भारत चीन सीमा विवाद और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य

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मोदी, ट्रम्प और जिनपिंग।

पहले अमेरिका के स्टेट सेक्रेटरी, माइक पॉम्पियो की बात पढ़ें। माइक पॉम्पियो अमेरिका के बड़े मंत्री हैं और राष्ट्रपति ट्रम्प के बेहद करीबी भी हैं। वे ब्रुसेल्स में एक आभासी कॉन्फ्रेंस में अपनी बात कह रहे थे। उनसे जब यह पूछा गया कि अमेरिका, यूरोप में अपने सैनिकों की संख्या में क्यों कमी कर रहा है, तो माइक ने कहा कि “अगर हम अपनी सेना जर्मनी से हटा रहे हैं तो, इसका अर्थ है कि उस सेना को कहीं और भेजे जाने की योजना है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की गतिविधियों के कारण भारत को खतरा उत्पन्न हो गया है। साथ ही चीन की गतिविधियों से, वियतनाम, इंडोनेशिया, फिलीपींस, मलेशिया और दक्षिण चीन सागर में भी तनाव है। यूएस आर्मी अपने को इन चुनौतियों के अनुरूप ढाल रही है।”

पॉम्पियो ने यह भी कहा कि “ट्रम्प प्रशासन ने दो साल पहले जो रणनीतिक योजना बनाई है उन्हें अमल में लाने का अवसर लंबे समय से लंबित है। अमेरिका ने इन खतरों के बारे में कई बार विचार किया है और कैसे इनका सामना किया जाए, इस पर भी सोचा है। यह खतरे, इंटेलिजेंस, सैनिक और सायबर क्षेत्रों से है।”

माइक आगे कहते हैं, ” इस अभ्यास के दौरान यह महसूस किया गया है कि रूस या अन्य विरोधी ताकतों का मुकाबला केवल उनके सामने कुछ फौजी टुकड़ी कहीं पर रख कर नहीं किया जा सकता है। अतः हम नए सिरे से सोच रहे हैं कि विवाद का स्वरूप क्या है, और अपने संसाधनों को हम कैसे उनके मुक़ाबले में खड़ा कर सकते हैं। हमारे यह संसाधन क्या खुफिया क्षेत्रों में पर्याप्त हैं या, वायु सेना के क्षेत्र में, या समस्त सुरक्षा क्षेत्रों में, यह भी देखना होगा।

जर्मनी से सैन्य बल हटाने के पीछे, यह सामूहिक उद्देश्य है कि, हम अपने संसाधनों को दुनिया में अन्यत्र लगाना चाहते हैं। दुनिया में बहुत सी जगहें हैं जैसे, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का खतरा भारत को है, और वियतनाम, मलेशिया, इंडोनेशिया, दक्षिण चीन सागर, और फिलीपींस में है। हम यह सुनिश्चित करने जा रहे हैं कि, पीपुल्स लिबरेशन आर्मी पीएलए का प्रतिरोध करने के लिये अपनी सेनाएं उचित जगहों पर लगाएंगे। हम इसे एक चुनौती के रूप में ले रहे हैं और इस चुनौती का सामना करेंगे।”

अपने भाषण में उन्होंने भारत-चीन सीमा विवाद पर विशेष बल दिया। साथ ही दक्षिण चीन सागर को भी जोड़ा। साथ ही उन्होंने अपनी विदेश नीति और यूरोप से अपने संबंधों पर बहुत कुछ कहा जो हमारे इस विमर्श का अंग नहीं है। 

माइक पॉम्पियो के इस लंबे भाषण से एक बात साफ हो रही है कि दुनिया फिर एक बार शीत युद्ध के दौर में लौट रही है। पहला शीत युद्ध का दौर, 1945 से 1990 तक चला। प्रथम शीत युद्ध के अनेक कारणों में सबसे प्रमुख कारण विचारधारा का संघर्ष था। 1939 से 1945 के बीच हुए द्वितीय विश्वयुद्ध में जब हिटलर ने सोवियत रूस पर हमला किया तो सोवियत संघ धुरी राष्ट्रों के खिलाफ मित्र राष्ट्रों के साथ आ गया और जब 1945 में हिटलर की पराजय हो गयी तथा हिटलर ने आत्महत्या कर लिया तो, सोवियत रूस अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के कारण मित्र राष्ट्रों से अलग हो गया। उसी के बाद 1949 में चीन में लाल क्रांति हो गयी और सोवियत रूस को एशिया में एक और हम ख़याल बड़ा देश मिला। वह कम्युनिज़्म के उभार का वक़्त था। 

