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कोरोना आपदा, हमारा स्वास्थ्य ढांचा और तालाबंदी

30 जनवरी को जब केरल में पहला कोविड 19 का केस मिला था, तब बहुतों को इस बात का अंदाज़ा भी नहीं था कि एक ऐसी आपदा ने दस्तक दे दिया है जो न सिर्फ लाइलाज है, बल्कि वह दुनिया के तमाम समीकरणों को बदल कर रख देने वाली है। यह वायरस जिसे कोरोना नॉवेल या कोविड 19 के नाम से जानते हैं, लाक्षणिक रूप से एक फ्लू और जुकाम ही है पर यह तेजी से श्वसन तंत्र को संक्रमित कर देता है, जिससे मृत्यु हो जाती है। इसकी कोई तयशुदा दवा नहीं है, और न ही बचाव के लिये कोई टीका अभी तक विकसित हो पाया है। चिकित्सा वैज्ञानिक निरन्तर इस पर शोध कर रहे हैं और उम्मीद है कि जल्दी ही कोई न कोई वैक्सीन या कारगर औषधि वे ढूंढ लेंगे।

सरकार ने सम्भावित संक्रमण रोकने के लिये घरों में ही लोगों को अनिवार्य रूप से रखने, जिसे लॉक डाउन नाम दिया गया, की नीति अपनाई और, इसके साथ स्वच्छता की सलाह तथा हेल्थकेयर सुविधाएं बढ़ाने की ओर भी ध्यान दिया गया । केरल ने भी न केवल बाहर से आने वालों की सघन चेकिंग शुरू की बल्कि अस्पतालों को भी सन्नद्ध किया जिससे इलाज हो सके। केरल स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के दृष्टिकोण से भारत में प्रथम स्थान पर और शिक्षा तथा अन्य सामाजिक सुविधाओं के मामले में देश के अन्य राज्यों की तुलना में अधिक व्यवस्थित है तो, उसे इसका लाभ भी मिला। देश में पहला केस होते हुए भी केरल में मृत्यु दर सबसे कम बनी हुई है।

इसके 52 दिन बाद, 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रात आठ बजे, अपने संबोधन के सिर्फ़ चार घंटे बाद, यानी रात 12 बजे से पूर्ण लॉकडाउन की घोषणा कर दी। लोगों को 8 नवम्बर, 2016 की रात 8 बजे की, उनकी घोषणा याद आ गयी जब उन्होंने नोटबंदी की घोषणा की थी और उसी के बाद देश की आर्थिक स्थिति में जो गिरावट आयी, वह अब कोरोना आपदा के कारण, और भी अधिक बिगड़ गयी है। 24 मार्च 2020 तक पूरे भारत में, कोरोना वायरस के कुल 564 केस पॉज़िटिव पाए गए थे और मौतों की संख्या 10 बताई गई थी। आज अकेले महाराष्ट्र में 50 हज़ार का आंकड़ा पार कर गया है। आज की नवीनतम सूचना के अनुसार, पूरे देश में, 1,31,868 मामले सामने आए हैं और अब तक 6767 लोगों की मृत्यु हो गयी है। लॉक डाउन के प्रथम दिन से अब चौथे चरण में अब तक मृत्यु दर में 2 % की वृद्धि हुई है।

कोरोना एक ऐसा संक्रामक रोग है जिससे निपटने में पूरी दुनिया की स्वास्थ्य सेवाएं जुटी हुयी हैं। चीन से निकल कर यूरोप और फिर अमेरिका तथा पूरी दुनिया में अचानक फैल जाने वाले इस संक्रामक रोग ने दुनिया के विकसित देशों से लेकर पिछड़े देशों तक, सबको निगलने की कोशिश की है। दुनिया की सारी सीमाएं इस रोग ने तोड़ दी है। स्पेन हो या इटली, अमरीका हो या ब्रिटेन, जापान हो या दक्षिण कोरिया, कनाडा हो या ब्राज़ील, हर देश में यह  वायरस अपना कहर बरपाता चला जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन,  डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे विश्व में, इस घातक वायरस से कुल 47 लाख लोग संक्रमित हो चुके हैं, जिनमें से तीन लाख से ज़्यादा की मृत्यु हो चुकी है।

