Subscribe for notification
Categories: बीच बहस

यह जीत भी मोदी के लिए किसी झटके से कम नहीं

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना का गठबंधन एक बार फिर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रहा है और हरियाणा में भी बहुमत न मिलने के बावजूद भाजपा जैसे-तैसे सरकार बनाने की स्थिति में है। इन दोनों राज्यों में विधानसभा चुनाव और विभिन्न राज्यों में 51 सीटों के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए किसी झटके से कम नहीं हैं।

महज पांच महीने पहले हुए लोकसभा के चुनाव में राष्ट्रवाद और हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर भाजपा ने देश के अन्य राज्यों के साथ ही इन दो राज्यों में भी विपक्षी दलों का सफाया करते हुए एक तरफा जीत हासिल की थी, लेकिन अब पांच महीने बाद हुए विधानसभा चुनाव में दोनों राज्यों के चुनाव नतीजे बताते हैं कि जनता ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मुद्दे को ज्यादा तरजीह नहीं दी। जनता का लगभग यही रुझान विभिन्न राज्यों में हुए उपचुनावों के नतीजों में भी देखने को मिला है।

भाजपा ने महाराष्ट्र विधानसभा की 288 सीटों में से 250 और हरियाणा विधानसभा की 90 में से 75 सीटें जीतने का न सिर्फ लक्ष्य निर्धारित किया था, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने इतनी ही सीटें जीतने के दावे किए थे, लेकिन चुनाव नतीजों ने उनके दावों की हवा निकाल दी।

कहने को तो दोनों ही राज्यों में भाजपा और कांग्रेस की बीच मुकाबला था लेकिन हकीकत यह है कि दोनों ही राज्यों में कांग्रेस बिल्कुल हारी हुई मानसिकता के साथ चुनाव लड़ रही थी। दोनों ही राज्यों में उसे अंदरुनी कलह और बगावत का सामना करना पड़ रहा था। इसकी वजह से कार्यकर्ताओं में भी ज्यादा उत्साह नहीं था। पैसे और अन्य चुनावी संसाधनों के मामले में भी भाजपा उससे कहीं ज्यादा भारी नजर आ रही थी। उसकी सहयोगी राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की हालत भी संगठन के स्तर पर बहुत ज्यादा अच्छी नहीं थी। उसके भी कई नेता पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। इन्हीं सब वजहों से इन दोनों राज्यों में भाजपा सरकारों की नाकामियों और जनता के रोजमर्रा से जुड़े मुद्दों को उस तरह से नहीं उठा पा रही थी, जिस तरह उठाने की अपेक्षा एक विपक्षी पार्टी के तौर पर उससे की जा रही थी। चुनाव पूर्व आए तमाम सर्वे और एग्जिट पोल के निष्कर्ष कांग्रेस के सफाए की भविष्यवाणी कर रहे थे। अब चुनाव नतीजों ने इन तमाम भविष्यवाणियों की हवा निकाल दी है।

दूसरी ओर भाजपा भी दोनों राज्यों में अपनी सरकार की नाकामियों और कमजोरियों को महसूस कर रही थी, लिहाजा उसने अपना पूरा चुनाव राष्ट्रवाद और हिंदुत्व जैसे निर्गुण और निराकार मुद्दों पर केंद्रित रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने दोनों राज्यों में धुआंधार चुनाव प्रचार किया। दोनों राज्यों में इन दोनों नेताओं ने अपने भाषणों में कश्मीर, धारा 370, सर्जिकल स्ट्राइक, हिंदू-मुसलमान, तीन तलाक, गाय, पाकिस्तान, सेना के जवानों की शहादत, वन रैंक वन पेंशन, एनआरसी जैसे मुद्दों का ही जिक्र किया और भाजपा के लिए वोट मांगे। यही नहीं, राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए मतदान से ठीक एक दिन पहले पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में आतंकवादी कैंपों पर गोलाबारी का उपक्रम भी किया गया।

दरअसल भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को मिली खुफिया सूचनाएं भी यही बता रही थीं कि दोनों राज्यों में स्थानीय मुद्दों को लेकर लोगों, खासकर किसानों और नौजवानों में असंतोष के चलते भाजपा की हालत पतली है। इसीलिए उसकी ओर से महाराष्ट्र में विनायक दामोदर सावरकर और ज्योतिबा फूले तथा सावित्री बाई फूले को भारत रत्न देने का शिगूफा छोड़कर भावनात्मक उभार लाने की कोशिश भी की गई। महाराष्ट्र में चूंकि कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का संगठन बुरी तरह बिखरा हुआ था, उसके उम्मीदवारों के पास चुनावी संसाधनों की कमी थी, कार्यकर्ताओं में ज्यादा उत्साह नहीं था इसलिए भाजपा और शिवसेना का गठबंधन वहां बहुमत हासिल करने में कामयाब रहा। हालांकि भाजपा को पिछले चुनाव के मुकाबले कम सीटें मिलीं और राज्य सरकार में उसके कई मंत्रियों को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा।

