Sunday, May 22, 2022

माकपा की कांग्रेस: कम्युनिस्टों की छोटी-बड़ी लाइन का द्वन्द्व 

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भारत की नई लोकसभा के 2024 में निर्धारित चुनाव के लिए नई मोर्चाबंदी की आहट है जो तेज नहीं तो बेआवाज भी नहीं है। नई  मोर्चाबंदी 2022 में ही तय राष्ट्रपति चुनाव में कुछ हद तक साफ हो सकती है। यह सोचना अव्वल दर्जे की मूर्खता होगी कि नई मोर्चाबंदी से इंडिया दैट इज भारत  की केंद्रीय सत्ता पर दखल के लिये कोई क्रांतिकारी हस्तक्षेप  हो जायेगा। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रधानमंत्री पद पर लगातार कायम नरेंद्र मोदी की जगह जल्द किसी वैकल्पिक व्यवस्था का सूत्रपात हो जाएगा ये सोचना राजनीतिक अपरिपक्वता ही होगी। 

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी  मार्क्सवादी यानि माकपा की वैकल्पिक मोर्चाबंदी की नई लाइन पर उसके हैदराबाद में हुई पिछली पार्टी कांग्रेस में मोहर लगी थी। माकपा की केरल के कन्नूर में 6 से 10 अप्रैल 2022 में निर्धारित 23 वीं पार्टी- कांग्रेस के लिए विचारार्थ मसौदा कार्यकर्ताओं के बीच वृहत्तर बहस के लिए जारी किया जा चुका है। संकेत हैं कि माकपा भाजपा को शिकस्त देने के लिए ‘ वामपंथी लोकतांत्रिक मोर्चा ‘ विकसित करेगी। देखना यह है कि पार्टी के मौजूदा महासचिव सीताराम येचुरी के स्थान पर अगला नेता कौन बनेगा। येचुरी इस पद पर लगातार दो बार चुने जा चुके हैं और माकपा के संशोधित संविधान के मुताबिक उन्हें अब ज्यादा महासचिव नहीं बनाया जा सकता है। सवाल ये भी है कि क्या माकपा के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टियों का पहले से कायम मोर्चा , कांग्रेस की वैकल्पिक सरकार बनने उसे बाहर या भीतर से समर्थन देती है या फिर भाजपा के सत्त्ता में लौटने पर उससे कैसे लोहा लेती है। 

माकपा की 23 वीं कांग्रेस के शुरू होने पर जो अधिकृत निर्णय लिए जाएंगे हम उसके बारे में ही नहीं बल्कि अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा कांग्रेस समेत विभिन्न मध्यमार्गी दलों और भाजपा की भी नई पेशबंदी का इसी अनियतकालीन कॉलम में विश्लेषण करेंगे। लेकिन पहले एक बैकग्राउंड आलेख पेश करना उचित होगा, 

बैकग्राउंड

भारत की तीनों बड़ी संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए 2018 में अपनी-अपनी पार्टी-कांग्रेस में कुछ नई कार्यनीतियाँ तैयार की थी। तीनों ने ही अपने पार्टी कार्यक्रम लगभग यथावत रखे थे। नई कार्यनीतियां भाजपा की  बढ़ती साम्प्रदायिक फासीवादी प्रवृतियों के खिलाफ सीमित चुनावी परिप्रेक्ष्य में बनाई गईं। इन पार्टियों ने अपने-अपने तत्कालीन महासचिव को इस पद पर अगले कार्यकाल के लिए चुन लिया। इन तीनों में से अभी सबसे बड़ी , माकपा की हैदराबाद में अप्रैल 2018 में 22 वीं पार्टी कांग्रेस में तय व्यूह-रचना में भाजपा की पराजय सुनिश्चित करने की लाइन तय की गई। नई लाइन में कांग्रेस से चुनावी सम्बन्ध नहीं रखने की पहले की सख्त लाइन में संशोधन कर दिए गए। इसके तहत माकपा विभिन्न राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग कार्यनीति अपनाएगी।

