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भारतीय उद्योगों के लिए तबाही साबित हो रही है कोरोना आपदा

देश मे पहला कोरोना का मामला 30 जनवरी को सामने आया जो केरल से था। केरल से प्रवासी आबादी बहुत अधिक संख्या में विदेशों में रहती है और यह रोग वहीं से आया है। लेकिन 30 जनवरी के पहले मामले के बाद भी केंद सरकार ने लम्बे समय तक इस मामले पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। इसी बीच, 24 और 25 फरवरी को ‘नमस्ते ट्रम्प’ कार्यक्रम जो अमेरिकी राष्ट्रपति के भारत आगमन के संबंध में आयोजित था, सम्पन्न हुआ। 13 मार्च तक सरकार ने इसे स्वास्थ्य इमरजेंसी नहीं माना।

तब तक न तो एयरपोर्ट पर सुदृढ़ चेकिंग की गयी और न ही अस्पतालों को समृद्ध किया गया और न ही डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ के लिये पर्याप्त संख्या में पीपीई किट और अन्य सुरक्षा उपकरणों की व्यवस्था की गयी। अंत में एक ही निरोधात्मक मार्ग बचता है घरों में कैद होकर सोशल डिस्टेंसिंग बरतने का तो सरकार ने पहले 21 दिन का लॉक डाउन 25 मार्च से और फिर 3 मई तक का लॉक डाउन 14 अप्रैल से लागू करने की घोषणा की। हम सब उसी लॉक डाउन में हैं।

संक्रमण रोकने के इस एकमात्र निरोधक उपाय, क्योंकि अभी तक कोविड 19 से बचने के लिये वैक्सीन का अविष्कार नहीं हो पाया है तो यही एक उपाय शेष भी बचता है, तो इसके अन्य क्षेत्रों में दुष्प्रभाव पड़ने शुरू हो गए हैं। सबसे घातक प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ा है जो 2016 के नोटबन्दी के बाद से निरन्तर अधोगामी हो रही है । बिना किसी पूर्व तैयारी और उचित रणनीति के इस लॉक डाउन ने बड़े से लेकर छोटे उद्योगों तक, संगठित से लेकर रोज कमाने खाने वाले असंगठित क्षेत्र तक के लोगों को घरों में बैठने को विवश कर दिया है।

आनन-फानन में घोषित लॉकडाउन में ज़रूरी सेवाओं के अलावा अन्य सभी तरह की सेवाएं बंद कर दी गई हैं। जिसका परिणाम यह हुआ कि, सारा व्यापार और कारोबार थम गया है, अधिकतर दुकानें प्रायः बंद हैं, आम लोगों की आवाजाही पर रोक है। अगर सीधे शब्दों में कहें तो, पहले से ही विभिन्न प्रकार की क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मुश्किलें झेल रही भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए यह कोरोना आपदा न केवल जीवन के लिये एक महामारी लेकर आयी है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था के लिये भी आज़ादी के बाद से, अब तक की सबसे बड़ी चुनौती भी है।

सबसे पहले बात बेरोजगारी की होनी चाहिए। बेरोजगारी से न केवल आर्थिक विकास की गति कम होती है बल्कि जनता में भी असंतोष फैलता है। एक रिपोर्ट के अनुसार, नोटबंदी के बाद देश में 50 लाख लोगों को अपनी नौकरियां गवांनी पड़ी है। साथ ही देश में बेरोजगारी की दर वर्ष 2018 में बढ़कर सबसे ज्यादा 6 प्रतिशत हो गई है। यह 2000 से लेकर 2010 के दशक के दर से दोगुनी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि पिछले एक दशक के दौरान देश में बेरोजगारी की दर में लगातार वृद्धि हुई है। 2016 के बाद यह अपने अधिकतम स्तर को छू गयी है। उसके बाद तो सरकार ने आंकड़ों को ही सार्वजनिक करने से मना कर दिया है। एक अनुमान के अनुसार, देश भर में 1.28 करोड़ छोटे उद्योग हैं और मौजूदा समय में 35 करोड़ लोगों को रोजगार देते हैं।