इससे बचने के लिये निरोधात्मक उपायों के रूप में, कुछ देशों ने, टोटल लॉकडाउन तो, कुछ देशों ने, ‘आंशिक लॉकडाउन’ यानी अलग-अलग इलाक़ों और संक्रमण के ख़तरों के ज़्यादा या कम होने की घटनाओं के आधार पर इसे लागू किया। पर ऐसा नहीं है कि किसी देश को संक्रमण रोकने में पूरी सफलता मिली हो। ताइवान, वियतनाम जैसे कुछ छोटे छोटे देश ज़रूर इस आपदा से उतने पीड़ित नहीं हैं पर इसका कारण उनका आकार में कम और स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतर होना है।

कोरोना को अगर एक युद्ध माना जाए, और जैसा इसे माना जा रहा है, तो यह जंग दो मोर्चे पर है। एक हेल्थकेयर औऱ दूसरा आर्थिक मोर्चे पर। युद्ध मे आर्थिक गति नहीं थमती है बल्कि कुछ क्षेत्रों में वह बढ़ ही जाती है, जबकि कोरोना आपदा ने देश को, दोनों ही मोर्चों पर,  संकट में डाल चुकी है। तालाबंदी या लॉक डाउन एक समय लेने का कार्यक्रम है और एक निरोधात्मक उपाय, न कि संक्रमण का कोई कारगर इलाज है। हमारे देश की स्वास्थ्य सेवाएं विशेषकर सरकारी या पब्लिक हेल्थकेयर बहुत सुदृढ़ नहीं हैं। हम इस विषय पर टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के सीनियर रिसर्च फेलो संजीव कुमार के एक रिसर्च पेपर से कुछ आंकड़े जो गुजरात मॉडल के हेल्थकेयर को केंद्र में रख कर तैयार किये गये हैं, प्रस्तुत करते हैं।

स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में गुजरात की चर्चा इस लिए भी ज़रूरी है कि, इसी राज्य के विकास के मॉडल पर 2014 के चुनाव में भाजपा को अपार सफलता मिली थी और यह मॉडल देश के विकास मॉडल के अग्रदूत के रूप में समझा जाता है।  लेकिन विकास के इस मॉडल में जनता कहाँ है ? जनता के लिये स्कूल, अस्पताल और उनकी बेरोजगारी दूर करने के उपाय क्या हैं ? विकास के इस मोहक मॉडल के पीछे का सच क्या है ? यह जानना बहुत ज़रूरी है। सरकार की प्राथमिकता में, हेल्थकेयर कहीं है भी, जब इस सवाल का उत्तर ढूंढा जाता है तो निराशा ही हाथ लगती है। स्वास्थ्य बीमा की कुछ लोक लुभावन नामों वाली योजनाओं को छोड़ दिया जाए तो अस्पताल, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और बड़े विशेषज्ञ अस्पतालों के लिये, धरातल पर सरकार ने पिछले सालों में कुछ किया भी नहीं है, बस कुछ बीमा आधारित घोषणाओं को छोड़ कर।

अहमदाबाद शहर में इस रोग के भयानक प्रसार पर एक याचिका अहमदाबाद हाईकोर्ट में दायर हुई और उस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने

जो कहा, उसे भी एक उदाहरण के रूप में देखा जाना चाहिये। अदालत ने याचिका की सुनवाई करते हुए कहा कि,

” राज्य सरकार केवल ऊपर-ऊपर से इस आपदा को नियंत्रित करने की कोशिश कर रही है। अहमदाबाद के सिविल अस्पताल जहां कोविड 19 के इलाज की बात की जा रही है, वहां की स्थिति एक काल कोठरी की तरह है, या उससे भी बदतर है। ”

वेंटिलेटर्स की कमी के कारण बढ़ती हुई मृत्यु दर पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि, ” क्या राज्य सरकार को यह बात पता है कि, अस्पताल में जो कोविड 19 के कारण मृत्यु हो रही है उनका एक बड़ा कारण वेंटिलेटर्स का अभाव है ?