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ( मार्क्सवादी लेनिनवादी-लिबरेशन ) यानि भाकपा -माले के दीपंकर भट्टाचार्य 1998 से ही लगातार पार्टी महासचिव बने हुए हैं। असम के गुवाहाटी में दिसंबर 1960 में पैदा हुए दीपंकर भट्टाचार्य 1998 में विनोद मिश्र के निधन के बाद पार्टी महासचिव चुने गए थे। विनोद मिश्र, पार्टी के 1975 से निधन तक महासचिव रहे थे।  

सीपीआई की 2018 में हुई पिछली पार्टी काग्रेस में महासचिव चुने गए सुधाकर रेड्डी की जगह 2019 में पार्टी की नेशनल काउंसिल ( राष्ट्रीय समिति) ने  डी राजा को सर्वसम्मति  नया महासचिव चुन लिया था। रेड्डी ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया था।  

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी का भी फिर इस पद पर चुनाव कर लिया गया । माकपा की हैदराबाद में 18 से 22 अप्रैल 2018 तक 22 वीं पार्टी कांग्रेस में निर्धारित चुनावी व्यूह-रचना में भाजपा की पराजय सुनिश्चित करने की  ‘ लाइन ‘ तय की गई। नई लाइन में कांग्रेस से चुनावी सम्बन्ध नहीं रखने की पहले की सख्त लाइन में संशोधन कर दिए गए। माकपा के हर राज्य की अलग राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार अलग चुनावी कार्यनीति बनाने का रास्ता साफ कर दिया गया। 

भाकपा नेता डी. राजा साफ कह चुके थे कि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल , कांग्रेस के साथ आपसी समझ विकसित किये बिना भाजपा –विरोधी मतदाताओं में भरोसा पैदा करना संभव नहीं होगा। उनके अनुसार गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस ही प्रमुख विपक्षी ताकत है। उनसे वाम दलों और अन्य लोकतांत्रिक ताकतों को भी आपसी समझ कायम करना ही चाहिए। 

भाकपा माले -लिबरेशन कमोबेश अपनी पुरानी लाइन पर ही चलती रही है। इसमें नया यही था कि पार्टी ने बिहार में पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के राष्ट्रीय जनता दल ( राजद ) और झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के साथ चुनावी हाथ मिलाने के संकेत दिए। पार्टी महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य के राजद नेतृत्व और झामूमो नेता एवं मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से साथ भेंट का चुनावी मतलब भी था। 

खबर मिली कि बिहार और झारखंड में भाकपा , माकपा और भाकपा -माले से लेकर मार्क्सिस्ट कोऑर्डिनेशन कमेटी (एमसीसी ) तक की सभी संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों ने भाजपा की चुनावी हार सुनिश्चित करने का निश्चय किया। कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गई। लेकिन संकेत मिले कि भाजपा-विरोधी प्रस्तावित वृहत्तर महागठबंधन में इन कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बिहार और झारखंड में कुछ सीटें छोड़ने पर बातचीत हुई। इनमें बिहार की बेगूसराय लोकसभा सीट भी भाकपा की ओर से जवाहरलाल नेहरू विश्विविद्यालय (जेएनयू ) के छात्र नेता कन्हैया कुमार को खड़ा करना शामिल  थी। कन्हैया कुमार , भाकपा छोड़ कर हाल में कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं जिनकी हैसियत चुनावी स्टार प्रचारक की है। बेगूसराय में कम्युनिस्टों का असर रहा है। यह कन्हैया  का गृह जिला है जो भाकपा की पिछली पार्टी कांग्रेस में उसकी राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य चुने गए थे।   

