Wednesday, December 7, 2022

शंभु मित्र के जन्मदिन पर विशेष: जिन्होंने टैगोर के नाटकों का मंचन करके बतलाया

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आधुनिक बांग्ला नाट्य मंच में शंभु मित्र की पहचान शीर्षस्थ नाटककार, अभिनेता और निर्देशक के रूप में है। उनकी पूरी जिंदगी नाटक के लिए समर्पित रही। उन्होंने न सिर्फ़ नाटकों में अभिनय-निर्देशन किया, बल्कि फ़िल्मों में भी अपने आप को आज़माया और यहां भी कामयाब साबित हुए। रंगमंच के हर महकमे पर उनकी अच्छी पकड़ थी। मंच सज्जा, प्रकाश-व्यवस्था और पात्रों की वेशभूषा हर क्षेत्र में शंभु मित्र की गहरी दिलचस्पी थी। रबीन्द्रनाथ टैगोर के नाटकों को एक अलहदा शैली में मंचित करने से शंभु मित्र को खूब मक़बूलियत मिली। उनका नाटक ‘रक्तकरबी’ बंगाल ही नहीं, पूरे देश में पसंद किया गया। वे एक रंग चिंतक भी थे।

उनके तमाम लेखन में उनका रंगचिंतन और रंग-दृष्टि दिखाई देती है। उनका रंग-चिंतन किसी खास दिशा में झुका हुआ नहीं है, वे नाटक के सभी तत्वों को साथ लेकर चलने के हिमायती थे। शंभु मित्र, विश्व रंगमंच के गंभीर अध्येता रहे। उन्होंने कई मशहूर कृतियों का बांग्ला में नाट्य-रूपांतर किया। उनकी आवाज़ बेहद प्रभावशाली थी। वे जब रबीन्द्रनाथ टैगोर की कविता ‘मधुवंशी की गली’ का पाठ करते, तो अवाम आंदोलित हो जाती थी।  

22 अगस्त, 1915 को कोलकाता में पैदा हुए शंभु मित्र की बचपन से ही नाटक में दिलचस्पी थी। सेंट जेवियर्स कॉलेज में अध्ययन के दौरान वे रेगुलर ड्रामे करते रहे। बांग्ला नाट्य मंच के चर्चित नाटककार शिशिर कुमार भादुड़ी के नाटक और अभिनय ने उन्हें काफ़ी प्रभावित किया। 24 साल की उम्र में ही शंभु मित्र एक नाट्य ग्रुप ‘रंगमंडल मंच’ में शामिल हो गए। यहां उन्होंने ‘रत्नदीप’ और ‘घुरनी’ में अदाकारी की, तो विधायक भट्टाचार्य का लिखा नाटक ‘माला राय’ का निर्देशन भी किया।

‘रंगमंडल मंच’ के बंद होने के बाद, कुछ दिन ‘मिनर्वा’ में काम किया। एक दिन ऐसा भी आया, जब उन्हें शिशिर कुमार भादुड़ी के साथ नाटक करने का मौक़ा मिला। उनके निर्देशन में शंभु मित्र ने ‘सीता’ और ‘आलमगीर’ में अदाकारी की। नाटक के अहम किरदार तक आने में उन्हें थोड़ा वक़्त लगा। ‘ए डॉक्टर’ वह नाटक था, जिसमें उन्हें मुख्य किरदार मिला। इस नाटक में अभिनय के बाद, उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। एक के बाद एक ‘नवाब’, ‘छेड़ा तार’, ‘टूटा हुआ तार’, ‘दश चक्र’, ‘राजा इडिपस’, ‘रक्तकरबी’ ‘श्रीविष्णुप्रिया’ और ‘दिग्विजय’ आदि नाटकों में शानदार रोल किए।