सरकार इस समस्या से निपटने के लिए क्या कर रही है ? “

अदालत ने राज्य सरकार को निर्देशित किया है कि वह नोटिफिकेशन जारी कर के यह आदेश दे कि,

” अहमदाबाद, और आसपास के सभी म्युनिसिपल, सिविल और कॉरपोरेट अस्पताल अपने 50 % बेड कोविड 19 के संक्रमितों के लिये सुरक्षित करें। ”

टेस्टिंग प्रोटोकॉल पर राज्य सरकार द्वारा कम टेस्टिंग किये जाने के बिंदु पर, अदालत ने कहा कि,

” कई मामलों में यह पता लगा है कि निजी लैब ने अनावश्यक रूप से कुछ अन्य टेस्ट किये हैं। राज्य सरकार इन निजी लेबोरेटरीज के लिये केवल एक गेट कीपर की भूमिका में है। सरकार को अपनी टेस्टिंग क्षमता को बढ़ाना चाहिए और टेस्ट, मुफ्त किये जाने चाहिए। जब तक सरकारी टेस्टिंग क्षमता उपलब्ध है तब तक निजी लैब्स द्वारा टेस्ट कराने के लिये मरीज़ों को बाध्य नहीं करना चाहिए। जब सरकारी लैब्स टेस्टिंग करने में अपनी क्षमता समाप्त कर लें, तभी निजी लैब्स की सहायता लेनी चाहिए। ”

गुजरात राज्य में, 19 सरकारी लेबोरेटरी हैं, जो कोविड मरीजों के लिये आरटी – पीसीआर टेस्ट करते हैं। अब तक 1,78,068 टेस्टिंग सैम्पल लिए गए हैं।

अदालत ने कहा,

” अगर यह भय है कि सबके टेस्ट किये जायेंगे तो 70 % लोग पॉजिटिव निकल आएंगे तो, केवल इस आशंका से भयग्रस्त होकर कम टेस्ट नहीं किये जाने चाहिए। राज्य सरकार सभी टेस्टिंग केंद्रों से निरंतर संपर्क में रहे, और जो भी संक्रमित मरीज पॉजिटिव पाए जाएं, जहां तक सम्भव हो उन्हें उनके घरों में ही आइसोलेशन में रख दिया जाए, या क्वारंटाइन की सुविधा में रखा जाए। जब लक्षण हों तो उन्हें अस्पताल में भर्ती किया जाए। यह भी बताया गया है कि टेस्टिंग किट की कमी नहीं है, पर उनका उपयोग बिना राज्य सरकार के अनुमोदन  के नहीं किया जा सकता है।

अहमदाबाद से अधिक चिंताजनक स्थिति मुंबई की है, पर याचिका अहमदाबाद में सुनी जा रही है तो इसका उल्लेख किया जा रहा है। ऐसा बिल्कुल भी नहीं कि, अन्य शहरों या राज्यों में स्थिति बिल्कुल दुरुस्त है। बल्कि हर जगह स्थिति कमोबेश एक ही जैसी है। गुजरात एक आदर्श विकसित राज्य माना जाता है तो उसका उल्लेख मैं कर रहा हूँ। पूरे देश में पब्लिक हेल्थकेयर प्राथमिकता में बहुत नीचे है, और इसका  कारण निजीकरण के दौर में हमने पब्लिक हेल्थकेयर को अपनी प्राथमिकता में कभी रखा ही नहीं है। देश मे हेल्थकेयर एक उपेक्षित क्षेत्र है और किसी भी सरकार ने पब्लिक हेल्थकेयर जिसे हम सरकारी अस्पताल की सुविधा कहते हैं, की तरफ उतना ध्यान नहीं दिया जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था।

फिलहाल, अग्रदूत की तरह प्रचारित गुजरात मॉडल पर इन आंकड़ों को देखिए।

● गुजरात में प्रति 1,000 की आबादी पर केवल 0.33 % हॉस्पिटल बेड हैं। इस मामले में गुजरात राज्य, केवल बिहार राज्य से, एक पायदान ऊपर है।

