीज थे, जिसकी वजह से उनकी आवाज में एक खरखराहट थी। श्रोताओं को उनकी आवाज को सुनकर, ऐसा एहसास होता कि वे मानो शराब पीकर गीत पढ़ रहे हों।

बहरहाल, बाद में यही उनका स्टाइल हो गया। श्रोता तरन्नुम में ही उनसे उनके गीत सुनने की फरमाइश करते। दूसरे कवि अपनी बारी का इंतजार करते रहते और श्रोताओं का नीरज के गीतों से जी नहीं भरता। एक दौर ऐसा भी रहा, जब नीरज का नाम कवि सम्मेलन के सौ फीसदी कामयाब होने की गारंटी माना जाता था। सात दशकों तक वे लगातार कवि सम्मेलन मंचों पर छाये रहे। उनको सुनकर देश की चार पीढ़ियां जवान हुईं। जब नीरज नवीं कक्षा के छात्र थे, तब उन्होंने अपनी पहली कविता कवि सोहन लाल द्विवेदी की अध्यक्षता में एटा के कवि सम्मेलन मंच पर पढ़ी और यह सिलसिला जिंदगी के आखिर तक जारी रहा। कवि सम्मेलनों की वे आन, बान और शान थे। उनकी मौजूदगी भर से मंच की गरिमा बढ़ जाती थी।

उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के पुरवाली गांव में 4 जनवरी, 1925 को जन्मे नीरज की शुरुआती जिंदगी काफी संघर्षपूर्ण रही। बचपन में ही उनके सिर से पिता का साया छिन गया। जीवन यापन के लिए पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं। मेरठ और अलीगढ़ के कॉलेज में हिन्दी विभाग के प्राध्यापक भी रहे। लेकिन उनका जी गीतों में ही बसता था। बाद में सब कुछ छोड़-छाड़ के वे गीत के ही हो लिए। गीत उनकी जिंदगी थे। दीगर कवि, गीतकारों की तरह कवि सम्मेलनों के सर्वोच्च मुकाम तक पहुंचने में नीरज को ज्यादा संघर्ष नहीं करना पड़ा। साल 1942 में दिल्ली में एक कवि सम्मेलन था, नीरज की जब बारी आई, तो उनके गीत और आवाज का कुछ ऐसा जादू हुआ कि श्रोता वंस मोर-वंस मोर चिल्लाने लगे।

उसके बाद उन्होंने और भी कई कविताएं और गीत सुनाये और सबका समान असर हुआ। इस कवि सम्मेलन के बाद, उनकी मकबूलियत पूरे मुल्क में फैल गई। नीरज कवि सम्मेलनों में बुलाये जाने लगे और इस तरह से उनकी एक नई यात्रा शुरू हुई। थोड़े से ही अरसे में वे हरिवंश राय बच्चन, गोपाल सिंह ‘नेपाली‘, बलबीर सिंह ‘रंग’, देवराज दिनेश, रामअवतार त्यागी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन‘, वीरेन्द्र मिश्र, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ जैसे अग्रिम पंक्ति के गीतकारों में शामिल हो गए। नीरज अपनी शुरूआत में ‘भावुक इटावी’ के नाम से कविताएं पढ़ते थे। बाद में उन्होंने ‘नीरज’ उपनाम रखा, जिसने उनके असल नाम गोपालदास सक्सेना को पीछे छोड़ दिया।

साल 1944 में शिमला में गांधी-जिन्ना सम्मेलन के बाद नीरज ने एक गीत लिखा, ‘‘आज मिला है गंगा जल, जल दमदम का।’’ जाहिर है कि अपने अलग तरह के भाव और विचारभूमि के चलते गीत काफी लोकप्रिय हुआ। यह गीत जब वे दिल्ली के एक कवि सम्मेलन मंच पर पढ़ रहे थे, तो उनका यह गीत सुनकर मशहूर शायर हफीज जालंधरी, जो कि उस वक्त ‘साइंस पब्लिसिटी ऑर्गेनाइजेशन’ में डायरेक्टर थे, बहुत मुतास्सिर हुए। उन्होंने नीरज को अपने महकमे में नौकरी की पेशकश की, जिसे नीरज ने मंजूर कर लिया। इस नौकरी में नीरज की जिम्मेदारी थी कि वे गीतों के माध्यम से सरकारी योजनाओं का प्रचार करें। इस काम के तहत देश में जगह-जगह सम्मेलन हुए। जिसमें उन्होंने अपने गीतों के जरिए जनता के बीच जागरूकता फैलाई।

