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Categories: बीच बहस

प्रोफ़ेसर तेलतुंबडे और उनके छात्रों पर बिल्कुल फ़िट बैठती है स्पैनिश फ़िल्म ‘तितली की जीभ’

एक स्पैनिश फ़िल्म La lengua de las mariposas (यानि तितली की जीभ) का आख़िरी दृश्य याद आ रहा है। स्पेन के गृहयुद्ध में बांदो नासिओनल की निर्णायक जीत हो चुकी है और सीगंदा रिपब्लिका इस्पान्योला के समर्थक समूह बांदो रिपब्लिकानो के सदस्यों को गिरफ़्तार किया जा रहा है। सिटी स्क्वायर में भीड़ लगी हुई है जिसमें आठ-दस साल का बच्चा मोंचो (जो इस कथा का नायक है) और उसका परिवार भी शामिल है। गिरफ़्तार किए गए लोग एक-एक कर के आगे आ रहे हैं, मौजूद भीड़ उनकी लानत-मलामत कर रही है। मोंचो की धर्म भीरू माँ बोले जा रही है, ‘नास्तिकों..नास्तिकों!!!’

फिर वह अपने परिवार की सलामती के लिए ज़रूरी चीज़ मतलब नए निज़ाम के प्रति निष्ठा साबित करने के लिए अपने पति (जो पकड़े जा रहे वामियों के प्रति सहानुभूति रखता है) पर भी ज़ोर डालती है। और वह कहने लगता है, ‘गद्दारों!! अपराधियों!!’

मोंचो का बड़ा भाई भी पीछे नहीं रहता।

सबसे आख़िर में बाहर निकलते हैं मोंचो के प्रिय शिक्षक डॉन ग्रेगोरिओ। अँधेरे से बाहर निकलते ही उनकी आँखें किंचित चौंधियाती हैं। वे लगभग घिसटते हुए आगे बढ़ते हैं। मोंचो की माँ के लिए यह निर्णायक क्षण है- वह अपने पति से डॉन ग्रेगोरिओ (जिनकी सहृदयता और भलमनसाहत से पूरा परिवार वाक़िफ़ है) को लानतें भेजने और गालियां देने को कहती है। वह कह उठता है, ‘हत्यारे! अराजकतावादी! हरामी!’ और कहते-कहते रो पड़ता है।

और मानों यह भी पर्याप्त नहीं था इसलिए वह नीचे झुककर नन्हें मोंचो से भी इसमें शामिल होने का इसरार करती है। डॉन ग्रेगोरिओ को ट्रक के पिछले हिस्से में चढ़ाया जाता है, ट्रक चलने को है, डॉन ग्रेगोरिओ पीछे मुड़ते हैं।

नन्हा मोंचो की आवाज़ उन्हें सुनाई देती  है, ‘नास्तिक! वामी!’ और उन दोनों की नज़रें मिलती हैं।

ट्रक निकल पड़ता है और बच्चे उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगते हैं। मोंचो भी उनके साथ गालियाँ देता हुआ शामिल हो जाता है। कुछ बच्चे रास्ते से पत्थर उठाकर ट्रक की दिशा में फेंकने लगते हैं। मोंचो भी ऐसा करता है।

ट्रक के पीछे-पीछे भागते हुए पत्थर फेंकते हुए वह एक शब्द कहता है, ‘एस्पिरितोरोमपा’। यह शब्द, जिसका मतलब है तितली की जीभ या सूँड़, मोंचो का प्रिय शब्द है जो उसने डॉन ग्रेगोरिओ से सीखा है। और यही उसका डॉन ग्रेगोरिओ के लिए सन्देश है कि वह गाली देने वाली, पत्थर मारने वाली भीड़ में शामिल होकर भी शामिल नहीं है।

(प्रो.आनंद तेलतुंबड़े और उनके बहुत से डाइरेक्ट और इनडाइरेक्ट छात्रों के लिए)

(कवि-लेखक-अनुवादक भारतभूषण तिवारी इंजीनियर हैं। वे अंग्रेजी और मराठी के जनप्रतिबद्ध लेखन से हिंदी पाठकों का परिचय लगातार कराते रहे हैं। अंग्रेजी अनुवादों के सहारे दूसरी भाषाओं के साहित्य और फिल्मों से भी।)

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This post was last modified on April 13, 2020 6:28 pm

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