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Categories: बीच बहस

डॉ. सुनीलम, एक आंदोलनकारी की डायरी

मेरे लिए 2020 का वर्ष सिखाने वाला और ज्ञानवर्धक रहा। यह वर्ष जन आंदोलनों के नाम रहा। इस वर्ष की शुरुआत नागरिक संशोधन कानून के खिलाफ संघर्ष से हुई तथा अनिश्चितकालीन किसान आंदोलन के साथ 2020 खत्म हो गया।

पिछले वर्ष की शुरुआत में जामिया विश्वविद्यालय और जेएनयू के छात्र छात्राओं के आंदोलन ने पूरे देश का ध्यान आकृष्ट किया। इस आंदोलन में मुझे जामिया जाकर एकजुटता प्रदर्शित करने का मौका मिला। बाद में आंदोलन को कुचलने का प्रयास भी हुआ।

केंद्र सरकार द्वारा भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा दर्ज करनी की जगह हिंसा की जिम्मेदारी देश के मानवाधिकार वादियों को माओवादी बताकर थोप दी गई। इसी तरह दिल्ली दंगों के जिम्मेदार भाजपा नेताओं को बचाकर नागरिकता कानून के विरोध में चल रहे आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। सरकार के तमाम दमन तथा लॉकडाउन का दुरुपयोग करने के बावजूद सरकार द्वारा श्रम कानूनों को खत्म किए जाने और किसान विरोधी कानूनों के खिलाफ किसान आंदोलन, श्रमिक आंदोलन जारी रहा। अदृश्य कोरोना ने जहां विज्ञान की सीमाओं को दुनिया के सामने ला दिया वहीं देश में सवा लाख कोरोना पीड़ितों की मौत और दुनिया में 17 लाख कोरोना पीड़ितों की मौत और 80 करोड़ लोगों के संक्रमित होने के बाद आए वैक्सीन ने नई उम्मीद पैदा की है। दुनिया भर में हवाई जहाज बंद होने के कारण मेरा भाई कनाडा में ही फंसा हुआ है। किसान आंदोलन के डर से सरकार ने ट्रेनों को बंद कर रखा है।

कोरोना संक्रमण ने पूरी दुनिया में कल्याणकारी राज्य की जरूरत का फिर से एहसास करा दिया है तथा बाजार की सीमाओं को तथा निर्ममता को भी साबित कर दिया है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत है जहां कोरोना के चलते 15 करोड़ भारतीय बेरोजगार हुए हैं। दूसरी तरफ अडानी अंबानी ने इस वर्ष तीन लाख करोड़ की संपत्ति बढ़ाई है।

इसीलिए अडानी अंबानी को सीधे चुनौती भारत के किसानों ने दी है। 40 दिन से चल रहे किसान आंदोलन में पांच लाख किसान दिल्ली को घेरे हुए है। एक डिग्री की कड़कडाती ठंड में 500 संगठन तीन कृषि कानूनों को रद्द करने के लिए अनिश्चितकालीन संघर्ष कर रहे हैं।

मुझे पिछले साल दुनिया के सबसे बड़े किसान आंदोलन में शामिल होने का मौका मिला है। 25 दिसंबर, 1997 को पहली बार किसान आंदोलन से जुड़कर मैंने  किसानों को संगठित करने का जो प्रयास किया था जिसमें 24 किसानों की शहादत हुई, 150 किसानों को गोली लगी, मुझे और मेरे तीन साथियों को आजीवन कारावास की सजा जरूर हुई लेकिन किसानों के हक और सम्मान के लिए किए गए प्रयासों का फल आज मुझे अनिश्चितकालीन किसान आंदोलन में दिखलाई पड़ रहा है। संगठन के तौर पर कहूं तो किसान संघर्ष समिति ने जन  आंदोलनों के राष्ट्रीय समन्वय, भूमि अधिकार आंदोलन और अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के माध्यम से इस आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान किया है। व्यक्ति के तौर पर मुझे लगता है भले ही स्वतंत्रता आंदोलन और जेपी आंदोलन में उम्र के चलते शामिल न रहा हूँ। लेकिन अन्ना आंदोलन, नागरिकता संशोधन कानून विरोधी आंदोलन तथा वर्तमान किसान आंदोलन में शामिल होने का अवसर मिला है जो मेरे जीवन को सार्थकता प्रदान करता है।

31 जनवरी से हमने समाजवादी समागम के 15 साथियों के साथ देश भर के 16 राज्यों की 54 दिन की यात्रा की जिसमें 50 शाहीन बाग का दौरा करने का मौका मिला। पुराने समाजवादियों और देश के विभिन्न आंदोलनकारियों से मुलाकात हुई। यात्रा का नेतृत्व कर रहे अरुण श्रीवास्तव जी और सभी साथियों और कार्यक्रमों के आयोजकों का आभारी हूँ जिनके चलते हमें हज़ारों मुस्लिम महिलाओं को हाथ में संविधान और बाबा साहेब का फोटो लेकर रात के 12 बजे भी मिलने का और अपने विचार साझा करने का मौका मिला। रमाशंकर जी का विशेष आभार जिन्होंने डॉ लोहिया की 10 पुस्तिकों की 2 -2 हज़ार प्रतियां छपवाकर हमें दी। डॉ. लोहिया के जन्मशताब्दी वर्ष में की गई यात्रा का अनुभव और संपर्क बहुत काम आए।