हफीज जालंधरी की संगत में आकर, नीरज का झुकाव गजल के जानिब हुआ। उर्दू के कई नामचीन शायरों से वे मिले। इसका असर यह हुआ कि वे गजल भी लिखने लगे। गीत की तरह उनकी गजलों ने भी कमाल दिखाया। नीरज कवि सम्मेलनों के साथ-साथ मुशायरों में भी बुलाए जाने लगे। यहां भी वे कवि सम्मेलनों की तरह कामयाब रहे। उनकी एक नहीं, कई ऐसी गजलें हैं, जो आज भी हमें गुनगुनाने को मजबूर करती हैं। सीधी-साधी जबान में लिखी गई, इन गजलों में जिंदगी का एक बड़ा फलसफा छिपा हुआ है।‘‘हम तेरी चाह में ऐ यार वहां तक पहुंचे/होश ये भी न जहां है कि कहां तक पहुंचे/एक सदी तक न वहां पहुंचेगी दुनिया सारी/एक ही घूंट में मस्ताने जहां तक पहुंचे।’’, ‘‘तमाम उम्र मैं एक अजनबी के घर में रहा/सफर न करते हुए भी किसी सफर में रहा।’’, ‘‘अब तो मजहब कोई ऐसा भी चलाए जाए/जिसमें इंसान को इंसान बनाया जाए।’’

साल 1955 में नीरज ने अपना कालजयी गीत ‘कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे……’’ लिखा, यह गीत, उन्होंने पहली बार लखनऊ रेडियो स्टेशन से पढ़ा। गीत रातों-रात पूरे देश में लोकप्रिय हो गया। इस गीत की लोकप्रियता का आलम यह था कि हर कवि सम्मेलन या मुशायरे में श्रोता इसी गीत की बार-बार फरमाइश करते थे। सच बात तो यह है कि मंचीय कविता को नीरज ने नई ऊंचाइयां प्रदान की। उन्होंने कविता की एक अलग मंचीय भाषा का अविष्कार किया, जो कि न तो पूरी तरह से हिन्दी है और न ही उर्दू। नीरज ने शुरुआत कविता और गीत से की। इसके बाद उन्होंने ग़ज़लें भी लिखीं। अंत में उनका रुझान दोहों और सधुक्कड़ी कविताओं की ओर हो गया था। ‘‘तन से भारी श्वास है, इसे समझ लो खूब/मुर्दा जल में तैरता जाता, जिंदा जाता डूब।’’ और ‘‘हम तो मस्त फकीर, हमारा कोई नहीं ठिकाना रे/जैसा अपना आना प्यारे, वैसा अपना जाना रे।’’

जैसे नीरज के दोहे, उन्हें कबीर, रहीम और रसखान जैसे आला दर्जे के हिन्दी कवियों की पंक्ति में रखते हैं। अपनी जिंदगी के आखिर में दोहे की तरफ मुड़ने के पीछे भी एक वजह थी। उन्हीं के मुताबिक,‘‘ग़ज़ल की टक्कर में सिर्फ दोहा ही खड़ा हो सकता है। जिस तरह से उर्दू ग़ज़ल का हर एक शे’र मुकम्मल होता है। उसी तरह एक दोहे में भी कवि पूरी बात कह देता है। दोहा हमारी प्राचीन परम्परा है। कविता की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा दोहा ही है। दोहे में गंभीर से गंभीर बात की जा सकती है, जो जनता को आसानी से समझायी जा सकती है। नानक, रहीम, तुलसी, कबीर व रसखान के दोहे आज भी लोगों को याद रहते हैं। लंबी कविता और ग़ज़ल किसी को याद नहीं रहती, लेकिन दोहा और शेर आम आदमी को याद हो जाता है और उसके ज़ेहन में पहुंच जाता है।’’

