Saturday, October 16, 2021

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जाति, वर्ग और भारत की कोविड आपदा

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ऑक्सीजन के लिए हांफते सड़कों पर दम तोड़ रहे हैं कोविड मरीज। दिखते हैं इलाज करवाने के लिए अस्पताल में बेड ढूंढते सैकड़ों बिलखते हताश लोग। यहां तक कि मृतकों को सम्मानजनक अन्त्येष्टि तक मयस्सर न होना और उनके पार्थिव शरीरों को बेदर्दी से भारत की नदियों के किनारे फेंक दिया जाना क्या कुछ कहता है?

जहां तक अप्रैल 2021 के प्रारंभ से भयानक रूप से बढ़ते कोविड संक्रमण को रोकने की तैयारी में भारत सरकार की अगाध विफलता का सवाल है, इस विषय पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है।

अन्य बातों के अलावा घमंड, अक्षमता, विरोधी विचारों के प्रति असहिष्णुता और समस्त राष्ट्रीय प्राथमिकताओं से ऊपर अपनी लोकप्रियता को रखने की सनक को दोष दिया गया है। सरकार की आलोचना से बचने के लिए, उसके समर्थकों ने स्वयं ही समस्या की जड़ के रूप में ‘‘सिस्टम’’ को चिन्हित कर लिया है-जो संभवतः देश की जरजर स्वास्थ सेवा व्यवस्था है।

हां, यह सच है कि ये सारे पहलू जरूर जिम्मेदार हैं कि कोविड-19 ने हमारे अंदाज़ से अधिक तबाही मचा दी। लेकिन इन सभी कारणों से हम असली कहानी की तह तक नहीं पहुंच सकते हैं-कि एक देश, जो विश्व की 5वीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है, जिसकी सेना विश्व में दूसरे नंबर पर है, और जो अंतरिक्ष, परमाणु और फार्मा शक्ति है, अपने दम घुटकर मरते नागरिकों को ऑक्सीजन जैसी सामान्य चीज़ मुहैय्या नहीं करा सका; न ही मृतकों की अंतिम क्रिया सम्पन्न करने के लिए लकड़ी का इंतजाम कर सका।

संक्षेप में, इसका जवाब इस बात में है कि आधुनिक भारतीय गणराज्य-जो बर्तानवी औपनिवेशिक राज की इमारत पर खड़ा था-मुट्ठी भर भारतीयों के हित में काम करता है, और बहुसंख्यक जनता को अपने भाग्य भरोसे छोड़ देता है। यद्यपि राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत पर आधिपत्य अभिजात्य वर्ग का होता है, यह बात भारत के लिए विशेष नहीं है। यहां शासक और शासित के बीच विषमता कई खास कारकों की वजह से बहुत बढ़ी हुई है। अवश्य ही एक है रंगभेद-मसलन जाति व्यवस्था, जिसके कारण भारतीय समाज में इस हद तक  संवेदना का अभाव है कि जनसंख्या के एक बड़े हिस्से को इंसान का दर्जा तक नहीं दिया जाता।

एक दशक पूर्व मशहूर चिकित्सक डा. विनायक सेन, जिनको छत्तीसगढ़ सरकार ने उत्पीड़न का शिकार बनाया था, ने भारत में व्यापक कुपोषण के बारे में कहा था कि यह genocide यानि ‘‘नरसंहार’’ से किसी मायने में कम नहीं है। इसे हम यूं कह सकते हैं कि उनके अनुसार भारतीय नागरिकों के एक विशाल हिस्से को जानबूझकर सत्ताधारियों द्वारा समय से पूर्व ही मौत के मुंह में धकेल दिया जाता है।

उस समय भी उनके कई समर्थकों को लगा था कि एक अच्छे डॉक्टर ऐसी बात को लेकर बुरे शब्द बोलकर अतिशयोक्ति कर रहे हैं, जिसे अक्सर भारतीय राज्य मशीनरी की अक्षमता माना जाता है। भारतीय जनमानस के स्वास्थ्य की बुरी दशा और स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच न होने को आम तौर पर राष्ट्रीय संपदा के अभाव के साथ-साथ नौकरशाही का सुस्त रवैय्या और राजनीतिक उदासीनता माना जाता है।

डा. सेन का तर्क था कि 33 प्रतिशत भारतीय जनता का शरीर द्रव्यमान सूचकांक या body mass index (BMI) 18.5 से नीचे है, जो भारी कुपोषण का द्योतक है। इसके अलावा, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में से 47 प्रतिशत तो उम्र के हिसाब से वजन के मापदंड से कुपोषित कहलाएंगे, जबकि 26 प्रतिशत नवजात शिशुओं का जन्म पर वजन कम रहता है।

