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जेपी की संपूर्ण क्रांति और आज का समय

भारतीय नागरिक और उसकी लोकतांत्रिक संस्थाएं आज पतन के जिस दौर में हैं उसमें स्वाधीनता सेनानी और आजादी की दूसरी लड़ाई का नेतृत्व करने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा पर सबसे ज्यादा बहस की जरूरत है। यह कहने वाले बहुत मिल जाएंगे कि आज जेपी नहीं हैं वरना मौजूदा अधिनायकवादी व्यवस्था को चुनौती देने और विकल्प खड़ा करने में देर न लगती लेकिन ऐसा कहने वाले कम हैं कि भले जेपी नहीं हैं लेकिन उनके विचार तो हैं और हम उन विचारों की रोशनी में नया समाज बनाने का अभियान तो चला ही सकते हैं।

दरअसल आज का युवा और राजनेता या तो जेपी का नाम नहीं जानता और अगर जानता भी है तो गलत संदर्भों में। कुछ लोग तो यह समझते हैं कि जेपी राष्ट्रीय स्वयंसंघ के नेता थे और उन्होंने उसका विस्तार करने के लिए ही आंदोलन चलाया था। कुछ वेबसाइटों पर आपको यह जानकारी मिल जाएगी कि जेपी ने 5 जून 1974 को पटना के विशाल गांधी मैदान में इंदिरा गांधी के विरुद्ध संपूर्ण क्रांति का आह्वान किया था। एक ओर हिंदू राष्ट्रवादी हैं जो जेपी को महज 1974 के आंदोलन और 1977 में इंदिरा गांधी को सत्ता से हटाने तक सीमित कर देते हैं तो दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो उन्हें आरएसएस को मुख्यधारा में लाने वाले एक महान व्यक्ति की महान भूल के नाते याद करते हैं। जेपी की विरासत और उनकी संपूर्ण क्रांति का इससे बुरा कुपाठ हो नहीं सकता। क्या हम अपने इतिहास के इतने बड़े महानायक के बारे में इतनी गलत व्याख्या सिर्फ इसलिए प्रस्तुत करते हैं क्योंकि उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक के एक कार्यक्रम में यह कह दिया था कि अगर संघ फासिस्ट है तो वे भी फासिस्ट हैं। देश के लिए और मनुष्य के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले एक महात्मा से ऐसी चिढ़ ही हमें कोई आदर्श गढ़ने और उस पर चलने से रोकती है।

इसलिए जरूरी है कि जेपी की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा की उत्पत्ति को समझने और वह जिस भी अवस्था में है उसे विकसित करने की जरूरत है। जेपी संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को अपने स्वास्थ्य और राजनीतिक संघर्ष के कारण बहुत विस्तार नहीं दे सके लेकिन परवर्ती काल में उनके मित्रों और अनुयायियों ने इस पर लिखा है। जेपी के निजी सचिव सच्चिदानंद सिन्हा उर्फ सच्चिदा बाबू ने चार खंडों में संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को विस्तार दिया है। इसी तरह लखनऊ मेडिकल कालेज के प्राचार्य रहे डॉ. एमएल गुजराल ने भी संपूर्ण क्रांति की अवधारणा को विस्तार देने का प्रयास किया है। गांधीवादी संस्थाओं से जुड़े सुभाष मेहता ने भी ए हैंडबुक आफ सर्वोदय शीर्षक से लिखी पुस्तक के दो खंडों में गांधी, विनोबा और जयप्रकाश नारायण के विचारों को व्यवस्थित करने की कोशिश करते हैं और जयप्रकाश नारायण की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा पर प्रकाश डालते हैं।

जयप्रकाश की संपूर्ण क्रांति मनुष्य और उसके समाज में भीतर और बाहर अंहिंसक तरीके से किए जाने वाले बुनियादी परिवर्तन का नाम है। इसके मूल में स्वतंत्रता, समता और भ्रातृत्व के मूल्य हैं। जेपी ने 1959 में भारतीय राजनीति की पुनर्रचना की अपील और 1961 में जनता के लिए स्वराज शीर्षक से दो महत्वपूर्ण लेख लिखे थे। उसमें उनके संपूर्ण क्रांति के विचार मौजूद हैं। उसके बाद उन्होंने 1969 में एक लेख लिखा जिसमें सबसे पहले संपूर्ण क्रांति शब्द का प्रयोग किया। यह विचार जयप्रकाश नारायण की एक निस्वार्थी और बलिदानी बौद्धिक और राजनीतिक यात्रा का मानवता और विशेषकर भारत के लिए निचोड़ है। जेपी के विचार देखने पर टेढ़े मेढ़े रास्ते से गुजरते हुए लगते हैं लेकिन वह एक ईमानदार क्रांतिकारी का सत्य और स्वतंत्रता के साथ प्रयोग है। जेपी पहले राष्ट्रवादी थे और आगे चलकर मार्क्सवादी हुए और फिर लोकतांत्रिक समाजवाद के माध्यम से गांधीवाद के करीब आए और फिर सर्वोदय से होते हुए संपूर्ण क्रांति के मुकाम तक गए। हालांकि जेपी अपनी व्याख्या में सर्वोदय और संपूर्ण क्रांति में ज्यादा अंतर नहीं देखते और वे सर्वोद्य को साध्य और संपूर्ण क्रांति को साधन मानते हैं। लेकिन एक बात जरूर है कि संपूर्ण क्रांति सर्वोदय आंदोलन की तरह से ठहरा हुआ विचार या व्यवहार नहीं है बल्कि एक प्रतिरोधी गतिशीलता और नवनिर्माण का विचार है।