कोरोना की मार सबसे ज्यादा इन उद्योगों पर पड़ने वाली है। समान की आपूर्ति में आ रही कठिनाइयों और सरकारी और निजी कंपनियों की तरफ से बकाया राशि न मिलने के कारण, छोटी कंपनियों का अस्तित्व खतरे में आ गया है। इंडिया एसएमई फोरम की डायरेक्टर जनरल सुषमा मोरथानिया ने कहा कि छोटी कंपनियों की मुश्किलें इतनी बढ़ती जा रही हैं कि ” आने वाले दिनों में उन्हें, कर्मचारियों को वेतन देने का भी संकट खड़ा हो जाएगा। लॉकडाउन खुलने के बाद अगर इस मुश्किल वक़्त में सरकार ने मदद नहीं की तो उन कम्पनियों का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

जिससे न सिर्फ बेरोजगारी बढ़ेगी बल्कि बाज़ार में मुद्रा का प्रवाह भी कम हो जायेगा जिससे मंदी और गहराएगी। ” ऐसे में, कारोबारियों की तरफ से सरकार को सुझाव दिया गया है कि छोटे कारोबारियों से जुड़े सभी उत्पादों और सेवाओं पर जीएसटी आधा कर दिया जाए और मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र के लिए 25 करोड़ टर्नओवर और सेवा क्षेत्र के लिए 10 करोड़ तक टर्नओवर वाले कारोबारियों को यह छूट कम से कम 2 साल तक दी जाए।

जानकारों की राय में, लॉकडाउन का सबसे ज़्यादा असर असंगठित क्षेत्र पर पड़ेगा। इस क्षेत्र से ही हमारी अर्थव्यवस्था का 50 प्रतिशत हिस्सा जीडीपी में जुड़ता है। यह क्षेत्र लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह से बंद है। जब यह क्षेत्र कच्चा माल नहीं ख़रीद सकता, तैयार माल बाज़ार में नहीं बेच सकता तो उनकी आय प्रायः बंद ही हो जाएगी। नोटबन्दी के बाद से ही देश में छोटे-छोटे कारखाने और लघु उद्योगों की बहुत बड़ी संख्या नकदी की समस्या से पहले से ही त्रस्त हैं। जब उन सबकी कमाई नहीं होगी तो ये लोग खर्च कहां से करेंगे। प्रायः महसूस किया जाता है कि ऐसे लोग बैंक के पास भी नहीं जा पाते हैं। इसलिए ऊंची ब्याज़ दर पर बाजार से ही क़र्ज़ ले लेते हैं और फिर उस क़र्ज़जाल में ऐसे फंस जाते हैं कि उससे निकलना उनके भी लिए असंभव नहीं तो कठिन अवश्य हो जाता है।

भारत ही नहीं दुनिया की बड़ी आर्थिक ताक़तें भी इस चिंता में डूबी हैं कि कोरोना के बाद क्या स्थिति होगी। अर्थ विशेषज्ञों का मानना है कि यह मंदी 1930 की बड़ी और ऐतिहासिक अमेरिकी मंदी से भी अधिक भयावह होगी। तब तो वैश्वीकरण उतना नहीं हुआ था और विश्व एक गांव में नहीं बदल पाया था, इसलिए उस मंदी का वैश्विक प्रभाव बहुत अधिक नही पड़ा था । पर आज अमेरिका हो, चीन हो, जापान हो, अरब के तेल भंडार हों या विश्व का कोई भी सुदूर से सुदूर क्षेत्र हो, वहां की गतिविधियों से अलग-थलग नहीं रहा जा सकता है। सभी देशों की आर्थिकी का असर लगभग सभी देशों पर थोड़ा बहुत पड़ता ही है।