भारत नया नया आज़ाद हुआ था। हमारी अपनी अर्थव्यवस्था का स्वरूप क्या हो, इस पर बहस चली। लेकिन भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में सोवियत क्रांति और समाजवाद से प्रभावित तबका मज़बूत था और स्वयं जवाहरलाल नेहरू का भी रुझान कही न कहीं, समाजवादी समाज की स्थापना की ओर था तो रूस ने तब हमें अपने एक स्वाभाविक साथी के रूप में लिया।

हमारा आर्थिक ढांचा, मिश्रित अर्थव्यवस्था के आधार पर विकसित हुआ। एक समय सामुदायिक खेती की भी बात चलने लगी थी। तब जमींदारी उन्मूलन के रूप में एक बड़ा और प्रगतिशील भूमि सुधार कार्यक्रम देश मे लाया गया। यह सारे प्रगतिशील कदम समाजवादी विचारधारा से कही न कहीं प्रभावित थे, जो भारत को अमेरिका से स्वाभाविक रूप से अलग और रूस के नजदीक करते गए। चीन इस पूरे विवाद में कहीं नहीं था। वह खुद को मजबूत करने में लगा था। 

दुनिया के दो शक्ति केन्द्र वैचारिक आधार पर बंट गए थे। विचारधारा के वर्चस्व की यह पहली जंग थी, जो प्रथम शीत युद्ध की पीठिका बनी। अमेरिका जो पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का सिरमौर था से कम्युनिस्ट सोवियत रूस के बीच जो, एक लंबा जासूसी, षड्यंत्र, और वैचारिक मतभेद का आपसी टकराव शुरू हुआ, वही इतिहास में शीत युद्ध कहलाया। यह सिलसिला, गोर्बाचेव के कार्यकाल और रूस में कम्युनिस्ट पार्टी के शासन के अंत और ग्लासनोस्त के आने तक चला और 1991 तक सोवियत ब्लॉक लगभग पूरी तरह से बिखर गया।

जो दुनिया दो ध्रुवीय थी, वह अब एक ध्रुवीय हो गयी और अमेरिका अब चुनौती रहित एक महाशक्ति बन गया। इसे कम्युनिस्ट विचारधारा की पराजय और पूंजीवादी सोच के विजय के रूप में देखा गया। यह प्रचारित किया जाने लगा कि, श्रम, पूंजी, इतिहास की प्रगतिवादी व्याख्या पर आधारित वैज्ञानिक भौतिकवाद के दर्शन जो कम्युनिस्ट विचारधारा का मूल है अब प्रासंगिक नहीं था। सोवियत रूस का बिखराव एक विचारधारा के अंत का प्रारंभ नहीं था। यह केवल आगे बढ़ते जाते समाज में युद्ध और शांति के अनेक सोपान की तरह, केवल एक पड़ाव था। 

दुनिया मे जब कोई प्रतिद्वंद्वी ही नहीं बचा तो फिर युद्ध किससे होता। अमेरिका एक चुनौती विहीन राष्ट्र बन गया। आर्थिक संपन्नता ने उसकी स्थिति गांव के एक बड़े और बिगड़ैल ज़मींदार की तरह कर दी । लेकिन धीरे धीरे ही सही, चीन की स्थिति सुधरी और चीन दुनिया की एक महाशक्ति बन कर उभरने की ओर अग्रसर हुआ । चीन ने पूंजीवाद को पूंजीवादी तरीके से ही चुनौती देने की रणनीति अपनाई। उसने अपनी आर्थिक ताक़त बढ़ाई और धीरे धीरे दुनिया भर में उसकी आर्थिक धमक महसूस की जाने लगी। 1991 के बाद हमारी अर्थव्यवस्था के मॉडल में भी परिवर्तन हुआ और हमने भी पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के रूप को अपनाया। खुली खिड़की ने विकास और प्रगति के अनेक द्वारा खोले। भारत दुनिया की सबसे तेज़ गति से विकसित होने वाली अर्थव्यवस्थाओं में शुमार हुआ। 