शंभु मित्र ने कुछ साल टूरिंग थिएटर भी किया। पश्चिम बंगाल के दूर-दराज के गांवों में घूमे। ग्राम्य जीवन को नज़दीकता से देखा। इसी दरमियान उन्होंने न सिर्फ़ ‘आगुन’, ‘लेबोरेटरी’ और ‘होम्योपैथी’ नाटक लिखे, बल्कि उनका मंचन भी किया। साल 1943 में जब इप्टा का गठन हुआ, तो बिजन भट्टाचार्य और विनय राय के साथ वे भी इसमें शामिल हो गए। यह वह दौर था, जब इप्टा देश के सभी बड़े लेखकों, कलाकारों और रंगकर्मियों की धुरी बना हुआ था। इप्टा से जुड़े संस्कृतिकर्मी अपने रंगकर्म से अवाम को आंदोलित कर रहे थे। जब बंगाल में बीसवीं सदी का भयंकर अकाल पड़ा, तो इप्टा भी अकाल पीड़ितों की मदद के लिए आगे आया। इप्टा से जुड़े रंगकर्मियों ने पूरे देश में नाट्य प्रदर्शन के ज़रिए चंदा इकट्ठा किया। उन्होंने उस वक़्त जो नाटक किए, वे हैं बिजन भट्टाचार्य का लिखा ‘नवान्न’ और ‘जबानबंदी’।

‘नवान्न’ से न सिर्फ़ शंभु मित्र को एक नई पहचान मिली, बल्कि बांग्ला नाट्य मंच को भी नई दिशा मिली। ‘नवान्न’ में उन्होंने अदाकारी के साथ-साथ इसका निर्देशन भी किया। पूरे देश में आम और ख़ास सभी ने नाटक को खू़ब पसंद किया। अपनी पहली ही प्रस्तुति में शंभु मित्र ने एक नया इतिहास रचा। शिशिर कुमार भादुड़ी जिनके लिए शंभु मित्र के दिल में बहुत इज़्ज़त थी, उन्होंने नाटक देखने के बाद कहा, ‘‘मैं जो सारा जीवन नहीं कर पाया, उसे शंभु मित्र ने कर दिखाया।’’ यह शंभु मित्र के लिए वाक़ई एक बड़ी उपलब्धि थी। जिन्हें रंगमंच में वे अपना आदर्श मानते थे, उन्होंने उनके काम को सराहा। उनकी तारीफ़ की।

शंभु मित्र जब तक इप्टा में रहे, उन्होंने इस संस्था से काफी लोगों को जोड़ा। साल 1948 में शंभु मित्र कुछ मतभेदों के चलते, इप्टा से अलग हो गए और उन्होंने अपनी नाट्य संस्था ‘बहुरूपी’ बना ली। यह संस्था भी इप्टा के नक्शे-क़दम पर चली। वे इप्टा से अलग भले ही हो गए, मगर उसकी विचारधारा से हमेशा जुड़े रहे। ‘बहुरूपी’ के बैनर पर ही उन्होंने ‘पथिक’, ‘चार अध्याय’, ‘दशचक्र’, ‘मुक्तधारा’, ‘कंचनरंग’, राजा इडिपस’ और ‘पुतुल खेला’ जैसे नाटक मंचन किए। साल 1973 में शंभु मित्र ने ‘बहुरूपी’ संस्था से भी किनारा कर लिया। लेकिन इन पच्चीस सालों में उन्होंने कई चर्चित नाटकों का मंचन किया।

जिसमें भी सबसे अहम था, गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के नाटकों का मंचन। टैगोर के नाटकों का मंचन हो सकता है, यह किसी ने ख़्वाब में भी नहीं सोचा था। शंभु मित्र ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और पहले नाटक ‘चार अध्याय’ (साल-1951) उसके बाद ‘रक्तकर्बी’ (साल-1954) का सफल मंचन किया। यह नाटक इस क़दर कामयाब हुए कि लोग रात-रात भर लाइन लगाकर, नाटक के टिकट खरीदते थे। कोलकाता में नाटक देखने के लिए ऐसी दीवानगी कभी देखने-सुनने में नहीं आई थी। रंगमंच के क्षेत्र में यह एक ऐसा कारनामा था, जिससे सब हैरान रह गए। इन नाटकों के अलावा उन्होंने जब ‘इडिपस’-‘राजा इडिपस’, ‘डॉल्सहाउस’-‘पूतुल खेला’ और ‘एनिमी ऑफ द पीपुल’-‘दशचक्र’ का बांग्ला रूपांतरण किया, तो दर्शकों ने मूल नाटकों से ज़्यादा इनको पसंद किया।