भारतीय उद्योग परिसंघ एक नोट ज़ारी किया है, जो चीन के संदर्भ में है। इस विमर्श में चीन के ही संदर्भ में विचार किया जा रहा है। इस नोट में जो चित्र आने वाले समय का खींचा गया है वह बेहद निराशाजनक है। एक संक्षिप्त जानकारी दे रहा हूँ पढ़ें। यह विवरण सेक्टर के अनुसार है। यह नोट और निष्कर्ष, बिजनेस स्टैंडर्ड, बीबीसी, फाइनेंशियल एक्सप्रेस सहित, विभिन्न पत्रिकाओं और वेबसाइटों पर उद्धृत निष्कर्षों पर आधारित है।

● वाहन उद्योग:

वाहन उद्योग पिछले तीन साल से मंदी से जूझ रहा है। यह महामारी इसे और प्रभावित करेगी। साथ ही इस उद्योग पर प्रभाव चीन के साथ उनके व्यापार की सीमा पर निर्भर करेगा। चीन में शटडाउन ने भारतीय ऑटो निर्माताओं और ऑटो उद्योग दोनों को प्रभावित करने वाले विभिन्न घटकों के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है। हालांकि, भारतीय उद्योग के लिए इन्वेंट्री का मौजूदा स्तर पर्याप्त है। यदि चीन में शटडाउन जारी रहता है, तो 2020 में भारतीय ऑटो मैन्युफैक्चरिंग में 8-10 प्रतिशत का संकुचन होने की उम्मीद है। हालांकि, बिजली संचालित वाहनों के क्षेत्र के लिए, कोरोना आपदा का प्रभाव अधिक हो सकता है। बैटरी आपूर्ति श्रृंखला में चीन प्रमुख है, क्योंकि इसमें लगभग तीन-चौथाई बैटरी उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता से आता है। भारतीय बाजार में अगर मांग में कमी और आयी जिसकी सम्भावना दिख भी रही है तो पहले से ही मंदी से प्रभावित इस सेक्टर को और मंदी का सामना करना पड़ेगा।

● फार्मा उद्योग:

अगर डायबिटीज, एलर्जी, बुखार या दर्द निवारक दवाएं आपको मेडिकल स्टोर पर इन दिनों एकाएक महंगी मिलने लगी हों तो हैरत में मत पड़िएगा। यह भारत से तीन हज़ार किमी दूर चीन के वुहान शहर और आसपास फैले नोवेल कोरोना वायरस का असर है। उस इलाके में हज़ारों लोग मर चुके हैं और लाखों को संक्रमित करने वाला यह वायरस चिकित्सा जगत के लिए विकट चुनौती बन गया है। हालांकि भारत दुनिया में शीर्ष दवा निर्यातकों में से एक है, लेकिन घरेलू फार्मा उद्योग थोक दवाओं (एपीआई और मध्यवर्ती जो कि उनके चिकित्सीय मूल्य देते हैं) के आयात पर बहुत अधिक निर्भर करता है।

भारत ने वित्त वर्ष 2019 – 20 में लगभग 24,900 करोड़ रुपये की थोक दवाओं का आयात किया था, जो कुल घरेलू खपत का लगभग 40 प्रतिशत है। चीन द्वारा भारत के एपीआई के आयात से इसकी खपत का लगभग 70 प्रतिशत औसत की दर से आयातकों को आपूर्ति बाधित होने का खतरा है। कई महत्वपूर्ण एंटीबायोटिक दवाओं और एंटीपीयरेटिक्स के लिए, चीन से आयात पर हमारी निर्भरता 100 प्रतिशत के करीब है।