भाकपा माले-लिबरेशन

संसदीय चुनावों में भाकपा माले-लिबरेशन का भटकाव ‘अन्य दोनों बड़ी संसदीय पार्टियों से कमतर नहीं रहा है। भाकपा माले ने दिवंगत महासचिव विनोद मिश्र के नेतृत्व में नागभूषण पटनायक और अन्य द्वारा कायम वृहत्तर मोर्चा, इंडियन पीपुल्स फ्रंट(आईपीएफ ) से अलग रूप से चुनाव में भाग लेना शुरू किया था। दीपंकर भट्टाचार्य , आईपीएफ महासचिव रह चुके हैं। डीबी स्वयं कभी सांसद नहीं रहे। लेकिन उनकी पार्टी संसदीय चुनाव लड़ती है। वह कुछेक बार एकाध सीट जीती भी है। भाकपा माले को शुरुआती कुछेक चुनावी सफलता मिली थी। उसने 1990 के दशक के आखिर में जनता दल से लालू प्रसाद यादव के विरोध में मौजूदा मुख्यमंत्री नीतिश कुमार , पूर्व केंद्रीय मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस आदि के अलग होकर बनाई गई समता पार्टी  के साथ चुनावी गठबंधन भी किया था। जब समता पार्टी का जनता दल यूनाइटेड के रूप में प्रादुर्भाव हुआ और वह भाजपा के दक्षिणपंथी गठबंधन , नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस ( एनडीए ) के संग हो गई तो उससे भाकपा माले ने चुनावी किनारा कर लिया। भाकपा माले का बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और उसकी सरकारों के प्रति विरोध बना रहा।  

दीपंकर भट्टाचार्य

द्वंद्व

संसदीय चुनावों को लेकर कम्युनिस्टों के बीच ख़ास तरह का द्वंद्व हमेशा से रहा है। दरअसल,1920 से 1925 के बीच बनी भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) में और उसके 1964 में हुए विभाजन से बनी माकपा में शुरू से कांग्रेस को लेकर पारस्परिक-विरोधी रूख रहा है। माकपा ने 1960 के दशक के उत्तरार्ध में बिहार , उत्तर प्रदेश जैसे कुछेक राज्यों में गैर- कांग्रेस दलों की मिली-जुली संयुक्त विधायक दल ( संविद ) सरकार से बाहर रहने का निर्णय किया था। कहा जाता है कि माकपा का एक हिस्सा ऐसी सरकार में शामिल होने की पेशकश पर विचार करने के पक्ष में था। लेकिन माकपा नेतृत्व इसके पक्ष में नहीं था। भाकपा ऐसी सरकार में भाजपा के पूर्ववर्ती संस्करण , जनसंघ के भी साथ शामिल हो गई थी। भाकपा से माकपा का विभाजन मूलतः इसी मुद्दे पर हुआ कि अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व कांग्रेस या अन्य का हाथ थाम राजसत्ता में दाखिल होने के पक्ष में था। जिस दूसरे हिस्से ने अलग होकर माकपा बनाई उसका मत था जब तक किसी सरकार को चलाने में मुख्य भूमिका नहीं मिले ,उसमें शामिल नहीं होना चाहिए। 

इंदिरा गांधी सरकार

कम्युनिस्टों के राजनीतिक द्वंद्व की दूसरी बड़ी झलक इंदिरा गांधी सरकार के दौरान दिखी। तब भाकपा ने इंदिरा गांधी सरकार का समर्थन किया। माकपा ने उस सरकार के अधिनायकवादी राजकाज का विरोध किया। पर माकपा उस सरकार के खिलाफ जयप्रकाश नारायण (जेपी ) के नेतृत्व में चले आंदोलन से अलग रही। द्वंद्व की अगली साफ झलक 1996 के लोकसभा चुनाव के बाद भाजपा की अटल बिहारी वाजपेई के प्रधानमंत्रित्व में बनी पहली सरकार के 13 दिन में ही गिर जाने से उत्पन्न राजनीतिक परिस्थितियों में दिखी। तब पूर्व प्रधानमंत्री (अब दिवंगत) विश्वनाथ प्रताप सिंह के सुझाव पर गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस दलों के मोर्चा की ओर से माकपा नेता और पश्चिम बंगाल के तब के मुख्यमंत्री ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने की पेशकश की गई।

इसके लिए लगभग सभी ऐसे राजनीतिक दल ही नहीं, स्वयं ज्योति बसु और तत्कालीन माकपा महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत तक तैयार थे। पर यह हो नहीं सका। दिवंगत हो चुके ज्योति बसु ने खुद बाद में इसे ऐतिहासिक भूल  करार दिया। ज्योति बसु को प्रधानमन्त्री बनने से रोकने के माकपा केंद्रीय कमेटी के कुछेक वोट के अंतर से लिए निर्णय को ‘ प्रकाश करात लाइन ‘ कहा जाता है जो चुनावी गठबंधन की राजनीति में माहिर माने जाने वाले हरकिशन सिंह सुरजीत के गुजर जाने के बाद और जोर पकड़ गया।