● हॉस्पिटल बेड का राष्ट्रीय मानक, भारत मे, 0.55 प्रति 1000 की आबादी पर है।

● विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में, भारत में प्रति 1000 की आबादी पर .70 बेड थे।

● आरबीआई के एक अध्ययन और आंकड़ों के अनुसार, अपने राज्यों में, सामाजिक सेक्टर पर खर्च करने वाले, देश के 18 बड़े राज्यों में गुजरात का स्थान इस क्षेत्र में 17 वां था।

● 2009 – 2010 में गुजरात, सामाजिक सेक्टर में, प्रति व्यक्ति व्यय के मामले में, 11 वें स्थान पर गिर कर आ गया, जबकि 1999 – 2000 में वह चौथे स्थान पर था।

● इसी अवधि में आसाम ने अपनी रैंकिंग में, सुधार करते हुए खुद को 12 वें से तीसरे स्थान पर ले आया और उत्तर प्रदेश 15 वें स्थान से तरक़्क़ी कर के नौवें स्थान पर आ गया।

● 1999 – 2000 में गुजरात अपने कुल राज्य व्यय का 4.39 % हेल्थकेयर पर व्यय करता था पर 2009 -10 में व्यय का यह प्रतिशत, गिर कर मात्र 0.77 % रह गया।

● एनएसडीपी में स्वास्थ्य व्यय के मद में गुजरात की हिस्सेदारी 1999 – 00 से 2009- 10 के बीच 0.87 % से गिर कर पर 0.73 % आ गयी।

● जबकि इसी अवधि में बड़े राज्यों की एनएसडीपी में स्वास्थ्य सेक्टर के मद में हिस्सेदारी बढ़ कर औसतन 0.95 % से बढ़ कर 1.04 % हो गयी।

● तमिलनाडु और असम ने, स्वास्थ्य सेक्टर में अपने व्यय बढ़ा कर लगभग दूने कर लिये।

● 2004 – 05 में जब यूपीए केंद्र में सत्ता में आयी तब देश की जीडीपी का केवल 0.84 % ही जन स्वास्थ्य पर व्यय होता था, जो 2008 – 09 में 1.41 % हो गया था।

● यही व्यय जब 2014 – 15 के बजट में, एनडीए सरकार सत्ता में आयी तो 0.98 % पर सिकुड़ कर आ गयी।

● वर्तमान वित्तीय वर्ष 2020 – 21 में यह राशि जीडीपी का 1.28 % अनुमानित रखी गयी है। जबकि 2008 – 09 में सरकार अपनी जीडीपी का 1.41% तक व्यय कर चुकी है।

● गुजरात मे किसी भी व्यक्ति का हेल्थकेयर, हॉस्पिटलाइजेशन पर व्यय, यहां तक कि बिहार जैसे मान्यता प्राप्त पिछड़े राज्य से भी अधिक है। इसका अर्थ यह हुआ कि, जनता को गुजरात के सरकारी  अस्पतालों में इलाज कराने के लिये, बिहार की जनता की तुलना में, अपनी जेब से अधिक धन व्यय करना पड़ रहा है।

● गुजरात, 2009 – 10 में, प्रति व्यक्ति दवा पर व्यय की रैंकिंग मे देश में 25 वें स्थान पर था।

● 2001 में जब नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्य मंत्री बने तो राज्य में कुल 1001 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र थे। सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों की संख्या 244 थी और कुल 7,274 उप स्वास्थ्य केंद्र थे।

● 2011 – 12 में प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में थोड़ी बढ़ोत्तरी हुई और उनकी संख्या क्रमशः 1,158 और 318 तक पहुंच गयी पर स्वास्थ्य उप केंद्रों में कोई वृद्धि नहीं हुई।

● आज भी गुजरात में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बिहार की तुलना में कम है।

● बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में जितने सरकारी अस्पताल हैं वे गुजरात से संख्या में तीन गुने अधिक हैं।