शंभु मित्र ने निर्देशक रुद्रप्रसाद सेनगुप्त के साथ भी काम किया। उनके नाटक ‘मुद्राराक्षस’ में उन्होंने चाणक्य की भूमिका निभाई, तो ‘लाईफ ऑफ गैलीलियो’ (ब्रेख़्त) में गैलीलियो का रोल किया। शंभु मित्र हरफ़नमौला थे। उन्होंने कुछ फ़िल्मों में अदाकारी और निर्देशन भी किया। हिंदी में ‘धरती के लाल’ में उन्होंने मुख्य भूमिका की, तो राज कपूर की फ़िल्म ‘जागते रहो’ का निर्देशन किया। ‘जागते रहो’ बॉक्स ऑफ़िस पर भले ही नाकाम रही, लेकिन फ़िल्म समीक्षकों ने इसे दिल से सराहा। कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में यह फ़िल्म दिखाई गई। ‘कार्लोवी वारी फ़िल्म समारोह’ में इसे ग्रेंड प्रिक्स पुरस्कार मिला। ‘अभिजात्री’, ‘धात्री देवता’, ‘पथिक’, ‘एक दिन रात्रे’, ‘शुभविवाह’, ‘मानिक’ और ‘नतून पाता’ वे बांग्ला फ़िल्में हैं जिनमें शंभु मित्र ने अभिनय किया।

इनमें फ़िल्म ‘एक दिन रात्रे’, ‘मानिक’ और ‘शुभविवाह’ में उनका डायरेक्शन भी है। यही नहीं वे ‘ए टाइनी थिंग ब्रिंग्स डेथ’ और ‘अवर इंडिया’ जैसी अंग्रेज़ी फ़िल्म का भी हिस्सा रहे। रंगमंच और बांग्ला नाटकों को लेकर शंभु मित्र ने कई किताबें लिखीं। जिनमें से कुछ हिंदी में भी प्रकाशित हुई हैं। किताब ‘नाट्यभाषा’ में रबीन्द्रनाथ ठाकुर के नाटक साहित्य की विवेचना है, तो ‘अभिनय नाटक मंच’ उनके अलग-अलग समय पर लिखे लेखों का संग्रह है। ‘किसे कहते हैं नाट्यकला’ किताब में रंगकर्म के बारे में उनका चिंतन है। इस किताब में वे कई सैद्धांतिक प्रस्तावनाओं के साथ रंगकर्म की बारीकियां सिखाते हैं।

अभिनेता-नाटककार-निर्देशक शंभु मित्र के कामकाज और उनके रंगकर्म पर काफी काम हुआ है। उनके समकालीन और सहकर्मियों तापस सेन, खालेद चौधरी, कुमार राय, रुद्रप्रसाद सेनगुप्त, गोपाल हाल्दार, शंख घोष आदि ने उन पर लिखा है। शंभु मित्र की बेटी शांओली मित्र ने भी अपने पिता के जीवन और रंगकर्म पर एक बहुत अच्छी किताब लिखी है। इसमें न सिर्फ शंभु मित्र की रंग-दृष्टि का एक मुकम्मल चित्र उभरता है, बल्कि उन्होंने उनकी मंच-प्रस्तुतियों के इतिहास औैर रचना-प्रक्रिया पर भी निगाह डाली है। बांग्ला में यह किताब ‘तर्पण’ और हिंदी में यह ‘पुत्री का कथन’ शीर्षक से प्रकाशित हुई है।

रंगकर्म के क्षेत्र में शंभु मित्र के विशेष योगदान के लिए उन्हें कई पुरस्कार और सम्मानों से सम्मानित किया गया। उन्हें मिले कुछ प्रमुख सम्मान हैं ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’, ‘कालिदास सम्मान’, पश्चिम बंगाल सरकार का ‘दीनबंधु मित्र स्मारक पुरस्कार’। भारत सरकार ने उन्हें अपने सबसे बड़े नागरिक सम्मानों में से एक ‘पद्मभूषण’ सम्मान से नवाजा, तो वे रेमन मैगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित हुए। एक लंबा जीवन जीने के बाद 18 मई, 1997 को शंभु मित्र ने इस दुनिया से अपनी आखि़री विदाई ली।

(जाहिद खान वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल शिवपुरी में रहते हैं।)

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