ज्योति बसु।
दिवंगत ज्योति बसु

माकपा , निर्वाचन आयोग से मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टियों में शामिल है। माकपा , केरल में सत्तारूढ़ वाम लोकतांत्रिक मोर्चा का नेतृत्व कर रही है। उसकी  पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में भी अर्से तक सरकार रही हैं। उसके जम्मू -कश्मीर , हिमाचल प्रदेश , तेलंगाना , ओडिसा आदि में भी कुछेक विधायक हैं। उसने पहली बार 1967 के लोकसभा चुनाव में भाग लिया था। तब उसके 19 और भाकपा के 23 सांसद चुने गए थे। माकपा के सर्वाधिक 43 सांसद 2004 के लोकसभा चुनाव में चुने गए। तब उसने केंद्र में कांग्रेस के मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) की सरकार को बाहर से समर्थन दिया था। बाद में उसने उस सरकार से अपना समर्थन भारत के अमरीका के साथ किये परमाणु ऊर्जा करार के विरोध में वापस ले लिया था। माकपा को 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल मतदाताओं के 3. 24 प्रतिशत के मत मिले थे। 

करात

येचुरी पहली बार 2015 में अपने गृह राज्य , आंध्र प्रदेश के वैजाग और फिर हैदराबाद में पार्टी- कांग्रेस में महासचिव निर्वाचित हो गए। पर उनका संगठन में वर्चस्व नहीं रहा है। माकपा के सांगठनिक ढाँचे पर करात की ही चलती रही है। करात 2015 में महासचिव बनने के पात्र नहीं रह गए थे। क्योंकि पार्टी संविधान में उनके ही पेश संशोधन के पारित होने के बाद किसी के लगातार तीन बार से अधिक महासचिव बनने पर रोक लग चुकी है। करात पहली बार 2005 में महासचिव चुने गए थे। वह खुद सांसद नहीं बने हैं। उनकी पत्नी , वृन्दा करात , बंगाल से राज्यसभा सदस्य रह चुकी हैं। करात दम्पति , पार्टी पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं। करात और येचुरी, दोनों ही वामपंथियों का गढ़ माने जाने वाले जेएनयू के छात्रसंघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। कहते हैं कि दोनों को गुजरे जमाने के कद्दावर कम्युनिस्ट नेताओं ने भविष्य में पार्टी की बागडोर सौंपने की सोच रखी थी।

रांची के दिवंगत राजनीतिक अध्येता , उपेन्द्र प्रसाद सिंह के अनुसार माकपा भी क्रांतिकारी कम्युनिस्ट पार्टी होने के मूल कार्यक्रम से भटक गई है। वह संसदीय भूलभुलैया में फंस गई लगती है जिसके प्रति कम्युनिस्ट इटरनेशनल की तीसरी कांग्रेस ने 1920 में अपनाई ‘ लाईन ‘ के जरिये सबको सचेत कर दिया था। जेएनयू के छात्र और माकपा के सदस्य रहे उपेन्द्र प्रसाद सिंह के मुताबिक “ कामरेड येचुरी में संसदीय भटकाव के लक्षण हैं। कामरेड  करात में सांगठनिक क्षमता बेशक बहुत न हो पर वैचारिक परिपक्वता और दृढ़ता कमतर नहीं है। “ 

माकपा के सैद्धांतिक रूप से उदारवादी माने जाने वाले हिस्से के बीच चुनावी वैतरणी पार करने कांग्रेस की छोटी लाइन चाह कर भी नहीं पकड़ पाने का दर्द जब तब नजर आता है। जबकि दूसरे हिस्से को कम्युनिस्ट विचारधारा की राजनीतिक लड़ाई को बीजेपी और कांग्रेस , दोनों के पार , अवाम तक ले जाने के अपने प्रयास पर अब तक की असफलता के बावजूद दर्प-सा लगता है। अंदरूनी द्वंद्व , सत्ता में दाखिल होने की छोटी या बड़ी लाइन पकड़ने ही नहीं सत्ता की गाड़ी का देर-सबेर चालक बनने या फिर यथाशीघ्र गार्ड ही बन जाने की छटपटाहट जैसा है। 

