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महाराष्ट्र में संकट टला लेकिन सवाल अब भी शेष हैं!

भारत के संविधान में चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय का दर्जा दिया गया है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली पर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। 1990 के दशक में टीएन शेषन और इस सदी के प्रारंभ में जेएम लिंगदोह के क्रमश: छह और तीन वर्ष के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो लगभग सभी मुख्य चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल में चुनाव आयोग के कामकाज के तौर-तरीकों और उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद इस संस्था की छवि इतनी मलिन कभी नहीं हुई जितनी कि पिछले कुछ वर्षों से उसकी सरकारपरस्ती के चलते लगातार हो रही है। इसके बावजूद आयोग ऐसा कुछ भी करना या करते दिखना नहीं चाहता, जिससे कि उसकी इस छवि में जरा भी सुधार आए।

ताजा मामला राज्यसभा और विभिन्न राज्यों की विधान परिषदों के चुनाव का है। इस वर्ष राज्यसभा की 73 सीटों और तीन राज्यों की विधान परिषद की रिक्त सीटों के द्विवार्षिक चुनाव होने हैं। इनमें से राज्यसभा की 55 और उत्तर प्रदेश, बिहार, और महाराष्ट्र में विधान परिषद की करीब 28 सीटों के लिए मार्च के आखिरी सप्ताह में चुनाव होने थे, लेकिन चुनाव आयोग ने कोरोना वायरस संक्रमण के संकट का हवाला देते हुए इन चुनावों को टाल दिया। हालांकि राज्यसभा की 55 में 37 सीटों का चुनाव निर्विरोध हो चुका है और राष्ट्रपति के मनोनयन कोटे की खाली हुई एक सीट भी सेवानिवृत्त प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के मनोनयन से भरी जा चुकी है। लेकिन अभी भी 7 राज्यों में राज्यसभा की 18 सीटों के चुनाव होने बाकी हैं।

चुनाव आयोग ने तीन राज्यों में विधान परिषद के चुनाव भी टाल दिए थे, लेकिन इनमें से महाराष्ट्र विधान परिषद का चुनाव अब 21 मई को कराने का एलान चुनाव आयोग को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘दखल’ के बाद करना पड़ा है।

सवाल है कि आखिर प्रधानमंत्री को दखल क्यों देना पड़ा? दरअसल महाराष्ट्र का पूरा मामला यह है कि वहां मुख्यमंत्री का पद संभाले उद्धव ठाकरे को छह महीने पूरे होने वाले हैं, लेकिन वे अभी तक राज्य विधानमंडल के सदस्य नहीं बन पाए हैं। महाराष्ट्र में दो सदनों वाला विधानमंडल है- विधानसभा और विधान परिषद। मुख्यमंत्री या मंत्री बनने के लिए इन दोनों में से किसी एक सदन का सदस्य होना अनिवार्य है।

उद्धव ठाकरे ने 28 नवंबर 2019 को मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। संविधान की धारा 164 (4) के अनुसार उन्हें अपने शपथ ग्रहण के छह महीने के अंदर यानी 28 मई से पहले अनिवार्य रूप से राज्य के किसी भी सदन का सदस्य निर्वाचित होना है। विधानसभा का सदस्य बनने के लिए ठाकरे को किसी विधायक से इस्तीफा दिलवाकर सीट खाली कराना पड़ती, लेकिन ठाकरे ने ऐसा न करते हुए विधान परिषद के जरिए विधान मंडल का सदस्य बनना तय किया। इस सिलसिले में वे 24 अप्रैल को विधानसभा कोटे की रिक्त हुई विधान परिषद की नौ सीटों के लिए होने वाले द्विवार्षिक चुनाव का इंतजार कर रहे थे। लेकिन कोरोना महामारी के चलते लागू लॉकडाउन का हवाला देकर चुनाव आयोग ने इन चुनावों को टाल दिया था। ऐसी स्थिति में ठाकरे के सामने एकमात्र विकल्प यही था कि वे 28 मई से पहले राज्यपाल के मनोनयन कोटे से विधान परिषद का सदस्य बन जाएं।

विधान परिषद में मनोनयन कोटे की दो सीटें रिक्त थीं। राज्य मंत्रिमंडल ने पिछले महीने राज्यपाल से इन दो में से एक सीट पर मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को मनोनीत किए जाने की सिफारिश की थी। चूंकि दोनों सीटें कलाकार कोटे से भरी जाना थीं, लिहाजा इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए मंत्रिमंडल ने अपनी सिफारिश में उद्धव ठाकरे के वाइल्डलाइफ फोटोग्राफर होने का उल्लेख भी किया था। इस प्रकार उनके मनोनयन में किसी तरह की कानूनी बाधा नहीं थी।