● भारत में इस समय 7,13,986 हॉस्पिटल बेड और कुल 20,000 वेंटिलेटर हैं। कोविड 19 के संबंध में एक आकलन के अनुसार, कुल 5% संक्रमितों को वेंटिलेटर की ज़रूरत पड़ सकती है।

● ऐसी परिस्थितियों में हमें देश के हेल्थकेयर सिस्टम को और सुदृढ़ करने के लिए विचार करना होगा।

अब सवाल उठता है कि विकास का क्या मानक होना चाहिये ? स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन, बड़े-बड़े शहर या देश की शिक्षित और स्वस्थ जनता? देश या समाज, भव्य अट्टालिकाओं, प्रशस्त राजमार्गों, बड़े-बड़े मॉल्स, से ही विकसित नहीं माना जा सकता है, बल्कि वह देश की जनता से बनता और बिगड़ता है। अगर जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य, जीवनयापन की मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध हैं तो देश को विकसित माना जाना चाहिये, अन्यथा वह पूंजीपतियों का निर्द्वन्द अभयारण्य बन कर रह जायेगा और समाज आपराधिक स्तर तक शोषक और शोषित में बंटता चला जायेगा।

वर्ष 2014-15 के बजट में सरकार ने 100 स्मार्ट सिटी बनाने का वायदा किया था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन स्मार्ट सिटी में हेल्थकेयर के क्षेत्र में केवल 1% बजट की धनराशि व्यय की जा रही है। स्मार्ट सिटी की 5,861 परियोजनाएँ, जो फिलहाल चल रही हैं, उनमें मात्र 69 परियोजनाएं ही, हेल्थकेयर से जुड़ी हैं। 100 स्मार्ट सिटीज के 55 शहरों में कुल व्यय ₹ 205,018 करोड़ का होना है, जिनमें हेल्थकेयर पर केवल ₹ 2112.06 करोड़ व्यय होगा। यह व्यय 2019-20 के बजट स्वीकृति जो जीडीपी का 1.6 है, से भी कम है। पंचवर्षीय योजना की तरह, 2015 में सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत की थी, जिसमें चार चरणों में 100 शहर स्मार्ट बनाये जाने हैं, जिसमें हेल्थकेयर पर विशेष जोर देने की बात की गयी है। लेकिन बजट और व्यय को देखते हुए यह केवल एक वादा ही फिलहाल लग रहा है। कोरोना आपदा के संदर्भ में इंडियन एक्सप्रेस में आज 25 मई को प्रकाशित एक खबर में 79% कोविड के मामले इन 17 स्मार्ट सिटी से ही हैं।

वर्तमान महामारी की आपदा के संदर्भ में दुनिया भर के देश अपने अपने देशों में हेल्थ केयर सेक्टर की गुणवत्ता और उसकी कमी, क्षमता और आवश्यकता पड़ने पर उनके योगदान का अध्ययन करने और उन्हें बेहतर बनाने के उपायों को अपनाने पर जुटे हुए हैं और तदनुसार अपनी नीतियां भी बना और संशोधित कर रहे हैं। ऐसी परिस्थितियों में हमें अपने यहां के हेल्थकेयर सेक्टर की कमियों और ज़रूरतों का अध्ययन कर के उन्हें बेहतर बनाने की एक संगठित योजना पर काम शुरू करना होगा।

सरकार ने लॉकडाउन के दो उद्देश्य बताये थे,

● पहला, इस वायरस के संक्रमण को रोकना क्योंकि इसके संक्रमण की दर जिसे ‘आरओ’ कहते हैं उसे क़ाबू में रखना था क्योंकि, डब्ल्यूएचओ के निर्देशों के अनुसार, क्वारंटाइन ही इसका एकमात्र निरोधात्मक उपाय है।

● दूसरा, कोरोना पॉज़िटिव मामलों के ग्राफ़ को ऊपर जाने से रोकना। इसे ‘फ़्लैटेन द कर्व’ कहा जा रहा है और इस दौरान, जो समय मिले उसी में, हेल्थकेयर का इंफ्रास्ट्रक्चर कुछ सुधार लिया जाय।