येचुरी मूलतः बंगाल के नहीं हैं पर पहली बार वहीं से सांसद निर्वाचित हो सके जहां उनकी पार्टी 1977 से 2011 तक लगातार 34 बरस सत्ता में रही।  राज्यसभा में उनका दूसरा कार्यकाल समाप्त होने को आया तो बंगाल विधानसभा में माकपा की ताकत इतनी भी नहीं बची कि वह वहां से राज्यसभा के लिए फिर चुने जा सकें। तब विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल , कांग्रेस ने पेशकश की थी  कि वह येचुरी को फिर राज्यसभा सदस्य बनाने के लिए समर्थन देने को तैयार है। यह पेशकश माकपा के किसी और नेता के लिए नहीं सिर्फ येचुरी के लिए थी। माकपा ने पेशकश अमान्य कर दी और यह कह उनके सांसद बने रहने की संभावना खारिज कर दी कि वह महासचिव बन चुके हैं और इस पद पर रहते हुए किसी को सांसद बनाने का पार्टी प्रावधान नहीं है।

पिनराई विजयन

गौरतलब है कि माकपा की बंगाल इकाई , राज्य में सत्ता 2011 में अपने हाथ से ममता बनर्जी की आल इंडिया तृणमूल कांग्रेस ( टीएमसी )के हाथ चले जाने के बाद से कांग्रेस से हाथ मिलाने की पक्षधर रही है और उसने  2016 में पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी की केंद्रीय लाइन के विपरीत , बाकायदा प्रस्ताव पारित कर यह किया भी। कुछ मजबूरी में पार्टी की केंद्रीय समिति ने राज्य इकाई को स्थानीय स्तर पर कांग्रेस से चुनावी तालमेल करने की ढील दे भी दी। मगर दांव उल्टा पड़ा। माकपा उस चुनाव में कांग्रेस से भी पीछे रह गई और उसे सदन में मुख्य विपक्षी दल का भी दर्जा खोना पड़ा। इसके बाद से पार्टी में केरल की करात लाइन और मजबूत हुई है , बंगाल लाइन कमजोर पड़ गई है। करात लाइन को पार्टी की केरल , त्रिपुरा इकाई का भी लगभग पूर्ण समर्थन हासिल बताया जाता है। केरल विधानसभा के बंगाल के साथ ही 2016 में और 2021 में हुए चुनाव में भी  माकपा के नेतृत्व वाले ‘ वाम -लोकतांत्रिक मोर्चा ‘ ने जीत हासिल की थी। और किसी राज्य में माकपा का चुनावी प्रभाव अभी लगभग नगण्य है।

माकपा के बाहर के फिल्मकार आनंद पटवर्धन , कन्हैया कुमार आदि की राय कमोबेश यह है कि करात लाइन के बूते भारत में फासीवादी ताकतों से ठीक से नहीं  लड़ा जा सकता है। कोलकाता के वामपंथी चिंतक अरुण माहेश्वरी ने ” वामपंथ का उत्तर-सत्य ” शीर्षक आलेख में फिल्मकार पटवर्धन के कथन का समर्थन करते हुए लिखा था कि 2019 का लोकसभा चुनाव कांग्रेस संग मिल कर लड़ने की येचुरी लाइन को ठुकरा कर करात गुट ने भाजपा का ही भला किया है।

