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Categories: बीच बहस

कोरोना वायरस से आतंकित नहीं है, लेकिन सतर्क भी नहीं है दिल्ली

12 बज रहे हैं। अक्षरधाम से आगे निकल कर रिंग रोड की तरफ़ बाएं मुड़ते ही ट्रैफिक जाम से सामना होता है। दिल्ली आम दिनों की तरह व्यस्त लगती है। थोड़ा आगे बढ़ कर राजघाट की तरफ जाते ही दिल्ली सुनसान हो जाती है। एक आइसक्रीम वाला है। अपने कार्ट पर पसर गया है। ख़रीदार की उम्मीद छोड़ दी है।

फिर आता है अंतर्राष्ट्रीय बस अड्डा। यहां लोग दिख रहे हैं। एक दो लोग मास्क में दिखते हैं। लगता है इन्हें कोरोना वायरस का पता है। जिन्होंने मास्क नहीं पहना है, उन्हें नहीं पता है, दावे के साथ नहीं कह सकता। मास्क सभी को नहीं पहनना है इसे लेकर स्पष्ट प्रचार नहीं है। मगर तभी कोई छींक कर आगे बढ़ते दिखा। लोग हाथ से कई चीज़ों को छू रहे हैं। चेहरे को छू रहे हैं। उन्हें देख कर नहीं लगता कि वायरस से आतंकित हैं। यह ज़रूर लगता है कि वे सतर्क नहीं हैं।

अब मैं अग्रसेन पार्क के सामने हूं। वहां एक मेट्रो स्टेशन है। यात्री एक दूसरे का हाथ थामे दिख रहे हैं। हाथ मिला मिला रहे हैं। भीड़ में आराम से चल रहे हैं। किसी ने भी किसी से सुरक्षित दूरी नहीं बनाई है। बहुत सारे ऑटो ख़ाली खड़े हैं। सवारी नहीं है। इक्का-दुक्का ऑटो चालक ने मास्क लगाया है। बाकी उसी तरह अपने ऑटो पर पसर गए हैं। सुस्ता रहे हैं।

बाइक सवार को देख रहा हूं। कोई हाथ से हैंडल छू रहा है। फिर चेहरा छू रहा है। एक बाइक सवार को टोक दिया। कहा कि नाखून मत खाइये। कहने लगे कि कील घुस गई है, लेकिन दूसरे बाइक सवार को देख रहा हूं। वे कोरोना वायरस से आतंकित नहीं हैं लेकिन सतर्क भी नहीं हैं।

अब मेरी बाईं तरफ़ तीस हज़ारी कोर्ट है। वकील आम दिनों की तरह आ जा रहे हैं। अपनी कार की डिक्की में फाइल रख कर पढ़ रहे हैं। भीड़ कम है मगर लोगों की आवाजाही बनी हुई है। आम दिनों की तरह आम लोग आ जा रहे हैं। तभी मास्क पहने एक औरत पूरी भीड़ को दो हिस्सों में बांट देती है। एक जो कोरोना वायरस को लेकर सजग है और दूसरा जो सजग नहीं हैं।

फुटपाथ की दुकानों पर भीड़ नहीं है। फलों की चाट बेचने वाला ग्राहक का इंतज़ार कर रहा है। छोले वाले की साइकिल पर भीड़ नहीं है। चादर पर बिछा कर पतलून, पर्स और मोबाइल कवर बेचने वालों के पास ख़रीदार नहीं हैं।

अब मैं ईदगाह से गुज़र रहा हूं। बल्लीमारन। नबीकरीम। सदर बाज़ार थाना। थोड़ा सा ट्रैफिक जाम है। मगर आम दिनों की तरह यहां भीड़-भाड़ नहीं है। कई दुकानों के शटर बंद हैं। इस बाज़ार में माल की ढुलाई बैलों से भी होती है। बैलों को कोई काम नहीं है। किनारे सुस्ता रहे हैं। चाय की दुकान पर चाय बनाने वाला है। दो ग्राहक हैं। एक ने मास्क पहना है। एक ने मास्क नहीं पहना है।

नज़र केले के ठेले पर पड़ती है। कोई ख़रीदार नहीं है। ठेले के पीछे दो औरतें खड़ी हैं। एक को छींक आती है मगर पल्लू से चेहरा पोंछ लेने के बाद दोनों सामान्य हो कर बातचीत कर रही हैं। मैंने किसी को भी हाथ की कुहनी में छींकते नहीं देखा जैसा टीवी में डॉक्टर बता रहे हैं। रूमाल लगा कर भी छींकते नहीं देखा।