दवा उत्पादन के गढ़ बद्दी (हिमाचल प्रदेश) में इस संकट की आहट साफ सुनाई दे रही है। मेडिक्योर फॉर्मा के निदेशक हितेंद्र सिंह बताते हैं, ”एंटी बायोटिक, एंटी एलर्जिक और डायबिटीज जैसी दवाओं को तैयार करने में प्रयोग होने वाला कच्चा माल पिछले महीने भर में ही दो से तीन गुना महंगा हो गया है।” उनकी कंपनी देश की 600 से ज्यादा घरेलू कंपनियों के लिए दवाएं तैयार करती है।

दर्द निवारक दवाइयों में इस्तेमाल होने वाले पैरासीटामॉल के बिना फॉर्मा उद्योग की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हितेंद्र सिंह के शब्दों में, ”अभी पिछले महीने तक इसका भाव 270 रु. किलो था और अब 600 रुपए के पार है। ” जाहिर है, कच्चे माल के दाम में अप्रत्याशित तेजी से दवाओं के दाम बढ़ेंगे, जिसकी महंगी कीमतों का प्रभाव  बीमारों पर ही पड़ेगा। कई दवाइयां जीवन रक्षक श्रेणी में आती हैं जिनके दाम सरकार तय करती है, उन पर भले ही असर न पड़े पर आम दवाएं तो उस असर से मुक्त नहीं रह पाएंगी।

● केमिकल उद्योग:

भारत में स्थानीय डाइस्टफ इकाइयाँ चीन से कई कच्चे मालों के आयात पर निर्भर हैं, जिनमें रसायन और अन्य मध्यवर्ती वस्तुयें शामिल हैं। चीन से विलंबित शिपमेंट और कच्चे माल की कीमतों में बढ़ोतरी से विशेषकर गुजरात में रंजक और डाइस्टफ उद्योग प्रभावित हो रहे हैं। कच्चे माल की आपूर्ति में व्यवधान के कारण लगभग 20 प्रतिशत उत्पादन प्रभावित हुआ है। चीन वस्त्रों के लिए विशेष रसायनों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, विशेष रूप से इंडिगो डेनिम के लिए आवश्यक है। हालांकि, यह एक अवसर भी है क्योंकि अमेरिका और यूरोपीय संघ अपने बाजारों में विविधता लाने और चीन के जोखिम को कम करने की कोशिश करेंगे। यदि इसका फायदा उठाया जाए तो इस व्यवसाय में से कुछ को भारत में भेजा जा सकता है।

अनिश्चितताओं के बीच केमिकल्स के दाम बढ़ऩे शुरू हो गए हैं, जिसका असर आने वाले सीजन में कीटनाशक और जैविक उत्पादों की कीमतों में देखने को मिलेगा। खेती के ही स्प्रे पंप का आयात करने वाली इंदौर की एक और कंपनी  प्रमुख बीसी। बैरागी को भी इस साल कारोबार ठंडा रहने का अंदेशा है। ”हर साल इन्हीं दिनों चीन जाकर नए उत्पाद देखकर मोलभाव करके पंप आयात किए जाते हैं। अब फैक्ट्रियां ही बंद पड़ी हैं। जब तक नए उत्पाद, नए भाव हाथ में नहीं आ जाते तब तक किसी भी व्यापारी को ठोस जानकारी देना मुश्किल है। गोदाम में पिछले साल का कुछ माल जरूर रखा है। इसके बाद इस साल पंप का काम कर पाएंगे, कहना मुश्किल है। “

● इलेक्ट्रॉनिक्स:

चीन अंतिम उत्पाद के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग में उपयोग किए जाने वाले कच्चे माल के लिए एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग इलेक्ट्रॉनिक्स घटक आपूर्ति-पर प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष और स्थानीय विनिर्माण पर भारी निर्भरता के कारण, आपूर्ति में व्यवधान, उत्पादन में कमी, उत्पाद की कीमतों पर प्रभाव से डर रहा है। कोरोना वायरस के प्रसार से भारत की प्रमुख आपूर्ति करने वाली शीर्ष इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों और स्मार्ट फोन निर्माताओं की बिक्री को धक्का लग सकता है।