‘संघर्ष’, ‘बादल बरस गयो’, ‘कारवां गुजर गया’, ‘विभावरी’, ‘दर्द दिया है’, ‘लहर पुकारे’, ‘प्राण गीत’, ‘नीरज की पाती’, ‘आसावरी’, ‘गीत-अगीत’, ‘नीरज की गीतिकाएं’, ‘वंशीवट सूना है’, ‘नीरज रचनावली (3 खंडों में)’, ‘नीरज दोहावली’, ‘नीरज के प्रेमगीत’, ‘बादलों से सलाम लेता हूं’, ‘कुछ दोहे नीरज के’, ‘कारवां गुजर गया’, ‘तुम्हारे लिए’, ‘फिर दीप जलेगा’, ‘गीत जो गाए नहीं’ ‘पंत-कला, काव्य और दर्शन’ और ‘लिख-लिख भेजत पाती’ जैसी कृतियों के रचनाकार नीरज अपनी जिंदगी में कई सम्मानों से नवाजे गए। इन सम्मानों में प्रमुख हैं-साहित्य वाचस्पति (1991, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग), डीलिट् की मानद उपाधियां (1996 में डॉ. बीआर अंबेडकर विश्वविद्यालय आगरा व 2007 में लखनऊ विश्वविद्यालय), यश भारती (1994, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान), हिंदी गौरव सम्मान (2004, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ) आदि। शिक्षा और साहित्य में उनके विशेष योगदान को देखते हुए, भारत सरकार ने साल 1991 में उन्हें ‘पद्मश्री’ और साल 2007 में ‘पद्मभूषण’ सम्मान प्रदान किया। इनके अलावा उन्हें ‘गीत गंधर्व’, ‘गीत सम्राट’, ‘गीत कौस्तुभ’, ‘गीत ऋषि’, ‘धरती तिलक’ आदि उपाधियों से भी विभूषित किया गया।

नीरज ने फिल्मों के लिए गीत भी लिखे। निर्देशक आरके चंद्रा ने साल 1960 में अपनी फिल्म ‘नई उमर की नई फसल’ में उन्हें गीत लिखने का पहला मौका दिया। नीरज का पहला ही गीत ‘‘कारवां गुज़र गया, गुबार देखते रहे….‘‘ सुपर हिट रहा। उसके बाद यह सिलसिला आगे भी जारी रहा। लेकिन फिल्मी दुनिया उन्हें ज्यादा रास नहीं आई। साल 1972 में वे फिल्म नगरी को अलविदा कहकर वापस अलीगढ़ लौट आए। लेकिन तब तक उनके खाते में कई कामयाबियां जुड़ गई थीं। नीरज ने कम वक्फे में ही रोशन, शंकर जयकिशन, एसडी बर्मन, इकबाल कुरैशी, जयदेव, हेमंत कुमार जैसे संगीतकारों और देव आनंद, राजकपूर, मनोज कुमार जैसे अभिनेता-निर्देशकों के साथ काम किया। उनकी चर्चित फिल्मों में ‘नई उमर की नयी फसल’, ‘कन्यादान’, ‘तेरे मेरे सपने’, ‘प्रेम प्रतिज्ञा’, ‘प्रेम पुजारी’, ‘मेरा नाम जोकर’, ‘चंदा और बिजली’, ‘चा चा चा’, ‘छुपा रूस्तम’, ‘शर्मीली’, ‘पहचान’ आदि हैं। नीरज का फिल्मी सफर भले ही छोटा रहा, पर इस सफर में उन्होंने ऐसे कई गीत दिए, जो कभी भुलाए नहीं जा सकते।