माकपा ने नई कार्यनीति के तहत राजस्थान और  तेलंगाना की विधान सभा के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस , दोनों के खिलाफ वामपंथी तीसरा मोर्चा खड़ा किया। राजस्थान में ऐसे मोर्चा में किसान संगठनों द्वारा समर्थित कुछ अन्य पार्टियां भी शामिल हुईं। राज्य में कांग्रेस और भाजपा के बाद कभी कोई ख़ास तीसरी राजनीतिक ताकत नहीं रही। ऐसे में  विधान सभा चुनाव में माकपा और भाकपा ने विभिन्न पार्टियों के साथ मिल कर लोकतांत्रिक  मोर्चा (रालोमो) बनाया। माकपा के 29  उम्मीदवारों में  दांतारामगढ से किसान नेता एवं पूर्व विधायक कामरेड अमराराम भी थे , जो हार गए। लेकिन माकपा के दो ही उम्मीदवार जीत सके जो उनके निर्वाचन क्षेत्रों में किसान आंदोलन की जोर पर संभव हो सका।  

खबरें मिली थीं कि कामरेड अमराराम ने भाजपा से अलग होने वाले भारत वाहिनी पार्टी के अध्यक्ष घनश्याम तिवाड़ी , निर्दलीय विधायक रहे हनुमान बेनीवाल की नई बनी पार्टी तथा  समाजवादी पार्टी , जनता दल-सेक्युलर समेत अन्य गैर-भाजपा , गैर-कांग्रेस दलों के नेताओं से  सम्पर्क किया। पर ज्यादातर दल नये मोर्चा  में शामिल नहीं हुए। नए मोर्चा की ओर से आमरा राम को मुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया गया। 

kisan-andolan-sikar-rajasthan
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भारत की कम्युनिस्ट पार्टियों के चुनावी इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि उसने संसदीय लोकतंत्र  के सिद्धांत से हट कर चुनाव से पहले ही नई सरकार बनाने की दावेदारी पेश कर उसका प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री भी घोषित कर दिया। ज्योति बसु को भी चुनाव से पहले इस पद का दावेदार कभी नही घोषित किया गया था। हालांकि  माकपा हल्कों में चुनाव बाद स्पष्टीकरण दिया गया कि पार्टी ने अधिकृत ‘रूप से ऐसी कोई घोषणा नहीं की थी और मुख्यमंत्री पद के लिए उनकी  दावेदारी को कुछ लोगों ने ‘*स्थानीय* आधार पर प्रचारित किया। बहरहाल , यह मोर्चा चुनावी रूप से सफल साबित नहीं हुआ। वामपंथी पार्टियों को बेशक कुछ नई राजनीतिक जमीन मिली। पर वे इस चुनाव में कोई ख़ास असर नहीं डाल सकीं।

तेलंगाना  में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी  ने 28 छोटी पार्टियों के संग मिल बहुजन लेफ्ट फ्रंट( बीएलएफ ) नामक नया चुनावी मोर्चा बनाया। लेकिन इसमें भाकपा शामिल नहीं थी। उसने कांग्रेस द्वारा बनाये गठबंधन महाकुटुम्बी में  आंध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री  नारा चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी ( टीडीपी ) और प्रोफ़ेसर मुदासानी कोंडाराम की तेलंगाना जन समिति (टीजेएस ) के साथ लगना श्रेयस्कर माना।  ग़दर नाम से लोकप्रिय क्रांतिकारी गायक , गुम्मदी विट्टल राव भी महाकुटुम्बी के साथ रहे महाकुटुम्बी को बुरी तरह परास्त होना पड़ा और बीएलएफ भी नाकामयाब  रही। 

भाकपा ने छत्तीसगढ़ में अन्य कम्युनिस्ट पार्टियों से अलग कार्यनीति पर चल कर पूर्व मुख्यमंत्री अजित जोगी की क्षेत्रीय पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के गठबंधन का साथ दिया जो सफल नहीं हो सका।

1925 में स्थापित भाकपा देश के सात “राष्ट्रीय “ दलों में शामिल है। वह 2014 के लोकसभा चुनाव में  21 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में 67 सीटों पर लड़ी। पर केवल एक सीट जीतने में सफल हुई। मत प्रतिशत भी 0.8 रह गया। भाकपा, अभी केरल में माकपा के पिनराई विजयन सरकार में सांझीदार  है। 2014 चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने उसकी राष्ट्रीय पार्टी की मान्यता खत्म करने का नोटिस दिया था। आयोग ने बाद में नियमों को बदल पांच के बजाए दस साल के बाद मान्यता खत्म करने का फैसला किया। भाकपा  चार राज्यों में न्यूनतम छह फीसदी वोट पाने या दो प्रतिशत सीटें जीतने में विफल रही तो  राष्ट्रीय पार्टी के रूप में उसकी मान्यता रद्द हो सकती है। उसने 1962 के लोकसभा चुनाव में 10 फीसदी वोट प्राप्त कर 29 सीटें जीती थीं। कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन के बाद भाकपा का चुनावी प्रभाव घटता गया।