सरकार द्वारा अचानक लॉकडाउन घोषित किए जाने के कारण यात्रा हैदराबाद की जगह वर्धा में ही समाप्त करनी पड़ी।

समाजवादी समागम के आयोजक

तेलंगाना के पूर्व गृहमंत्री नाइ नरसिम्हा रेड्डी जी ने हैदराबाद के समाजवादी साथियों के साथ पूरी तैयारी कर चुके थे पर सरकार ने अनुमति नहीं दी। कोरोना संक्रमण ने बाद में उनकी और उनकी पत्नी की जान ले ली। नागपुर जाकर पहली बार ऐसा हुआ कि लोहिया भवन के निर्माता और समता सन्देशके सम्पादक हरीश अड़यालकर से मुलाकात नहीं हो सकी। उनकी और उनके बेटे की कोरोना से मौत हो गई। रेड्डी जी और अड़यालकार की मौत मेरे लिए निजी नुकसान है जिसकी कभी भरपाई नहीं हो सकेगी।

लॉकडाउन के दौरान कुछ समय दिल्ली में रहने के बाद अधिकतर समय ग्वालियर में पिताजी के साथ छात्र जीवन के बाद यानी 1982 के बाद पहली बार कई महीने साथ रहने का मौका मिला। बहुत कुछ सीखने मिला ।

जिंदगी में घर के काम का महत्व समझ में आया। जिससे यह एहसास हुआ कि औसतन घर के काम में 5 घंटे का समय साफ सफाई, खाना बनाने और कपड़े धोने में खर्च होता है। यह 5 घंटे 2 सदस्यों के लिए खर्च हो रहे थे। औसतन 5 सदस्यों के लिए रोजाना अधिकतर महिलाएं (मां, बहन, पति, बच्चे) अपने परिवार के लिए 7 से 8 घंटे का समय लगाती हैं। जिसका हिसाब किताब इतिहास में आज तक नहीं हुआ। आर्थिक तौर पर इस योगदान को देखना हो तो इस काम को करने के लिए यदि कोई सहायक रखें तो दिल्ली जैसे शहर में उसे दस हजार रूपये बाकी शहर में तीन से पांच हजार रूपये देने होते हैं। महिलाओं के इस महत्वपूर्ण योगदान को कभी पुरुष प्रधान समाज ने स्वीकार ही नहीं किया।  कृतज्ञता प्रकट करने का सवाल ही पैदा नहीं होता। यह बात नई नहीं है लेकिन कोरोना काल में घर के काम करते वक्त यह बात बार बार दिमाग मे आती रही इसलिए साझा कर रहा हूं।

लॉकडाउन किए जाने के बाद पहले 2 महीने प्रवासी श्रमिकों की गांव वापसी को लेकर प्रशासनिक अधिकारियों से बात करने में दिन रात लगा रहा । मुझे इस बात का संतोष है कि मैं देश भर के संपर्कों और भागवत परिहार जी के सहयोग से हजारों प्रवासी श्रमिकों जिन्हें मैं अतिथि श्रमिक कहता हूं उनकी गांव वापसी में मदद कर सका। देशभर में प्रवासी श्रमिकों के समर्थन में उन्हें दस हजार रुपये मासिक देने और निशुल्क घर वापसी के आंदोलन में भी मैंने शिरकत की तथा कई ऑनलाइन बैठकों में हिस्सा लिया।

कोरोना काल में बिहार में चुनाव हुए। मध्यप्रदेश में चुनी हुई कांग्रेस की सरकार को दलबदल कराकर गिरा दिया और भाजपा के सरकार बनाने के बाद 28 सीटों पर उप चुनाव भी हुए ।

मैं बिहार के चुनाव में भी गया और मध्य प्रदेश के चुनाव में भी। देखा किस तरह देश के ग्रामीण क्षेत्रों ने कोरोना को पूरी तरह नकार दिया है । मैंने मुरैना, भिंड और ग्वालियर में 6 सपा उम्मीदवारों के लिए सभाएं कीं तथा बिहार में महागठबंधन के उम्मीदवारों के पक्ष में माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य, महागठबन्धन के मुख्यमंत्री उम्मीदवार तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के साथ सभाएं की। बिहार में महागठबंधन स्पष्ट तौर पर चुनाव जीता हुआ दिखलाई पड़ रहा था लेकिन भाजपा ने प्रशासनिक मशीनरी का दुरुपयोग कर नतीजे बदल दिए और जनमत के खिलाफ बिहार में सरकार बना ली। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी।