अब सवाल उठता है 25 मार्च से जारी लॉक डाउन से इस युद्ध में हमें कितनी सफलता अब तक मिली है। कोरोना संक्रमण की गति न तो आशानुरूप थमी ही है और न ही ग्राफ फ्लैटन हुआ। इसका कारण यह भी है कि लॉक डाउन जितनी सख्ती से लागू होना चाहिये था, उतनी सख्ती से लागू नहीं हो सका। लॉक डाउन का कहीं मज़बूरी, तो कहीं लापरवाही, तो कहीं जानबूझकर उल्लंघन होता रहा। सरकार की सख्ती के बावजूद, तालाबंदी उल्लंघन की घटनाएं लगभग प्रतिदिन होती रहीं, जिससे इसके उद्देश्य को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न हुई। लॉक डाउन लागू करते समय भी सरकार ने बहुत सी समस्याओं पर विचार नहीं किया।

एक तो यह तालाबंदी, विलंब से की गयी, दूसरे देश की सबसे बड़ी प्रवासी और ज़रूरतमंद आबादी कामगारों का कहीं कोई इंतजाम नहीं किया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि, भारी संख्या में प्रवासी मज़दूर, लॉकडाउन के बीच आनन-फ़ानन में अपने घरों के लिए, पैदल या जो भी साधन उन्हें मिले, उसी से निकल लिये, और मौसम, रास्ते की दूरी, साधनों के अभाव आदि समस्याओं के कारण, वे रास्तों में भूख-प्यास या सड़क दुर्घटनाओं के भी  शिकार हुए। यह समस्या कोरोना आपदा से भी बड़ी आपदा साबित हो रही है । इस भयानक त्रासदी का सिलसिला अब भी जारी है।

बेरोजगारी का आलम यह है कि एक अनुमान के अनुसार इस तालाबंदी से, अब तक क़रीब 12 करोड़ लोग अपनी आजीविका गंवा चुके हैं। इनमें से देश के असंगठित क्षेत्र, यानी दिहाड़ी या शॉर्ट टर्म कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कामगार अधिक हैं। क़रीब इतने ही अगर बेरोज़गार नहीं हुए हैं, तो पिछले दो महीनों से बिना वेतन के, घर बैठे काम शुरू होने का इंतज़ार कर रहे हैं। सरकार ने संकट से निपटने के लिये 20 लाख करोड़ रुपए के राहत पैकेज की घोषणा की। उसका क्या असर देश के औद्योगिक विकास पर पड़ता है इस पर अभी कुछ कहना जल्द बाजी होगी।

तालाबंदी पर बीबीसी के एक लेख के अनुसार, दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में डेवलपमेंट इकनॉमिक्स की प्रोफ़ेसर जयति घोष ने प्रवासी कामगारों के पलायन पर कहा है कि, “बांग्लादेश, श्रीलंका, नेपाल या पाकिस्तान जैसे पड़ोसियों ने लॉक डाउन को भारत से बेहतर हैंडल किया। प्रवासियों को घर लौटने का समय दिया और उन्हें सार्वजनिक परिवहन उपलब्ध कराया। जबकि भारत में प्रवासियों को क़रीब 45 दिन तक तो ट्रांसपोर्ट से वंचित रखा गया और जहाँ थे, वहीं भूखे-प्यासे रहते रहे। फिर दबाव में ट्रेन शुरू की तो किराया ऐसे कि मध्यमवर्गीय ही उसके टिकट ख़रीद सकें। “

अब तालाबंदी को लेकर देश के अर्थ समीक्षकों की चिंताजनक टिप्पणियां आ रही हैं कि, देश लम्बे समय तक आर्थिक स्थिति को संभाल पाने में सक्षम नहीं है। तालाबंदी के कुछ जानकारों का कहना है कि, लॉक डाउन की शुरुआती नीति हताहतों की संख्या पर क़ाबू पाने की थी और वो शुरुआती चार हफ़्तों के भीतर ही दिख चुकी थी। जाने-माने हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर देवी शेट्टी के मुताबिक़, “समय रहते लॉकडाउन ख़त्म कर सोशल डिस्टेंसिंग पर ध्यान दिए जाने की ज़्यादा ज़रूरत दिख रही है।”