जेनोसाइड या नरसंहार शब्द का प्रयोग करने के बारे में डा. सेन का तर्क था कि यह कुपोषण भारतीय समाज में समान रूप से विद्यमान नहीं है, बल्कि अनुसूचित जाति व जनजाति के बीच अधिक पाया जाता है। ये दोनों श्रेणियां मिलाकर भारतीय नागरिकों का 29 प्रतिशत हैं, पर कुपोषण के आधे मामलों के लिए जिम्मेदार हैं। तो यह आश्चर्य की बात नहीं कि भारत में रुग्णता का बड़ा बोझ ये ही उठाते हैं, चाहे वह टीबी हो, मलेरिया या डायरिया हो अथवा न्यूमोनिया की वजह से शिशुओं की मौत।

अन्य पिछड़ी जातियां, जो भारतीय जनसंख्या की 41 प्रतिशत हैं, के गरीब तबकों में कुपोषण और रोग का बोझ भी कम नहीं है। वैश्विक भुखमरी सूचकांक या ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2020 में भारत का स्थान 107 देशों में 94 था। केवल 13 देशों की स्थिति भारत से बुरी है, जिनमें अन्य देशों के अलावा रवांडा, नाइजीरिया, अफगानिस्तान, लाइबीरिया, मोज़ाम्बिक और चाड शामिल हैं।

एक और कारण भी है जिसकी वजह से कोविड-19 भारत में आपदा बन गई-वह है भारत में धन का संकेंद्रण। भारतीय जनसंख्या का सर्वोच्च श्रेणी वाला 10 प्रतिशत हिस्सा राष्ट्रीय संपत्ति के 77 प्रतिशत पर अपना कब्जा जमाए हुए है। यह विश्व का एकमात्र ऐसा देश है जहां सबसे अधिक गरीबी में लोग रहते हैं।

भारतीय अभिजात्य वर्ग का अधिकतर धन ‘क्रोनी कैपिटलिज़्म’(crony capitalism)  यानि जहां बिज़नेस की सफलता सत्ताधारियों से नज़दीकी पर निर्भर हो, और उत्तराधिकार के माध्यम से अर्जित किया गया है। यहां सत्ता में आने वाला हर राजनीतिक दल इन्हीं पूंजीपतियों की सेवा में लगा रहता है और उसे व्यापक जनता की भलाई से कोई मतलब नहीं रहता। उदाहरण के लिए, 2017-18 में भारत का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर खर्च जीडीपी का 1.28 प्रतिशत था, जो विश्व में सबसे कम होगा। यह एक ऐसा शर्मनाक रिकॉर्ड है जिसे आज़ादी के बाद से यूं ही बरकरार रखा गया है।

 सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था की जो बुरी दशा है, साथ में 75 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाएं क्योंकि निजी क्षेत्र में हैं, इसके चलते भारत में स्वास्थ्य पर out-of-pocket-expenditure, यानि अपने जेब से खर्च विश्व में सबसे अधिक है-62.3 प्रतिशत। अधिकतर भारतवासियों के लिए ठीक-ठाक स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठा पाना असंभव है, यहां तक कि स्वास्थ्य पर खर्च लोगों के कर्ज में गहरे डूब जाने का एक प्रमुख कारण बनता है। भारत में 20 प्रतिशत आत्महत्याएं स्वास्थ्य से जुड़ी चिंताओं के चलते ही होती हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो ‘सिस्टम की असफलता’ इतने वर्षों से सत्ता संभालने वालों की अकर्मण्यता या अक्षमता के कारण नहीं है। बल्कि भारत की सामाजिक व आर्थिक व्यवस्था जान-समझकर ऐसी बनाई ही गई है कि भारत के नागरिक अनावश्यक रूप से परेशानी झेलें और अपनी जान गंवाएं, क्योंकि इसी क्रूरता के माध्यम से यह व्यवस्था अपने को संगठित कर सकती है और स्थिर रख सकती है।

जब तक जातीय वर्चस्व को उखाड़ फेंकने के लिए नीतियां नहीं बनतीं और धन का पुनर्वितरण नहीं होता, अधिकतर भारतवासियों के किसी भी प्रकार के बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की आशा करना बेमानी लगता है। कोविड-19 संकट से प्राप्त सच्ची नसीहत यह है कि हमारे पास दो ही विकल्प हैं-या तो हम जीवित रहें या फिर ऐसी एक व्यवस्था को जीवित रखें जो भीतर तक औपनिवेशिक और जातिवादी है।

(सत्या सागर पत्रकार हैं, जिनसे satyasagar@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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