अब तक हुई कांग्रेस की सूची

भारत की तीनों प्रमुख संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों की वर्ष 2019 के आम चुनाव में जबर्दस्त  हार हुई। उन्होंने केरल , पश्चिम बंगाल , तमिलनाडु  ,समेत विभिन्न राज्यों में एक सौ से अधिक प्रत्याशी खड़े किये थे। सिर्फ पांच जीत सके। इनमें से भी चार तमिलनाडु में जीते जो मुख्यतः द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके ) के साथ गठबंधन की बदौलत संभव हो सकी है । केरल में सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ ) का नेतृत्व कर रही सीपीएम सिर्फ एक सीट जीत सकी। पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में बरसों सत्ता में रही कम्युनिस्ट पार्टियों का तो पत्ता ही साफ हो गया। कन्हैया कुमार भी बिहार की बेगूसराय सीट पर बुरी तरह हार गए , जिसे कम्युनिस्ट भारत का लेलिनग्राद एवं स्तालिनग्राद तक कहते रहे हैं।  बंगाल में वाम दलों को न सिर्फ भारी चुनावी नुकसान हुआ बल्कि उनकी प्रतिबद्ध रही कतार के कुछ हिस्से का दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के पाले में चले जाने से भी कम्युनिस्टों की  काफी भद्द हुई है।  चुनाव के तुरंत बाद राज्य में सीपीएम के तीन मौजूदा विधायक में से एक बाकायदा भाजपा में शामिल हो गए।  स्वतंत्र भारत के इतिहास में कम्युनिस्टों यह सबसे बुरी चुनावी हार है। 

प्रथम चुनाव

कम्युनिस्टों ने चुनावों में जोर -आजमाईश स्वतंत्र भारत के 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 की बहुत ही लम्बी अवधि में हुए सर्वप्रथम चुनाव से ही शुरू कर दी थी।  तब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का विभाजन नहीं हुआ था।  चुनावी राजनीति में कांग्रेस के बाद कम्युनिस्टों का असर ज्यादा था। उस  बार के चुनाव मैदान में 48 कम्युनिस्ट उतरे थे , जिनमें से 16 निर्वाचित हुए। इनमें से आठ तत्कालीन मद्रास राज्य से जीते थे जिसका बाद में पुनर्गठन किया गया। भाकपा को कांग्रेस के 45 फीसद मत की तुलना में 3.3 प्रतिशत मत ही मिले। पर यह वोट शेयर भारतीय जनता पार्टी के पूर्ववर्ती स्वरुप , भारतीय जनसंघ को मिले 3 .1 प्रतिशत मत से कुछ ज्यादा ही था , जिसके 94 प्रत्याशियों में से तीन ही चुने जा सके थे। 1957 के दूसरे आम चुनाव में सीपीआई को 8.9 प्रतिशत मत मिले और उसके 110 उम्मीदवारों में से 27 जीते। 

वृंदा करात

1962 के आम चुनाव में कम्युनिस्टों का मत प्रतिशत बढ़कर 9. 9 प्रतिशत हो गया और उसकी जीती सीटें भी  29 हो गई , जिनमे 9 पश्चिम बंगाल और 8 आंध्र प्रदेश की थी।  1967 के आम चुनाव से कुछ पहले ही सीपीआई का विभाजन हो गया था। विभाजन से नई बनी पार्टी , सीपीएम ने भी उस चुनाव  में भाग लिया।  तब सीपीआई ने 5 प्रतिशत मत प्राप्त कर 23 सीटें और सीपीएम ने 4.4 % मत हासिल कर 19 सीटें जीती।  सीपीएम के सफल प्रत्याशियों में सर्वाधिक 9 केरल के थे।  