जेपी समाजशास्त्र के गंभीर विद्यार्थी थे और मार्क्सवाद का उनका अध्ययन भारत में उनके समकालीन किसी भी मार्क्सवादी से कम नहीं था। इसलिए जब 1974 में पहली बार उन्होंने व्यवहार के तौर पर युवाओं के समक्ष संपूर्ण क्रांति का नारा दिया तो यह अचानक प्रकट होने वाली धारणा नहीं थी। इसकी एक मार्क्सवादी परंपरा है और जेपी से ज्यादा इस बात को कौन समझ सकता है। टोटल रिवोल्यूशन शब्द का प्रयोग सबसे पहले 1847 में कार्ल मार्क्स ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक `पावर्टी आफ फिलास्फी’ में दिया था। जेपी ने 127 साल बाद उस अवधारणा को भारत में उतारने का प्रयास किया। कार्ल मार्क्स ने कहा था, “ इस बीच सर्वहारा और बुर्जुआ वर्ग के बीच का अंतर्विरोध एक वर्ग का दूसरे वर्ग से संघर्ष है। यह संघर्ष अपनी सर्वोच्च अभिव्यक्ति संपूर्ण क्रांति में प्रकट करता है।’’

जेपी मार्क्सवादी दर्शन में वर्णित क्रांति की अवधारणा और उसके साथ ही सर्वहारा की तानाशाही की अनिवार्यता को त्याग चुके थे। यही वजह है कि वे सर्वोदयी विचारों के साथ जुड़े। लेकिन वर्ग की उपस्थिति और उनके बीच टकराव की वास्तविकता को वे आखिर तक स्वीकार करते रहे। सन 1977 में जेपी ने छात्र संघर्ष वाहिनी के युवाओं को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि संपूर्ण क्रांति जीवन के सभी पक्षों में परिवर्तन करना चाहती है और वर्गविहीन और जातिविहीन समाज की एक जीवन शैली विकसित करना चाहती है। उन्होंने समाज में परिवर्तन लाने के लिए वर्ग संघर्ष को एक तकनीक के रूप में स्वीकार किया था।

जब जेपी के इस इंटरव्यू पर उनके सर्वोदयी साथी आपत्ति करने लगे और यह भी कहने लगे कि अब वे फिर मार्क्सवाद की ओर जा रहे हैं तो उनका कहना था कि वर्ग संघर्ष कोई पैदा नहीं करता। वास्तव में समाज में शक्तिशाली और कमजोर दो किस्म के तबके रहते हैं। सवाल इस बात का है कि आप किस वर्ग के साथ खड़े होते हैं। जेपी ने लंबे समय तक सर्वोदय आंदोलन में भूदान और ग्रामदान के लिए काम करते हुए यह जान लिया था कि वह तरीका ज्यादा कारगर सिद्ध नहीं हो रहा है। उनका यह यकीन कमजोर हो गया कि शक्तिशाली तबका स्वयं उदारता दिखाते हुए कमजोर वर्ग की जिम्मेदारी लेगा। यही वजह थी कि उन्होंने कमजोर वर्ग को संगठित होने और अपने अधिकारों के लिए दावा करने का आह्वान किया। उनका संदेश लड़ाई लड़ने का नहीं था लेकिन खामोश बैठने का भी नहीं था। वे चाहते थे कि कमजोर तबका कार्रवाई करे। उसके लिए उन्होंने सविनय अवज्ञा, शांतिपूर्ण प्रतिरोध और असहयोग का रास्ता सुझाया। कुल मिलाकर वे सत्याग्रह के माध्यम से अपनी संपूर्ण क्रांति के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहते थे।