लेकिन राज्यपाल ने मंत्रिमंडल की सिफारिश पर पहले तो कई दिनों तक कोई फैसला नहीं किया। बाद में जब उनके इस रवैये की आलोचना होने लगी और सत्तारुढ़ शिवसेना की ओर से उन पर राजभवन को राजनीतिक साजिशों का केंद्र बना देने का आरोप लगाया गया तो उन्होंने सफाई दी कि वे इस संबंध में विधि विशेषज्ञों से परामर्श कर रहे हैं। उन्होंने यह भी सवाल किया कि इतनी जल्दी क्या है? यह सब करने के बाद अंतत: उन्होंने मंत्रिमंडल को सिफारिश लौटा दी।

राज्य मंत्रिमंडल ने संवैधानिक प्रावधानों के मुताबिक अपनी सिफारिश दोबारा राज्यपाल को भेजी, जिसे स्वीकार करना राज्यपाल के लिए संवैधानिक बाध्यता थी। लेकिन राज्यपाल ने कोई फैसला न लेते हुए मामले को लटकाए रखा। राज्यपाल के इस रवैये से यही जाहिर हुआ कि वे एक बार फिर राज्य में राजनीतिक अस्थिरता को न्योता दे रहे हैं, बगैर इस बात की चिंता किए कि महाराष्ट्र इस समय देश में कोरोना वायरस के संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित राज्य है और यह संकट राजनीतिक अस्थिरता के चलते ज्यादा गहरा सकता है। ऐसे में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बात की। हालांकि यह मामला किसी भी दृष्टि से प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप करने जैसा नहीं था, लेकिन प्रधानमंत्री ने ठाकरे से कहा कि वे देखेंगे कि इस मामले में क्या हो सकता है।

प्रधानमंत्री ने अपने आश्वासन के मुताबिक मामले को देखा भी। यह तो स्पष्ट नहीं हुआ कि उनकी ओर से राज्यपाल को क्या संदेश या निर्देश दिया गया, मगर अगले ही दिन राज्यपाल ने चुनाव आयोग को पत्र लिख कर राज्य विधान परिषद की रिक्त सीटों के चुनाव कराने का अनुरोध किया। उनके इस अनुरोध पर चुनाव आयोग फौरन हरकत में आया। मुख्य चुनाव आयुक्त सुनील अरोड़ा, जो कि इस समय अमेरिका में हैं, ने आनन-फानन में वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए चुनाव आयोग की बैठक करने की औपचारिकता पूरी की और महाराष्ट्र विधान परिषद की सभी नौ रिक्त सीटों के लिए 21 मई को चुनाव कराने का एलान कर दिया। जाहिर है कि प्रधानमंत्री के हस्तक्षेप से हुई यह पूरी कवायद राज्यपाल द्वारा की गई मनमानी को जायज ठहराने के लिए की गई।

दरअसल राज्यपाल कोश्यारी के पास राज्य मंत्रिमंडल की सिफारिश को न मानने अथवा उसे ठुकराने का कोई संवैधानिक आधार नहीं था। अगर वे मंत्रिमंडल की सिफारिश के आधार पर उद्धव ठाकरे को विधान परिषद का सदस्य मनोनीत कर भी देते तो कोई नई मिसाल कायम नहीं होती। पहले भी ऐसा हुआ है। उत्तर प्रदेश में 1960 में चंद्रभानु गुप्त जब मुख्यमंत्री बने तो वे राज्य विधानमंडल में किसी भी सदन के सदस्य नहीं थे।

उन्हें भी मंत्रिमंडल की सिफारिश पर राज्यपाल ने विधान परिषद का सदस्य मनोनीत किया था। इसके अलावा महाराष्ट्र में भी दत्ता मेघे सहित तीन नेताओं के ऐसे उदाहरण हैं, जो राज्य सरकार में मंत्री थे और विधान परिषद में उन्हें मनोनीत किया गया था। इन उदाहरणों की रोशनी में कहा जा सकता है कि उद्धव ठाकरे को मनोनीत करने की सिफारिश को ठुकराने का महाराष्ट्र के राज्यपाल का फैसले का कोई संवैधानिक आधार नहीं था, बल्कि वह राजनीतिक इरादों से प्रेरित फैसला था।

बहरहाल, सवाल उठता है कि जब चुनाव आयोग 21 मई को चुनाव करा सकता है तो उसने मार्च महीने में चुनाव टालने का फैसला किस आधार पर किया था? कोरोना महामारी के जिस संकट को आधार बनाकर चुनाव टाले गए थे, वह आधार तो अब भी कायम है और अभी काफी समय तक कायम रहेगा।