फिल्मों में लिखे उनके गीतों‘‘फूलों के रंग से दिल की कलम से’’, ‘‘खिलते हैं गुल यहां खिलके बिछुड़ने को’’, ‘‘बस यही अपराध हर बार करता हूं’’, ‘‘शोखियों में घोला जाये फूलों का शबाब’’, ‘‘रंगीला रे तेरे रंग में…’’, ‘‘मेघा छाए आधी रात, बैरन बन गई निंदिया’’ आदि ने खूब धूम मचाई। फिल्मी दुनिया के बड़े पुरस्कार ‘फिल्म फेयर अवार्ड’ के लिए नीरज का नाम लगातार तीन साल 1970 से 1972 तक नामांकित किया गया और साल 1970 में उन्हें फिल्म ‘चंदा और बिजली’ फिल्म के गीत ‘काल का पहिया घूमे रे भइया’ के लिए यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला। नीरज ने भले ही फिल्मों में कम गीत लिखे, लेकिन इन गीतों में भाषा के स्तर पर उन्होंने तरह-तरह के मौलिक प्रयास किए। फिल्मी गीतों पर जब उर्दू जबान पूरी तरह से छाई हुई थी, उन्होंने शुद्ध हिन्दी के गीत लिखे। जो लोगों को पसंद भी आए। वे नीरज ही थे, जिन्होंने फिल्मी गीतों के इतिहास में पहली बार फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में छंद मुक्त कविता ‘‘ऐ भाई जरा देख के चलो…’’ को गीत के तौर पर इस्तेमाल किया और यह गीत खूब हिट हुआ।

‘‘कारवां गुज़र गया‘‘, ‘‘ऐ भाई देख के चलो‘‘, ‘‘ये नीरज की प्रेम सभा है‘‘, ‘‘हम तेरी चाह में ए यार कहां तक पहुंचे‘‘, ‘‘चुप-चुप अश्क बहाने वालों/मोती व्यर्थ लुटाने वालों/कुछ सपनों के मर जाने से/जीवन नहीं मरा करता है।’’ जैसे कालजयी गीत लिखने वाले गीतों के जादूगर नीरज का कहना था कि ‘‘कविता अपने प्रशंसक और लोकप्रियता तभी कायम रख सकती है, जब कविता उसी भाषा में हो, जिस भाषा का श्रोता वर्ग या पाठक वर्ग हो। कविता में श्रोता के हृदय की भाषा हो। जनता की भाषा हो। आप उसी भाषा में कहें, जो उसे समझ आए। कविता जब देश के सामूहिक, देशीय संस्कार को स्पर्श करेगी, तभी हृदय में बैठेगी।’’

19 जुलाई, साल 2018 को नीरज ने इस जहान-ए-फानी से अपनी आखरी रुखसती ली। उन्होंने 93 साल की लंबी जिंदगी जी, सैकड़ों अर्थपूर्ण गीत लिखे और अपने गीतों से पाठकों और श्रोताओं को नये संस्कार दिए। उनके जाने से जैसे कवि सम्मेलनों का नूर ही चला गया। वह पुरअसर आवाज खामोश हो गई, जो श्रोताओं के कानों में मिस्री घोलती थी। नीरज आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके एक नहीं, अनगिनत गीत ऐसे हैं जो श्रोताओं और पाठकों के जेहन में कल भी जिंदा थे, आज भी जिंदा हैं और आगे भी रहेंगे। ‘‘हाथ मिले और दिल न मिले हों/ऐसे में नुकसान रहेगा/जब तक मंदिर और मस्जिद हैं/मुश्किल में इंसान रहेगा/‘नीरज’ तो कल यहां न होगा/लेकिन उसका गीत-विधान रहेगा।’’

(मध्यप्रदेश निवासी लेखक-पत्रकार जाहिद खान, ‘आजाद हिंदुस्तान में मुसलमान’ और ‘तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ समेत पांच किताबों के लेखक हैं।)

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This post was last modified on July 19, 2020 7:45 pm

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