बिज़नेस स्टैंडर्ड अख़बार की राजनीतिक सम्पादक अदिति फड़नीस का कहना है कि,

“लॉक डाउन लागू करने की प्रक्रिया ज़्यादा बेहतर हो सकती थी। उदाहरण के रूप में, अगर सिक्किम और गोवा में केस कम और पूरे कंट्रोल में थे तो, वहां की इंडस्ट्रीज़ को क्यों बंद कर दिया गया? “

दुर्भाग्य से, जैसे-जैसे लॉकडाउन के चरण बढ़ते गए, कोरोना पॉज़िटिव के मामले भी सामने आते गए । ऐसा इसलिए हुआ कि समय के साथ-साथ टेस्टिंग की गति भी बढ़ती गयी। जब टेस्टिंग गति बढ़ेगी तो नए मामले सामने आएंगे ही। सरकार का भी कहना है कि, लॉकडाउन जल्द लागू होने की वजह से भारत संक्रमित मामलों की संख्या को अपेक्षाकृत धीमा कर सका वरना, 100,000 मामले तक तो हम, कम से कम तीन हफ़्ते पहले ही, पहुँच जाते। लेकिन लॉक डाउन के दौरान प्रवासियों की समस्या इतनी बड़ी हो जाएगी, केंद्र सरकार को इसका अनुमान नहीं था। यह सवाल बेहद ज़रूरी है कि, सरकार को इस बात का अहसास क्यों नहीं हुआ कि चार घंटे की नोटिस पर पूरे देश में जब सब कुछ बंद हो जाएगा तो प्रवासी मज़दूर कहाँ जाएँगे ?

कॉमनवेल्थ ह्यूमन राइट्स इनिशिएटिव के वेंकटेश नायक के अनुसार,

“भारत में प्रवासियों, जिसमें मज़दूर समेत वे सब शामिल हैं, जो दूसरे प्रदेशों का रुख़ करते हैं, जिनकी गणना 10 साल में एक बार जनगणना के समय होती है। 2001 में यह संख्या क़रीब 15 करोड़ की थी, जो 2011 में बढ़ कर, लगभग 45 करोड़ हो गयी। अब तो यह संख्या और भी अधिक बढ़ गयी होगी। इसमें बड़ा हिस्सा प्रवासी मज़दूरों का है। पलायन और पलायन जन्य यह त्रासदी, उनके मानवाधिकारों का हनन है।

कोविड 19 के टीका, वैक्सीन के संबंध में कुछ उत्साहवर्धक खबरें आ रही हैं पर विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि, इसमें कम से कम अभी एक साल से अधिक का समय लग सकता है। अतः फिलहाल, इस घातक वायरस से बचने के लिए सोशल डिस्टेंसिंग ही अब तक का, सबसे कारगर उपाय है। इंडियन जर्नल ऑफ़ मेडिकल एथिक्स के सम्पादक, डॉक्टर अमर जेसानी के अनुसार,

” लॉकडाउन किसी पैंडेमिक का इलाज नहीं बल्कि, संक्रमण की दर को थामना भर होता है जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं को तैयारी का समय मिल सके बड़े स्तर के फैलाव से निपटने के लिए। ”

अब दुनिया भर में, भारत की स्थिति हेल्थकेयर के क्षेत्र में कहां है, इसे देखिये। एक सर्वे के अनुसार, स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करने वाले दुनिया के 195 देशों की सूची में भारत 145 वें नम्बर पर है । यहां तक कि, हम इस क्षेत्र में भारत सूडान, अजरबैजान, चीन और बोस्निया हर्जेगोविना जैसे देशों से भी नीचे है। अमेरिका के सीएटल स्थित ‘इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मेट्रिक्स एंड इवैल्यूएशन’ द्वारा किए गए इस सर्वे की जो रिपोर्ट ‘द लंसेट’ में प्रकाशित की गई है, के अनुसार, साल 1990 में भारत 158 वें पायदान पर था, जबकि 2016 तक इसमें कुछ सुधार आया है। हाल ही में वर्ल्ड बैंक ने भी ऐसी ही एक रिपोर्ट जारी की थी, जिसमें स्वास्थ्य सूचकांक (हेल्थ इंडेक्स) में 195 देशों की सूची में भारत का स्थान अब, 145 वां बताया गया था।