चुनाव आयोग ने राज्यसभा की 18 सीटों और तीन राज्यों की विधान परिषद के चुनाव कोरोना वायरस के संक्रमण की वजह से अगले आदेश तक टाले जाने का फैसला 24 मार्च को जिस समय किया था, उससे चंद घंटे पहले ही मध्य प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही चल रही थी और लगभग 114 विधायकों की मौजूदगी में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने विश्वास मत हासिल किया था। जाहिर है जब सत्र चल रहा था, तब विधानसभा के तमाम अफसर, क्लर्क, सुरक्षा गार्ड और मीडियाकर्मी भी वहां मौजूद रहे होंगे। मध्य प्रदेश विधानसभा के इस सत्र से एक दिन पहले तक संसद का बजट सत्र भी जारी था।

23 मार्च को दोनों सदनों में वित्त विधेयक पारित कराया गया था। इसके बावजूद चुनाव आयोग ने चुनाव टालने का फैसला कोरोना वायरस संक्रमण को वजह बताते हुए किया। हालांकि राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव ऐसे नहीं है कि जिनमें बडी संख्या में इकट्ठा होते हों। कोरोना संक्रमण के चलते लॉकडाउन होने के बावजूद जिस तरह कई अन्य जरुरी और गैरजरुरी काम भी हुए हैं और अभी भी हो रहे हैं, उसी तरह राज्यसभा और विधान परिषद के चुनाव भी हो सकते थे।

वैसे ऐसा नहीं है कि इन चुनावों के बगैर कोई काम रुक रहा है, फिर भी अगर चुनाव आयोग चाहता तो ये चुनाव 26 मार्च को हो सकते थे। इनके लिए बहुत ज्यादा तैयारी करने की भी जरुरत नहीं थी। मिसाल के तौर पर झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव के लिए कुल 81 मतदाता हैं। आयोग चाहता तो तीन से पांच मिनट के अंतराल पर विधायक वोट डाल सकते थे। विधानसभा में, जहां मतदान की प्रक्रिया संपन्न होती है, वहां दो-दो मीटर की दूरी पर विधायकों के खड़े होने का बंदोबस्त हो सकता था। मास्क और सैनिटाइजर का भी इंतजाम किया जा सकता था। इसी तरह गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों के लिए 177, मध्य प्रदेश में तीन सीटों के लिए 206, राजस्थान में तीन सीटों के लिए 200, आंध्र प्रदेश में तीन सीटों के लिए 175 और मणिपुर तथा मेघालय में एक-एक सीट के लिए 60-60 विधायक मतदाता हैं।

महाराष्ट्र विधान परिषद की जिन नौ सीटों के लिए चुनाव होना हैं वे सभी विधानसभा कोटे की हैं, जिनके लिए 288 विधायकों को मतदान करना है। इसी तरह उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के लिए शिक्षक और स्नातक वर्ग की 11 सीटों के लिए और बिहार में आठ सीटों के लिए अलग-अलग जिला मुख्यालय पर वोट डलने हैं, जिसके लिए इंतजाम करना कोई मुश्किल काम नहीं है। मगर चुनाव आयोग ने चुनाव कराने के बजाय चुनाव टालने का आसान रास्ता चुना।

सवाल यही है कि जब चुनाव आयोग महाराष्ट्र विधान परिषद की नौ सीटों के लिए 21 मई को चुनाव कराने का एलान कर चुका है तो बाकी राज्यों में विधान परिषद और राज्यसभा के चुनाव टाले रखने का क्या औचित्य है? कोरोना संक्रमण का संकट तो अभी लंबे समय तक जारी रहना है, जबकि इसी साल अक्टूबर में उत्तर प्रदेश की 10, कर्नाटक की चार, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर की एक-एक राज्यसभा सीट के लिए चुनाव होना है।

इसी साल जुलाई में ही बिहार में राज्यपाल के मनोनयन और विधायकों के वोटों से चुनी जाने वाली विधान परिषद की 18 सीटें खाली होने वाली हैं। फिर नवंबर-दिसंबर में बिहार विधानसभा के चुनाव भी होने हैं। मध्य प्रदेश में भी विधानसभा की 24 सीटों पर उपचुनाव सितंबर महीने से पहले कराए जाने की संवैधानिक बाध्यता है। आंध्र प्रदेश और जम्मू-कश्मीर सहित कई राज्यों में स्थानीय निकाय चुनावों पर भी अभी रोक लगी हुई है।

यह सही है कि विधानसभा के उपचुनाव और स्थानीय निकाय चुनावों में सीधे आम मतदाता की भागीदारी रहती है, लिहाजा कोरोना संकट के चलते अभी उनका चुनाव नहीं कराया जा सकता। लेकिन सीमित मतदाताओं के जरिए होने वाले राज्यसभा और विधान परिषद चुनावों को टालकर और प्रधानमंत्री के परोक्ष दखल से एक राज्य में चुनाव कराने का फैसला लेकर चुनाव आयोग पता नहीं क्यों अपनी विश्वसनीयता और योग्यता पर लगे प्रश्न चिह्न को और ज्यादा गहरा करना चाहता है।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं। आप आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on May 9, 2020 11:00 pm

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