हम आगे बढ़ते जा रहे हैं। दुकानों के शटर गिरे हैं। ठेले ख़ाली हैं। किनारे लगे हुए हैं। ठेले वाले ख़ाली बैठे हैं। कोई चुपचाप सड़क को निहार रहा है। यह पहाड़गंज से सटा मार्केट है। कोई ख़रीदार नहीं है। सिर्फ दुकानें खुली हैं। ई रिक्शा खाली चल रहे हैं। बहुत सारे ई रिक्शा खड़े हैं। ऑटो रिक्शा भी ख़ाली खड़े हैं। चलते हुई कम नज़र आ रहे हैं। ग्राहक ही नहीं हैं। आप देख सकते हैं कि यहां पर काम ठप्प है। उन दुकानों में भी जो खुली हैं।

आम लोगों की कमाई कम हो गई है। रोज़ बनाकर और बेचकर कमाने वाले बेकार हो गए हैं। रोज़ कमा कर खाने वालों के पास कोई काम नहीं है। कोरोना वायरस ने इन इलाकों को दूसरी तरह से प्रभावित किया है। बाज़ार बंद होने से कमाई बंद हो गई है। उससे जागरूकता के प्रति और उदासीनता दिखती है। बार-बार हाथ साफ करते रहने के लिए प्रचार प्रसार की कमी दिखती है। अगर जागरूक भी होंगे तो बिना पानी के कैसे हाथ साफ करेंगे।

पुराने ज़माने में सार्वजनिक नल हुआ करता था। जहां से लोग पानी पी लेते थे। पानी भर लेते थे। हाथ धो लेते थे। इनके बस की बात नहीं है कि पानी ख़रीद कर साबुन से हाथ धो लें। हर रिक्शा वाले को सैनिटाइज़र देने का अभियान चले या उसके हाथ धोने की व्यवस्था की जाए।

अभी तक यह वायरस विदेश यात्रा से लोट रहे यात्रियों के ज़रिए आ रहा है। इनमें से बहुतों को क्वारेंटिन किया जा रहा है, लेकिन क्या इनके यहां काम करने वाले ड्राइवर, माली और खानसामा और सफाई और खाने का काम करने के लिए महिलाओं को छुट्टी दी गई है?

सरकार को चाहिए कि ऐसे लोगों के यहां काम करने वाले ड्राइवर और घरेलू सहायिकाओं पर भी नज़र रखे। देखे कि वे ऐसे घरों में काम करने न जाएं। अगर यह वायरस मालिकों के यहां से होता हुआ दिल्ली की झुग्गी बस्तियों में पहुंचा तो फिर कैसे संभालेंगे।

इसलिए ज़रूरी है कि विधायक, पार्षद और राजनीतिक दल के कार्यकर्ता इन बस्तियों में जागरूकता मार्च निकालें। सांसद और विधायक फंड का एक हिस्सा इस काम के लिए रखा जा सकता है। हर बस्ती में एक टैंकर उपलब्ध कराए और साबुन ताकि कोई भी जाकर हाथ धो सके।

दिल्ली में जहां भी प्याऊ है उसके एक नल को हाथ साफ करने के लिए उपलब्ध कर देना चाहिए। दुकानदार अपनी दुकान के आगे पानी और साबुन रख सकता है। बहुत से आम लोगों की कमाई बंद हो गई है। उसकी भरपाई के लिए सरकार रोज़ाना ऐसे लोगों को 200 रुपये दिया करे, ताकि अर्थव्यवस्था चलती रहे। ठहर न जाए।

दिल्ली सरकार ने ऐसा कुछ फैसला किया है लेकिन ज़रूरत है कि इसे बड़े स्केल पर लागू किया जाए। हर गली, हर मोड़ और हर दस कदम पर हाथ साफ करने की व्यवस्था नज़र आनी चाहिए।

आदतें हवा में नहीं बदलती हैं। सिस्टम को भी बदलना पड़ता है। हाथ धोने का सिस्टम तैयार करना कोई बड़ी बात नहीं है। हाथ धोने के तरीके और छींकने के तरीके लोगों के बीच जाकर बताए जाने चाहिए। अभी तक सरकारों ने वीडियो लांच नहीं किया है। अरविंद केजरीवाल को खुद हाथ धोते हुए और छींकते हुए का वीडियो बनाना चाहिए।

आप और बीजेपी के सारे विधायकों को ऐसा वीडियो बनाकर अपने इलाके में लांच कर देना चाहिए। विधायकों को अपने वीडियो में बताना चाहिए कि उनके इलाके में कहां-कहां पर हाथ धोने की व्यवस्था है और पार्षदों को बताना चाहिए कि उनके वार्ड में कहां कहां रखा है। रोज़ शाम को छोटी-छोटी सभाएं होनी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग जान सकें। देख सकें।

भारत का प्रदर्शन अभी तक अच्छा है। अच्छी बात है कि हम आतंकित नहीं हैं। मगर हम सतर्क नहीं है। यह अच्छी बात नहीं है ।

(वरिष्ठ टीवी पत्रकार रवीश कुमार की फेसबुक वाल से साभार।)

This post was last modified on March 17, 2020 12:13 am

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