भारत एक उन्नत होती हुई अर्थव्यवस्था की ओर अग्रसर हो रहा था कि, 2016 के बाद कुछ विफल आर्थिक नीतियों के काऱण विकास की गति में बाधा पहुंची और विश्व आर्थिकी में जो हमारा स्थान था वह कम होने लगा। इसी बीच यह कोरोना आपदा आ गयी जिसने दुनियाभर के देशों और महाशक्तियों के सामने अनेक संकट खड़े कर दिए। भारत भी अछूता नहीं रहा। अब तो दुनिया भर में मंदी का दौर आ ही गया है। यह कब तक चलेगा यह अभी कोई भी बता नहीं पा रहा है। 

कोरोना वायरस की शुरुआत चीन के वुहान शहर से हुई और फिर यूरोप, अमेरिका होते हुए वह वायरस भारत में आया। दुनिया भर में इसे लेकर हाहाकार मचा रहा। अब भी कोरोना का भय कम नहीं हुआ है। इसकी दवा और वैक्सीन की तलाश दुनिया भर के वायरोलॉजिस्ट और चिकित्सा वैज्ञानिक कर रहे हैं, पर अभी उसमें किसी को भी सफलता नहीं मिली है। अमेरिका और चीन में इस वायरस को लेकर भी तनातनी शुरू हुई। अमेरिका का आरोप है कि यह वायरस प्रकृति जन्य नहीं है बल्कि मनुष्य निर्मित है और इसका उद्देश्य, दुनिया भर में तबाही लाकर चीन अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है।

पर वैज्ञानिक शोधों से अभी तक तो यही प्रमाणित हुआ है कि यह वायरस मानव निर्मित नहीं है। इस संक्रमण को रोकने के लिये दुनिया भर में घरों में बंद रहने की टेक्निक जिसे लॉक डाउन कहा गया अपनाया गया। इसका बेहद विपरीत प्रभाव, अर्थव्यवस्था पर पड़ा। दुनिया भर में आर्थिक मंदी का दौर शुरू हो गया। पर इस मंदी का असर जितना पूंजीवादी देशों पर पड़ा, उतना चीन में नहीं हुआ। 

चीन मूलतः एक विस्तारवादी मानसिकता का देश है। इसी मनोवृत्ति के चलते इसने दुनिया भर के गरीब देशों को आर्थिक सहायता देकर उन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने की कोशिश की। भारत के चारों तरफ इसने एक जाल सा खड़ा कर दिया। पाकिस्तान के माध्यम से वह ग्वादर के रास्ते अरब सागर तक पहुंच गया है। श्रीलंका के माध्यम से उसकी मौजूदगी हिन्द महासागर में हो गयी है। नेपाल को अपने आर्थिक मायाजाल में लेकर भारत के लिये एक बड़ी समस्या जो मनोवैज्ञानिक अधिक है, खड़ी कर दी है। नेपाल से हमारे सम्बंध अच्छे हैं, और दोनों ही देशों में कोई विवाद नहीं है, पर इधर चीन के षड्यंत्र से एक तनाव और खटास का वातावरण ज़रूर बन गया है। चीन की वन बेल्ट वन रोड योजना ने उसकी महत्वाकांक्षी और विस्तारवादी योजना का ही प्रमाण दिया। जहाँ जहाँ से यह महत्वाकांक्षी योजना निकल रही है चीन उन्हें अपने उपनिवेश के रूप में देख रहा है। 