कोरोना काल में मैंने किसान सँघर्ष समिति के अध्यक्ष टँटी चौधरी जी को खोया। बीच में जब उनकी ज्यादा तबियत खराब हुई मैं मुलतायी गया उनका इलाज कराया लेकिन वे बचे नहीं। हमारे संरक्षक प्रहलाद स्वरूप अग्रवाल जी का भी निधन हुआ। मुझे दुख है कि मैं दोनों के अंतिम दर्शन नहीं कर सका। वरिष्ठ साथी आष्टा के गुलाब देशमुख के जवान बेटे की भी मौत हो गई कोरोना काल में तीन किसान विरोधी अध्यादेश लाने के बाद से ही 250 किसान संगठनों के मंच अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति ने  राष्ट्र व्यापी विरोध आंदोलन शुरू कर दिए थे।

मैंने ग्वालियर के स्थानीय कार्यक्रमों में भाग लेकर उनमें शिरकत की तथा ऑनलाइन कार्यक्रमों में भागीदारी की। पंजाब में आंदोलन तेज होने के बाद मैं मानसा (पंजाब) तथा कुरुक्षेत्र (हरियाणा) गया। कुरुक्षेत्र में किसान संगठनों की बैठक की अध्यक्षता की जिसमें संयुक्त किसान मोर्चा की नींव पड़ी। अनिश्चितकालीन किसान आंदोलन शुरू होने के बाद 10 दिन सिंघु बॉर्डर, टिकरी बॉर्डर और गाजीपुर बॉर्डर पर किसानों के साथ रहा।  बुखार होने पर दिल्ली से ग्वालियर आया। जांच कराने पर कोरोना पॉजिटिव निकला। 14 दिन ग्वालियर सरकारी अस्पताल के आईसीयू में अपनी बहन और डॉक्टरों की टीम के इलाज के बाद 12 के पहले घर वापस आया हूं। फिलहाल कोरोना संक्रमण के बाद के प्रभाव से जूझ रहा हूं।

इलाज के दौरान बहन ने जो कुछ किया उसको जीवन में भुला नहीं सकता। कोरोना से मेरे परिवार और रिश्तेदारों में 8 सदस्य संक्रमित हुए। कोरोना के दौरान मेरे कुत्ते ब्रूनो की मौत हो गई। दीदी के प्रिय कुत्ते टी जे की मौत हो गई। जानवर भी जीवन का हिस्सा बन जाते हैं। उनकी मौत से कितना कष्ट होता है, यह जीवन में पहली बार महसूस हुआ ।

इस वर्ष की सबसे बड़ी उपलब्धि बेगमगंज (रायसेन) के टी आर आठ्याजी, कांडीखाल (उत्तराखंड) के जबर सिंह जी के साथ बहुजन संवाद की शुरुआत 7 जून 20 को करना रहा। जिसके 208 दिन आज पूरे हो रहे हैं। बहुजन संवाद के कार्यक्रम के दौरान शोधकर्ता लता जी के विचार सुने, उनसे बातचीत हुई मैंने उनके सामने बहुजन संवाद से जुड़ने का प्रस्ताव रखा जिसे उन्होंने स्वीकार किया जिससे बहुजन संवाद को नयी ऊर्जा और गहराई मिली। बहुजन संवाद में अब तक 800 से ज्यादा बहुजन विचारकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, किसान और मजदूर नेताओं तथा समाजवादी, वामपंथी, गांधीवादी, अंबेडकरवादी विचारों से जुड़े बुद्धिजीवी भागीदारी कर चुके हैं। बहुजन संवाद को अब तक बीस लाख लोगों द्वारा देखा जा चुका है।

पिछले 3 दशकों में मेरा काफी समय अदालतों में चले 140 प्रकरणों में गया। इस साल पहले यात्रा और बाद में कोरोना के चलते इस साल अदालत के चक्कर नहीं काटने पड़े। उम्मीद है अगले वर्ष मुझे सभी प्रकरणों में न्याय मिलेगा। मुझे उम्मीद है अगले वर्ष में व्यवस्था परिवर्तन के संघर्षों में मैं अधिक योगदान कर सकूंगा।

आप सबका मुझे जो स्नेह प्यार और आत्मीयता मिली वह सब कुछ मुझे अगले वर्ष भी मिलता रहेगा।

इस साल जिन साथियों से नहीं मिल सका उनसे अगले वर्ष जरूर कहीं न कहीं सशरीर मुलाकात होगी इसी विश्वास के साथ पिछले साल को लेकर अपनी टिप्पणी समाप्त करता हूँ।

(डॉ. सुनीलम पूर्व विधायक और समाजवादी नेता हैं। और इस समय किसान आंदोलन में केंद्रीय नेतृत्वकारी भूमिका निभा रहे हैं।)

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This post was last modified on January 2, 2021 9:36 am

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