महाराष्ट्र की तरह ही हरियाणा में भी स्थानीय मुद्दों पर जनता की नाराजगी और राज्य सरकार की नाकामी से भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को पार्टी की जमीन खिसकने और सत्ता हाथ से निकलने का डर सता रहा था। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी ताबड़तोड़ रैलियों में राष्ट्रीय मुद्दों को ही फोकस में रखा। यहां नाराज किसानों को रिझाने के लिए प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान को मिलने वाला सिंधु नदी का पानी रोक देने और उसे सिंचाई के लिए हरियाणा के किसानों को देने जैसी हवाई घोषणा भी की।

यही नहीं जाट समुदाय के वोटों का विभाजन करने के लिए शिक्षक भर्ती घोटाले में दोषी पाए जाने के बाद जेल की सजा काट रहे पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला को मिले दो महीने के पैरोल का भी फायदा उठाने की भाजपा ने भरपूर कोशिश की। 84 वर्षीय चौटाला ने इन दो महीनों के दौरान पूरे सूबे में लगभग दो दर्जन सभाएं कर अपनी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल का प्रचार किया। चुनाव से ऐन पहले चौटाला दो महीने के पैरोल पर जेल से बाहर कैसे आए और राजनीतिक गतिविधियों में कैसे भाग लेते रहे, इस सवाल का जवाब तो वह अदालत ही दे सकती है, जिसने उनका पैरोल मंजूर किया होगा।

भाजपा अपनी तमाम हिकमत अमली के बावजूद हरियाणा में मनचाहे नतीजे हासिल नहीं कर सकी। मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर और एक अन्य मंत्री को छोड़कर राज्य के सारे मंत्रियों को करारी हार का सामना करना पड़ा। जिन ओम प्रकाश चौटाला को पैरोल पर लाकर उनकी सभाएं कराई गई थीं, उनकी पार्टी इंडियन नेशनल लोकदल का भी बुरी तरह सफाया हो गया। अलबत्ता चौटाला से बगावत कर नई पार्टी बनाने वाले उनके पोते दुष्यंत चौटाला अपनी हनक दिखाने में कामयाब रहे। उनकी जननायक जनता पार्टी दस सीटें जीतने में सफल रही।

महाराष्ट्र की तरह हरियाणा में भी कांग्रेस अंदरुनी कलह से ग्रस्त थी लेकिन उसने चुनाव से पहले कुमारी शैलजा को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाकर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुडा को चुनाव अभियान की कमान सौंपकर स्थिति को थोड़ा संभाल लिया था। कांग्रेस आलाकमान ने यही फैसला अगर चुनाव से दो तीन महीने पहले कर लिया होता तो संभवत: उसके लिए नतीजे और भी अच्छे आ सकते थे।

दोनों राज्यों में चाकचौबंद सत्तारूढ़ भाजपा के मुकाबले विपक्ष लुंजपुंज स्थिति में था। उसके बावजूद भाजपा की ताकत पहले से घटी है तो इसकी एक मात्र वजह यही है कि जनता ने कश्मीर, धारा 370, पाकिस्तान, सर्जिकल स्ट्राइक, जैसे मुद्दों के मुकाबले अपने रोजमर्रा के जीवन से जुड़े मुद्दों को ही ज्यादा तरजीह दी। उसने भाजपा को संदेश दे दिया है कि राष्ट्रवाद और अन्य भावनात्मक मुद्दे एक हद तक ही कारगर हो सकते हैं। विभिन्न राज्यों में हुए 51 विधानसभा सीटों के उपचुनावों के नतीजों का भी कमोबेश यही संदेश हैं। इन उपचुनावों में ज्यादातर सीटों पर भाजपा और उसके सहयोगी दलों को हार का सामना करना पड़ा है।

This post was last modified on November 2, 2019 10:58 am

Leave a Comment
Disqus Comments Loading...
Share

Recent Posts

वादा था स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने का, खतरे में पड़ गयी एमएसपी

वादा फरामोशी यूं तो दुनिया भर की सभी सरकारों और राजनीतिक दलों का स्थायी भाव…

5 hours ago

विपक्ष की गैर मौजूदगी में लेबर कोड बिल लोकसभा से पास, किसानों के बाद अब मजदूरों के गले में फंदा

मोदी सरकार ने किसानों के बाद अब मजदूरों का गला घोंटने की तैयारी कर ली…

6 hours ago

गोदी मीडिया से नहीं सोशल प्लेटफार्म से परेशान है केंद्र सरकार

विगत दिनों सुदर्शन न्यूज़ चैनल पर ‘यूपीएससी जिहाद’ कार्यक्रम के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम…

8 hours ago

पवार भी निलंबित राज्य सभा सदस्यों के साथ बैठेंगे अनशन पर

नई दिल्ली। राज्य सभा के उपसभापति द्वारा कृषि विधेयक पर सदस्यों को नहीं बोलने देने…

9 hours ago

खेती छीन कर किसानों के हाथ में मजीरा पकड़ाने की तैयारी

अफ्रीका में जब ब्रिटिश पूंजीवादी लोग पहुंचे तो देखा कि लोग अपने मवेशियों व जमीन…

11 hours ago

पिछले 18 साल में मनी लॉन्ड्रिंग से 112 अरब रुपये का लेन-देन, अडानी की कम्पनी का भी नाम शामिल

64 करोड़ के किकबैक से सम्बन्धित बोफोर्स सौदे का भूत भारतीय राजनीति में उच्चस्तरीय भ्रष्टाचार…

11 hours ago