चीन के इस बढ़ते प्रभाव ने अमेरिका को सशंकित कर दिया और वह नहीं चाहता कि दुनिया में कोई और ध्रुवीय महाशक्ति उभरे। सोवियत रूस को विघटित करने के बाद लम्बे समय तक उसकी बादशाहत रही है। अब उसे यह चुनौती मिल रही है। इतिहास फिर खुद को दुहरा रहा है। एक समय कम्युनिस्ट रूस अमेरिका के लिये खतरा बना था तो आज फिर एक लाल खतरा उसे दिख रहा है। माइक पांम्पियो का भाषण दुबारा पढ़ें। उसमे साफ साफ यह कहा गया है कि अमेरिका, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की प्रसार वादी नीतियों के खिलाफ अपनी रणनीति बना रहा है और अपने सैन्य बल को पुनः नयी रणनीति के आधार पर तैनात कर रहा है। इसी सिलसिले में माइक भारत के सीमा विवाद का उल्लेख करते हैं और वे चाहते हैं कि उनका सैन्य बल भारत में रहे और इस माध्यम से वे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से अपना वैचारिक संघर्ष पूरा करें। 

इस प्रकार यह शीत युद्ध का यह द्वितीय चरण है। भारत पहले चरण में बड़ी सफाई और खूबसूरती के साथ दोनों ही महाशक्तियों से दूर रहा। पर इस चरण में क्या वह उतनी ही कुशलता से अपने को अलग रख पाता है, यह तो भविष्य ही बताएगा। माइक पॉम्पियो का बयान कि वे कम्युनिस्ट चीन से भारत के बीच तनाव का सैनिक समाधान भी निकालेंगे, के बारे में अभी तक भारत की कोई अधिकृत प्रतिक्रिया नही आयी है। भारत चीन की गलवान घाटी में हुए विवाद जिसमें हमारे 20 सैनिक शहीद हुए हैं, पर अभी सैन्य स्तर पर चीन से वार्ता कर रहा है। लेकिन  इस बातचीत का कोई खास नतीजा निकलता नहीं दिख रहा है। अमेरिका का यह अधिकृत बयान बदलते परिवेश में बेहद महत्वपूर्ण है। 

राष्ट्रपति ट्रूमैन के ही समय से अमेरिका भारत के नज़दीक आने की कोशिश कर रहा था, लेकिन भारत ने खुद को गुट निरपेक्ष आंदोलन से जोड़ा और वह दोनों ध्रुवों से अलग रहा। नेहरू, नासिर, टीटो की त्रिमूर्ति ने शीत युद्ध के उस काल खंड में अपनी अलग राह तय की। अफ्रीकी और एशियाई नव स्वतंत्र देशों का गुट निरपेक्ष आंदोलन धीरे-धीरे मज़बूत होता गया। पर जब दुनिया एक ध्रुवीय बन गयी तो यह आंदोलन कमज़ोर पड़ गया और अब यह केवल एक अतीत का दस्तावेज है। यद्यपि भारत 1961 में गुट निरपेक्ष आन्दोलन की स्थापना करने वाले देशों में प्रमुख था किन्तु शीत युद्ध के समय उसके अमेरिका के बजाय सोवियत संघ से बेहतर सम्बन्ध थे। लेकिन 1962 में चीनी हमले के समय भारत ने अमेरिका से मदद मांगी थी। उसे आपातकाले मर्यादा नास्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। 

भारत और अमरीका दो ऐसे राष्ट्र हैं, जिन्होंने अपने आधुनिक इतिहास के दौरान अपने संबंधों में काफ़ी उतार-चढ़ाव देखे हैं। दोनों देशों के बीच भिन्न-भिन्न सामरिक और विचारधारात्मक कारणों से समय-समय पर तनावपूर्ण संबंध रहे हैं, लेकिन परिस्थितियां बदलने पर दोनों देश एक-दूसरे के नज़दीक भी आए हैं। शीत युद्ध की राजनीति का अमेरिकी-भारत संबंधों पर गहरा प्रभाव पड़ा। जबकि विश्व के अधिकतर देश पूर्वी ब्लॉक और पश्चिमी ब्लॉक में बंटे हुए थे, भारत ने सैद्धांतिक रूप से गुट-निरपेक्ष रहने का फ़ैसला किया पर वह अमरीका के बजाय सोवियत संघ के ज्यादा क़रीब रहा। 1971 में हुयी भारत सोवियत संघ बीस साला संधि ने हमें एक मजबूत मित्र दिया और 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम और पाकिस्तान के साथ युद्ध में, हमारी शानदार विजय के पीछे इस मित्रता की महती भूमिका भी रही है। 