सर्वाधिक सफलता

कम्युनिस्ट पार्टियों को सर्वाधिक सफलता वर्ष  2004 के लोकसभा चुनाव में मिली थी , जब उनके कुल 59 सांसद चुने गए । इनमें से अकेले सीपीएम के 44 सांसद थे। उस चुनाव के बाद सीपीएम के ही सोमनाथ चटर्जी लोक सभा के स्पीकर चुने गए थे। ऐसा शायद सीपीएम द्वारा कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव अलायंस ( यूपीए ) को सरकार बनाने के लिए बाहर से दिए समर्थन के ‘ एवज ‘ में हुआ था। यह दीगर बात है कि वामपंथी दलों ने यूपीए सरकार को दिया अपना समर्थन उसके द्वारा अमेरिका के साथ किये परमाणु करार के विरोध में वापस ले लिया। लेकिन  यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार सत्ता में बने रहने में कामयाब रही और सीपीएम के कहने पर भी सोमनाथ चटर्जी ने लोक सभा के स्पीकर पद से इस्तीफा नहीं दिया।  

बहरहाल वर्ष  2009 के लोकसभा चुनाव में  24  कम्युनिस्ट ही चुने गए जिनमें सीपीएम के 16 शामिल थे। लोकसभा के 2014 में हुए चुनाव में केवल 10 कम्युनिस्ट जीत सके , जिनमें सीपीएम के 9 थे।  2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम के तीन ही सदस्य लोकसभा के लिए चुने गए हैं। पिछले आम चुनाव में माकपा को 22.96 फीसदी वोट मिले थे जो इस बार घटकर 6.3 प्रतिशत रह गया। सीपीआई को  2014 में 2.36 फीसदी वोट मिले , जो 2019 में घटकर 0.39 प्रतिशत रह गया। पिछली बार खुद सीपीएम ने 3.3 प्रतिशत वोट प्राप्त कर  नौ सीटें जीती थी।

सीपीएम  ने पश्चिम बंगाल में भाजपा की चुनावी बढ़त रोकने के लिए  कांग्रेस के साथ पिछली बार दोनों की जीती  सीटों पर तालमेल करने का सुझाव दिया था , जिसे कांग्रेस ने स्वीकार नहीं किया। पश्चिम बंगाल की 42 में से 29 सीटों पर सीपीएम के प्रत्याशी थे , पर कोई नहीं जीत सका ।    

केरल 

भारत में केरल कम्युनिस्टों की पहली आशा बनी थी जब वहाँ 1957 में देश की पहली  लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार कायम हुई। बताया जाता है कि विश्व में पहली बार लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकार इटली के समीप एक छोटे से देश सान मारिनो  में द्वित्तीय विश्व युद्ध के लगभग तुरंत बाद कायम हुई थी जो ज्यादा टिक नहीं सकी। केरल में बनी पहली कम्युनिस्ट सरकार के मुख्यमंत्री ईएमएस नम्बूदरीपाद थे। बहरहाल , ‘ मोदी मय ‘ भारत के मौजूदा दौर में कम्युनिस्टों के लिए केरल आखरी आशा है , जहां 2016 के विधान सभा चुनाव के बाद से मुख्यमंत्री मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ( सीपीएम ) के पिनाराई विजयन हैं। उन्होंने अगला विधान सभा चुनाव नहीं लड़ने की घोषणा की है। उनका नाम माकपा के अगले महासचिव के बतौर चर्चा में है। वह करात समर्थक माने जाते हैं। 

बहरहाल , केरल भी कम्युनिस्टों के हाथ से निकल गया तो देश में संसदीय वामपंथ का  अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।  

(सीपी नाम से चर्चित पत्रकार,यूनाईटेड न्यूज ऑफ इंडिया के मुम्बई ब्यूरो के विशेष संवाददाता पद से दिसंबर 2017 में रिटायर होने के बाद बिहार के अपने गांव में खेतीबाड़ी करने और स्कूल चलाने के अलावा स्वतंत्र पत्रकारिता करते हैं।)

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