Sunday, November 28, 2021

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असहमति को दबाने के लिए आतंक विरोधी कानून का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए:जस्टिस चंद्रचूड़

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आतंकनिरोधी क़ानून, यूएपीए और राजद्रोह के प्रावधानों का इस्तेमाल कर जिस तरह विरोधियों को निशाने पर लिया जा रहा है और असहमति की आवाज़ों को कुचला जा रहा है, उस पर न्यायपालिका में चिंता बढ़ती जा रही है। लखनऊ में अलकायदा से सम्बन्ध रखने के कथित आरोप में दो मुस्लिम युवकों की गिरफ्तारी के विरोध में आतंकवाद विरोधी कानून के खिलाफ उठते विरोधी स्वरों के बीच उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि असहमति को दबाने के लिए आतंक विरोधी कानून का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए। इसका निहतार्थ यही निकलता है कि मोदी सरकार असहमति को दबाने के लिए आतंक विरोधी कानून का इस्तेमाल कर रही है। ऐसे भी देशभर में यूएपीए कानून के दुरुपयोग के खिलाफ लड़ाई तेज हो रही है।

जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा है कि नागरिकों की असहमति को दबाने के लिए किसी भी कानून का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। जस्टिस चंद्रचूड़ की यह टिप्पणी भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच कानूनी संबंधों पर एक कार्यक्रम के दौरान सामने आई। उन्होंने कहा कि आपराधिक कानून जिसमें आतंकवाद विरोधी कानून भी शामिल है, का इस्तेमाल नागरिकों के असंतोष को दबाने या फिर उनका उत्पीड़न करने में नहीं किया जाना चाहिए।

अर्णब गोस्वामी बनाम राज्य के अपने फैसले का जिक्र करते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारी कोर्ट्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वह जनता की रक्षा की कतार में सबसे आगे खड़ी रहें ताकि नागरिक स्वतंत्रता से वंचित न रहें। उन्होंने कहा कि एक दिन के लिए भी आजादी का नुकसान बहुत ज्यादा होगा। उनका यह बयान 84 वर्षीय कार्यकर्ता स्टेन स्वामी की मौत पर उपजी नाराजगी के बीच आया है। दरअसल 84 साल के स्टेन स्वामी को यूएपीए कानून के तहत एलगार परिषद मामले में गिरफ्तार किया गया था। स्वास्थ्य के आधार पर वह जमानत की लड़ाई लड़ रहे थे कि इसी बीच मुंबई स्थित जेल में उनका निधन हो गया। कई बार की कोशिशों के बावजूद उन्हें ज़मानत नहीं मिली। भीमा कोरेगाँव मामले में उन पर आतंकनिरोधी क़ानून और यूएपीए लगा दिया गया था और एनएआई हर बार उनकी ज़मानत याचिका का विरोध करती थी।

पिछले दिनों यूएपीए कानून के इस्तेमाल को लेकर कई मामले सुर्खियों में बनें। हाल ही में असम के एक नेता अखिल गोगाई 1.5 साल जेल में रहने के बाद रिहा हुए, उन्हें नागरिकता कानून बिल के हिंसक विरोध प्रदर्शन के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जेल से बाहर आते ही उन्होंने इस कानून के दुरुपयोग के खिलाफ लड़ाई लड़ने का आगाज किया है। एनआईए अदालत के इस फ़ैसले को दिल्ली हाईकोर्ट के उस फ़ैसले के परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है जिसमें उसने नताशा नरवाल, देवांगना कलिता और आसिफ़ तन्हा को यूएपीए के मामले में ज़मानत दी थी। इस फ़ैसले में उसने यूएपीए के दुरुपयोग की बात भी कही थी। इसी तरह पिछले दिनों कश्मीर में एक शख्स 11 साल बाद जेल से रिहा हुआ, वह आतंकवाद के आरोप में 11 साल तक जेल में बंद रहा और आखिर में निर्दोष पाया गया।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि भारत सबसे पुराना और सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते बहुसांस्कृतिक, बहुलवादी समाज के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। जहां संविधान इनके अधिकारों के प्रति आस्था और सम्मान रखता है। इस मौके पर उन्होंने अमेरिका की कानून व्यवस्था की तारीफ भी की।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि हमारी अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि वे नागरिकों को आजादी से वंचित करने के खिलाफ रक्षा की पहली पंक्ति बनी रहें। एक दिन के लिए भी स्वतंत्रता का नुकसान बहुत ज्यादा है। हमें अपने फैसलों में गहरे प्रणालीगत मुद्दों के प्रति हमेशा सचेत रहना चाहिए। भारत और अमेरिका, दुनिया के अलग-अलग कोने में हैं, लेकिन फिर भी एक गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध साझा करते हैं।

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अमेरिका स्वतंत्रता, बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक शांति को बढ़ावा देने में सबसे आगे है भारत सबसे पुराना और सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के नाते बहुसांस्कृतिक, बहुलवादी समाज के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय संविधान भी मानव अधिकारों के प्रति गहरी प्रतिबद्धता और सम्मान पर केंद्रित हैं। भारतीय न्यायशास्त्र पर अमेरिका के प्रभाव को कम करके नहीं आंका जा सकता है। इसने भारतीय संविधान के दिल और आत्मा में योगदान दिया है। अमेरिकी प्रभाव का ही उदाहरण भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा के अधिकार पर है।

उन्होंने कहा, जैसा कि बिल ऑफ राइट्स प्रदान करता है कि कोई भी व्यक्ति कानून की उचित प्रक्रिया के बिना जीवन, स्वतंत्रता या संपत्ति से वंचित नहीं होगा।भारतीय सर्वोच्च न्यायालय और संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय दोनों को अपनी शक्ति के मामले में सबसे शक्तिशाली अदालतों के रूप में जाना जाता है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि वयस्कों के बीच समलैंगिक संबंधों को अपराध से बाहर करने का उनका फैसला लॉरेंस बनाम टेक्सास में यूएस सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए था।

यूएपीए पर भारत की काफी बदनामी हो रही है। अक्टूबर 2020 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार संगठन ने इस पर ख़ास कर चिंता जताई थी और भारत को फटकारा था। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयुक्त ने यूएपीए पर विशेष रूप से सरकार की आलोचना करते हुए कहा था कि मानवाधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को इसके तहत निशाना बनाया गया है, ख़ास कर समान नागरिकता क़ानून के मुद्दे पर विरोध करने वालों पर यह लगाया गया।उन्होंने कहा था कि यह भी खबर है कि 1,500 लोगों पर यह कानून लगाया गया है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों के मानक पर खरा नहीं उतरने के लिए इस क़ानून की आलोचना की गई है।

गौरतलब है कि यूएपीए के तहत, जांच एजेंसियों को सामान्य आपराधिक कानून के तहत 60-90 दिनों की तुलना में किसी मामले की जांच के लिए 180 दिन का समय मिलता है। इसका मतलब है कि एक आरोपी छह महीने के बाद ही जमानत के लिए आवेदन करने का पात्र है। वकीलों का कहना है कि भारत में पुलिस अकसर आतंकवाद विरोधी कानून का उपयोग कर रही है क्योंकि यह उन्हें बिना किसी मुकदमे के आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखने में सक्षम बनाता है। वकील इसे शांतिपूर्ण असंतोष को दबाने के लिए पुलिस के प्रयासों के हिस्से के रूप में देखते हैं।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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