● सौर ऊर्जा:

भारत में सौर ऊर्जा परियोजना डेवलपर्स चीन से प्राप्त सौर मॉड्यूल पर निर्भर हैं।  यह मॉड्यूल सौर परियोजना की कुल लागत का लगभग 60 प्रतिशत है। चीनी कंपनियों ने भारतीय सौर घटकों के बाजार पर अपना वर्चस्व कायम करते हुए लगभग 80 प्रतिशत सौर कोशिकाओं और मॉड्यूलों की आपूर्ति की, जिससे उनका प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण हुआ। चीनी विक्रेताओं ने प्रकोप के कारण भारतीय डेवलपर्स को अपने यहां घटकों के उत्पादन, गुणवत्ता जांच और परिवहन में हो रही देरी के बारे में सूचित कर दिया है। परिणामस्वरूप, भारतीय डेवलपर्स ने सौर पैनलों / कोशिकाओं और सीमित शेयरों में आवश्यक कच्चे माल की कमी का सामना करना शुरू कर दिया है।

● इनफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी:

चीन में वार्षिक छुट्टियों ने चीन से बाहर काम करने वाली घरेलू आईटी कंपनियों के राजस्व और विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। आईटी कंपनियां जनशक्ति पर बहुत अधिक निर्भर हैं और लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग जैसे आवश्यक मुद्दों से उत्पन्न प्रतिबंध के कारण काम करने में सक्षम नहीं हैं। परिणामस्वरूप वे समय पर मौजूदा परियोजनाओं को पूरा करने या वितरित करने में सक्षम नहीं हैं और नई परियोजनाओं को भी वे कम कर  रहे हैं। इसके अलावा, चीन में भारतीय आईटी कंपनियों के लिए वैश्विक ग्राहकों ने मलेशिया, वियतनाम आदि जैसे वैकल्पिक स्थानों में अन्य सेवा प्रदाताओं की तलाश शुरू कर दी है।

● शिपिंग:

भारत और चीन के बीच शिपमेंट में देरी की शिकायतें आई हैं। 2020 की पहली तिमाही में भारतीय शिपिंग कंपनियों की कुल आय के बारे में इस सेक्टर को अनेक गंभीर चिंताएं हैं। जनवरी 2020 के तीसरे सप्ताह से ड्राई बल्क कार्गो आंदोलन में तेज गिरावट आई है। क्योंकि चीन में शटडाउन का मतलब है कि जहाज चीनी बंदरगाहों में प्रवेश नहीं कर सकते।

● टूरिज्म और एविएशन:

कोरोना वायरस के प्रसार से एविएशन सेक्टर भी प्रभावित हुआ है। प्रकोप ने घरेलू वाहक को भारत और चीन और हांगकांग से भारत में परिचालन करने वाली उड़ानों को रद्द करने और अस्थायी रूप से निलंबित करने के लिए मजबूर किया है। इंडिगो और एयर इंडिया जैसे कैरियरों ने चीन के लिए काम रोक दिया है। चीन और हांगकांग के लिए उड़ानों के अस्थायी निलंबन से इस सेक्टर के सकल राजस्व लक्ष्य पर बेहद प्रभाव पड़ेगा।

● टेक्सटाइल इंडस्ट्री:

चीन के कपड़ा कारखानों ने भारत से कपड़े, यार्न और अन्य कच्चे माल के निर्यात को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हुए कोरोना वायरस के प्रकोप के कारण परिचालन को रोक दिया है। विघटन से सूती धागे के निर्यात में 50 प्रतिशत की कमी आने की आशंका है, जिससे भारत में कताई मिलों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। माल के प्रवाह बाधिता के इस दौर में इस मंदी के कारण राजस्व, कपड़ा इकाइयों को वार्षिक ब्याज और वित्तीय संस्थानों को पुनर्भुगतान करने में बाधा आ सकती है, जिससे उनका बकाया चुकता नहीं हो पाएगा।