दूसरी ओर, इस समय अब भारत की मौजूदा नीति अपने राष्ट्रीय हितों की ख़ातिर एक साथ विभिन्न देशों से अच्छे संबंध बनाने की है। भारत, ईरान, फ़्रांस, इस्राइल, अमेरिका और बहुत से अन्य देशों के साथ मित्रता बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। भारत और अमेरिका के रिश्ते अब और मजबूत हुए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति  बिल क्लिंटन, 2000 ई में और उसके पहले, जिमी कार्टर 1978 में, रिचर्ड निक्सन 1969 में और आइज़नहावर 1959 में भारत आये थे।

मार्च 21, 2000 को राष्ट्रपति क्लिंटन और प्रधानमंत्री वाजपेयी ने नई दिल्ली में एक संयुक्त बयान, “भारत-अमेरिकी संबंध : 21वीं शताब्दी के लिए एक परिकल्पना” नामक संयुक्त दस्तावेज पर हस्ताक्षर किये थे। 25 जनवरी 2015 को भारत की तीन दिन की यात्रा पर आये अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि बनने वाले पहले अमरीकी राष्ट्रपति रहे। अभी हाल ही में 24 और 25 फरवरी को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत की यात्रा की। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने अमेरिका की कई यात्राएं कीं, और उनके ट्रम्प और बराक ओबामा से बेहद करीबी रिश्ते आज भी हैं। 

शीत युद्ध के बाद एकध्रुवीय विश्व में अमेरिका एकमात्र सुपर पावर बनकर उभरा, इसीलिए यह भारत के राष्ट्रीय हितों के अनुकूल था कि अमेरिका के साथ संबंधों को अनुकूल किया जाए तथा शीत युद्धोत्तर विश्व में भारत ने अर्थिक उदारीकरण की नीति अपनायी, क्योंकि भूमंडलीकरण को बढ़ावा दिया गया था। भारतीय विदेश नीति में आर्थिक कूटनीति को प्रमुख स्थान दिया गया तथा अमेरिका ने भी भारत को एक उभरते बाजार के रूप में देखा।अमेरिका द्वारा भारत में निवेश भी आरंभ हुआ। आर्थिक रूप से दोनों देशों के बीच संबंध मजबूत भी हो रहे थे, किन्तु परमाणु अप्रसार के मुद्दे पर अमेरिका एनपीटी व सीटीबीटी पर हस्ताक्षर के लिए भारत पर दबाव बनाए हुए था।

भारत के द्वारा, परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर से इंकार करने और 1998 में परमाणु परीक्षण करने के बाद अमेरिका ने भारत को अलग-थलग करने की नीति अपनायी, जिसका भारतीय अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक परिणाम देखा गया।1999 में पाकिस्तानी सेना द्वारा नियंत्रण रेखा का उल्लंघन करके भारत के क्षेत्र में प्रवेश किया गया तो यह पहला मौका था जब भारतीय कार्यवाही का अमेरीका ने विरोध नहीं किया। धीरे धीरे स्थिति सुधरती चली गई और अब भारत अमेरिका सम्बंध प्रगाढ़ हैं। कूटनीतिक रिश्ते सदैव कभी नीम नीम तो कभी शहद शहद सरीखे होते हैं। 

प्रथम और अब इस आसन्न द्वितीय शीत युद्ध में एक मौलिक अंतर है जो सोवियत रूस और चीन की कूटनीतिक और ऐतिहासिक मानसिकता में है। अमेरिका तो तब भी पूंजीवादी व्यवस्था का शिखर प्रतीक बना रहा और अब भी वह है पर अब थोड़ा और अहंकार तथा ‘जहां तक मैं देखता हूँ, वहां तक मेरा ही साम्राज्य है’ कि दर्पयुक्त मानसिकता से वह लबरेज है। सोवियत रूस विस्तारवादी नहीं था जबकि चीन विस्तारवाद से बुरी तरह ग्रस्त है। वह तिब्बत की पांच उंगलियों के माओ के सिद्धांत, पर अब भी अमल करता है और विस्तारवाद के वायरस ने चीन के संबंध उसके सभी पड़ोसियों से बिगाड़ कर रख दिये हैं। जबकि सोवियत रूस के साथ ऐसा नहीं था। आज चाहे भारत हो या जापान सभी चीन की इस दादागिरी से त्रस्त हैं। भारत की सीमाएं चूंकि चीन से मिलती हैं और यह सीमा जटिल भौगोलिक स्थिति के कारण निर्धारित भी नहीं है तो चीन के विस्तारवाद का दंश भारत को अधिक झेलना पड़ता है। गलवान घाटी और लद्दाख की हाल की घटनाएं इसी मानसिकता का प्रमाण हैं। 