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया था कि भारत में हर साल स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च की वजह से पांच करोड़ लोग गरीबी के शिकार हो जाते हैं। दरअसल, भारत में स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का महज 1.25 फीसदी ही खर्च होता है, जिसकी वजह से यहां लोगों पर स्वास्थ्य के खर्चों का भार बढ़ जाता है, जिससे वो धीरे-धीरे कर्ज के बोझ तले दबने लगते हैं। हेल्थ केयर पर देशों द्वारा व्यय के आंकड़ों के अनुसार, दक्षिण एशियाई देशों में मालदीव स्वास्थ्य सेवाओं पर जीडीपी का 13.7 फीसदी, अफगानिस्तान 8.2 फीसदी और नेपाल 5.8 फीसदी खर्च करते हैं। वहीं, भूटान अपनी जीडीपी का 2.5 फीसदी और श्रीलंका 1.6 फीसदी सेहत पर खर्च करते हैं। हमारा व्यय बहुत ही कम है, जिसे बढ़ाने की ज़रूरत है।

हमने विकास के मॉडल के रूप में बड़ी-बड़ी इमारतें, मॉल, कॉमर्शियल केंद्र, बड़े और महंगे निजी अस्पताल, निजी यूनिवर्सिटी आदि तो बनाये हैं, पर सरकारी अस्पताल, और जन स्वास्थ्य के मुद्दों पर ग्लोबलाइजेशन  और उदारीकरण के दौर के आगमन के बाद ध्यान नहीं दिया है। मैक्स, फोर्टिस, अपोलो जैसे निजी अस्पताल श्रृंखला की भूमिका अपनी जगह है पर, जहां देश की दो तिहाई आबादी निम्न वर्ग और निम्न मध्यवर्ग तथा नौकरीपेशा समाज से आती है वहां पब्लिक हेल्थकेयर एक बड़ा मुद्दा बनना चाहिए। खूबसूरत, महंगी लुभावनी बीमा योजनाएं, किसी अस्पताल या पीएचसी का विकल्प नहीं हो सकती हैं । यह इलाज के लिये हमें धन तो उपलब्ध करा सकती हैं, पर इलाज तो अस्पतालों में ही होगा और उसे डॉक्टर तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मी ही करेंगे, न कि बीमा कंपनियां। जब अस्पताल ही सुगमता से उपलब्ध नहीं होंगे और प्रशिक्षित मेडिकल स्टाफ और डॉक्टरों का ही अभाव रहेगा तो इन बीमा योजनाओं का क्या होगा।

मेडिकल कॉलेज और डॉक्टरों की कमी से भी हमारी स्वास्थ्य सेवाएं जूझ रही हैं। दुनिया भर में आबादी के अनुरूप डॉक्टर हमारे यहां कम हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार, देश में 11,082 की आबादी पर मात्र एक डॉक्टर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानकों के अनुसार, यह अनुपात प्रति एक हजार व्यक्तियों पर एक होना चाहिए। इस मानक के अनुसार से देखें तो यह अनुपात ग्यारह गुना कम है। यह सब कमियां, आज तब नज़र आ रही हैं जब हम एक खतरनाक वायरस के संक्रमण से रूबरू हैं।

सरकार को जनता के स्वास्थ्य पर अपने बजट की और धनराशि व्यय करनी होगी और पब्लिक हेल्थ केयर सिस्टम को और समृद्ध करना होगा। कोरोना आया है तो जाएगा भी। पर यह न तो मानव जीवन के इतिहास का पहला वायरस है और न ही अंतिम। भविष्य में ऐसे वायरस जन्य संक्रमण महामारी का रूप न ले लें, इसलिए हमें पब्लिक हेल्थकेयर सिस्टम को बेहतर बनाने के लिये उसे प्राथमिकता में लाना होगा।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं। )

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This post was last modified on May 26, 2020 6:31 pm

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