इससे कपास के किसानों की मांग पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, जो पहले से ही दबे हुए हैं और उन्हें डर है कि अगर चीन का यह संकट आगे भी जारी रहा तो उनक़ी  कीमतों में और गिरावट आ सकती है। उल्लेखनीय है कि भारत के पास पहले से ही वियतनाम, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे देशों के विपरीत, एक प्रतिस्पर्धा है, जो सूती धागे के निर्यात हेतु चीन के लिए शुल्क मुक्त क्षेत्र है। हम चीन के लिये शुल्क मुक्त नहीं हैं। दूसरी ओर, चीन में कोरोना वायरस मुद्दा उन सभी उद्योगों के लिए एक बड़ा अवसर प्रकट करता है जहां चीन एक प्रमुख निर्यातक है।

● इंजीनियरिंग गुड्स सेक्टर:

लुधियाना मशीन टूल्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के निदेशक दिलदार सिंह के शब्दों में इस सेक्टर के बारे में पढ़ें, ”इधर 3-4 वर्षों में चीन पर हमारी निर्भरता बढ़ी है। यहां कई ऐसे मैन्युफैक्चरर हैं जो चीन से तैयार माल मंगवाकर ट्रेडिंग करने लगे हैं। अब जब आयात ठप्प या कम होगा तो निश्चित तौर पर हमारे यहां उनकी मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी। यहां बनाकर तकनीकी गुणवत्ता की बराबरी कर पाना मुश्किल है लेकिन सप्लाई लंबे समय तक ठप्प रही तो भारतीय उत्पादकों के लिए यह एक अवसर भी होगा,  क्योंकि हमारे पास विकल्प सीमित हो जाएंगे। ” भारत में तैयार उत्पाद की कीमत भी एक अहम मुद्दा होती है, कीमत ही वह वजह थी, जिसकी वजह से मैन्युफैक्चरर खुद न बनाकर चीन से तैयार माल मंगवाकर बेचने लगे। दिलदार सिंह कहते हैं, ”इस मौके को भुनाने के लिए सरकार को उद्योगों की मदद करनी होगी, जिसकी उम्मीद कम नजर आती है। ”

इसे संक्षेप में इस प्रकार समझें। दवाएं बनाने में इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल यानी सॉल्ट के लिए भारत चीन पर निर्भर है। और चीन में आलम यह है कि वहां फैक्ट्रियां बंद पड़ी हैं, बंदरगाह ठप हैं और श्रमिक खौफ में हैं। उत्पादन और आपूर्ति की पूरी कड़ी ही उलझ गई है। ऐसे में न केवल फार्मा बल्कि चीन से सस्ते आयात पर टिके तमाम उद्योगों में अफरा तफरी है। चीन से कुल आयात में 80 फीसद से ज्यादा हिस्सा इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग के सामान, केमिकल और इससे जुड़े उत्पादों का है. देश के बीसियों उद्योगों के लिए वही कच्चा या तैयार माल है । बच्चों के खिलौने, गिफ्ट आइटम, फर्नीचर, गैस चूल्हे, बेल्ट बक्कल, चैन (जिप) जैसी छोटी-छोटी चीजों के बाजार में भी चीन का ही दबदबा है। कोरोना वायरस से निपटने में जो भी वक्त लगे पर भारत में इसने उद्योगों को भी अपनी आपदा की गिरफ्त में ले लिया है।