यह कहा जा सकता है कि, माइक पॉम्पियो का यह बयान, अमेरिकी सरकार का अधिकृत बयान नहीं है, यह ब्रुसेल्स में एक थिंक टैंक में दिया गया उनका वक्तव्य है। लेकिन यह अमेरिकी कूटनीतिक लाइन तो है ही। अब यह सवाल उठता है कि माइक पांम्पियो के अनुसार, कम्युनिस्ट चीन से उनके इस वैचारिक युद्ध में भारत की क्या भूमिका होनी चाहिए ? मेरी राय में भारत को अमेरिका के इस झांसे में नहीं आना चाहिए कि वह भारत चीन सीमा विवाद के इस दौर में भारत की एक इंच भूमि पर भी, अमेरिकी सेना को आने की अनुमति दे। अमेरिका चीन का यह आपसी विवाद वैचारिक तो है ही आर्थिक वर्चस्व का भी है। यह द्वंद्व शुरू हो चुका है। अमेरिका की दिली इच्छा है कि वह भारत पाकिस्तान और भारत चीन के बीच हर विवाद में चौधराहट और मध्यस्थता करे। अमेरिका का यह इरादा छुपा हुआ भी नहीं है।

ट्रम्प तो मध्यस्थता की मेज पर बैठने के लिये बेताब हैं। पर भारत ने फिलहाल अमेरिका के इस प्रस्ताव को खुल कर खारिज़ कर दिया है। अमेरिका का, भारत में सैन्य बल के साथ भारत की रक्षा करने के नाम पर घुसना एक बार फिर से एक साम्राज्यवादी ताक़त के सामने आत्मसमर्पण करना होगा । अमेरिका और चीन के बीच इस वैचारिक और आर्थिक संघर्ष में, हम एक उपनिवेश की तरह बन कर रह जाएंगे। अमेरिका ने एक बार भी चीन को यह सख्त संदेश नहीं दिया है कि वह घुसपैठ बंद करे और वापस जाए। जबकि कारगिल में अमेरिका का रुख पाकिस्तान के प्रति सख्त था। यह इसलिए कि अमेरिका खुद भी चीन से सीधे भिड़ना नहीं चाहता है वह हमारे कंधे पर बंदूक रख कर अपना हित साधना चाहता है। 

एक बात भारत को समझ लेनी चाहिए कि, चीन तो विश्वसनीय नहीं है पर अमेरिका भी चीन से कम अविश्वसनीय नहीं है। अमेरिका का भारत में वैधानिक घुसपैठ का एक ही उद्देश्य है, आगामी शीत युद्ध की परिस्थिति में एशिया में एक मजबूत ठीहा बनाना, जहां से वह चीन की दक्षिणी सीमा से लेकर सिंगापुर मलेशिया होते हुए दक्षिण चीन सागर तक अपनी मजबूत मौजूदगी रख सके। अमेरिका अपने प्रस्तावित सैन्य अड्डे पर जो भी व्यय करेगा उसका एक एक पैसा वह भारत से वसूल करेगा और भारत को एक ऐसी स्थिति में ला कर खड़ा कर देगा कि न केवल भारत की विदेश नीति वह संचालित करने की हैसियत में आ जायेगा बल्कि हमारी गृह नीति भी वह प्रभावित करने लगेगा। 

भारत को अपनी चीन नीति और साथ ही सभी पड़ोसी देशों से अपनी नीति की समीक्षा करनी होगी। पड़ोसियों से सीमा विवाद का हल सामरिक तो तब निकलेगा जब समर छिड़ जाय पर समर की स्थिति सदैव बनी भी नहीं रह सकती है अतः कूटनीतिक मार्ग का अनुसरण ही उचित रास्ता है।

( विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानपुर में रहते हैं।)

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