जेपी ने कार्ल मार्क्स की अवधारणा से अपना अंतर स्पष्ट करते हुए कहा था, “ कार्ल मार्क्स ने वर्ग संघर्ष के बारे में जो कहा था कि वह औद्योगिक समाज के बारे में था। हमारा समाज प्रमुख रूप से एक कृषि आधारित समाज है। मार्क्स के वर्ग संघर्ष के सिद्धांत में हिंसा है जबकि मेरा सिद्धांत शांतिपूर्ण और अहिंसक है।’’

जेपी और मार्क्सवादी विचारों में यह भी फर्क है कि जहां मार्क्सवाद में समाज का परिवर्तन सत्ता के अतिकेंद्रीकरण और पूर्ण राज्यवाद के माध्यम से होता है वहीं जेपी की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा इसके विपरीत है। वे गांधी की तरह ग्राम स्वराज को मान्यता देते थे और सत्ता के विकेंद्रीकरण पर जोर देते थे। हालांकि वैसी स्थिति लाने के लिए भी उन्होंने जनक्रांति, जनांदोलन और व्यापक परिवर्तन का आह्वान किया था क्योंकि उनका भी मानना था कि समाज का परिवर्तन टुकड़ों टुकड़ों में नहीं होना चाहिए। उसमें सामूहिकता होनी चाहिए और व्यक्ति और व्यवस्था में एक साथ परिवर्तन होना चाहिए।

क्रांति के बारे में जेपी की सोच एकदम स्पष्ट थी कि उसे कोई एक नेता नहीं करता। हर क्रांति अपनी दिशा स्वयं तय करती है। कोई लेनिन या जेपी सिर्फ इतना बता सकते हैं कि क्रांति की स्थितियां हैं या नहीं। “ इतिहास का कोई भी नेता चाहे कितना महान हो, चाहे लेनिन हों, माओ हों या गांधी हों उसने स्वयं क्रांति नहीं की बल्कि क्रांतियां हुई हैं।’’ उनकी संपूर्ण क्रांति में जिन सात क्रांतियों को शामिल किया गया था वे थीं—सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, विचारधारात्मक, बौद्धिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक।

जेपी की इस क्रांति की अवधारणा में खास बात राजशक्ति पर लोकशक्ति का नियंत्रण कायम करना था। आज भारतीय समाज में राजशक्ति ने लोकशक्ति पर नियंत्रण कायम कर लिया है। यही कारण है कि जेपी जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार जनता को दिए जाने के पक्ष में थे। इन सबसे ऊपर जेपी के भीतर एक उच्च स्तरीय नैतिकता बोध था और उसी से जुड़ा हुआ सेवा भाव था। यही कारण है वे विभिन्न राजनीतिक दलों की छल कपट की भाषा और कार्रवाई को नापसंद करते थे। इसी बात को आगे ले जाते हुए उन्होंने दल विहीन लोकतंत्र की बात की थी।

जेपी की संपूर्ण क्रांति की अवधारणा आकर्षक है और समय की मांग भी है लेकिन वह एक प्रकार से आदर्शवादी और यूटोपिया वाली भी है। मधु लिमए ने उनके पार्टी विहीन लोकतंत्र के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया था। इसी प्रकार जेपी ने छात्रों को क्रांति की मशाल थमाने की कोशिश की थी लेकिन न तो वह कोई स्थायी तबका है और न ही उसकी वर्गीय निष्ठाएं स्पष्ट हैं। इसलिए उनकी क्रांति शायद परवान नहीं चढ़ सकी। जेपी के अनुसार आज का औद्योगिक मजदूर वर्ग पेटी बुर्जुआ हो गया है इसलिए उससे क्रांतिकारी कामों की उम्मीद नहीं की जा सकती। उसकी तुलना में वे ग्रामीणों पर कुछ भरोसा करने की बात करते थे और सामूहिक खेती की पैरवी करते थे।

आज देश में किसान आंदोलन चल रहा है और खेती किसानी पर नए किस्म का संकट है। दूसरी ओर देश में असमानता बढ़ रही है और स्वतंत्रता और भाईचारे पर नए किस्म के खतरे उपस्थित हैं तब जेपी की संपूर्ण क्रांति पर चर्चा की बहुत जरूरत है। ऐसे में जेपी को फासिस्ट या फासिस्टों का साथी कहना हमें भटकाने के अलावा कहीं नहीं ले जाएगा। जेपी की पूरी सोच के केंद्र में मनुष्य है राष्ट्र की नस्ल नहीं। वे नागरिक अधिकारों के हिमायती हैं। ध्यान रहे कि उन्होंने जो कहा था वह अपने अनुभव और समय के लिहाज से कहा था। आज 47 साल बाद देश को नैतिक पतन से निकालने और मानवीय गरिमा के मूल उद्देश्य को जाग्रत करने के लिए उसकी नई व्याख्या की आवश्यकता है।

(अरुण कुमार त्रिपाठी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)  

This post was last modified on June 5, 2021 3:23 pm

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