कोरोना की महामारी के अंत में पूरी दुनिया पर इसका प्रभाव खरबों डॉलर का होने वाला है। वर्ष 2002-2003 का संदर्भ लें, जब चीन में सार्स नाम की महामारी नौ महीने तक फैली थी तब इसने 8,000 से ज्यादा लोगों को चपेट में लेने के साथ, 774 लोगों की जानें भी ले ली थीं। उस समय व्यापार विशेषज्ञों के अनुसार, दुनियाभर को 4,000 करोड़ डॉलर का नुकसान हुआ था। 2003 में विश्व अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी केवल 4 प्रतिशत थी। विश्व अर्थव्यवस्था तब 2.9 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही थी लेकिन चीन की आर्थिक विकास दर 10 प्रतिशत थी।

अब कोरोना का यह कहर सार्स से कहीं अधिक घातक है और विश्व अर्थव्यवस्था में चीन का प्रभाव भी बढ़ा है। वर्तमान समय में दुनिया की अर्थव्यवस्था में चीन की हिस्सेदारी 2003 के मुकाबले चार गुना ज्यादा यानी 16 प्रतिशत है। ऐसे में कोरोना के कहर से चीन की आर्थिक विकास दर एक से सवा प्रतिशत तक कम होने के अनुमान लगाए जा रहे हैं। इसके असर से विश्व अर्थव्यवस्था की रफ्तार भी 0.5 प्रतिशत तक घटने की संभावना है।

चीन न केवल दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक बल्कि दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश भी है। 100 से ज्यादा देशों के लिए चीन की फैक्ट्रियां सबसे बड़ी आपूर्तिकर्ता हैं, दूसरी ओर चीन के 4 प्रांतों और 48 शहरों में थमी 50 करोड़ लोगों की जिंदगी के खपत पर भी असर डालेगी, जो दरअसल भारत जैसे कई देशों का बाजार भी है। इस समय भारत के कुल आयात में चीन की हिस्सेदारी 14 प्रतिशत है, जबकि भारत के निर्यात में चीन की हिस्सेदारी मात्र 5 प्रतिशत है। भारत का यह व्यापार घाटा 53.6 अरब डॉलर का है। और आयात आधारित उद्योगों में संकट तो अब दिखने ही लगा है।

इस लेख में चीन को प्रमुखता इस लिये दी गयी है कि चीन से हमारे व्यापार का अंश अन्य किसी भी देश के व्यापार से अधिक है अगर रक्षा सौदों को अलग कर दिया जाए तो। ऐसी स्थिति में यह आपदा केवल एक संकट ही लेकर नहीं बल्कि एक चुनौती के रूप में भी हमारे सम्मुख उपस्थित है। हमारे पास, श्रम है, कौशल है, क्षमता है पर किसी भी स्पष्ट नीति और उचित दिशानिर्देश का अभाव हमें सदैव आयातक अधिक निर्यातक कम बनाता रहा है।

कुछ तो कर प्रणाली, कुछ बेमतलब की नौकरशाही का अंकुश, और ग्राह की तरह ग्रसे भ्रष्टाचार ने हमारे उद्योग जगत को कभी भी मुक्त भाव से प्रतियोगिता में उतरने नहीं दिया। ऐसे घरेलू संकटों से निपटने के लिये राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक दक्षता और कुशल प्रतिभा की आवश्यकता अनिवार्यतः पड़ती है। अभी तो हम सब घातक वायरस से बचने के लिये घरों में कैद हैं। पर यही समय है जब सरकार आपदा बाद के प्रबंधन की रूपरेखा बना ले ताकि उसे समय मिलते ही लागू किया जा सके।

यह समय एकजुटता का है। बिना एक हुए कभी भी किसी संकट का सामना नहीं किया जा सकता है। सरकार को भी राजनीतिक मतभेदों से हट कर उन सभी आर्थिक प्रतिभाओं को एक मंच पर लाकर इस बड़ी चुनौती का सामना करने के लिये तैयार होना पड़ेगा, अन्यथा अधोगामी होती हुई इस आर्थिकी में सुधार की बात सोचना एक दिवास्वप्न ही होगा।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफ़सर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

This post was last modified on April 21, 2020 9:48 am

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